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MAHESH KUMAR VERMA
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Sunday, November 22, 2009

भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान

जिस देश में भ्रष्टाचार होती है, उस देश के हम वासी हैं
दिस देश में न्याय का होता हलाल, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ बोलने का नहीं है अधिकार, उस देश के हम वासी हैं
जहाँ स्वतंत्र रहते हुए भी हैं गुलाम, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ धर्म से बड़ा पैसा है, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ पैसे से बिकती है सरकार, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ पैसे के सामने न्यायालय भी होता अंधा, उस देश के हम वासी हैं।
भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान
नहीं है कहीं धर्म का नामों-निशान
उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ हर रोज अपराध होती है, उस देश के हम वासी हैं।
मेरा देश भले हो बेईमान, पर फिर भी है यह महान
होकर बेईमान है जो महान, उस देश के हम वासी हैं।

Sunday, October 18, 2009

हमें मनुष्य बनना होगा

दिवाली का पर्व बीत गया और अब महापर्व छठ निकट गया है। आपको याद होगा पिछले वर्ष छठ पर्व के उपरांत पशुओं ने कवि के रचना के माध्यम से मनुष्य को मुर्ख की संज्ञा देता हुए शाप दिया था कि इनका व्रत निष्फल जाएगा। क्या हम मनुष्य पशुओं के शाप से मुक्त होंगे?

हम मनुष्य को सबसे बुद्धिमान विवेकशील प्राणी कहते हैं पर वास्तव में इनका जीवन आज पशु से भी बदतर है, तभी तो ये पशुओं का दुःख-दर्द नहीं समझते हैं उन्हें मारकर अपना पेट भरते हैंकिसी भी दृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति ने मनुष्य को मांसाहारी जीव के रूप में नहीं बनाया है पर मनुष्य प्रकृति के नियम को तोड़कर मांसाहार करता हैउस समय मनुष्य अपनी सारी बुद्धि खो देता है और पशु से भी बदतर बन जाता
है।

अतः कवि हमें जोर डालते हुए मनुष्य बनने के लिए कहता है :

हमें मनुष्य बनना होगा
पशुओं का दर्द समझना होगा
प्रकृति के साथ चलना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा

बन सके नारायण तो
नर का कर्तव्य निभाना होगा
अंदर के बुराई को हटाना होगा
अच्छाई को लाना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा


-- महेश कुमार वर्मा

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Saturday, October 17, 2009

दीपावली की शुभकामनाएं

दीपावली की शुभकामनाएं

अंतर में ज्ञान का दीप जलाकर सत्य के प्रकाश में ईमानदारिता के राह पर चलें।

Friday, October 9, 2009

दीपावली का संकल्प

दुर्गा पूजा दशहरा बीत गयाईद भी बीत गया और अब गया बुराई पर अच्छाई के विजय अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक पर्व दीपावलीदीपावली सा पर्व हमें अंधकार से प्रकाश में जाने की प्रेरणा देता हैइस पर्व के अवसर पर कई दिन पहले से ही लोग अपने घरों की साफ-सफाई में लग जाते है
कार्त्तिक मास के
अमावस को मनाया जाने वाला इस पर्व को अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक माना जाता हैइस दिन शाम में लोग लक्ष्मी-गणेश का पूजन कर अपने घरों में दीप जलाते हैंलोग घरों को दीपक से सजाते हैं और दीपक के रोशनी से ही अमावस की वह काली रात उजियाला में बदल जाता हैवैसे अब दीपक का स्थान मोमबत्ती विद्युत-बल्ब भी ले लिया हैपर इस दिन लोग अपने घरों को दीप, मोमबत्ती, इत्यादि से प्रकाशवान बनाते हैं खुशियाँ मनाते हैंइस दिन धन की देवी लक्ष्मी की पूजा होती है अतः व्यापारी वर्ग में दुकानों में इस पर्व का विशेष महत्त्व है उस दिन लोग माँ लक्ष्मीं की पूजा कर धन-धान्य की कामना करते हैं
पर्व में खुशियाँ मनाना पर्व के आधार पर अच्छे राह पर चलना तो ठीक है पर लोग कुछ लापरवाही कुछ अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से भी नहीं चुकते हैंआप खुद देखिए, अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक पर्व दीपावली के लिए लोग महीनों पहले से अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं पर दीपावली के दिन क्या करते हैंउस दिन लोग बम-पटाखे आतिशबाजी से ध्वनि वायु प्रदूषित कर हमारे पर्यावरण वातावरण को ही नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि खुद के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाते हैं। ......... अंधकार से प्रकाश में जाना तो ठीक है, साफ-सफाई भी ठीक है पर वातावरण प्रदूषित कर खुद की स्वास्थ्य खराब करना कहाँ तक उचित है? जरा सोचें, दीपावली अंधकार से प्रकाश में जाने का पर्व है की स्वच्छ वातावरण को प्रदूषित करने का। .....................
दूसरी ओर कितने लोगों की यह संकीर्ण मानसिकता रहती है की इस दिन रात में जुआ / सट्टा / पचीसी खेला जाता है / खेलना चाहिए और अपने इसी संकीर्ण मानसिकता के कारण कितने लोग उस रात जुआ खेलते हैं / पैसे सट्टा में लगाते हैं हजारों रुपये बर्बाद करते हैंपर सोचें, क्या हुआ जुआ खेलकर ...... एक ओर धन की देवी लक्ष्मी की पूजा दूसरी ओर जुआ / सट्टा में हार कर धन बर्बाद करना ................ क्यों, ऐसा क्यों? ................... वास्तव में जुआ खेलना धन कमाने का उचित तरीका है ही नहीं। ..................

दीपावली अंधकार से प्रकाश में जाने का पर्व है और इस दिन अपने में बुराई रूपी अंधकार को हटाकर अच्छाई रूपी प्रकाश को लाना चाहिएतो क्यों इस दिवाली में हम बुरे मार्ग से हटकर अच्छे मार्ग पर चलने का संकल्प लें


Monday, September 28, 2009

पहले राम बनो

आज विजया दशमी का पर्व है। इसी दिन लोग दशहरा पर्व का समापन भी करते हैं। कहा जाता है कि दस सिरों वाला रावण इसी दिन हारा था यानि भगवान राम के हाथों मारा गया था। और इसी के यादगार में लोग इस दिन रावण का पुतला जलाते हैं और खुशियाँ मानते हैं। पर लोग यह भूल जाते हैं कि रावण बहुत ही बड़ा विद्वान था। रावण के मरते वक्त खुद भगवान राम ने भी विद्वान रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने गए थे। क्या राम रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए जाकर गलती किए? क्या भगवान राम के इस कार्य से हमें सिख नहीं लेनी चाहिए? .......... निःसंदेह हमें भगवान राम के इस कार्य से सिख लेनी चाहिए। आखिर भगवान राम के इस कार्य से हमें क्या सिख मिलती है? इस घटना से हमें यही सिख मिलती है कि शत्रु के भी अच्छे गुणों को ग्रहण करें. रावण बहुत ही बड़ा विद्वान व पंडित था। भले ही किसी एक घटना के कारण वह भगवान राम के हाथों मारा गया। पर उसकी विद्वता को इंकार नहीं किया जा सकता है। और इसी कारण ही भगवान राम भी उनके पास शिक्षा ग्रहण करने गए। हमें किसी के जीवन से उसके बुराई को छोड़कर अच्छाई को ग्रहण करना चाहिए। अतः हमें भी विजया दशमी का यह पर्व भी इसी लक्ष्य को रखकर मनाना चाहिए। पर हम करते क्या हैं। सिर्फ रावण का पुतला जलाने का ही रश्म मानते हैं। और कोई अच्छाई को ग्रहण करने का कार्य नहीं करते है। विजया दशमी के दिन बेवजह के बेकसूर जीव को मारकर उसके मांस खाकर अपना पेट भरते हैं। क्या भगवान राम ने ऐसा किया था? नहीं न? तब हम ऐसा क्यों करते है? और यदि सिर्फ रावण के पुतला को जलाकर ही विजया दशमी का पर्व मनाना है तो जरा सोचें कि रावण को तो राम ने मारा था पर यहाँ राम है कहाँ जो रावण को मारेगा? जब आप राम के तरह नहीं हैं तो आपको रावण का पुतला जलाकर रावण की निंदा कर विजया दशमी का पर्व मानाने का अधिकार कैसे हैं?

विजया दशमी का पर्व मनाओ पर पहले राम बनो तब रावण को मारना।

Saturday, September 19, 2009

करें मानवता को महान

नमस्कार

आज से शारदीय नवरात्र आरंभ हो गया हैऔर इसके साथ ही दशहरा दुर्गा पूजा का पर्व का भी शुभारंभ होगयाइस खुशी के माहौल में और भी खुशी गयी कि दो दिनों के बाद आपसी प्रेम भाईचारा का पवित्र पर्व ईदहैइन खुशी पवित्र पर्व के अवसर पर आम जनों से मेरा आग्रह है कि इन पर्वों को खुशी पवित्रता के साथ ही मनाएं तथा इन पर्वों में बुराई को आने दें


पर्व है प्रेम भाईचारा का
रखें इसे पवित्र अल्लाह के नाम
पर्व है अन्याय पर न्याय के विजय का
रखें इसे स्वच्छ भगवान के नाम
गर तुम करोगे मांसाहार
तो पर्व हो जाएगा दूषित
हम हो जायेंगे बदनाम
अतः रोको इन कुप्रथाओं को मानवता के नाम
मत करो हिंसा अल्लाह भगवान के नाम
पर्व है पवित्र रखो इसे पवित्र
मत करो इसे दूषित
पर्व है पवित्र
प्रेम भाईचारा का पर्व है बड़ा महान
अन्याय पर न्याय की विजय से होती है
मानवता की पहचान
हम हैं मानव
करें मानवता को महान
करें मानवता को महान

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है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना

प्रेम है बहुत महान

मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है?

मुर्ख मनुष्य

बकरे की जुबान


Tuesday, September 15, 2009

क्यों खफा हो मुझसे

क्यों खफा हो मुझसे यह तो बता
क्यों चुप हो यह तो बता
तुम्हारी चुप्पी मेरे दिल में यों चुभती है
जिसका वर्णन मैं कर सकता नहीं
फिर भी इस आश के साथ जिन्दा हूँ
कि तुम्हारी चुप्पी टूटेगी और
एक दिन तुम मेरे साथ दोगे
मेरे साथ दोगे व मेरे दर्द सुनोगे
मेरे दर्द सुनोगे व उसे दूर करोगे
मेरे चाह को पूरा करोगे
व मेरे दर्द को दूर करोगे
और यदि तुम ऐसा नहीं करोगे
तो फिर तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
जब मेरे दुःख में साथ ही न दो
पर फिर भी इसी आश के साथ हूँ
कि तुम मेरा साथ दोगे
व मेरी सहायता करोगे


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महेश कुमार वर्मा
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Friday, August 14, 2009

स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प

कल १५ अगस्त, २००९ को राष्ट्र स्वतंत्रता की ६२वीं वर्षगाँठ मना रहा हैलोग इस अवसर को मनाने के लिएतरह-तरह की तैयारियाँ किए हैंमैं जानना चाहता हूँ कि आज हम अपने को कैसे स्वतंत्र कहें? क्यों? आप खुद देखें सोचें कि क्या आज हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? आज हमें किस चीज की स्वतंत्रता मिली है, इसपर सोचेंआज हमें तो न्याय पाने का अधिकार है तो आज हमें अन्याय के विरुद्ध बोलने का अधिकार हैइतना ही नहीं हमारी कितनी ही अधिकारों का आज हनन हो गया हैबच्चे पढने खेलने के लिए भी स्वतंत्र नहीं हैं और उन्हें काम पर लगा दिया जाता हैऔर जब उन्हें काम पर लगाया जाता है तो भी फिर उन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती हैतब फिर हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं? आज हम देखते है कि किसी के साथ जब अन्याय होता है तो वह अपनी शिकायत भी नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी शिकायत सुनने फिर उसपर कारवाई होने तक उसे इतना परेशान होना पड़ता है कि उसे न्याय कोसों दूर दिखाई पड़ती हैयदि वह उस पर लगा भी रहा तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसे न्याय मिल ही जाएगातब फिर ऐसी स्थिति में हम कैसे अपने को अपने देश को स्वतंत्र कहें?
हाँ, यहाँ अपराधी स्वतंत्र जरुर हो रहे हैं और अब वे बेहिचक अपराध को अंजाम दे रहे हैं और फिर उसके विरुद्ध कार्रवाई में कमी हुई हैयह कोरी बात नहीं बल्कि वास्तविकता है
तब फिर हम स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाएँ? आखिर किस मुँह से हम अपने अपने देश को स्वतंत्र कहें? क्या हम हमारे देश अपराध को नियंत्रित करने के लिए नहीं बल्कि अपराध को बढ़ाने के लिए हैंनहीं, हमें हमारे देश को ऐसा नहीं बनना हैआएँ इस स्वतंत्रता दिवस में अपने देश को अपराध मुक्त बनाने में एक-दुसरे का सहयोग करने का संकल्प लें


-- महेश कुमार वर्मा
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स्वतंत्रता दिवस पर अन्य रचनाएँ

Sunday, July 19, 2009

तीन भिखारी

तीन भिखारी

 

हाथ में कटोरा लिए

आधा कपड़ा फटे हुए

आधा तन उघड़े हुए

एक हाथ में लाठी लिए

झुकी कमर से चल रहे

लोगों से हैं कह रहे

दे दो बाबू दे दो

इस बुढ़े को दे दो

तू एक पैसे देगा

वो दस लाख देगा

दे दो बाबू दे दो

दे दो बाबू दे दो

उसे देख कई चलने वाले

सिक्‍के डाल देते कटोरी में उसके

कोई अपने आप से कहता

यही है इन लोगों का धंधा

तो कोई नजर छुपाकर बढ़ जाते

व सुरक्षित रखते अपने पैसे

सुरक्षित रखते अपने पैसे

सड़क पर के भिखारी ये

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

 

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

वही पुराना ऑफिस

जहॉं मैं वर्षों कार्य किया

वही पुराना ऑफिस

जहॉं से मैं रिटायर हुआ

मेरे रिटायर होने पर

किया था विदाई समारोह सहकर्मियों ने

दिया था कुछ उपहार मेरे सह‍कर्मियों ने

वही पुराना ऑफिस

वही पुराना ऑफिस जब मैं पहुँचा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

बड़ा बाबू ऐनक पहने

मोटे फाईल में व्‍यस्‍त थे

मुझे देख ऐनक उतार

मुझको वे समझाने लगे

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

कहा उसने

नहीं दोगे तो होगा नहीं काम तुम्‍हारा

अब नहीं है यहॉं ईमानदारी तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

अब तुम्‍हारा नहीं है यहॉं कोई सम्‍मान

दे दो वरना कर दुँगा तुम्‍हें बदनाम

फिर नहीं होगा तुम्‍हारा काम

फिर नहीं होगा तुम्‍हार काम

 

मैं वापस आ गया

मैं वापस आ गया

सोचने लगा

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

यह सोचने पर मैं विवश था

यह सोचने पर मैं विवश था

कि यह तो

उस सड़क किनारे के

भिखारी से भी बदतर निकला

जिसने मेरे पैसे को भी

अपना ही समझा

जिसने मेरे पैसे को भी अपनो ही समझा

 

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

गया मैं थाना पुलिस के पास

होती दारोगा बाबू से मुलाकात

जो सामने ऑफिस में ही थे

कलम लिए कुछ लिख रहे थे

उनके ईशारे पर

सामने कुर्सी पर मैं बैठा

और सुनाया अपना दुखड़ा

कहा मैं बिल्‍कुल साफ-सुथरा

नहीं है मेरे पास कोई पैसा

आपसे ही है मुझे आशा

आपसे ही है मुझे आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

काम तो हो जाएगा

पर देना होगा कुछ पैसा

फिर तुम्‍हारा सारा पैसा

तुम्‍हारे हाथ में होगा

और वह बड़ा बाबू

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

पर कुछ तो देना होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

 

मैंने कहा

मेरे पास नहीं है पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

वहाँ न दिया तो

आपके लिए

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

पर एक आपसे ही है आशा

एक आपसे ही है आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

पर दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

कहा उसने संतरी से

निकालो इसे बाहर

और ले जाओ यहॉं से

है नहीं पैसा

और करता है बकवास

ले जाओ इसे यहॉं से

ले जाओ इसे यहॉं से

आया संतरी

बड़ी-बड़ी मुँछों वाला

रंग था उसका बिल्‍कुल काला

हाथ में लिए था डंडा

खींच मुझे बाहर निकाला

मैं कुछ कहना चाहा

पर उसने एक न सुना

धक्‍का देकर बाहर निकाला

दो-चार थप्‍पड़ भी लगाया

और मुझे निकाल दिया

और मुझे निकाल दिया

 

आया फिर मैं अपने घर में

आया फिर मैं अपने घर में

सोचने लगा

कि ये पुलिस हैं या हैं जल्‍लाद

ये रक्षक हैं या हैं भक्षक

करते हैं ये धर्म की रक्षा

या करते हैं धर्म को ही हलाल

या करते हैं धर्म को ही हलाल

मैं सोचने लगा

कि ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

सड़क का भिखारी

अपने पेट के लिए मॉंगते हैं

ऑफिस का किरानी

मेरे पैसे को अपना ही समझ लिया

और ये पुलिस

ये तो

ये तो मेरे पैसे व मेरे शरीर

दोनों पर अपना अधिकार जमाया

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मार भगाया

 

किरानी रूपी भिखारी

सड़क के भिखारी से बदतर निकला

पर पुलिस रूपी ये भिखारी

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

जो मेरे शरीर को भी मेरा न समझा

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मर भगाया

पुलिस रूपी ये जल्‍लाद

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

 

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महेश कुमार वर्मा
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Tuesday, July 14, 2009

अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों

हमारे देश को स्वतंत्र हुए ६२ वर्ष हो गए और अब हम पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं, कोई कुछ करने वाला नहीं है। चाहे भ्रष्टाचार का मामला हो या अपराध का मामला हो हम बेरोकटोक आगे बढ़ रहे हैं। आखिर हम स्वतंत्र जो हैं, मेरे कार्य पर कोई भला क्यों अंकुश लगाएगा? इतना ही नहीं हम अपने पहनावे में भी पूर्ण स्वतंत्र हो गए हैं। अपने इच्छानुसार हम ज्यादा कपड़े पहनें या कम पहनें, दुसरे को क्यों कुछ भी लेना-देना? तब तो आज फिल्म से लेकर हमारे समाज तक में शरीर पर से वस्त्र घटने लगे हैं। और यही देखकर मेरे कलम को भी नहीं रहा गया और उसे यह गीत गाना पड़ा :
हट गए हैं वस्त्र तन से साथियों।
अब तुहारे हवाले बदन साथियों॥
हो गए हैं फिदा सनम साथियों।
होंगे न जुदा सनम साथियों।
साँस थमती नहीं नब्ज जमती नहीं।
तुमसे मिलने को हैं बेकरार साथियों।
अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों॥
हो गए हैं निर्वस्त्र दिलदार साथियों।
है तुम्हारा इंतजार आशिकी साथियों।
अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों।
अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों॥
(व्यंग्य)
रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

Saturday, April 25, 2009

विकलांग पुलिस प्रशासन ने अपराधियों के समक्ष घुटने टेके व पीड़ित को खुद मामला सलटाने को कहा

हमारी पुलिस प्रशासन का हालात कैसी है इसका अंदाजा इसी घटना से लगाया जा सकता है कि आगामी ३०.०४.२००९ को लोकसभा चुनाव है और इससे मात्र ८ दिन पहले २२.०४.२००९ को एक प्रा. वि. के हेडमास्टर श्री चितरंजन भगत का अपहरण होता है। पर घटना के चौथे दिन आज २५.०४.२००९ के अब तक भी पुलिस द्वारा न तो अपहर्ता के विरुद्ध कोई खाश कार्रवाई ही की गयी है न तो अपहृत को ही उनके चंगुल से मुक्त कराया गया है जबकि अपहर्ता व अपहृत से मोबाईल पर बराबर बात हो रही है। इसके बावजूद भी पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं की जा रही है। आरक्षी अधीक्षक (एस. पी.) ने स्पष्ट रूप से कल २४.०४.२००९ को पीड़ित वालों को कह दिया कि मेरे पास कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है। वहीं डी. एस. पी. ने कह दिया कि आपलोग खुद अपने स्तर से मामला को सलटा लें। उल्लेखनीय है कि अपहर्ता द्वारा मोबाईल पर ६ लाख रूपये फिरौती की माँग की गयी है (जो बाद में कम कर ४ लाख कर दिया गया है) और पैसे जमा करने के लिए आज २५.०४.२००९ तक का समय दिया गया है अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी दी गयी है। पर पुलिस अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी है। एस. पी. के अनुसार कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है। जब इस मामला में कार्रवाई करने के लिए प्रशासन के पास फोर्स नहीं है तो आप सोच सकते है कि ५ दिनों के बाद ३०.०४.२००९ को होने वाले चुनाव कितना निष्पक्ष होगा? ............ आख़िर पुलिसवाले करेंगे भी क्या? इस घटना में पुलिसवाले व थाना का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है, इसका भी प्रमाण मिला है, जो इस घटना से स्पष्ट है :

अपहर्ता व अपहृत का फोन हमेशा पीड़ित के एक नजदीकी के मोबाईल पर आता है जिसमें अपहर्ता पैसे की माँग करते हैं अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी देते हैं। ..... मोबाईल धारक द्वारा हुए बातचीत की रिकॉर्डिंग कर ली जाती है और फिर वे इस रिकार्डिंग को संबंधित सलखुआ(सहरसा) थाना के पुलिस अधिकारी को सुनाते हैं। तो फिर बाद में अपराधकर्मियों द्वारा फोन पर कहा जाता है कि आप थाना गए थे और वहाँ हमलोगों के बातचीत के रिकॉर्डिंग सुनाये हैं ........... इस प्रकार कहकर उन्हें धमकी दी जाती है ........................ अब आप खुद सोचें कि थाना में रिकॉर्डिंग सुनाया गया तो यह ख़बर अपराधकर्मियों तक कैसे पहुँचा? यह इसी बात को प्रमाणित करता है कि थाना और पुलिसवाले का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है और इसी कारण ही वे कोई विशेष कार्रवाई नहीं कर रहे हैं और इस केस से अपना पिंड छुड़ाने के लिए कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है, आप अपने स्तर से ही मामला को सलटा लें (यानि पैसे के लेन-देन करके छुड़वा लें)।

इस पुरे घटनाक्रम से हमारी पुलिसिया तंत्र की हालात स्पष्ट होती है जो यदि चाहे तो अपहृत को तुरत मुक्त करा सकता है पर अपराधी से खुद उनकी साथ-गाँठ होने के कारण वे कुछ नहीं कर रही है। घटना बिहार राज्य के सहरसा जिला के सलखुआ थाना क्षेत्र की है। अपहृत श्री चितरंजन भगत सहरसा के संतनगर मुहल्ला के निवासी हैं तथा सलखुआ(सहरसा) के फरकिया क्षेत्र स्थित प्रा. वि., रंगनिया(अलानी) में हेडमास्टर के पद पर पदस्थापित हैं; जिन्हें गत बुधवार यानि २२.०४.२००९ को स्कूल जाने के क्रम में पंचभीरा घाट के समीप सशस्त्र अपराधकर्मियों द्वारा अपहरण कर लिया गया। ...................... इस क्षेत्र में यानी सुपौल लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में अगले कुछ दिनों बाद ३०.०४.२००९ को लोक सभा चुनाव होनी है। अब आप खुद सोचें कि क्या पुलिस प्रशासन की यह हालात यहाँ लोक सभा चुनाव कराने के लिए उचित है? ............. क्या इस हालात में यहाँ निष्पक्ष चुनाव हो सकता है? ................. क्या यहाँ के आम जनता सुरक्षित है? ......................... नहीं, यहाँ न तो आम जनता ही सुरक्षित है और न ही यहाँ के पुलिस प्रशासन ही चुस्त व दुरुस्त है जो सही ढंग से चुनाव करा सके। इस प्रकार यहाँ के यानी लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र सुपौल की वर्तमान स्थिति चुनाव कराने लायक नहीं है। .......... यों भी जब एक अपहरण के मामला में पुलिस कुछ नहीं कर रही है और एस. पी. खुद कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है तो फिर ऐसे विकलांग पुलिस प्रशासन के भरोसे लोक सभा चुनाव कैसे कराया जा सकता है? .....................................

(घटना की जानकारी विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त जानकारी पर आधारित)

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Tuesday, April 21, 2009

पाप की विदाई

आओ साथ मिलकर लड़ें अपनी लड़ाई
दुनियाँ से पाप और अत्याचार को दें हमेशा के लिए विदाई
फिर कभी न आए ये पाप हम इंसानों के बीच
नहीं बनें हम हैवान इंसानों के बीच
हम हैं इंसान
नहीं बनेंगे हैवान
आएगी पाप यदि मेरे बीच
तो दिखा दूंगा उन्हें सबसे नीच
आओ साथ मिलकर लड़ें अपनी लड़ाई
और हमेशा के लिए करें पाप की विदाई

-- महेश कुमार वर्मा
२१.०४.२००९


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Sunday, April 19, 2009

न्याय व अन्याय


वो क्या देगा न्याय

जो न जानता है कि

क्या होता है न्याय

वो क्या देगा न्याय

जो जीवन भर किया अन्याय

न्याय और अन्याय के बीच मरती है भोली जनता

वो क्या जानेगा इसका दर्द

जो है खुद बेदर्द
जो है खुद बेदर्द

-- महेश कुमार वर्मा

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http://paramjitbali-ps2b.blogspot.com/2009/04/blog-post.html

Monday, April 6, 2009

गलती

मुझे नहीं मालूम कि मेरी क्या गलती है

मुझे तो बस इतना मालूम

कि गलती मेरी साथ हुयी

न्याय पाने की थी आशा

पर न्याय पाना भी दुस्वार हुआ

गलती बताने वाले कोई नहीं

पर सजा देने वाले हजार हुए

मेरा सुनने वाला कोई नही

पर आरोप लगाने वाले हजार हुए

घाव पर मलहम लगाने वाला कोई नहीं

पर नमक छिडकने वाले हजार हुए

साथ देने वाला कोई नहीं

पर आगे बढ़कर धक्का दे गिराने वाले हजार हुए

मौत से बचाने वाला कोई नहीं

पर मौत देने वाले हजार हुए

चाहते है वे मेरी मौत

तो ठीक है मुझे मौत के गले लगा दो

पर एक गुजारिश है तुमसे

कि ऐसा न करना अब किसी से

न होना कभी तुम धर्म भ्रष्ट

न देना किसी को ऐसा कष्ट

न देना किसी को ऐसा कष्ट

मुझे नहीं मालूम कि मेरी क्या गलती है
मुझे तो बस इतना मालूम
कि गलती मेरी साथ हुयी

गलती मेरी साथ हुयी

-- महेश कुमार वर्मा

Wednesday, April 1, 2009

नशा!

नशा!
नशा शराब में नहीं
नशा बोतल में नहीं
नशा तो मेरे मन में है
यदि होती शराब में नशा
तो नाचती वो बोतल
यदि होती बोतल में नशा
तो नाचती वो बोतल
पर नशा तो मेरे उस मन में है
जिसने खुद को पागल बनाया
व बोतल व शराब से दोस्ती निभाया
नशा शराब में नहीं
नशा मेरे मन में है
नशा मेरे मन में है
और बोतल बेचारा बदनाम है
नशा बोतल में नहीं
नशा मेरे मन में है
नशा मेरे मन में है

Saturday, March 7, 2009

होली

सबों को होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

होली का पवित्र पर्व नजदीक है। मैं व्यक्तिगत रूप से सबों से आग्रह करना चाहता हूँ कि होली के पवित्र पर्व को पवित्र बनाएं रखें व इसे दूषित नहीं करें। कितने लोग इस होली के पर्व के ही दिन पुराने शत्रुता का बदला लेते हैं। कितने लोग पवित्र होली के दिन शराब पीकर मतवाला बने रहते हैं और पवित्र होली को दूषित कर देते हैं। कितने लोग जबरन ही किसी को उसके न चाहने पर भी उसे रंग या अन्य पदार्थ देते हैं। कितने लोग के मंशा सिर्फ शरारत करने की ही रहती है। पर ऐसा नहीं होनी चाहिए। होली आपसी प्रेम का पर्व है न कि शरारत करने का पर्व। होली प्रेम का पर्व है। पर कितने लोग इस दिन विशेष रूप से मांसाहार भोजन करते हैं, जो कि उचित नहीं है। आयें आपसी प्रेम के पर्व होली में मांसाहार का विरोध करें व सबों से प्रेम करें।

कृपया पवित्र होली को पवित्र बनाए रखें। पुनः होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।

आपका

महेश कुमार वर्मा

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http://popularindia.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%८०

Thursday, February 26, 2009

आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए प्रकाशक जिम्मेवार क्यों?

आज मैं निम्न पोस्ट पढ़ा :

ब्लागर हैं तो क्या? कानून से ऊपर नहीं (http://teesarakhamba.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html)

ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में (http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=76)

वैसे मैं सम्बंधित ब्लॉग को या इससे सम्बंधित समाचार को अन्यत्र कहीं नहीं पढ़ा या सुना हूँ। पर इस ब्लॉग में लेखक ने जो बात कहना चाहा है वह तो मैं समझ गया. पर एक बात मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि यदि कोई साईट या ब्लॉग या समाचारपत्र ऐसा है जो किसी विषय पर आम लोगों की निष्पक्ष विचार आमंत्रित करता है और सम्बंधित साईट या पत्र का उद्देश्य रहता है कि वह आम लोगों की निष्पक्ष विचार को सार्वजानिक करे ताकि आम जनता यह जान सके कि इस विषय पर किसका क्या विचार है. तब यदि कोई व्यक्ति उसपर अपने विचार में या टिप्पणी में कोई आपत्तिजनक बात लिखता है तो इसके लिए साईट या पत्र का स्वामी जिम्मेवार क्यों होगा और उसपर कार्रवाई क्यों होगी? उसका तो उद्देश्य तो आम लोगों के विचार को सार्वजानिक करना था. .................... ऐसी स्थिति में तो कार्रवाई सम्बंधित विचारक / टिप्पणीकार पर होनी चाहिए न कि साईट / ब्लॉग / समाचारपत्र के स्वामी पर. यदि किसी साईट या पत्र पर आये टिप्पणी से ही किसी के (या टिप्पणीकार के) अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए सम्बंधित साईट / पत्र के स्वामी या प्रकाशक जिम्मेवार क्यों व कैसे होगा? ................... ऐसी स्थिति में यदि कसी के टिपण्णी से किसी के अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए टिप्पणीकार जिम्मेवार होगा और कार्रवाई भी उसी पर होनी चाहिए न कि साईट या पत्र के स्वामी या प्रकाशक पर.............


ऊपर वर्णित पोस्ट के लेखक, प्रकाशक व पाठक कृपया इसपर अपनी राय स्पष्ट करें.

Saturday, January 24, 2009

गणतंत्र दिवस : एक प्रश्न

दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के ५९ वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। प्रश्न उठता है की हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाएँ? क्या सिर्फ इसलिए कि हम भारतीय है? जरा सोचें कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए पर आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिली है?

कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गयी है। पर वास्तविकता इनसे कोसों दूर है। वास्तविकता के जमीं पर हम आयें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं। इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय ही होता है।

यह बात सिर्फ कहने-सुनने के लिए ही नहीं बल्कि वास्तविकता है। आप ख़ुद देखें आज बच्चों को उचित शिक्ष भी नहीं मिल पाती है। उन्हें पढने व खेलने का भी अधिकार नहीं है और बचपन से ही उनसे मजदूरी करायी जाती है। ....... आज महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है और महिला वर्ग हमेशा पुरुषों द्वारा प्रताडित ही होती रहती है। आज पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है और तंग आकर वह अपराधी भी बन जा रहा है। आज भारत में न्यायप्रिय राजा नहीं है बल्कि यहाँ सभी मुद्राप्रिय हैं। कभी दुनियाँ को धर्म की शिक्षा देने वाला भारत आज खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है। और इसके लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ-साथ खुद हमारे समाज हैं। जी हाँ, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है कि आज अन्याय व जुल्म के सताए व्यक्ति को उचित न्याय भी नहीं मिल पाता है। पुलिस से लेकर अदालत तक सभी मुद्राप्रिय हो गए हैं और यहाँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुद्रा के आधार पर न्याय होता है। ऐसे कई मामला देखे जाते हैं जहाँ न्यायलय में न्याय करने के लिए बैठे हमारे न्यायाधिश भी पैसे लेकर पैसे वाले के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। अपराध बढ़ाने में तो शायद सबसे बड़ा हाथ समाज से अपराध को मुक्त कराने के लिए बैठे हमारे पुलिसिया तंत्र का ही है। जहाँ यदि आप अपने ऊपर हुए किसी जुल्म व अन्याय के शिकायत करने जाएँ तो आपके साथ क्या जुल्म हुआ यह नहीं देखा जाता है बल्कि देखा जाता है कि आपके पास क्या पैसा है। इतना ही नहीं, अपराधी अपना लाभांश इन पुलिस को देकर ही अपने अपराध के व्यवसाय में दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं। ................. अपराधों को बढ़ाने में हमारा समाज भी पीछे नहीं है। भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं। .........................

इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय मैं भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है? .................... और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? ........ आयें अपने समाज व देश से अन्याय, भ्रष्टाचार व जुल्म को उखाड़ फेकने के लिए कदम आगे बढाकर राष्ट्रहित में कार्य करें।

धन्यवाद।

आपका

महेश कुमार वर्मा

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Wednesday, December 31, 2008

नव वर्ष के शुभ किरण

नव वर्ष के शुभ किरण


नव वर्ष के शुभ किरण
स्‍वच्‍छ करे मेरा तन व मन
चले एक ऐसा पवन
कि झूम उठे सारा चमन
हर कलियाँ खिलती रहे
हर बगिया महकती रहे
मज़हब की खुशबु उठती रहे
ज्ञान की धारा बहती रहे
नव वर्ष के शुभ किरण
स्‍वच्‍छ करे मेरा तन व मन
स्‍वच्‍छ करे मेरा तन व मन

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सबों को नव वर्ष की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

Friday, December 5, 2008

शहीदों को श्रद्धांजलि

क्या फायदा हुआ तुम्हें

किसी का घर सुना करके

किसी के मांग का सिंदूर उतार के

किसी को अनाथ करके

किसी को यों ही तड़पा के

किसी को बेमौत मार के

क्या फायदा हुआ तुम्हें

सबों को दर्द देके

है तुम्हारे पास कोई जवाब

नहीं है

क्योंकि तुम ख़ुद बेदर्द हो

क्या जानोगे दुसरे के दर्द

पर याद रखना

परमात्मा के दरबार में

तुम्हें तुम्हारे हर कर्म का जवाब देना होगा

हर कर्म का जवाब देना होगा

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शहीदों को श्रद्धांजलि

-- महेश कुमार वर्मा

Monday, December 1, 2008

याद

याद

हर रोज तुम आती हो
हर वक्त साथ रहती हो
तुम्हारे साथ रहने के कारण ही
मैं राह चल पाता हूँ
तुम साथ रहती हो
पर फिर भी
नहीं कर पाता तुम्हारा शरीर-स्पर्श
कारण तुम शरीर से नहीं
बल्कि तुम्हारी सिर्फ याद आती है
तुम्हारी सिर्फ याद आती है

तुम्हारी याद में वो बल है
जो मुझे आगे बढ़ाता है
तुम्हारी याद में वो आकर्षण है
जो मुझे तुम्हारे करीब लाता है
तुम्हारी याद में वो एकता है
जो हमदोनों को एक बनाता है
तुम्हारी याद में वो संजीवनी है
जो मुझे जीवित रखता है
तो भला तुम्हारी याद कैसे न आए
तुम्हारी याद कैसे न आए



-- महेश कुमार वर्मा

Sunday, November 30, 2008

एक भिखारी ऐसा भी

देखा मैं एक ऐसा भिखारी

जो खा रहा था खैनी

सोचा

पेट भरने के लिए

कुछ नहीं है उसके पास

माँगता है कुछ लेकर आस

दया करके

कोई कुछ खाने देता है

कोई कुछ पैसे देता है

पर वह

वह भिखारी

मिले पैसे से

खैनी खाता है

सोचने पर मैं मजबूर हुआ

कि इसे पैसे देना

पुण्य है या पाप है

पुण्य है या पाप है

यह कोई कविता नहीं

नहीं यह कोई कहानी है

यह मेरी आँखों देखी हकीकत है

आँखों देखी हकीकत है

आप भी विचारें

उसे भिक्षा में पैसे देना

पुण्य है या पाप है

पुण्य है या पाप है

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मेरी आँखों देखी हकीकत पर आधारित

-- महेश कुमार वर्मा

क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया

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क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया


मेरे बेटों की नजरों में मैं बुढ़ा हो गया
उनकी नजरों में मैं बेकार हो गया
अब नहीं मैं उनके किसी काम का
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया
इसीलिए तो उसने मुझे घर से निकाला
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया॥

उनकी नजरों में
मुझे निकालकर
वे चैन से रह पाएँगे
आराम से सो पाएँगे
नहीं होगा तब
कोई उनके ऊपर
अपना मालिक
ख़ुद वे ही रहेंगे
न कोई बोलने वाला रहेगा
न कोई टोकने वाला रहेगा
जो मर्जी होगा
अपनी इच्छा से करेगा
कुछ नहीं तो कम-से-कम
बुढे बाप के सेवा से तो छुटकारा मिलेगा
बस इसीलिए उसने मुझे निकाला।
बस इसीलिए उसने मुझे निकाला॥

पर, ऐ दुष्ट पुत्र!
क्या तुमने कभी ये है सोचा
कि किसने तुझे उंगली पकड़कर
चलना है सिखाया
क्या तुमने कभी ये है सोचा
कि तुम्हारे जन्म के बाद
किसने तुम्हारी परवरिश की
कि किसके कारण आज तुम पढ़-लिख कर
बड़ा होकर गौरवान्वित महसूस करते हो
क्या तुमने कभी ये है सोचा
कि किसके गोद में तुम घूमते थे
और किस प्रकार तुमने
एक-एक शब्द करके बोलना सीखा।

तुम्हारे यही बाप ने
तुम्हें बोलना सीखाया
तुम्हें चलना सीखाया
तुम्हें पाल-पोष कर बड़ा किया
व मेरे ही कारण
तुम पढ़-लिखकर
आज अपने पैरों पर खड़ा हो।
पर आज तुम मुझे ही भूल गया
और मुझे घर से निकल दिया
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।

आज मैं तुम्हारे कोई काम का नहीं
आज तुम्हारे लिए सिर्फ
तुम्हारी बीवी व बच्चे हैं
अपने बीवी के कारण तुम
अपने माँ-बाप को भूल गया
और हमें घर से निकाला
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।

पर तुम ये कभी मत भूलना
कि एक दिन तुम भी होगा बुढ़ा
और उस समय
तुम्हारा भी शरीर शिथिल पड़ जाएगा
और तुम भी शारीरिक श्रम नहीं कर पाएगा
सोचो उस समय तुम क्या करोगे
कैसे रहोगे
कैसे खाओगे।

सोच बेटा सोच
यह तो है प्रकृति का नियम
कि बच्चा एक दिन जवान होगा
जवानी बुढापा में बदलेगा
और बुढापा के बाद फिर सबको
है परमात्मा के पास जाना
नहीं है किसी को इससे बचना।
नहीं है किसी को इससे बचना॥
यह है प्रकृति का नियम
इसपर न तो मेरा वश है न तुम्हारा
ये हमेशा से चल रहा है
और इसे हमेशा चलते ही है रहना।
इसे हमेशा चलते ही है रहना॥

सोच बेटा सोच
कि मुझे घर से निकालकर
क्या तुम प्रकृति के नियम बदल देगा
और क्या तुम कभी बुढ़ा नहीं होगा
जिस बाप ने तुम्हें जन्म दिया
उसे ही तुम आज घर से निकाला
क्योंकि वह बुढ़ा हो गया।
पर सोच बेटा सोच
एक दिन तुम भी होगा बुढ़ा।
एक दिन तुम भी होगा बुढ़ा॥

घर से निकाला है मुझे जबसे
सोच रहा हूँ मैं तुम्हारे बारे में तबसे
कि कैसे बनेगा मेरा लाल
एक नेक इंसान
कैसे आएगा उसे सद्बुद्धि
और किस प्रकार रहेगा
आगे दुनियाँ में वह
यही सोचकर मेरा
शरीर सुख रहा है
मेरे मन में सिर्फ
तुम्हारा ही ख्याल आ रहा है
कि कैसे बनोगे तुम नेक इंसान।
कैसे बनोगे तुम नेक इंसान॥

तुम हो इंसान
मत बनो हैवान
सबका मालिक है भगवान
पर तुम अपनी मानवता को पहचान
और बनो एक नेक इंसान।
बनो एक नेक इंसान॥
मेरी तो यही ख्वाहिश है बेटा
मेरी तो यही ख्वाहिश है बेटा
पर तुमने मुझे घर से निकाला
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया॥

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रचयिता :
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महेश कुमार वर्मा
DTDC कुरियर ऑफिस,
सत्यनारायण मार्केट,
मारुती (कारलो) शो रूम के सामने,
बोरिंग रोड, पटना (बिहार),
पिन : 800001 (भारत);
Webpage : http://popularindia.blogspot.com/
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846

Thursday, November 27, 2008

जिस बेटे को उंगली पकड़कर


जिस बेटे को उंगली पकड़कर
चलना था सिखलाया
जिसे गोद में रखकर
बोलना था सिखलाया
आज उसी बेटे ने मुझे
धक्का देकर
घर से है निकाला।
घर से है निकाला॥


उसकी पत्नी ने उससे कहा
इस बुढे का रहना मुझे नहीं है भाता
लगाओ इस बुढे को कहीं भी ठिकाना
वरना तोड़ लो मुझसे नाता।
वरना तोड़ लो मुझसे नाता॥


माना उसने प्यारी बीवी की बात
किया मुझपर कटु वचनों की बरसात
बोला उसने,
ऐ बुढा!
तुम्हारा नही है यहाँ कोई काम
चले जाओ यहाँ से
और हमें शान्ति से रहने दो
वरना हाथ-पैर तोड़कर बाहर कर दूंगा
फिर भी नहीं मानोगे तो
जहर देकर मार दूंगा!
जहर देकर मार दूंगा!!
पहले किया मैंने
उसके बात को अनसुना
पर उसने मेरा भोजन बंद किया
व मुझे भूखे ही रखने लगा
फिर एक दिन मुझे

धक्का देकर
घर से भी निकाल दिया।
घर से भी निकाल दिया॥


तब से भटक रहा हूँ
अकेले रह रहा हूँ
कोई नहीं है अब मेरा
सिर्फ ईश्वर ही है सहारा।
सिर्फ ईश्वर ही है सहारा॥


जिस बेटे को उंगली पकड़कर
चलना था सिखलाया
जिसे गोद में रखकर
बोलना था सिखलाया
आज उसी बेटे ने मुझे
धक्का देकर
घर से है निकाला।
घर से है निकाला॥


रचयिता -- महेश कुमार वर्मा

Sunday, November 23, 2008

गर तू ना होती

गर तू ना होती

गर तू ना होती तो कौन मेरे पास होता
गर तू ना होती तो कौन मेरे साथ होता
गर तू ना होती तो कौन मेरा अपना होता
गर तू ना होती तो सारा जहाँ सपना होता
गर तू ना होती तो जीवन नहीं ये पूरा होता
गर तू ना होती तो जीवन ये अधुरा होता
गर तू ना होती तो नहीं ये जीवन होता
गर तू ना होती तो नहीं ये गज़ल होता
कहना है बस एक बार तू मान जा
मान जा मेरे दिल को बहला जा
मान जा जीने का राह दिखा जा
मान जा मेरे जीवन को सँवार जा
गर तू ना होती तो नहीं ये जीवन होता
गर तू ना होती तो नहीं ये गज़ल होता


रचयिता : महेश कुमार वर्मा

Friday, November 14, 2008

छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए

छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए
*******************************



दुनियाँ वाले मुझे तुमसे अब नहीं है कुछ कहना।
मुझे यहाँ रहने का अब नहीं है कोई बहाना॥

क्या फायदा हुआ तुझे मुझको यूँ ही तड़पा कर।
क्या फायदा हुआ तुझे मुझको यूँ ही रुला कर॥
क्या फायदा हुआ तुझे मुझसे मेरा अधिकार छिनकर।
क्या फायदा हुआ तुझे मेरे जीने का आधार छिनकर॥
यदि मैं कुछ नहीं कर सकता उसके लिए।
तो मैं जिऊँगा फिर किसके लिए॥
जीने का अंतिम आधार था वह मेरे लिए।
मौत से बचने का एक ही सहारा था वह मेरे लिए॥
आया था मैं मौत के बहुत ही करीब से।
जीने की आशा थी अब सिर्फ उसी से॥
जीने के लिए मुझे उसके लिए कुछ करना जरुरी था।
उसके लिए मुझे जीना भी बहुत जरुरी था॥
उसके लिए मेरा सपना रह जाएगा अधुरा।
उस सपना को फिर कौन करेगा पूरा॥
एक सिर्फ वही बचा था मेरे लिए।
उसे छिनकर कुछ नहीं छोड़ा तुम मेरे लिए॥
अब मुझे कुछ नहीं कहना है तुमसे।
चलाओ दुनियाँ को तुम अपनी मन से॥
नहीं कुछ रहा यहाँ अब मेरे लिए।
नहीं रहा मैं यहाँ अब किसी के लिए॥
छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए।
छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए॥

------------------------------http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/d5274d12d3216ye5

Wednesday, November 5, 2008

मुर्ख मनुष्य

देख मुर्ख मनुष्य को
करता है ये छठ पर्व
चाहता है हजारों कामना
छठ करने के लिए
कितनी सारी व्यवस्था करता है
भगवान से हजारों कामना चाहता है
खरना करता है
उपवास रहता है
नदी जाता है
सूर्य को अर्ध्य देता है
ताकि उसकी मनोकामना पुरी हो
पर उसका नहाय-खाय
खरना, उपवास
व सूर्य को अर्ध्य देना
सब तब हो जाता है बेकार
जब छठ के तुरत बाद
वह भूल जाता है
अपने धर्म व कर्म को
और करता है
मुझपर बेवजह प्रहार
मैं ही नहीं
मेरे जैसे हजारो
बकरे मारे जाते है
छठ के पारण दिन
लेते हैं मनुष्य
बेवजह इनकी जान
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान

मुर्ख मनुष्य
करके मेरा बध
छठ के अपने पुण्य को
ख़ुद मिटा देता है
और ले आता है
अपने खाते में
सिर्फ पाप ही पाप
इसीलिए तो नहीं करता है ये
कोई तरक्की
नहीं करता है, नहीं करेगा
कभी ये कोई तरक्की
ये फल है ख़ुद कर्म की उनकी
नहीं करेगा कभी ये कोई तरक्की
नहीं करेगा कभी ये कोई तरक्की

अरे मुर्ख व पापी मनुष्य
मेरी गलती मुझे बताओ
मेरा अपराध मझे बताओ
तुमने मुझे क्यों मारा
मुझ बेगुनाहों को क्यों रुलाया
मारकर मुझे तुम
तरक्की कर सकते नहीं
शांत तुम रह सकते नहीं
चैन से तू सो सकते नहीं
चैन से तू सो सकते नहीं

कहता है तुमसे ये बकरा
अपना भविष्य तुमने ख़ुद है उकेरा
अवश्य मिलेगा तुम्हें मुझे मारने का फल
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल


-- महेश कुमार वर्मा

Tuesday, October 28, 2008

अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे

अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
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उजड़ि गेल घर बाढ़ में
डूबि गेल पूँजी व्यापार में
ना बा कहूँ रहे के ठिकाना
ना बा कुछु खाय के ठिकाना
दिया से अपन घर के सजाएब कैसे
जुआड़ी सैंया के हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे

ना बा घर ना बा दुआर
भगवान तोहार मूर्ति हम बिठाएब कैसे
तोहार आरती हम उतारब कैसे
हो अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे

Monday, October 27, 2008

दीवाली

मनाएँ हम मिलकर दीवाली

ना हो प्रकाश से कोई जगह खाली

अन्धकार से प्रकाश में जाना है

जीवन में प्रकाश लाना है

दीवाली के दीपक से यही सीख लेना हैं

सारे जग से अंधकार मिटाना है

दुनियाँ में प्रकाश फैलाना है 

हरेक जगह प्रकाश फैलाना है॥ 


-- महेश कुमार वर्मा 


दीपावली की शुभकामनाएँ


प्रकाश पर्व दीपावली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है। अतः आएँ इस दीपावली में अपने अंदर के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप जलाएँ और सारे जगत को प्रकाशमय बनाएँ।

सबों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

Sunday, October 26, 2008

दिवाली में जलते हैं पैसे


होती थी यह वर्षों पहले

जब दिवाली में जलते थे दिये

पर अब चाहे हो जैसे

दिवाली में जलते हैं पैसे

छोड़ते हैं बम-पटाखे

और छोड़ते हैं रॉकेट

फैलाते है प्रदुषण

बढ़ाते हैं बीमारी

चाहे हो जैसे

पर दिवाली में जलते हैं पैसे

दिवाली मैं दिये अब जलते नहीं

दिये के स्थान पर है अब मोमबत्ती

मोमबत्ती का स्थान भी ले लिया अब बिजली

बिना बिजली के नहीं होता अब दिवाली

पर आपस में ख़ुशी बाँटने के जगह

खेलकर जुआ करते हैं पैसे की बर्बादी

चाहे हो जैसे 

पर दिवाली में जलते हैं पैसे 

दिवाली में जलते हैं पैसे


--महेश कुमार वर्मा

Friday, October 17, 2008

प्रेम है बहुत महान

प्रेम है बहुत महान

ये है मानवता की पहचान

प्रेम ही है जो दुश्मन को दोस्त बनाते हैं

प्रेम ही है जो पशुओं को भी मित्र बनाते हैं

प्रेम ही है जो सबों को आपस में बांधे रखता है

प्रेम ही है जो सबों को बिछुड़ने से रोकता है

प्रेम न होता तो ये सारा रिश्ता नाता न होता

प्रेम न होता तो दुनियाँ का काम न होता

प्रेम न होता तो दुनियाँ में चलना मुश्किल था

प्रेम न होता तो हमें जी पाना मुश्किल था

अतः प्रेम करना सीखो

आपस में मिलकर रहना सीखो

सबों से प्रेम करो

नहीं किसी से वैर करो

प्रेम है बहुत महान

ये है मानवता की पहचान

प्रेम है बहुत महान

प्रेम है बहुत महान

Tuesday, October 7, 2008

सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ


सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ

Thursday, September 25, 2008

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥


--महेश कुमार वर्मा

Tuesday, September 23, 2008

अपना समाज महान होगा


समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें मानवता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें सच्चरित्रता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें ईमानदारिता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें निष्पक्षता आएगी॥
जब आएगी मुझमें मानवता
जब आएगी मुझमें ईमानदारिता
तब होगी हमारी अपनी सत्ता
तब होगी हमारी अपनी सत्ता
तब नहीं कोई भ्रष्ट होगा
तब नहीं कोई बेईमान होगा
तब नहीं कहीं अन्याय होगा
तब नहीं कहीं अत्याचार होगा
तब नहीं किसी से शिकवा होगा
सभी जगह प्रेम व करुणा होगा
आपस में भाईचारा होगा
स्वच्छ व सुंदर समाज होगा
तब अपना समाज महान होगा
तब अपना समाज महान होगा

रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

Sunday, September 14, 2008

है किसी में हिम्मत तो

अब तक तो चुप था पर

अब चुप रह सकता नहीं

मरना होगा मर जाएंगे पर

मैं सर झुका सकता नहीं

है किसी में हिम्मत तो मेरे बातों का जवाब दे दे

है किसी में ईमानदारी तो सच्चाई सामने ला दे

सत्य धर्म से प्यार

किसे सुनाऊँ मैं अपनी हाल
हाल मेरा है बेहाल
मर जाऊँगा मिट जाऊँगा
नहीं मानूंगा मैं हार
झूठ को नहीं स्वीकारुँगा
सत्य को नहीं छोडूँगा
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार

Friday, September 12, 2008

कोई अपना मुझे नजर नहीं आता

चाहता था कुछ कहना पर कह न पा रहा हूँ
चाहता था कुछ लिखना पर लिख न पा रहा हूँ
करूँ मैं क्या मुझे पता नहीं चलता
जीने का कोई सहारा अब नजर नहीं आता
चाहा था नई जिन्दगी जीने को
पर बचा है अब सिर्फ मरने को
चाहता था कुछ कहना पर कह नहीं सकता
चाहता था कुछ लिखना पर लिख नहीं सकता
कैसे कहूँ कैसे सुनाऊँ पता नहीं चलता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता

Tuesday, September 9, 2008

दिल

दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है
भर जाएंगे शरीर के जख्म दिन नहीं तो महीनों में जरुर
पर नहीं भरेंगे दिल का जख्म यह बात है जरुर
तड़पते रह जाओगे दिल का जख्म लेकर
पर नहीं आएँगे कोई तुम्हें अपना समझकर
जमाना हो गया है बेदर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
क्योंकि जमाना हो गया है बेदर्द
दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है

Monday, September 8, 2008

बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते

बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
निभा सको तो साथ देगी जीवन भर ये रिश्ते
नहीं तो सिर्फ कहलाने को रह जाएँगे ये रिश्ते
बनते हैं पल भर में, बिगड़ते हैं पल भर में ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते

Thursday, September 4, 2008

ये रिश्ता चीज होती है क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या
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पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

था कभी भाई-भाई का रिश्ता
कभी बिछुड़ने वाला रिश्ता
जो हमेशा साथ-साथ खेलता
हमेशा साथ-साथ पढ़ता
हमेशा साथ-साथ खाता
हमेशा साथ-साथ रहता
पर आज जब वे बड़ा समझदार हुए
तो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हुए
हथियार लेकर दोनों आमने-सामने हुए
भाई-भाई का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


किया था शादी पति-पत्नी के रिश्ता के साथ
जीवन भर साथ निभाने को
पर रह गयी दहेज़ में कमी
तो दिया उसे साथ रहने को
और जिन्दा ही पत्नी को जला डाला
क्योंकि था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
जीवन भर साथ निभाने का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


था पिता-पुत्र का रिश्ता
पिता ने उसे अपने बुढ़ापे का सहारा समझा
पर उसने तो दुश्मन से भी भयंकर निकला
निकाल दिया पिता को घर से
भूखे-प्यासे छोड़ दिया
नहीं मरा पिता तो उसने
जहर देकर मार दिया
बुढ़ापे का सहारा आज उसी का कातिल बना
था इन्सान पर आज वह हैवान बना
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या

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http://merekavimitra.blogspot.com/2008/08/rishte-par-kavitayen-kavya-pallavan.html#mahesh

Tuesday, September 2, 2008

बाल शिक्षा बनाम बाल मजदूरी

आज सरकार शिक्षा पर जोर दे रही है तथा तरह-तरह के योजनाएं चला रही हैं। पर उस सरकार को क्या यह वास्तविकता मालूम है कि उनके योजनाओं का कितना लाभ बच्चों को मिल रहा है। सरकार को यह नहीं मालूम है कि उनके द्वारा लागु किए गए दोपहर के भोजन का कार्यक्रम की सारी रकम व अनाज स्कूल के शिक्षकों द्वारा चट कर दिए जाते हैं और बच्चों को भोजन नहीं मिलता है और यदि कहीं कभी-कभी थोड़ा-बहुत मिल भी जाता है तो वह घटिया किस्म का ही रहता है। ............ और इस कारण आज सरकारी स्कूल जाने वाले बच्चे-बच्चे "घोटाला" शब्द से वाकिफ हो गए हैं और वे जानते हैं कि उनके लिए आए अनाज उनको न मिलकर शिक्षकों के घर पहुँच रहे हैं। ..............
आज सरकार १४ वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने की बात कह रही है। पर क्या सरकार कभी इस सच्चाई को जानने की कोशिश की कि कितने बच्चे स्कूल जाते हैं व पढ़ते हैं? शायद सरकार कभी यह जानने की कोशिश नहीं की, और यदि की तो वह सही तथ्य तक नहीं पहुँच पायी। ........ आज भी ऐसे कितने बच्चे हैं जो अपनी पढ़ाई के उम्र में पढ़ाई से वंचित होकर अपने पेट पालने के लिए कहीं किसी के अन्दर काम या नौकरी कर रहे हैं। इस प्रकार के बच्चों को न तो पढ़ने का मौका मिलता है और न तो खेलने का ही मौका मिलता है। ................ बच्चो के साथ ऐसी स्थिति सिर्फ गाँव-देहात में ही नहीं शहर में भी है। जबकि बाल मजदूरी पर कानून ने रोक लगा रखी है। ............ शहर के होटलों में या अन्य स्थानों में भी ऐसे कितने बच्चे मिलेंगे जो दिन भर काम करके अपना पेट पालते हैं और न तो वे लिखना-पढ़ना जानते हैं और न तो जान पाते हैं। उन्हें तो बस दिन भर वहाँ काम करना है। उनके जीवन में न तो पढ़ाई है, न तो खेल है और न तो उनके विकास का कोई साधन है। ................... आप सोच सकते हैं कि ऐसे बच्चों का भविष्य क्या होगा? ..............
सरकार को सिर्फ घोषणाएं करने व कार्यक्रम तैयार करने से नहीं होगा .................. बल्कि हर बच्चे को उचित समय पर उचित शिक्षा व उचित वातावरण सुनिश्चित कराना होगा। हमें बच्चे के प्रतिभा को कुंठित नहीं होने देना चाहिए बल्कि प्रतिभा को जगाना चाहिए।
--- महेश कुमार वर्मा
०२.०९.२००८
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Sunday, August 24, 2008

स्त्री शिक्षा में बाधा क्यों


आज हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री जाति को उपेक्षित भाव से देखा जाता है। लड़का-लड़की में अंतर व लड़की को उपेक्षित भाव से देखना उसी समय से प्रारंभ हो जाता है जब लड़की अपने माँ के कोख से जन्म लेती है। जब लड़का जन्म लेता है तो बेटी खुशियाँ मनाते हैं और वहीँ जब लड़की जन्म लेती है तो तो एक मायूसी छा जाती है; जैसे कि लड़की को जन्म लेने के बाद कोई विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा हो।


इतना ही नहीं, जन्म के बाद भी लड़का व लड़की के पालन-पोषण में काफी अंतर देखने को मिलता है। जहाँ लड़का के भोजन व रहन-सहन का खास ख्याल रखा जाता है वहीँ लड़की के संबंध में ऐसा नहीं होता है। जहाँ लड़का के पढाई-लिखाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है वहीँ लड़की को इस मायने में नजर अंदाज कर दिया जाता है। कितने लड़की को तो स्कूल जाने का भी सौभाग्य नहीं मिल पाता है। कोई लड़की यदि पराया भी तो मिडिल स्कूल या हाई स्कूल के पढ़ाई के बाद उसका पढ़ाई बंद हो जाता है और यदि उस लड़की के मन में और भी पढने की ईच्छा हो तो उसकी यह ईच्छा चूर-चूर हो जाता है और उसकी प्रतिभा भी कुंठित हो जाती है।



पर सोचें कि हम लड़का व लड़की में इतना भेद-भाव क्यों करते हैं? क्या लड़की को इस समाज में रहने व पढ़ने तथा आगे बढ़ने व कुछ करने का अधिकार नहीं है? .......... सोचने पर इसका एक यही कारण स्पष्ट होता है कि हम यह मानते हैं कि लड़की तो पराया घर जाएगी इस पर इतना ध्यान व खर्च क्यों किया जाए? धन धन हाँ, माँ-बाप अपने इसी सोच के कारण अपने बेटी का सही ढंग से न तो पालन-पोषण करते हैं न तो सही दंग से शिक्षा ही देते हैं। क्योंकि वे मानते हैं की बेटी पराया धन है इसे ससुराल में रहना है तो फिर इसके पीछे इतनी खर्च क्यों करूँ? ............ फिर एक यह भी सोच रहती है की लड़की को ज्यादा या उच्च शिक्षा देंगे तो फिर हमें उस अनुसार उसके लिए उच्च स्तर का वर ढूंढना होगा जिसमें मुझे दहेज के रूप में काफी धन देना होगा। .................... इस प्रकार दहेज समस्या के कारण भी कितने माँ-बाप अपनी बेटी को विशेष नहीं पढाते हैं। ......... पर हमें यह समझना चाहिए की हमारी यह सोच किसी भी अर्थ में उचित नहीं है। दहेज के डर से बेटी को न पढाना हमारी मुर्खता है और यह हमारी संकीर्ण व नीच विचारधारा को ही दर्शाता है। ............... इस प्रकार के सोच रखने वाले को यह समझना चाहिए कि यदि हम बेटी को उचित शिक्षा दें और पढ़ा-लिखा कर आगे बढाएँ तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। यदि लड़की पढ़-लिखकर नौकरी या कोई रोजगार करती है तो इसमें हर्ज क्या? ऐसी स्थिति में ऐसे लड़के भी आसानी से मिल सकते हैं जो बिना दहेज के या कम दहेज के उससे शादी करे। और यदि ऐसा नहीं होता है तो यदि लड़की पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी है, आत्मनिर्भर है तो इसमें हर्ज क्या?............... इस प्रकार हमें यह समझना चाहिए कि बेटी को पढ़ा-लिखा कर आगे बढ़ाने से दहेज समस्या बढती नहीं है बल्कि बहुत हद तक दहेज समस्या का समाधान होता है। ................


अतः हमारी समाज को अपनी इस नीच सोच को बदलना चाहिए व बेटा-बेटी में फर्क न कर लड़का-लड़की दोनों को सही ढंग से पालन-पोषण व उचित शिक्षा देना चाहिए।


हाँ, यह बात भी सही है कि धीरे-धीरे हम जागरूक हो रहे हैं तथा अब कितने परिवारों में बेटी को भी उच्च शिक्षा दी जा रही है। पर इस कार्य में अभी हम बहुत ही पीछे हैं, हमें और आगे बढ़ना होगा।


अपने नीच सोच को हटाना होगा।
बेटा-बेटी में अन्तर पाटना होगा॥
बेटी को आगे बढ़ाना होगा।
जिम्मेदार माँ-बाप का फर्ज निभाना होगा॥

Saturday, August 23, 2008

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

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गीता में भगवान श्री कृष्ण ने हमें हमेशा अपने कर्म करते रहने की ही शिक्षा दिए हैं। अतः श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व को हमें यों ही नहीं बिताना चाहिए बल्कि इस अवसर पर हमें अपने कर्म को करते हुए अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित होना चाहिए।

Sunday, August 17, 2008

दिल का जख्म


कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

है जख्म ये जो भरती नहीं
है इसकी दवा जो मिलती नहीं
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे


क्या सुनाऊं दिल का हाल
पापियों ने किया इसे बेहाल
थी अरमां आसमां छूने को
पर ऊँचाई से उसने ऐसा धकेला
कि दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
किसी तरह टुकड़े को जोड़कर
नया जीवन जीना चाहा
पर आगे के राह में
उसने ऐसा रोड़ा लगाया
कि दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का दर्द बढ़ता ही गया
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे


बहुत कोशिश की दिल के जख्म को भरने की
पर नहीं किया था रत्ती भर भी सद्व्यवहार उसने
किया था मेरे दिल पर आघात ही आघात उसने
मेरे दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का जख्म बढ़ता ही गया
मुझसे उसने दुनियाँ का सब कुछ छीन लिया
नहीं छोड़ा उसने कुछ भी मेरे लिए
सिवाय दिल के जख्म के
सिवाय दिल के जख्म के
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

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http://kathavyatha.blogspot.com/#septkavita1


Friday, August 15, 2008

आया है स्वतंत्रता दिवस

सबों को स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
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आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म याद कराने को।
भूल न जाना तुम हिंदुस्तान के मज़हब को॥

हो जाओ तैयार सब कुछ न्योछावर करने को।

सहना होगा थोड़ा कष्ट भारतमाता के लाज बचाने को॥

आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म याद कराने को।

आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म निभाने को॥

Thursday, August 14, 2008

सबसे न्यारा सबसे प्यारा

सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा
हर बच्चे यहाँ के हैं सच्चे
इनको किसी का डर नहीं
इनके मन में कोई पाप नहीं
बस अपना कार्य करना है
जीवन में आगे बढ़ना हैं
अपना नाम कमाना है
भारत को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाना है
बस मत रोको इन्हें आगे बढ़ने में
मदद करो इन्हें आगे बढ़ने में
सहायता करो इन्हें बढ़ने में
मत लगने दो इनपर किसी भी प्रकार का धब्बा
इसी पर है देश की आशा
गर चुक गए तुम तो मिलेगी निराशा ही निराशा
बस यही है तुमसे आशा
मदद करो इन्हें बढ़ने में
और हाथ बढाओ देश को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने में
सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा

Wednesday, August 13, 2008

भारतमाता के हम वीर सपूत



भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे
दुश्मन चाहे लाख आए
अपने कर्तव्य को नहीं भूलेंगे
अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे
अन्याय को नहीं स्वीकारेंगे
भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे

आगे बढ़ते रहे हैं
आगे ही बढ़ते रहेंगे
अन्याय व भ्रष्टाचार को
इस देश से निकाल फेकेंगे
सच्चाई व ईमानदारिता के समाज हम बनाएँगे
भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे

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भारतमाता के हम वीर

Wednesday, August 6, 2008

स्वतंत्रता दिवस नहीं शोक दिवस

मना रहे हैं स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
पढ़ा रहे हैं सदाचारिता की पाठ
कर रहे हैं आपस में गरीबों के राशि के बंदरबाँट
यही है भारतीय स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
आज मेरा देश स्वतंत्र है
पर इस देश के निवासी गुलाम हैं
भ्रष्टाचार व अन्याय के गुलाम
जुल्म व शोषण के गुलाम
घूसखोरी व अत्याचार के गुलाम
एक नहीं दो नहीं सभी हैं इनके गुलाम
यही है मेरे देश की पहचान
यहाँ किसी को बोलने का भी अधिकार नहीं है
यहाँ किसी को न्याय पाने का भी अधिकार नहीं है
नहीं होती है यहाँ आम जन के साथ न्याय
आम जन के लिए तो न्याय माँगना भी गुनाह हो जाता है
यदि माँगा वह न्याय और नहीं दिया पैसा
तो रक्षक भी उसका दुश्मन हो जाता है
क्योंकि यहाँ पैसे की ही बात सुनी जाती है
व पैसे की ही जीत होती है
एक नहीं दो नहीं नीचे से ऊपर तक सभी जगह है घूसखोरी व अत्याचार
इसे बंद करने के लिए नहीं है कोई सरकार
होती रही है होती रहेगी अन्याय व अत्याचार
हमें न्याय पाने का भी नहीं है अधिकार
हमें सच बोलने का भी नहीं है अधिकार
तो फिर क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता दिवस
आज सच्चाई व इमानदारी का नहीं है नामों निशान
भारत में धर्म की कोई नहीं है पहचान
चूँकि भारत में सच्चाई, ईमानदारी व धर्म सभी का हो गया है नाश
तो क्यों न स्वतंत्रता दिवस के स्थान पर शोक दिवस ही मनाया जाए

रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

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स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ

Saturday, July 26, 2008

महापाप

इसमें कोई दो राय नहीं कि कन्या भ्रूण हत्या बढ़ने का सर्वाधिक मुख्य कारण संतान के रूप में लड़की की चाह न होकर लड़का की चाह होना रहता है।



अतः जबतक समाज की मानसिकता को बदलकर नर व नारी एक सामान की भावना नहीं लाई जाएगी तबतक इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है। और इसके लिए समाज को ही सोचना पड़ेगा व आगे आना पड़ेगा।



फिर आख़िर संतान के रूप में लोग लड़की क्यों नहीं चाहते हैं? हमें इस पर भी सोचना चाहिए और इसमें जो कारण उचित हों उसे दूर करने का उपाय समाज को ही करना होगा। ऐसे ही कारणों में से एक कारण है : दहेज-समस्या।



हमारी समाज दहेज रूपी दानव को नष्ट करने का कोई पहल नहीं करती है, पर जन्म से पूर्व अपने ही संतान को नष्ट करने का पहल जरुर करती है। सोचिए आख़िर कितनी संकीर्ण व नीच विचारधारा की है हमारी समाज। ......... और यदि हमारी समाज इतनी नीच विचारधारा की है तो हमें समाज के इस विचारधारा का विरोध करने में संकोच नहीं करना चाहिए।


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फिर कन्या भ्रूण हत्या ही क्यों , नर या मादा किसी भी प्रकार की भ्रूण हत्या महापाप है। उस माँ-बाप के लिए अपने संतान के प्रति इससे बड़ा कुकर्म और क्या होगा, जिसने ख़ुद संतान के जन्म के लिए प्रयोजन किया व फिर जन्म से पहले ही अपने ही संतान को नष्ट कर दिया।


कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं किसी भी लिंग की भ्रूण हत्या महापाप है।


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कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

मुझे भी जन्म लेने दो

Friday, July 25, 2008

संतमत आश्रम या अपराध का अड्डा

नीचे के समाचार को पढ़ें व विचारे:

जब संतमत-सत्संग के आश्रम में इस प्रकार की घटना हो सकती है तो अन्य जगह ऐसी घटना नहीं होगी यह कैसी सुनिश्चित की जाएगी? जो संतमत-सत्संग ख़ुद अपने प्रमुख आश्रम को व अपने प्रमुख संतों को सुरक्षित नहीं रख सकी तथा आरोपी भी प्रमुख संत-महात्मा ही है, वह संतमत-सत्संग कैसे शान्ति फैलाएगी? कैसे अब लोग इन साधु-महात्माओं पर विश्वास करे???

ताजा समाचार है कि जिन्हें गोली लगी उनहोंने कल यानि २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया।

अब आप सोचें कि अध्यात्म के आड़ में संतमत-सत्संग का आश्रम क्या अपराध का अड्डा नहीं बन रहा है?

शान्ति के संदेश देने वाले साधु-महात्मा क्या अपराध नहीं कर रहे हैं?

तो नीचे २३.०७.२००८ के समाचार-पत्र का समाचार पढें व विचारें। उल्लेखनिए है कि साधु दयानंद ने २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया है।

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=1#

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=17#

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भागलपुर, अपराध संवाददाता : जिले के बरारी थाना अंतर्गत कुप्पा घाट स्थित महर्षि मेही आश्रम पर कब्जे को लेकर सोमवार की देर रात आश्रम के एक साधु दयानंद दास को गोली मार दी गई। जिन्हें गंभीर हालत में जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया, जहां उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इस संबंध में स्वामी दयानंद के बयान पर मंगलवार को आश्रम के चार पदाधिकारियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। जिनमें महर्षि मेंही आश्रम में कब्जे को लेकर साधु को मारी गोली महर्षि मेंही आश्रम .. अखिल भारतीय संतमत सतसंग महासभा के आशुतोष बाबा, महामंत्री करुनेश्वर सिंह, सह मंत्री राजेन्द्र सिंह व प्रबंधक महापात्रा बाबा के नाम शामिल हैं। इधर, देर शाम डीआईजी रघुनाथ प्रसाद सिंह आश्रम पहुंच मौके का जायजा लिया तथा घटना को आश्रम विवाद का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि जांच के बाद ही आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उधर, एसपी कुंदन कृष्णन को आशंका है कि महंत को उसकी ही रिवाल्वर से गोली लगी है। यदि हत्या की नीयत से गोली चलाई गई होती तो गोली कमर की नीचले हिस्से में क्यों लगती। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। सुपौल जिले के करजाइन बाजार निवासी वैद्यनाथ प्रसाद यादव के पुत्र स्वामी दयानंद दास ने प्राथमिकी में कहा है कि वह गुरुमहाराज के समाधि स्थल के पीछे स्थित कमरा नंबर तीन में सो रहे थे तथा कमरे का दरवाजा खुला हुआ था। इसी बीच रात के पौने तीन बजे के करीब उसके कमर में गोली मार दी गई। गोली लगते ही वे विस्तर से नीचे गिर चिल्लाने लगे परन्तु वहां कोई नहीं आया। बाद में उन्हें मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने कहा कि नामजद चारों लोग मिलकर आश्रम से उसे निकालवाना चाहते थे। क्योंकि आश्रम में हो रहे गोरख धंधे की उसे जानकारी थी। इसके अलावा वे आशुतोष बाबा का आचार्य के उत्तराधिकारी बनने का भी विरोध करते थे। उन्होंने बताया कि उनके मित्र पंकज दास को जबसे आश्रम से बाहर निकाला गया है तब से उसने आशुतोष बाबा को प्रणाम करना तक बंद कर दिया था। इस बात को लेकर भी आशुतोष बाबा नाखुश थे। इन्हीं सब कारणों से एक साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया। इस संबंध में कमरा नंबर एक में रहनेवाले मोनू बाबा, कमरा नंबर पांच के तेजनारायण जो आश्रम की खेती करते हैं तथा सामने वाले कमरे में रहने वाले सफाईकर्मी योगेन्द्र सिंह ने बताया कि वे लोग सो रहे थे। जिस समय घटना घटी उस समय बिजली नहीं थी। इन लोगों का कहना है कि घटना को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया तथा घटना के वक्त मोनू बाबा व तेजनारायण के कमरे को भी बाहर से बंद कर दिया गया था। इधर, मंत्री राजेन्द्र सिंह, व्यवस्थापक महापात्रा व आशुतोष बाबा ने लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इनलोगों ने दयानंद दास को आश्रम से निकालने की बात को गलत करार देते हुए कहा कि आश्रम के लोग ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करेंगे। उनलोगों ने बताया कि महामंत्री करूणेश्र्वर सिंह 19 जुलाई से ही बाहर हैं। घटना के कारणों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए इन लोगों ने इसकी निंदा की है। जांच पूर्व निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी : हरिनंदन बाबा भागलपुर : महर्षि मेंही आश्रम के आचार्य स्वामी हरिनंदन बाबा ने कहा कि घटना की जानकारी उन्हें वार्निग घंटी के बाद रात्रि करीब पौने तीन बजे हुई। हालांकि घटना की वास्तविकता का अब तक उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना को अंजाम बाहरी तत्वों या फिर आश्रम के लोगों द्वारा दिया गया है यह विचारनीय बिंदु है। इसकी गहन जांच कराई जाएगी तथा जांच पूर्व किसी निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी होगी। इस घटना से आश्रम की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। उन्होंने वर्तमान में आश्रम में किसी तरह के विवाद से भी इनकार किया है। व्यवस्था में कमी की बात मानते हुए उन्होंने कहा कि देर शाम आश्रम में आए बाहरी लोगों एवं कमरों की अच्छी तरह जांच होनी चाहिए। जांच में कोताही बरतने का नतीजा सामने है।

Tuesday, July 22, 2008

मुझे भी जन्म लेने दो

तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो


रचनाकार : महेश कुमार वर्मा
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Sunday, July 20, 2008

कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं........


यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। ........आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। ........... यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना या उससे घृणा करना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ................

--महेश कुमार वर्मा

दिनांक : २०।०७।२००८

स्थान : पटना

लेखक : MAHESH KUMAR VERMA

पता : DTDC Courier Office,

Satyanarayan Market,

Opposite Maruti (KARLO) Show Room,

Boring Road, Patna (Bihar)

PIN-800001 (INDIA)

E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com

Webpges : http://popularindia.blogspot.com/

http://aatm-chintan.blogspot.com/

http://dharm-darshan.blogspot.com/

Contact No. : +919955239846

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भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध

जघन्य अपराध

Tuesday, April 22, 2008

चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है?

जी हाँ, यह प्रश्न विचारनिए है कि चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है? इस बात में कोई दो राय नहीं कि चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग जीव हत्या को बढावा देना है। (क्यों?)

हम चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग करते हैं आख़िर तब ही तो बाज़ार में इसकी मांग होती है और इसी कारण ही चर्म उद्योग फल-फूल रहा है। तो इस प्रकार हम यदि चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन करते हैं तो उस जीव हत्या के लिए हम भी जिम्मेवार बनते हैं जिसके चर्म से वह वस्तु बनती है। (क्यों?)

और इसमें कोई दो राय नहीं कि जीव हत्या एक महापाप है। अतः हमें चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन बंद करना चाहिए।

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वह बकरा ने आपको क्या किया था?
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
शाकाहारी भोजन : शंका समाधान
मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Thursday, March 27, 2008

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

आत्म-चिंतन: वह बकरा ने आपको क्या किया था?

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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
शाकाहारी भोजन : शंका समाधान
http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Friday, March 21, 2008

होली के अवसर पर एक अपील

पवित्र होली का पर्व आपस में वैर व दुश्मनी या शत्रुता की भावना भुलाकर आपस में प्रेम स्थापित करने का पर्व है। पर आज कितने लोग अपने पुराने दुश्मनी का बदला होली के दिन ही लेते हैं तथा कितने लोग होली के दिन शरारत करने से नहीं चुकते हैं। पर हमें ख्याल रखना चाहिए की पवित्र होली का पर्व शरारत करने का पर्व नहीं है बल्कि यह प्रेम का पर्व है। इस होली के अवसर पर मैं सबों से अपील करना चाहता हूँ कि वे होली का पर्व प्रेम पूर्वक मनाएं न कि शरारती के साथ तथा आपसी वैर भावना भुलाकर आपस में प्रेम स्थापित करें। साथ ही मांस-मदिरा का सेवन भी त्यागना चाहिए।

होली के शुभकामनाओं के साथ।

आपका
महेश कुमार वर्मा
http://popularindia.blogspot.com/

Sunday, March 9, 2008

मेरा जीवन खुला किताब

मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया
न कोई जान सका न कोई पहचान सका
यह यों पड़ा ही रह गया
मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया

Friday, January 25, 2008

मेरे देश की कहानी

सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों आओ सुनो मेरे देश की कहानी
जहाँ रोज होती है घोटाला और होती है बेईमानी
और कुछ हो या ना हो भ्रष्टाचार ही है देश की निशानी
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों आओ सुनो मेरे देश की कहानी

बेईमानी, भ्रष्टाचार, घुसखोरी और अत्याचार
इसी पर तो टिकी है इस देश की सरकार
नहीं हो भ्रष्टाचार तो ये जी नहीं पाएंगे
इसीलिए तो भ्रष्टाचार को ये कभी नहीं छोड़ेंगे

बढ़ रहे हैं बढ़ रहे हैं ये बढ़ते ही रहेंगे
भ्रष्टाचार को ये नंबर वन का बिजनेस बनाएँगे

तड़पते को रुलाएंगे
मरते को मारेंगे
धर्मं को भुलाएँगे
पैसे को पहचानेंगे
सबों पर अपना रॉब जमाएँगे
दुनियाँ में ताकतवर कहलाएँगे

और कुछ नहीं है इनका विचार
बढ़ते ही रहेगी देश में अत्याचार

पुरुष हो या हो महिला
गरीब हो या हो लाचार
सबों के साथ होगी दुर्व्यवहार व अत्याचार
यही तो है इनको शक्तिशाली कहलाने का आधार

छोड़ देंगे यदि इसे
तो नहीं चल पाएगी इनकी सरकार

यह नई बात नहीं
यह तो है वर्षों पुरानी
यहाँ हमेशा होती रही
बेईमानी ही बेईमानी

बस यही है यहाँ की कहानी
यही है मेरे देश की कहानी
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Saturday, January 19, 2008

कहाँ जाऊंगा मैं तुम्हें छोड़कर

कहाँ जाऊंगा मैं तुम्हें छोड़कर
नहीं रह सकता में तुमसे नाता तोड़कर
चले न जाना तुम मेरा दिल तोड़कर
आ जाना तुम मेरा अपना बनकर
जी नहीं सकता मैं तुम्हें छोड़कर
जी नहीं सकता मैं तुम्हें छोड़कर

Wednesday, January 16, 2008

मुझे शांतिपूर्वक जाने दो

यदि कोई नहीं है इस दुनिया में सच्चाई पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में सच्चाई का साथ देने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में ईमानदारिता पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में निष्पक्षता पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में मुझको न्याय दिलाने वाला
यदि कोई नही