जहाँ पैसे के सामने न्यायालय भी होता अंधा, उस देश के हम वासी हैं।
भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान।
मेरा देश भले हो बेईमान, पर फिर भी है यह महान।
दिल की आवाज़ में आपका स्वागत है। यहाँ आप विभिन्न विषयों पर महेश कुमार वर्मा के स्वतंत्र विचार, तर्क व रचनाएँ देख व पढ़ सकते हैं। आपके स्वतंत्र व निष्पक्ष सुझाव व विचारों का स्वागत है। E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....
Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
दीपावली की शुभकामनाएं
अंतर में ज्ञान का दीप जलाकर सत्य के प्रकाश में ईमानदारिता के राह पर चलें।
आज विजया दशमी का पर्व है। इसी दिन लोग दशहरा पर्व का समापन भी करते हैं। कहा जाता है कि दस सिरों वाला रावण इसी दिन हारा था यानि भगवान राम के हाथों मारा गया था। और इसी के यादगार में लोग इस दिन रावण का पुतला जलाते हैं और खुशियाँ मानते हैं। पर लोग यह भूल जाते हैं कि रावण बहुत ही बड़ा विद्वान था। रावण के मरते वक्त खुद भगवान राम ने भी विद्वान रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने गए थे। क्या राम रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए जाकर गलती किए? क्या भगवान राम के इस कार्य से हमें सिख नहीं लेनी चाहिए? .......... निःसंदेह हमें भगवान राम के इस कार्य से सिख लेनी चाहिए। आखिर भगवान राम के इस कार्य से हमें क्या सिख मिलती है? इस घटना से हमें यही सिख मिलती है कि शत्रु के भी अच्छे गुणों को ग्रहण करें. रावण बहुत ही बड़ा विद्वान व पंडित था। भले ही किसी एक घटना के कारण वह भगवान राम के हाथों मारा गया। पर उसकी विद्वता को इंकार नहीं किया जा सकता है। और इसी कारण ही भगवान राम भी उनके पास शिक्षा ग्रहण करने गए। हमें किसी के जीवन से उसके बुराई को छोड़कर अच्छाई को ग्रहण करना चाहिए। अतः हमें भी विजया दशमी का यह पर्व भी इसी लक्ष्य को रखकर मनाना चाहिए। पर हम करते क्या हैं। सिर्फ रावण का पुतला जलाने का ही रश्म मानते हैं। और कोई अच्छाई को ग्रहण करने का कार्य नहीं करते है। विजया दशमी के दिन बेवजह के बेकसूर जीव को मारकर उसके मांस खाकर अपना पेट भरते हैं। क्या भगवान राम ने ऐसा किया था? नहीं न? तब हम ऐसा क्यों करते है? और यदि सिर्फ रावण के पुतला को जलाकर ही विजया दशमी का पर्व मनाना है तो जरा सोचें कि रावण को तो राम ने मारा था पर यहाँ राम है कहाँ जो रावण को मारेगा? जब आप राम के तरह नहीं हैं तो आपको रावण का पुतला जलाकर रावण की निंदा कर विजया दशमी का पर्व मानाने का अधिकार कैसे हैं?
विजया दशमी का पर्व मनाओ पर पहले राम बनो तब रावण को मारना।
तीन भिखारी
हाथ में कटोरा लिए
आधा कपड़ा फटे हुए
आधा तन उघड़े हुए
एक हाथ में लाठी लिए
झुकी कमर से चल रहे
लोगों से हैं कह रहे
दे दो बाबू दे दो
इस बुढ़े को दे दो
तू एक पैसे देगा
वो दस लाख देगा
दे दो बाबू दे दो
दे दो बाबू दे दो
उसे देख कई चलने वाले
सिक्के डाल देते कटोरी में उसके
कोई अपने आप से कहता
यही है इन लोगों का धंधा
तो कोई नजर छुपाकर बढ़ जाते
व सुरक्षित रखते अपने पैसे
सुरक्षित रखते अपने पैसे
सड़क पर के भिखारी ये
मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए
मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए
थोड़ी दूर चलने पर
पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में
थोड़ी दूर चलने पर
पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में
वही पुराना ऑफिस
जहॉं मैं वर्षों कार्य किया
वही पुराना ऑफिस
जहॉं से मैं रिटायर हुआ
मेरे रिटायर होने पर
किया था विदाई समारोह सहकर्मियों ने
दिया था कुछ उपहार मेरे सहकर्मियों ने
वही पुराना ऑफिस
वही पुराना ऑफिस जब मैं पहुँचा
लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा
लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा
बड़ा बाबू ऐनक पहने
मोटे फाईल में व्यस्त थे
मुझे देख ऐनक उतार
मुझको वे समझाने लगे
मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए
मॉंग रहे थे मुझसे पैसे
मॉंग रहे थे मुझसे पैसे
कहा उसने
नहीं दोगे तो होगा नहीं काम तुम्हारा
अब नहीं है यहॉं ईमानदारी तुम्हारा
मेरे कलम पर है पैसा तुम्हारा
मेरे कलम पर है पैसा तुम्हारा
अब तुम्हारा नहीं है यहॉं कोई सम्मान
दे दो वरना कर दुँगा तुम्हें बदनाम
फिर नहीं होगा तुम्हारा काम
फिर नहीं होगा तुम्हार काम
मैं वापस आ गया
मैं वापस आ गया
सोचने लगा
मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए
मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे
मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे
यह सोचने पर मैं विवश था
यह सोचने पर मैं विवश था
कि यह तो
उस सड़क किनारे के
भिखारी से भी बदतर निकला
जिसने मेरे पैसे को भी
अपना ही समझा
जिसने मेरे पैसे को भी अपनो ही समझा
नहीं था मेरे पास कोई चारा
सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा
नहीं था मेरे पास कोई चारा
सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा
गया मैं थाना पुलिस के पास
होती दारोगा बाबू से मुलाकात
जो सामने ऑफिस में ही थे
कलम लिए कुछ लिख रहे थे
उनके ईशारे पर
सामने कुर्सी पर मैं बैठा
और सुनाया अपना दुखड़ा
कहा मैं बिल्कुल साफ-सुथरा
नहीं है मेरे पास कोई पैसा
आपसे ही है मुझे आशा
आपसे ही है मुझे आशा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा
दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा
काम तो हो जाएगा
पर देना होगा कुछ पैसा
फिर तुम्हारा सारा पैसा
तुम्हारे हाथ में होगा
और वह बड़ा बाबू
वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा
वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा
पर कुछ तो देना होगा
बिना दिए कुछ नहीं होगा
बिना दिए कुछ नहीं होगा
मैंने कहा
मेरे पास नहीं है पैसा
मेरे पास नहीं है पैसा
वहाँ न दिया तो
आपके लिए
लाऊँ मैं कहॉं से पैसा
लाऊँ मैं कहॉं से पैसा
मेरे पास नहीं है पैसा
पर एक आपसे ही है आशा
एक आपसे ही है आशा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
पर दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना
दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना
कहा उसने संतरी से
निकालो इसे बाहर
और ले जाओ यहॉं से
है नहीं पैसा
और करता है बकवास
ले जाओ इसे यहॉं से
ले जाओ इसे यहॉं से
आया संतरी
बड़ी-बड़ी मुँछों वाला
रंग था उसका बिल्कुल काला
हाथ में लिए था डंडा
खींच मुझे बाहर निकाला
मैं कुछ कहना चाहा
पर उसने एक न सुना
धक्का देकर बाहर निकाला
दो-चार थप्पड़ भी लगाया
और मुझे निकाल दिया
और मुझे निकाल दिया
आया फिर मैं अपने घर में
आया फिर मैं अपने घर में
सोचने लगा
कि ये पुलिस हैं या हैं जल्लाद
ये रक्षक हैं या हैं भक्षक
करते हैं ये धर्म की रक्षा
या करते हैं धर्म को ही हलाल
या करते हैं धर्म को ही हलाल
मैं सोचने लगा
कि ये क्यों मॉंगते हैं मुझसे
ये क्यों मॉंगते हैं मुझसे
सड़क का भिखारी
अपने पेट के लिए मॉंगते हैं
ऑफिस का किरानी
मेरे पैसे को अपना ही समझ लिया
और ये पुलिस
ये तो
ये तो मेरे पैसे व मेरे शरीर
दोनों पर अपना अधिकार जमाया
और बेवजह मुझे मार भगाया
बेवजह मुझे मार भगाया
किरानी रूपी भिखारी
सड़क के भिखारी से बदतर निकला
पर पुलिस रूपी ये भिखारी
सबसे बड़ा घिनौना निकला
सबसे बड़ा घिनौना निकला
जो मेरे शरीर को भी मेरा न समझा
और बेवजह मुझे मार भगाया
बेवजह मुझे मर भगाया
पुलिस रूपी ये जल्लाद
सबसे बड़ा घिनौना निकला
सबसे बड़ा घिनौना निकला
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हमारी पुलिस प्रशासन का हालात कैसी है इसका अंदाजा इसी घटना से लगाया जा सकता है कि आगामी ३०.०४.२००९ को लोकसभा चुनाव है और इससे मात्र ८ दिन पहले २२.०४.२००९ को एक प्रा. वि. के हेडमास्टर श्री चितरंजन भगत का अपहरण होता है। पर घटना के चौथे दिन आज २५.०४.२००९ के अब तक भी पुलिस द्वारा न तो अपहर्ता के विरुद्ध कोई खाश कार्रवाई ही की गयी है न तो अपहृत को ही उनके चंगुल से मुक्त कराया गया है जबकि अपहर्ता व अपहृत से मोबाईल पर बराबर बात हो रही है। इसके बावजूद भी पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं की जा रही है। आरक्षी अधीक्षक (एस. पी.) ने स्पष्ट रूप से कल २४.०४.२००९ को पीड़ित वालों को कह दिया कि मेरे पास कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है। वहीं डी. एस. पी. ने कह दिया कि आपलोग खुद अपने स्तर से मामला को सलटा लें। उल्लेखनीय है कि अपहर्ता द्वारा मोबाईल पर ६ लाख रूपये फिरौती की माँग की गयी है (जो बाद में कम कर ४ लाख कर दिया गया है) और पैसे जमा करने के लिए आज २५.०४.२००९ तक का समय दिया गया है अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी दी गयी है। पर पुलिस अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी है। एस. पी. के अनुसार कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है। जब इस मामला में कार्रवाई करने के लिए प्रशासन के पास फोर्स नहीं है तो आप सोच सकते है कि ५ दिनों के बाद ३०.०४.२००९ को होने वाले चुनाव कितना निष्पक्ष होगा? ............ आख़िर पुलिसवाले करेंगे भी क्या? इस घटना में पुलिसवाले व थाना का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है, इसका भी प्रमाण मिला है, जो इस घटना से स्पष्ट है :
अपहर्ता व अपहृत का फोन हमेशा पीड़ित के एक नजदीकी के मोबाईल पर आता है जिसमें अपहर्ता पैसे की माँग करते हैं अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी देते हैं। ..... मोबाईल धारक द्वारा हुए बातचीत की रिकॉर्डिंग कर ली जाती है और फिर वे इस रिकार्डिंग को संबंधित सलखुआ(सहरसा) थाना के पुलिस अधिकारी को सुनाते हैं। तो फिर बाद में अपराधकर्मियों द्वारा फोन पर कहा जाता है कि आप थाना गए थे और वहाँ हमलोगों के बातचीत के रिकॉर्डिंग सुनाये हैं ........... इस प्रकार कहकर उन्हें धमकी दी जाती है ........................ अब आप खुद सोचें कि थाना में रिकॉर्डिंग सुनाया गया तो यह ख़बर अपराधकर्मियों तक कैसे पहुँचा? यह इसी बात को प्रमाणित करता है कि थाना और पुलिसवाले का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है और इसी कारण ही वे कोई विशेष कार्रवाई नहीं कर रहे हैं और इस केस से अपना पिंड छुड़ाने के लिए कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है, आप अपने स्तर से ही मामला को सलटा लें (यानि पैसे के लेन-देन करके छुड़वा लें)।
इस पुरे घटनाक्रम से हमारी पुलिसिया तंत्र की हालात स्पष्ट होती है जो यदि चाहे तो अपहृत को तुरत मुक्त करा सकता है पर अपराधी से खुद उनकी साथ-गाँठ होने के कारण वे कुछ नहीं कर रही है। घटना बिहार राज्य के सहरसा जिला के सलखुआ थाना क्षेत्र की है। अपहृत श्री चितरंजन भगत सहरसा के संतनगर मुहल्ला के निवासी हैं तथा सलखुआ(सहरसा) के फरकिया क्षेत्र स्थित प्रा. वि., रंगनिया(अलानी) में हेडमास्टर के पद पर पदस्थापित हैं; जिन्हें गत बुधवार यानि २२.०४.२००९ को स्कूल जाने के क्रम में पंचभीरा घाट के समीप सशस्त्र अपराधकर्मियों द्वारा अपहरण कर लिया गया। ...................... इस क्षेत्र में यानी सुपौल लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में अगले कुछ दिनों बाद ३०.०४.२००९ को लोक सभा चुनाव होनी है। अब आप खुद सोचें कि क्या पुलिस प्रशासन की यह हालात यहाँ लोक सभा चुनाव कराने के लिए उचित है? ............. क्या इस हालात में यहाँ निष्पक्ष चुनाव हो सकता है? ................. क्या यहाँ के आम जनता सुरक्षित है? ......................... नहीं, यहाँ न तो आम जनता ही सुरक्षित है और न ही यहाँ के पुलिस प्रशासन ही चुस्त व दुरुस्त है जो सही ढंग से चुनाव करा सके। इस प्रकार यहाँ के यानी लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र सुपौल की वर्तमान स्थिति चुनाव कराने लायक नहीं है। .......... यों भी जब एक अपहरण के मामला में पुलिस कुछ नहीं कर रही है और एस. पी. खुद कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है तो फिर ऐसे विकलांग पुलिस प्रशासन के भरोसे लोक सभा चुनाव कैसे कराया जा सकता है? .....................................
(घटना की जानकारी विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त जानकारी पर आधारित)
वो क्या देगा न्याय
जो न जानता है कि
क्या होता है न्याय
वो क्या देगा न्याय
जो जीवन भर किया अन्याय
न्याय और अन्याय के बीच मरती है भोली जनता
वो क्या जानेगा इसका दर्द
जो है खुद बेदर्द
जो है खुद बेदर्द
-- महेश कुमार वर्मा
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http://paramjitbali-ps2b.blogspot.com/2009/04/blog-post.html
सबों को होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
होली का पवित्र पर्व नजदीक है। मैं व्यक्तिगत रूप से सबों से आग्रह करना चाहता हूँ कि होली के पवित्र पर्व को पवित्र बनाएं रखें व इसे दूषित नहीं करें। कितने लोग इस होली के पर्व के ही दिन पुराने शत्रुता का बदला लेते हैं। कितने लोग पवित्र होली के दिन शराब पीकर मतवाला बने रहते हैं और पवित्र होली को दूषित कर देते हैं। कितने लोग जबरन ही किसी को उसके न चाहने पर भी उसे रंग या अन्य पदार्थ देते हैं। कितने लोग के मंशा सिर्फ शरारत करने की ही रहती है। पर ऐसा नहीं होनी चाहिए। होली आपसी प्रेम का पर्व है न कि शरारत करने का पर्व। होली प्रेम का पर्व है। पर कितने लोग इस दिन विशेष रूप से मांसाहार भोजन करते हैं, जो कि उचित नहीं है। आयें आपसी प्रेम के पर्व होली में मांसाहार का विरोध करें व सबों से प्रेम करें।
कृपया पवित्र होली को पवित्र बनाए रखें। पुनः होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।
आपका
महेश कुमार वर्मा
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http://popularindia.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%८०
आज मैं निम्न पोस्ट पढ़ा :
ब्लागर हैं तो क्या? कानून से ऊपर नहीं (http://teesarakhamba.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html)
ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में (http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=76)
वैसे मैं सम्बंधित ब्लॉग को या इससे सम्बंधित समाचार को अन्यत्र कहीं नहीं पढ़ा या सुना हूँ। पर इस ब्लॉग में लेखक ने जो बात कहना चाहा है वह तो मैं समझ गया. पर एक बात मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि यदि कोई साईट या ब्लॉग या समाचारपत्र ऐसा है जो किसी विषय पर आम लोगों की निष्पक्ष विचार आमंत्रित करता है और सम्बंधित साईट या पत्र का उद्देश्य रहता है कि वह आम लोगों की निष्पक्ष विचार को सार्वजानिक करे ताकि आम जनता यह जान सके कि इस विषय पर किसका क्या विचार है. तब यदि कोई व्यक्ति उसपर अपने विचार में या टिप्पणी में कोई आपत्तिजनक बात लिखता है तो इसके लिए साईट या पत्र का स्वामी जिम्मेवार क्यों होगा और उसपर कार्रवाई क्यों होगी? उसका तो उद्देश्य तो आम लोगों के विचार को सार्वजानिक करना था. .................... ऐसी स्थिति में तो कार्रवाई सम्बंधित विचारक / टिप्पणीकार पर होनी चाहिए न कि साईट / ब्लॉग / समाचारपत्र के स्वामी पर. यदि किसी साईट या पत्र पर आये टिप्पणी से ही किसी के (या टिप्पणीकार के) अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए सम्बंधित साईट / पत्र के स्वामी या प्रकाशक जिम्मेवार क्यों व कैसे होगा? ................... ऐसी स्थिति में यदि कसी के टिपण्णी से किसी के अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए टिप्पणीकार जिम्मेवार होगा और कार्रवाई भी उसी पर होनी चाहिए न कि साईट या पत्र के स्वामी या प्रकाशक पर.............
ऊपर वर्णित पोस्ट के लेखक, प्रकाशक व पाठक कृपया इसपर अपनी राय स्पष्ट करें.
दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के ५९ वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। प्रश्न उठता है की हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाएँ? क्या सिर्फ इसलिए कि हम भारतीय है? जरा सोचें कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए पर आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिली है?
कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गयी है। पर वास्तविकता इनसे कोसों दूर है। वास्तविकता के जमीं पर हम आयें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं। इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय ही होता है।
यह बात सिर्फ कहने-सुनने के लिए ही नहीं बल्कि वास्तविकता है। आप ख़ुद देखें आज बच्चों को उचित शिक्ष भी नहीं मिल पाती है। उन्हें पढने व खेलने का भी अधिकार नहीं है और बचपन से ही उनसे मजदूरी करायी जाती है। ....... आज महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है और महिला वर्ग हमेशा पुरुषों द्वारा प्रताडित ही होती रहती है। आज पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है और तंग आकर वह अपराधी भी बन जा रहा है। आज भारत में न्यायप्रिय राजा नहीं है बल्कि यहाँ सभी मुद्राप्रिय हैं। कभी दुनियाँ को धर्म की शिक्षा देने वाला भारत आज खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है। और इसके लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ-साथ खुद हमारे समाज हैं। जी हाँ, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है कि आज अन्याय व जुल्म के सताए व्यक्ति को उचित न्याय भी नहीं मिल पाता है। पुलिस से लेकर अदालत तक सभी मुद्राप्रिय हो गए हैं और यहाँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुद्रा के आधार पर न्याय होता है। ऐसे कई मामला देखे जाते हैं जहाँ न्यायलय में न्याय करने के लिए बैठे हमारे न्यायाधिश भी पैसे लेकर पैसे वाले के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। अपराध बढ़ाने में तो शायद सबसे बड़ा हाथ समाज से अपराध को मुक्त कराने के लिए बैठे हमारे पुलिसिया तंत्र का ही है। जहाँ यदि आप अपने ऊपर हुए किसी जुल्म व अन्याय के शिकायत करने जाएँ तो आपके साथ क्या जुल्म हुआ यह नहीं देखा जाता है बल्कि देखा जाता है कि आपके पास क्या पैसा है। इतना ही नहीं, अपराधी अपना लाभांश इन पुलिस को देकर ही अपने अपराध के व्यवसाय में दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं। ................. अपराधों को बढ़ाने में हमारा समाज भी पीछे नहीं है। भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं। .........................
इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय मैं भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है? .................... और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? ........ आयें अपने समाज व देश से अन्याय, भ्रष्टाचार व जुल्म को उखाड़ फेकने के लिए कदम आगे बढाकर राष्ट्रहित में कार्य करें।
धन्यवाद।
आपका
महेश कुमार वर्मा
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क्या फायदा हुआ तुम्हें
किसी का घर सुना करके
किसी के मांग का सिंदूर उतार के
किसी को अनाथ करके
किसी को यों ही तड़पा के
किसी को बेमौत मार के
क्या फायदा हुआ तुम्हें
सबों को दर्द देके
है तुम्हारे पास कोई जवाब
नहीं है
क्योंकि तुम ख़ुद बेदर्द हो
क्या जानोगे दुसरे के दर्द
पर याद रखना
परमात्मा के दरबार में
तुम्हें तुम्हारे हर कर्म का जवाब देना होगा
हर कर्म का जवाब देना होगा
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शहीदों को श्रद्धांजलि
-- महेश कुमार वर्मा