जहाँ पैसे के सामने न्यायालय भी होता अंधा, उस देश के हम वासी हैं।
भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान।
मेरा देश भले हो बेईमान, पर फिर भी है यह महान।
दिल की आवाज़ में आपका स्वागत है। यहाँ आप विभिन्न विषयों पर महेश कुमार वर्मा के स्वतंत्र विचार, तर्क व रचनाएँ देख सकते हैं। आपके सुझाव व विचारों का स्वागत है। E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
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11/22/2009 07:15:00 PM
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कविता
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10/18/2009 08:00:00 AM
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कविता,
छठ,
जीव-हत्या,
बकरा,
मांसाहार
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दीपावली की शुभकामनाएं
अंतर में ज्ञान का दीप जलाकर सत्य के प्रकाश में ईमानदारिता के राह पर चलें।
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10/17/2009 06:18:00 PM
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दिवाली,
दीपावली,
शुभकामना
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10/09/2009 07:11:00 PM
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दिवाली,
दीपावली,
विचार
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आज विजया दशमी का पर्व है। इसी दिन लोग दशहरा पर्व का समापन भी करते हैं। कहा जाता है कि दस सिरों वाला रावण इसी दिन हारा था यानि भगवान राम के हाथों मारा गया था। और इसी के यादगार में लोग इस दिन रावण का पुतला जलाते हैं और खुशियाँ मानते हैं। पर लोग यह भूल जाते हैं कि रावण बहुत ही बड़ा विद्वान था। रावण के मरते वक्त खुद भगवान राम ने भी विद्वान रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने गए थे। क्या राम रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए जाकर गलती किए? क्या भगवान राम के इस कार्य से हमें सिख नहीं लेनी चाहिए? .......... निःसंदेह हमें भगवान राम के इस कार्य से सिख लेनी चाहिए। आखिर भगवान राम के इस कार्य से हमें क्या सिख मिलती है? इस घटना से हमें यही सिख मिलती है कि शत्रु के भी अच्छे गुणों को ग्रहण करें. रावण बहुत ही बड़ा विद्वान व पंडित था। भले ही किसी एक घटना के कारण वह भगवान राम के हाथों मारा गया। पर उसकी विद्वता को इंकार नहीं किया जा सकता है। और इसी कारण ही भगवान राम भी उनके पास शिक्षा ग्रहण करने गए। हमें किसी के जीवन से उसके बुराई को छोड़कर अच्छाई को ग्रहण करना चाहिए। अतः हमें भी विजया दशमी का यह पर्व भी इसी लक्ष्य को रखकर मनाना चाहिए। पर हम करते क्या हैं। सिर्फ रावण का पुतला जलाने का ही रश्म मानते हैं। और कोई अच्छाई को ग्रहण करने का कार्य नहीं करते है। विजया दशमी के दिन बेवजह के बेकसूर जीव को मारकर उसके मांस खाकर अपना पेट भरते हैं। क्या भगवान राम ने ऐसा किया था? नहीं न? तब हम ऐसा क्यों करते है? और यदि सिर्फ रावण के पुतला को जलाकर ही विजया दशमी का पर्व मनाना है तो जरा सोचें कि रावण को तो राम ने मारा था पर यहाँ राम है कहाँ जो रावण को मारेगा? जब आप राम के तरह नहीं हैं तो आपको रावण का पुतला जलाकर रावण की निंदा कर विजया दशमी का पर्व मानाने का अधिकार कैसे हैं?
विजया दशमी का पर्व मनाओ पर पहले राम बनो तब रावण को मारना।
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9/28/2009 08:01:00 PM
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जीव-हत्या,
मांसाहार,
विचार,
विजया दशमी
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9/19/2009 03:16:00 PM
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अपील,
ईद,
कविता,
जीव-हत्या,
दुर्गा पूजा,
धर्म,
मांसाहार,
रमजान,
विजया दशमी
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क्यों खफा हो मुझसे यह तो बता
क्यों चुप हो यह तो बता
तुम्हारी चुप्पी मेरे दिल में यों चुभती है
जिसका वर्णन मैं कर सकता नहीं
फिर भी इस आश के साथ जिन्दा हूँ
कि तुम्हारी चुप्पी टूटेगी और
एक दिन तुम मेरे साथ दोगे
मेरे साथ दोगे व मेरे दर्द सुनोगे
मेरे दर्द सुनोगे व उसे दूर करोगे
मेरे चाह को पूरा करोगे
व मेरे दर्द को दूर करोगे
और यदि तुम ऐसा नहीं करोगे
तो फिर तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
जब मेरे दुःख में साथ ही न दो
पर फिर भी इसी आश के साथ हूँ
कि तुम मेरा साथ दोगे
व मेरी सहायता करोगे
--
महेश कुमार वर्मा
Webpage : http://popularindia.blogspot.com
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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9/15/2009 06:42:00 PM
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कविता
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8/14/2009 04:36:00 PM
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चिंतन,
विचार,
स्वतंत्रता दिवस
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तीन भिखारी
हाथ में कटोरा लिए
आधा कपड़ा फटे हुए
आधा तन उघड़े हुए
एक हाथ में लाठी लिए
झुकी कमर से चल रहे
लोगों से हैं कह रहे
दे दो बाबू दे दो
इस बुढ़े को दे दो
तू एक पैसे देगा
वो दस लाख देगा
दे दो बाबू दे दो
दे दो बाबू दे दो
उसे देख कई चलने वाले
सिक्के डाल देते कटोरी में उसके
कोई अपने आप से कहता
यही है इन लोगों का धंधा
तो कोई नजर छुपाकर बढ़ जाते
व सुरक्षित रखते अपने पैसे
सुरक्षित रखते अपने पैसे
सड़क पर के भिखारी ये
मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए
मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए
थोड़ी दूर चलने पर
पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में
थोड़ी दूर चलने पर
पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में
वही पुराना ऑफिस
जहॉं मैं वर्षों कार्य किया
वही पुराना ऑफिस
जहॉं से मैं रिटायर हुआ
मेरे रिटायर होने पर
किया था विदाई समारोह सहकर्मियों ने
दिया था कुछ उपहार मेरे सहकर्मियों ने
वही पुराना ऑफिस
वही पुराना ऑफिस जब मैं पहुँचा
लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा
लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा
बड़ा बाबू ऐनक पहने
मोटे फाईल में व्यस्त थे
मुझे देख ऐनक उतार
मुझको वे समझाने लगे
मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए
मॉंग रहे थे मुझसे पैसे
मॉंग रहे थे मुझसे पैसे
कहा उसने
नहीं दोगे तो होगा नहीं काम तुम्हारा
अब नहीं है यहॉं ईमानदारी तुम्हारा
मेरे कलम पर है पैसा तुम्हारा
मेरे कलम पर है पैसा तुम्हारा
अब तुम्हारा नहीं है यहॉं कोई सम्मान
दे दो वरना कर दुँगा तुम्हें बदनाम
फिर नहीं होगा तुम्हारा काम
फिर नहीं होगा तुम्हार काम
मैं वापस आ गया
मैं वापस आ गया
सोचने लगा
मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए
मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे
मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे
यह सोचने पर मैं विवश था
यह सोचने पर मैं विवश था
कि यह तो
उस सड़क किनारे के
भिखारी से भी बदतर निकला
जिसने मेरे पैसे को भी
अपना ही समझा
जिसने मेरे पैसे को भी अपनो ही समझा
नहीं था मेरे पास कोई चारा
सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा
नहीं था मेरे पास कोई चारा
सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा
गया मैं थाना पुलिस के पास
होती दारोगा बाबू से मुलाकात
जो सामने ऑफिस में ही थे
कलम लिए कुछ लिख रहे थे
उनके ईशारे पर
सामने कुर्सी पर मैं बैठा
और सुनाया अपना दुखड़ा
कहा मैं बिल्कुल साफ-सुथरा
नहीं है मेरे पास कोई पैसा
आपसे ही है मुझे आशा
आपसे ही है मुझे आशा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा
दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा
काम तो हो जाएगा
पर देना होगा कुछ पैसा
फिर तुम्हारा सारा पैसा
तुम्हारे हाथ में होगा
और वह बड़ा बाबू
वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा
वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा
पर कुछ तो देना होगा
बिना दिए कुछ नहीं होगा
बिना दिए कुछ नहीं होगा
मैंने कहा
मेरे पास नहीं है पैसा
मेरे पास नहीं है पैसा
वहाँ न दिया तो
आपके लिए
लाऊँ मैं कहॉं से पैसा
लाऊँ मैं कहॉं से पैसा
मेरे पास नहीं है पैसा
पर एक आपसे ही है आशा
एक आपसे ही है आशा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
पर दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना
दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना
कहा उसने संतरी से
निकालो इसे बाहर
और ले जाओ यहॉं से
है नहीं पैसा
और करता है बकवास
ले जाओ इसे यहॉं से
ले जाओ इसे यहॉं से
आया संतरी
बड़ी-बड़ी मुँछों वाला
रंग था उसका बिल्कुल काला
हाथ में लिए था डंडा
खींच मुझे बाहर निकाला
मैं कुछ कहना चाहा
पर उसने एक न सुना
धक्का देकर बाहर निकाला
दो-चार थप्पड़ भी लगाया
और मुझे निकाल दिया
और मुझे निकाल दिया
आया फिर मैं अपने घर में
आया फिर मैं अपने घर में
सोचने लगा
कि ये पुलिस हैं या हैं जल्लाद
ये रक्षक हैं या हैं भक्षक
करते हैं ये धर्म की रक्षा
या करते हैं धर्म को ही हलाल
या करते हैं धर्म को ही हलाल
मैं सोचने लगा
कि ये क्यों मॉंगते हैं मुझसे
ये क्यों मॉंगते हैं मुझसे
सड़क का भिखारी
अपने पेट के लिए मॉंगते हैं
ऑफिस का किरानी
मेरे पैसे को अपना ही समझ लिया
और ये पुलिस
ये तो
ये तो मेरे पैसे व मेरे शरीर
दोनों पर अपना अधिकार जमाया
और बेवजह मुझे मार भगाया
बेवजह मुझे मार भगाया
किरानी रूपी भिखारी
सड़क के भिखारी से बदतर निकला
पर पुलिस रूपी ये भिखारी
सबसे बड़ा घिनौना निकला
सबसे बड़ा घिनौना निकला
जो मेरे शरीर को भी मेरा न समझा
और बेवजह मुझे मार भगाया
बेवजह मुझे मर भगाया
पुलिस रूपी ये जल्लाद
सबसे बड़ा घिनौना निकला
सबसे बड़ा घिनौना निकला
*******
*****
***
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7/19/2009 02:18:00 PM
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अन्याय,
कविता,
जीव-हत्या,
धर्म,
नेता,
न्याय
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7/14/2009 01:06:00 PM
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कविता,
व्यंग्य,
समाज,
स्वतंत्रता दिवस
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हमारी पुलिस प्रशासन का हालात कैसी है इसका अंदाजा इसी घटना से लगाया जा सकता है कि आगामी ३०.०४.२००९ को लोकसभा चुनाव है और इससे मात्र ८ दिन पहले २२.०४.२००९ को एक प्रा. वि. के हेडमास्टर श्री चितरंजन भगत का अपहरण होता है। पर घटना के चौथे दिन आज २५.०४.२००९ के अब तक भी पुलिस द्वारा न तो अपहर्ता के विरुद्ध कोई खाश कार्रवाई ही की गयी है न तो अपहृत को ही उनके चंगुल से मुक्त कराया गया है जबकि अपहर्ता व अपहृत से मोबाईल पर बराबर बात हो रही है। इसके बावजूद भी पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं की जा रही है। आरक्षी अधीक्षक (एस. पी.) ने स्पष्ट रूप से कल २४.०४.२००९ को पीड़ित वालों को कह दिया कि मेरे पास कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है। वहीं डी. एस. पी. ने कह दिया कि आपलोग खुद अपने स्तर से मामला को सलटा लें। उल्लेखनीय है कि अपहर्ता द्वारा मोबाईल पर ६ लाख रूपये फिरौती की माँग की गयी है (जो बाद में कम कर ४ लाख कर दिया गया है) और पैसे जमा करने के लिए आज २५.०४.२००९ तक का समय दिया गया है अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी दी गयी है। पर पुलिस अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी है। एस. पी. के अनुसार कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है। जब इस मामला में कार्रवाई करने के लिए प्रशासन के पास फोर्स नहीं है तो आप सोच सकते है कि ५ दिनों के बाद ३०.०४.२००९ को होने वाले चुनाव कितना निष्पक्ष होगा? ............ आख़िर पुलिसवाले करेंगे भी क्या? इस घटना में पुलिसवाले व थाना का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है, इसका भी प्रमाण मिला है, जो इस घटना से स्पष्ट है :
अपहर्ता व अपहृत का फोन हमेशा पीड़ित के एक नजदीकी के मोबाईल पर आता है जिसमें अपहर्ता पैसे की माँग करते हैं अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी देते हैं। ..... मोबाईल धारक द्वारा हुए बातचीत की रिकॉर्डिंग कर ली जाती है और फिर वे इस रिकार्डिंग को संबंधित सलखुआ(सहरसा) थाना के पुलिस अधिकारी को सुनाते हैं। तो फिर बाद में अपराधकर्मियों द्वारा फोन पर कहा जाता है कि आप थाना गए थे और वहाँ हमलोगों के बातचीत के रिकॉर्डिंग सुनाये हैं ........... इस प्रकार कहकर उन्हें धमकी दी जाती है ........................ अब आप खुद सोचें कि थाना में रिकॉर्डिंग सुनाया गया तो यह ख़बर अपराधकर्मियों तक कैसे पहुँचा? यह इसी बात को प्रमाणित करता है कि थाना और पुलिसवाले का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है और इसी कारण ही वे कोई विशेष कार्रवाई नहीं कर रहे हैं और इस केस से अपना पिंड छुड़ाने के लिए कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है, आप अपने स्तर से ही मामला को सलटा लें (यानि पैसे के लेन-देन करके छुड़वा लें)।
इस पुरे घटनाक्रम से हमारी पुलिसिया तंत्र की हालात स्पष्ट होती है जो यदि चाहे तो अपहृत को तुरत मुक्त करा सकता है पर अपराधी से खुद उनकी साथ-गाँठ होने के कारण वे कुछ नहीं कर रही है। घटना बिहार राज्य के सहरसा जिला के सलखुआ थाना क्षेत्र की है। अपहृत श्री चितरंजन भगत सहरसा के संतनगर मुहल्ला के निवासी हैं तथा सलखुआ(सहरसा) के फरकिया क्षेत्र स्थित प्रा. वि., रंगनिया(अलानी) में हेडमास्टर के पद पर पदस्थापित हैं; जिन्हें गत बुधवार यानि २२.०४.२००९ को स्कूल जाने के क्रम में पंचभीरा घाट के समीप सशस्त्र अपराधकर्मियों द्वारा अपहरण कर लिया गया। ...................... इस क्षेत्र में यानी सुपौल लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में अगले कुछ दिनों बाद ३०.०४.२००९ को लोक सभा चुनाव होनी है। अब आप खुद सोचें कि क्या पुलिस प्रशासन की यह हालात यहाँ लोक सभा चुनाव कराने के लिए उचित है? ............. क्या इस हालात में यहाँ निष्पक्ष चुनाव हो सकता है? ................. क्या यहाँ के आम जनता सुरक्षित है? ......................... नहीं, यहाँ न तो आम जनता ही सुरक्षित है और न ही यहाँ के पुलिस प्रशासन ही चुस्त व दुरुस्त है जो सही ढंग से चुनाव करा सके। इस प्रकार यहाँ के यानी लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र सुपौल की वर्तमान स्थिति चुनाव कराने लायक नहीं है। .......... यों भी जब एक अपहरण के मामला में पुलिस कुछ नहीं कर रही है और एस. पी. खुद कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है तो फिर ऐसे विकलांग पुलिस प्रशासन के भरोसे लोक सभा चुनाव कैसे कराया जा सकता है? .....................................
(घटना की जानकारी विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त जानकारी पर आधारित)
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4/25/2009 12:08:00 PM
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अपराध,
पुलिस,
प्रश्न,
लोक सभा चुनाव,
समाज
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आओ साथ मिलकर लड़ें अपनी लड़ाई
दुनियाँ से पाप और अत्याचार को दें हमेशा के लिए विदाई
फिर कभी न आए ये पाप हम इंसानों के बीच
नहीं बनें हम हैवान इंसानों के बीच
हम हैं इंसान
नहीं बनेंगे हैवान
आएगी पाप यदि मेरे बीच
तो दिखा दूंगा उन्हें सबसे नीच
आओ साथ मिलकर लड़ें अपनी लड़ाई
और हमेशा के लिए करें पाप की विदाई
प्रस्तुतकर्ता
Popular India
पर
4/21/2009 03:24:00 PM
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कविता,
पाप,
समाज
इस संदेश के लिए लिंक
वो क्या देगा न्याय
जो न जानता है कि
क्या होता है न्याय
वो क्या देगा न्याय
जो जीवन भर किया अन्याय
न्याय और अन्याय के बीच मरती है भोली जनता
वो क्या जानेगा इसका दर्द
जो है खुद बेदर्द
जो है खुद बेदर्द
-- महेश कुमार वर्मा
-------------
http://paramjitbali-ps2b.blogspot.com/2009/04/blog-post.html
प्रस्तुतकर्ता
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4/19/2009 11:36:00 AM
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अन्याय,
कविता,
न्याय
इस संदेश के लिए लिंक
मुझे नहीं मालूम कि मेरी क्या गलती है
मुझे तो बस इतना मालूम
कि गलती मेरी साथ हुयी
न्याय पाने की थी आशा
पर न्याय पाना भी दुस्वार हुआ
गलती बताने वाले कोई नहीं
पर सजा देने वाले हजार हुए
मेरा सुनने वाला कोई नही
पर आरोप लगाने वाले हजार हुए
घाव पर मलहम लगाने वाला कोई नहीं
पर नमक छिडकने वाले हजार हुए
साथ देने वाला कोई नहीं
पर आगे बढ़कर धक्का दे गिराने वाले हजार हुए
मौत से बचाने वाला कोई नहीं
पर मौत देने वाले हजार हुए
चाहते है वे मेरी मौत
तो ठीक है मुझे मौत के गले लगा दो
पर एक गुजारिश है तुमसे
कि ऐसा न करना अब किसी से
न होना कभी तुम धर्म भ्रष्ट
न देना किसी को ऐसा कष्ट
न देना किसी को ऐसा कष्ट
मुझे नहीं मालूम कि मेरी क्या गलती है
मुझे तो बस इतना मालूम
कि गलती मेरी साथ हुयी
गलती मेरी साथ हुयी
-- महेश कुमार वर्मा
प्रस्तुतकर्ता
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पर
4/06/2009 08:18:00 AM
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कविता,
गलती
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नशा!
नशा शराब में नहीं
नशा बोतल में नहीं
नशा तो मेरे मन में है
यदि होती शराब में नशा
तो नाचती वो बोतल
यदि होती बोतल में नशा
तो नाचती वो बोतल
पर नशा तो मेरे उस मन में है
जिसने खुद को पागल बनाया
व बोतल व शराब से दोस्ती निभाया
नशा शराब में नहीं
नशा मेरे मन में है
नशा मेरे मन में है
और बोतल बेचारा बदनाम है
नशा बोतल में नहीं
नशा मेरे मन में है
नशा मेरे मन में है
प्रस्तुतकर्ता
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पर
4/01/2009 09:43:00 AM
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कविता,
नशा
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सबों को होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
होली का पवित्र पर्व नजदीक है। मैं व्यक्तिगत रूप से सबों से आग्रह करना चाहता हूँ कि होली के पवित्र पर्व को पवित्र बनाएं रखें व इसे दूषित नहीं करें। कितने लोग इस होली के पर्व के ही दिन पुराने शत्रुता का बदला लेते हैं। कितने लोग पवित्र होली के दिन शराब पीकर मतवाला बने रहते हैं और पवित्र होली को दूषित कर देते हैं। कितने लोग जबरन ही किसी को उसके न चाहने पर भी उसे रंग या अन्य पदार्थ देते हैं। कितने लोग के मंशा सिर्फ शरारत करने की ही रहती है। पर ऐसा नहीं होनी चाहिए। होली आपसी प्रेम का पर्व है न कि शरारत करने का पर्व। होली प्रेम का पर्व है। पर कितने लोग इस दिन विशेष रूप से मांसाहार भोजन करते हैं, जो कि उचित नहीं है। आयें आपसी प्रेम के पर्व होली में मांसाहार का विरोध करें व सबों से प्रेम करें।
कृपया पवित्र होली को पवित्र बनाए रखें। पुनः होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।
आपका
महेश कुमार वर्मा
---------
http://popularindia.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%८०
प्रस्तुतकर्ता
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पर
3/07/2009 08:55:00 AM
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शुभकामना,
होली
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आज मैं निम्न पोस्ट पढ़ा :
ब्लागर हैं तो क्या? कानून से ऊपर नहीं (http://teesarakhamba.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html)
ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में (http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=76)
वैसे मैं सम्बंधित ब्लॉग को या इससे सम्बंधित समाचार को अन्यत्र कहीं नहीं पढ़ा या सुना हूँ। पर इस ब्लॉग में लेखक ने जो बात कहना चाहा है वह तो मैं समझ गया. पर एक बात मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि यदि कोई साईट या ब्लॉग या समाचारपत्र ऐसा है जो किसी विषय पर आम लोगों की निष्पक्ष विचार आमंत्रित करता है और सम्बंधित साईट या पत्र का उद्देश्य रहता है कि वह आम लोगों की निष्पक्ष विचार को सार्वजानिक करे ताकि आम जनता यह जान सके कि इस विषय पर किसका क्या विचार है. तब यदि कोई व्यक्ति उसपर अपने विचार में या टिप्पणी में कोई आपत्तिजनक बात लिखता है तो इसके लिए साईट या पत्र का स्वामी जिम्मेवार क्यों होगा और उसपर कार्रवाई क्यों होगी? उसका तो उद्देश्य तो आम लोगों के विचार को सार्वजानिक करना था. .................... ऐसी स्थिति में तो कार्रवाई सम्बंधित विचारक / टिप्पणीकार पर होनी चाहिए न कि साईट / ब्लॉग / समाचारपत्र के स्वामी पर. यदि किसी साईट या पत्र पर आये टिप्पणी से ही किसी के (या टिप्पणीकार के) अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए सम्बंधित साईट / पत्र के स्वामी या प्रकाशक जिम्मेवार क्यों व कैसे होगा? ................... ऐसी स्थिति में यदि कसी के टिपण्णी से किसी के अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए टिप्पणीकार जिम्मेवार होगा और कार्रवाई भी उसी पर होनी चाहिए न कि साईट या पत्र के स्वामी या प्रकाशक पर.............
ऊपर वर्णित पोस्ट के लेखक, प्रकाशक व पाठक कृपया इसपर अपनी राय स्पष्ट करें.
प्रस्तुतकर्ता
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2/26/2009 11:45:00 AM
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अपराध,
विचार
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दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के ५९ वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। प्रश्न उठता है की हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाएँ? क्या सिर्फ इसलिए कि हम भारतीय है? जरा सोचें कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए पर आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिली है?
कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गयी है। पर वास्तविकता इनसे कोसों दूर है। वास्तविकता के जमीं पर हम आयें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं। इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय ही होता है।
यह बात सिर्फ कहने-सुनने के लिए ही नहीं बल्कि वास्तविकता है। आप ख़ुद देखें आज बच्चों को उचित शिक्ष भी नहीं मिल पाती है। उन्हें पढने व खेलने का भी अधिकार नहीं है और बचपन से ही उनसे मजदूरी करायी जाती है। ....... आज महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है और महिला वर्ग हमेशा पुरुषों द्वारा प्रताडित ही होती रहती है। आज पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है और तंग आकर वह अपराधी भी बन जा रहा है। आज भारत में न्यायप्रिय राजा नहीं है बल्कि यहाँ सभी मुद्राप्रिय हैं। कभी दुनियाँ को धर्म की शिक्षा देने वाला भारत आज खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है। और इसके लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ-साथ खुद हमारे समाज हैं। जी हाँ, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है कि आज अन्याय व जुल्म के सताए व्यक्ति को उचित न्याय भी नहीं मिल पाता है। पुलिस से लेकर अदालत तक सभी मुद्राप्रिय हो गए हैं और यहाँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुद्रा के आधार पर न्याय होता है। ऐसे कई मामला देखे जाते हैं जहाँ न्यायलय में न्याय करने के लिए बैठे हमारे न्यायाधिश भी पैसे लेकर पैसे वाले के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। अपराध बढ़ाने में तो शायद सबसे बड़ा हाथ समाज से अपराध को मुक्त कराने के लिए बैठे हमारे पुलिसिया तंत्र का ही है। जहाँ यदि आप अपने ऊपर हुए किसी जुल्म व अन्याय के शिकायत करने जाएँ तो आपके साथ क्या जुल्म हुआ यह नहीं देखा जाता है बल्कि देखा जाता है कि आपके पास क्या पैसा है। इतना ही नहीं, अपराधी अपना लाभांश इन पुलिस को देकर ही अपने अपराध के व्यवसाय में दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं। ................. अपराधों को बढ़ाने में हमारा समाज भी पीछे नहीं है। भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं। .........................
इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय मैं भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है? .................... और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? ........ आयें अपने समाज व देश से अन्याय, भ्रष्टाचार व जुल्म को उखाड़ फेकने के लिए कदम आगे बढाकर राष्ट्रहित में कार्य करें।
धन्यवाद।
आपका
महेश कुमार वर्मा
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1/24/2009 12:22:00 PM
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गणतंत्र दिवस,
चिंतन,
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प्रश्न,
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मंथन,
विचार
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12/31/2008 06:42:00 PM
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कविता,
नववर्ष
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क्या फायदा हुआ तुम्हें
किसी का घर सुना करके
किसी के मांग का सिंदूर उतार के
किसी को अनाथ करके
किसी को यों ही तड़पा के
किसी को बेमौत मार के
क्या फायदा हुआ तुम्हें
सबों को दर्द देके
है तुम्हारे पास कोई जवाब
नहीं है
क्योंकि तुम ख़ुद बेदर्द हो
क्या जानोगे दुसरे के दर्द
पर याद रखना
परमात्मा के दरबार में
तुम्हें तुम्हारे हर कर्म का जवाब देना होगा
हर कर्म का जवाब देना होगा
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शहीदों को श्रद्धांजलि
-- महेश कुमार वर्मा
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12/05/2008 09:17:00 AM
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कष्ट,
चिंतन,
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धर्म,
श्रद्धांजलि
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12/01/2008 08:57:00 PM
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कविता,
याद
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देखा मैं एक ऐसा भिखारी
जो खा रहा था खैनी
सोचा
पेट भरने के लिए
कुछ नहीं है उसके पास
माँगता है कुछ लेकर आस
दया करके
कोई कुछ खाने देता है
कोई कुछ पैसे देता है
पर वह
वह भिखारी
मिले पैसे से
खैनी खाता है
सोचने पर मैं मजबूर हुआ
कि इसे पैसे देना
पुण्य है या पाप है
पुण्य है या पाप है
यह कोई कविता नहीं
नहीं यह कोई कहानी है
यह मेरी आँखों देखी हकीकत है
आँखों देखी हकीकत है
आप भी विचारें
उसे भिक्षा में पैसे देना
पुण्य है या पाप है
पुण्य है या पाप है
--------------------------------
मेरी आँखों देखी हकीकत पर आधारित
-- महेश कुमार वर्मा
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11/30/2008 12:28:00 PM
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कविता,
भिखारी
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रचयिता :
महेश कुमार वर्मा
DTDC कुरियर ऑफिस,
सत्यनारायण मार्केट,
मारुती (कारलो) शो रूम के सामने,
बोरिंग रोड, पटना (बिहार),
पिन : 800001 (भारत);
Webpage : http://popularindia.blogspot.com/
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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11/30/2008 12:16:00 PM
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कविता,
बुढा
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11/27/2008 09:21:00 PM
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कविता,
बुढा
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11/23/2008 04:00:00 PM
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कविता,
गज़ल,
याद
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दुनियाँ वाले मुझे तुमसे अब नहीं है कुछ कहना।
मुझे यहाँ रहने का अब नहीं है कोई बहाना॥
क्या फायदा हुआ तुझे मुझको यूँ ही तड़पा कर।
क्या फायदा हुआ तुझे मुझको यूँ ही रुला कर॥
क्या फायदा हुआ तुझे मुझसे मेरा अधिकार छिनकर।
क्या फायदा हुआ तुझे मेरे जीने का आधार छिनकर॥
यदि मैं कुछ नहीं कर सकता उसके लिए।
तो मैं जिऊँगा फिर किसके लिए॥
जीने का अंतिम आधार था वह मेरे लिए।
मौत से बचने का एक ही सहारा था वह मेरे लिए॥
आया था मैं मौत के बहुत ही करीब से।
जीने की आशा थी अब सिर्फ उसी से॥
जीने के लिए मुझे उसके लिए कुछ करना जरुरी था।
उसके लिए मुझे जीना भी बहुत जरुरी था॥
उसके लिए मेरा सपना रह जाएगा अधुरा।
उस सपना को फिर कौन करेगा पूरा॥
एक सिर्फ वही बचा था मेरे लिए।
उसे छिनकर कुछ नहीं छोड़ा तुम मेरे लिए॥
अब मुझे कुछ नहीं कहना है तुमसे।
चलाओ दुनियाँ को तुम अपनी मन से॥
नहीं कुछ रहा यहाँ अब मेरे लिए।
नहीं रहा मैं यहाँ अब किसी के लिए॥
छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए।
छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए॥
------------------------------http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/d5274d12d3216ye5
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11/14/2008 09:57:00 PM
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कविता
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देख मुर्ख मनुष्य को
करता है ये छठ पर्व
चाहता है हजारों कामना
छठ करने के लिए
कितनी सारी व्यवस्था करता है
भगवान से हजारों कामना चाहता है
खरना करता है
उपवास रहता है
नदी जाता है
सूर्य को अर्ध्य देता है
ताकि उसकी मनोकामना पुरी हो
पर उसका नहाय-खाय
खरना, उपवास
व सूर्य को अर्ध्य देना
सब तब हो जाता है बेकार
जब छठ के तुरत बाद
वह भूल जाता है
अपने धर्म व कर्म को
और करता है
मुझपर बेवजह प्रहार
मैं ही नहीं
मेरे जैसे हजारो
बकरे मारे जाते है
छठ के पारण दिन
लेते हैं मनुष्य
बेवजह इनकी जान
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान
मुर्ख मनुष्य
करके मेरा बध
छठ के अपने पुण्य को
ख़ुद मिटा देता है
और ले आता है
अपने खाते में
सिर्फ पाप ही पाप
इसीलिए तो नहीं करता है ये
कोई तरक्की
नहीं करता है, नहीं करेगा
कभी ये कोई तरक्की
ये फल है ख़ुद कर्म की उनकी
नहीं करेगा कभी ये कोई तरक्की
नहीं करेगा कभी ये कोई तरक्की
अरे मुर्ख व पापी मनुष्य
मेरी गलती मुझे बताओ
मेरा अपराध मझे बताओ
तुमने मुझे क्यों मारा
मुझ बेगुनाहों को क्यों रुलाया
मारकर मुझे तुम
तरक्की कर सकते नहीं
शांत तुम रह सकते नहीं
चैन से तू सो सकते नहीं
चैन से तू सो सकते नहीं
कहता है तुमसे ये बकरा
अपना भविष्य तुमने ख़ुद है उकेरा
अवश्य मिलेगा तुम्हें मुझे मारने का फल
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल
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11/05/2008 10:37:00 AM
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कविता,
जीव-हत्या,
बकरा,
मांसाहार
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10/28/2008 07:15:00 PM
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कविता,
दिवाली
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ना हो प्रकाश से कोई जगह खाली
अन्धकार से प्रकाश में जाना है
जीवन में प्रकाश लाना है
दीवाली के दीपक से यही सीख लेना हैं
सारे जग से अंधकार मिटाना है
दुनियाँ में प्रकाश फैलाना है
हरेक जगह प्रकाश फैलाना है॥
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10/27/2008 06:18:00 PM
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कविता,
दिवाली
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10/27/2008 08:20:00 AM
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दिवाली,
शुभकामना
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होती थी यह वर्षों पहले
जब दिवाली में जलते थे दिये
पर अब चाहे हो जैसे
दिवाली में जलते हैं पैसे
छोड़ते हैं बम-पटाखे
और छोड़ते हैं रॉकेट
फैलाते है प्रदुषण
बढ़ाते हैं बीमारी
चाहे हो जैसे
पर दिवाली में जलते हैं पैसे
दिवाली मैं दिये अब जलते नहीं
दिये के स्थान पर है अब मोमबत्ती
मोमबत्ती का स्थान भी ले लिया अब बिजली
बिना बिजली के नहीं होता अब दिवाली
पर आपस में ख़ुशी बाँटने के जगह
खेलकर जुआ करते हैं पैसे की बर्बादी
चाहे हो जैसे
पर दिवाली में जलते हैं पैसे
दिवाली में जलते हैं पैसे
--महेश कुमार वर्मा
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10/26/2008 06:31:00 PM
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कविता,
दिवाली
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प्रेम है बहुत महान
ये है मानवता की पहचान
प्रेम ही है जो दुश्मन को दोस्त बनाते हैं
प्रेम ही है जो पशुओं को भी मित्र बनाते हैं
प्रेम ही है जो सबों को आपस में बांधे रखता है
प्रेम ही है जो सबों को बिछुड़ने से रोकता है
प्रेम न होता तो ये सारा रिश्ता नाता न होता
प्रेम न होता तो दुनियाँ का काम न होता
प्रेम न होता तो दुनियाँ में चलना मुश्किल था
प्रेम न होता तो हमें जी पाना मुश्किल था
अतः प्रेम करना सीखो
आपस में मिलकर रहना सीखो
सबों से प्रेम करो
नहीं किसी से वैर करो
प्रेम है बहुत महान
ये है मानवता की पहचान
प्रेम है बहुत महान
प्रेम है बहुत महान
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10/17/2008 09:02:00 PM
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कविता,
प्रेम
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10/07/2008 09:57:00 PM
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9/25/2008 09:08:00 PM
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ईद,
कविता,
धर्म,
रमजान
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9/23/2008 08:39:00 PM
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कविता,
समाज
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अब तक तो चुप था पर
अब चुप रह सकता नहीं
मरना होगा मर जाएंगे पर
मैं सर झुका सकता नहीं
है किसी में हिम्मत तो मेरे बातों का जवाब दे दे
है किसी में ईमानदारी तो सच्चाई सामने ला दे
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9/14/2008 12:00:00 PM
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कविता
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किसे सुनाऊँ मैं अपनी हाल
हाल मेरा है बेहाल
मर जाऊँगा मिट जाऊँगा
नहीं मानूंगा मैं हार
झूठ को नहीं स्वीकारुँगा
सत्य को नहीं छोडूँगा
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार
प्रस्तुतकर्ता
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9/14/2008 11:40:00 AM
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कर्म,
कविता,
धर्म,
सत्य
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चाहता था कुछ कहना पर कह न पा रहा हूँ
चाहता था कुछ लिखना पर लिख न पा रहा हूँ
करूँ मैं क्या मुझे पता नहीं चलता
जीने का कोई सहारा अब नजर नहीं आता
चाहा था नई जिन्दगी जीने को
पर बचा है अब सिर्फ मरने को
चाहता था कुछ कहना पर कह नहीं सकता
चाहता था कुछ लिखना पर लिख नहीं सकता
कैसे कहूँ कैसे सुनाऊँ पता नहीं चलता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता
प्रस्तुतकर्ता
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9/12/2008 09:26:00 PM
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कविता
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दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है
भर जाएंगे शरीर के जख्म दिन नहीं तो महीनों में जरुर
पर नहीं भरेंगे दिल का जख्म यह बात है जरुर
तड़पते रह जाओगे दिल का जख्म लेकर
पर नहीं आएँगे कोई तुम्हें अपना समझकर
जमाना हो गया है बेदर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
क्योंकि जमाना हो गया है बेदर्द
दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है
प्रस्तुतकर्ता
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पर
9/09/2008 05:00:00 AM
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कविता,
जख्म,
दिल
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बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
निभा सको तो साथ देगी जीवन भर ये रिश्ते
नहीं तो सिर्फ कहलाने को रह जाएँगे ये रिश्ते
बनते हैं पल भर में, बिगड़ते हैं पल भर में ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
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पर
9/08/2008 08:37:00 AM
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कविता,
रिश्ता
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पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
था कभी भाई-भाई का रिश्ता
कभी न बिछुड़ने वाला रिश्ता
जो हमेशा साथ-साथ खेलता
हमेशा साथ-साथ पढ़ता
हमेशा साथ-साथ खाता
हमेशा साथ-साथ रहता
पर आज जब वे बड़ा व समझदार हुए
तो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हुए
हथियार लेकर दोनों आमने-सामने हुए
भाई-भाई का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
किया था शादी पति-पत्नी के रिश्ता के साथ
जीवन भर साथ निभाने को
पर रह गयी दहेज़ में कमी
तो न दिया उसे साथ रहने को
और जिन्दा ही पत्नी को जला डाला
क्योंकि था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
जीवन भर साथ निभाने का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
था पिता-पुत्र का रिश्ता
पिता ने उसे अपने बुढ़ापे का सहारा समझा
पर उसने तो दुश्मन से भी भयंकर निकला
निकाल दिया पिता को घर से
भूखे-प्यासे छोड़ दिया
नहीं मरा पिता तो उसने
जहर देकर मार दिया
बुढ़ापे का सहारा आज उसी का कातिल बना
था इन्सान पर आज वह हैवान बना
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
ये रिश्ता चीज होती है क्या
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http://merekavimitra.blogspot.com/2008/08/rishte-par-kavitayen-kavya-pallavan.html#mahesh
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9/04/2008 08:43:00 AM
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अपराध,
कविता,
चिंतन,
दहेज़,
रिश्ता,
हत्या
इस संदेश के लिए लिंक
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9/02/2008 08:41:00 AM
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अपराध,
बाल-शिक्षा
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आज हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री जाति को उपेक्षित भाव से देखा जाता है। लड़का-लड़की में अंतर व लड़की को उपेक्षित भाव से देखना उसी समय से प्रारंभ हो जाता है जब लड़की अपने माँ के कोख से जन्म लेती है। जब लड़का जन्म लेता है तो बेटी खुशियाँ मनाते हैं और वहीँ जब लड़की जन्म लेती है तो तो एक मायूसी छा जाती है; जैसे कि लड़की को जन्म लेने के बाद कोई विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा हो।
इतना ही नहीं, जन्म के बाद भी लड़का व लड़की के पालन-पोषण में काफी अंतर देखने को मिलता है। जहाँ लड़का के भोजन व रहन-सहन का खास ख्याल रखा जाता है वहीँ लड़की के संबंध में ऐसा नहीं होता है। जहाँ लड़का के पढाई-लिखाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है वहीँ लड़की को इस मायने में नजर अंदाज कर दिया जाता है। कितने लड़की को तो स्कूल जाने का भी सौभाग्य नहीं मिल पाता है। कोई लड़की यदि पराया भी तो मिडिल स्कूल या हाई स्कूल के पढ़ाई के बाद उसका पढ़ाई बंद हो जाता है और यदि उस लड़की के मन में और भी पढने की ईच्छा हो तो उसकी यह ईच्छा चूर-चूर हो जाता है और उसकी प्रतिभा भी कुंठित हो जाती है।
पर सोचें कि हम लड़का व लड़की में इतना भेद-भाव क्यों करते हैं? क्या लड़की को इस समाज में रहने व पढ़ने तथा आगे बढ़ने व कुछ करने का अधिकार नहीं है? .......... सोचने पर इसका एक यही कारण स्पष्ट होता है कि हम यह मानते हैं कि लड़की तो पराया घर जाएगी इस पर इतना ध्यान व खर्च क्यों किया जाए? धन धन हाँ, माँ-बाप अपने इसी सोच के कारण अपने बेटी का सही ढंग से न तो पालन-पोषण करते हैं न तो सही दंग से शिक्षा ही देते हैं। क्योंकि वे मानते हैं की बेटी पराया धन है इसे ससुराल में रहना है तो फिर इसके पीछे इतनी खर्च क्यों करूँ? ............ फिर एक यह भी सोच रहती है की लड़की को ज्यादा या उच्च शिक्षा देंगे तो फिर हमें उस अनुसार उसके लिए उच्च स्तर का वर ढूंढना होगा जिसमें मुझे दहेज के रूप में काफी धन देना होगा। .................... इस प्रकार दहेज समस्या के कारण भी कितने माँ-बाप अपनी बेटी को विशेष नहीं पढाते हैं। ......... पर हमें यह समझना चाहिए की हमारी यह सोच किसी भी अर्थ में उचित नहीं है। दहेज के डर से बेटी को न पढाना हमारी मुर्खता है और यह हमारी संकीर्ण व नीच विचारधारा को ही दर्शाता है। ............... इस प्रकार के सोच रखने वाले को यह समझना चाहिए कि यदि हम बेटी को उचित शिक्षा दें और पढ़ा-लिखा कर आगे बढाएँ तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। यदि लड़की पढ़-लिखकर नौकरी या कोई रोजगार करती है तो इसमें हर्ज क्या? ऐसी स्थिति में ऐसे लड़के भी आसानी से मिल सकते हैं जो बिना दहेज के या कम दहेज के उससे शादी करे। और यदि ऐसा नहीं होता है तो यदि लड़की पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी है, आत्मनिर्भर है तो इसमें हर्ज क्या?............... इस प्रकार हमें यह समझना चाहिए कि बेटी को पढ़ा-लिखा कर आगे बढ़ाने से दहेज समस्या बढती नहीं है बल्कि बहुत हद तक दहेज समस्या का समाधान होता है। ................
अतः हमारी समाज को अपनी इस नीच सोच को बदलना चाहिए व बेटा-बेटी में फर्क न कर लड़का-लड़की दोनों को सही ढंग से पालन-पोषण व उचित शिक्षा देना चाहिए।
हाँ, यह बात भी सही है कि धीरे-धीरे हम जागरूक हो रहे हैं तथा अब कितने परिवारों में बेटी को भी उच्च शिक्षा दी जा रही है। पर इस कार्य में अभी हम बहुत ही पीछे हैं, हमें और आगे बढ़ना होगा।
अपने नीच सोच को हटाना होगा।
बेटा-बेटी में अन्तर पाटना होगा॥
बेटी को आगे बढ़ाना होगा।
जिम्मेदार माँ-बाप का फर्ज निभाना होगा॥
प्रस्तुतकर्ता
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8/24/2008 05:58:00 PM
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महिला,
विचार
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श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ
**************************************************

गीता में भगवान श्री कृष्ण ने हमें हमेशा अपने कर्म करते रहने की ही शिक्षा दिए हैं। अतः श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व को हमें यों ही नहीं बिताना चाहिए बल्कि इस अवसर पर हमें अपने कर्म को करते हुए अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित होना चाहिए।
प्रस्तुतकर्ता
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8/23/2008 08:37:00 AM
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जन्माष्टमी,
धर्म,
शुभकामना
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कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
है जख्म ये जो भरती नहीं
है इसकी दवा जो मिलती नहीं
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
क्या सुनाऊं दिल का हाल
पापियों ने किया इसे बेहाल
थी अरमां आसमां छूने को
पर ऊँचाई से उसने ऐसा धकेला
कि दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
किसी तरह टुकड़े को जोड़कर
नया जीवन जीना चाहा
पर आगे के राह में
उसने ऐसा रोड़ा लगाया
कि दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का दर्द बढ़ता ही गया
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
बहुत कोशिश की दिल के जख्म को भरने की
पर नहीं किया था रत्ती भर भी सद्व्यवहार उसने
किया था मेरे दिल पर आघात ही आघात उसने
मेरे दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का जख्म बढ़ता ही गया
मुझसे उसने दुनियाँ का सब कुछ छीन लिया
नहीं छोड़ा उसने कुछ भी मेरे लिए
सिवाय दिल के जख्म के
सिवाय दिल के जख्म के
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
-----------------
http://kathavyatha.blogspot.com/#septkavita1
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8/17/2008 02:00:00 PM
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कविता,
जख्म,
दर्द,
दिल
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सबों को स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
-----------------------------------------------------
आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म याद कराने को।
आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म निभाने को॥
प्रस्तुतकर्ता
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8/15/2008 03:05:00 PM
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कविता,
भारत,
भारतमाता,
स्वतंत्रता दिवस
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सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा
हर बच्चे यहाँ के हैं सच्चे
इनको किसी का डर नहीं
इनके मन में कोई पाप नहीं
बस अपना कार्य करना है
जीवन में आगे बढ़ना हैं
अपना नाम कमाना है
भारत को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाना है
बस मत रोको इन्हें आगे बढ़ने में
मदद करो इन्हें आगे बढ़ने में
सहायता करो इन्हें बढ़ने में
मत लगने दो इनपर किसी भी प्रकार का धब्बा
इसी पर है देश की आशा
गर चुक गए तुम तो मिलेगी निराशा ही निराशा
बस यही है तुमसे आशा
मदद करो इन्हें बढ़ने में
और हाथ बढाओ देश को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने में
सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा
प्रस्तुतकर्ता
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पर
8/14/2008 10:53:00 AM
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कविता,
भारत
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8/13/2008 09:06:00 PM
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कविता,
भारतमाता
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मना रहे हैं स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
पढ़ा रहे हैं सदाचारिता की पाठ
कर रहे हैं आपस में गरीबों के राशि के बंदरबाँट
यही है भारतीय स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
आज मेरा देश स्वतंत्र है
पर इस देश के निवासी गुलाम हैं
भ्रष्टाचार व अन्याय के गुलाम
जुल्म व शोषण के गुलाम
घूसखोरी व अत्याचार के गुलाम
एक नहीं दो नहीं सभी हैं इनके गुलाम
यही है मेरे देश की पहचान
यहाँ किसी को बोलने का भी अधिकार नहीं है
यहाँ किसी को न्याय पाने का भी अधिकार नहीं है
नहीं होती है यहाँ आम जन के साथ न्याय
आम जन के लिए तो न्याय माँगना भी गुनाह हो जाता है
यदि माँगा वह न्याय और नहीं दिया पैसा
तो रक्षक भी उसका दुश्मन हो जाता है
क्योंकि यहाँ पैसे की ही बात सुनी जाती है
व पैसे की ही जीत होती है
एक नहीं दो नहीं नीचे से ऊपर तक सभी जगह है घूसखोरी व अत्याचार
इसे बंद करने के लिए नहीं है कोई सरकार
होती रही है होती रहेगी अन्याय व अत्याचार
हमें न्याय पाने का भी नहीं है अधिकार
हमें सच बोलने का भी नहीं है अधिकार
तो फिर क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता दिवस
आज सच्चाई व इमानदारी का नहीं है नामों निशान
भारत में धर्म की कोई नहीं है पहचान
चूँकि भारत में सच्चाई, ईमानदारी व धर्म सभी का हो गया है नाश
तो क्यों न स्वतंत्रता दिवस के स्थान पर शोक दिवस ही मनाया जाए
रचनाकार : महेश कुमार वर्मा
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8/06/2008 04:13:00 PM
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कविता,
स्वतंत्रता दिवस
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इसमें कोई दो राय नहीं कि कन्या भ्रूण हत्या बढ़ने का सर्वाधिक मुख्य कारण संतान के रूप में लड़की की चाह न होकर लड़का की चाह होना रहता है।
अतः जबतक समाज की मानसिकता को बदलकर नर व नारी एक सामान की भावना नहीं लाई जाएगी तबतक इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है। और इसके लिए समाज को ही सोचना पड़ेगा व आगे आना पड़ेगा।
फिर आख़िर संतान के रूप में लोग लड़की क्यों नहीं चाहते हैं? हमें इस पर भी सोचना चाहिए और इसमें जो कारण उचित हों उसे दूर करने का उपाय समाज को ही करना होगा। ऐसे ही कारणों में से एक कारण है : दहेज-समस्या।
हमारी समाज दहेज रूपी दानव को नष्ट करने का कोई पहल नहीं करती है, पर जन्म से पूर्व अपने ही संतान को नष्ट करने का पहल जरुर करती है। सोचिए आख़िर कितनी संकीर्ण व नीच विचारधारा की है हमारी समाज। ......... और यदि हमारी समाज इतनी नीच विचारधारा की है तो हमें समाज के इस विचारधारा का विरोध करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
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फिर कन्या भ्रूण हत्या ही क्यों , नर या मादा किसी भी प्रकार की भ्रूण हत्या महापाप है। उस माँ-बाप के लिए अपने संतान के प्रति इससे बड़ा कुकर्म और क्या होगा, जिसने ख़ुद संतान के जन्म के लिए प्रयोजन किया व फिर जन्म से पहले ही अपने ही संतान को नष्ट कर दिया।
कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं किसी भी लिंग की भ्रूण हत्या महापाप है।
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कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य
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7/26/2008 08:36:00 PM
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नीचे के समाचार को पढ़ें व विचारे:
जब संतमत-सत्संग के आश्रम में इस प्रकार की घटना हो सकती है तो अन्य जगह ऐसी घटना नहीं होगी यह कैसी सुनिश्चित की जाएगी? जो संतमत-सत्संग ख़ुद अपने प्रमुख आश्रम को व अपने प्रमुख संतों को सुरक्षित नहीं रख सकी तथा आरोपी भी प्रमुख संत-महात्मा ही है, वह संतमत-सत्संग कैसे शान्ति फैलाएगी? कैसे अब लोग इन साधु-महात्माओं पर विश्वास करे???
ताजा समाचार है कि जिन्हें गोली लगी उनहोंने कल यानि २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया।
अब आप सोचें कि अध्यात्म के आड़ में संतमत-सत्संग का आश्रम क्या अपराध का अड्डा नहीं बन रहा है?
शान्ति के संदेश देने वाले साधु-महात्मा क्या अपराध नहीं कर रहे हैं?
तो नीचे २३.०७.२००८ के समाचार-पत्र का समाचार पढें व विचारें। उल्लेखनिए है कि साधु दयानंद ने २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया है।
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=1#
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=17#
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भागलपुर, अपराध संवाददाता : जिले के बरारी थाना अंतर्गत कुप्पा घाट स्थित महर्षि मेही आश्रम पर कब्जे को लेकर सोमवार की देर रात आश्रम के एक साधु दयानंद दास को गोली मार दी गई। जिन्हें गंभीर हालत में जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया, जहां उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इस संबंध में स्वामी दयानंद के बयान पर मंगलवार को आश्रम के चार पदाधिकारियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। जिनमें महर्षि मेंही आश्रम में कब्जे को लेकर साधु को मारी गोली महर्षि मेंही आश्रम .. अखिल भारतीय संतमत सतसंग महासभा के आशुतोष बाबा, महामंत्री करुनेश्वर सिंह, सह मंत्री राजेन्द्र सिंह व प्रबंधक महापात्रा बाबा के नाम शामिल हैं। इधर, देर शाम डीआईजी रघुनाथ प्रसाद सिंह आश्रम पहुंच मौके का जायजा लिया तथा घटना को आश्रम विवाद का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि जांच के बाद ही आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उधर, एसपी कुंदन कृष्णन को आशंका है कि महंत को उसकी ही रिवाल्वर से गोली लगी है। यदि हत्या की नीयत से गोली चलाई गई होती तो गोली कमर की नीचले हिस्से में क्यों लगती। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। सुपौल जिले के करजाइन बाजार निवासी वैद्यनाथ प्रसाद यादव के पुत्र स्वामी दयानंद दास ने प्राथमिकी में कहा है कि वह गुरुमहाराज के समाधि स्थल के पीछे स्थित कमरा नंबर तीन में सो रहे थे तथा कमरे का दरवाजा खुला हुआ था। इसी बीच रात के पौने तीन बजे के करीब उसके कमर में गोली मार दी गई। गोली लगते ही वे विस्तर से नीचे गिर चिल्लाने लगे परन्तु वहां कोई नहीं आया। बाद में उन्हें मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने कहा कि नामजद चारों लोग मिलकर आश्रम से उसे निकालवाना चाहते थे। क्योंकि आश्रम में हो रहे गोरख धंधे की उसे जानकारी थी। इसके अलावा वे आशुतोष बाबा का आचार्य के उत्तराधिकारी बनने का भी विरोध करते थे। उन्होंने बताया कि उनके मित्र पंकज दास को जबसे आश्रम से बाहर निकाला गया है तब से उसने आशुतोष बाबा को प्रणाम करना तक बंद कर दिया था। इस बात को लेकर भी आशुतोष बाबा नाखुश थे। इन्हीं सब कारणों से एक साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया। इस संबंध में कमरा नंबर एक में रहनेवाले मोनू बाबा, कमरा नंबर पांच के तेजनारायण जो आश्रम की खेती करते हैं तथा सामने वाले कमरे में रहने वाले सफाईकर्मी योगेन्द्र सिंह ने बताया कि वे लोग सो रहे थे। जिस समय घटना घटी उस समय बिजली नहीं थी। इन लोगों का कहना है कि घटना को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया तथा घटना के वक्त मोनू बाबा व तेजनारायण के कमरे को भी बाहर से बंद कर दिया गया था। इधर, मंत्री राजेन्द्र सिंह, व्यवस्थापक महापात्रा व आशुतोष बाबा ने लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इनलोगों ने दयानंद दास को आश्रम से निकालने की बात को गलत करार देते हुए कहा कि आश्रम के लोग ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करेंगे। उनलोगों ने बताया कि महामंत्री करूणेश्र्वर सिंह 19 जुलाई से ही बाहर हैं। घटना के कारणों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए इन लोगों ने इसकी निंदा की है। जांच पूर्व निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी : हरिनंदन बाबा भागलपुर : महर्षि मेंही आश्रम के आचार्य स्वामी हरिनंदन बाबा ने कहा कि घटना की जानकारी उन्हें वार्निग घंटी के बाद रात्रि करीब पौने तीन बजे हुई। हालांकि घटना की वास्तविकता का अब तक उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना को अंजाम बाहरी तत्वों या फिर आश्रम के लोगों द्वारा दिया गया है यह विचारनीय बिंदु है। इसकी गहन जांच कराई जाएगी तथा जांच पूर्व किसी निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी होगी। इस घटना से आश्रम की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। उन्होंने वर्तमान में आश्रम में किसी तरह के विवाद से भी इनकार किया है। व्यवस्था में कमी की बात मानते हुए उन्होंने कहा कि देर शाम आश्रम में आए बाहरी लोगों एवं कमरों की अच्छी तरह जांच होनी चाहिए। जांच में कोताही बरतने का नतीजा सामने है।
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7/25/2008 01:24:00 PM
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तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो
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7/22/2008 08:05:00 AM
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भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं........
यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। ........आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। ........... यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना या उससे घृणा करना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ................
--महेश कुमार वर्मा
दिनांक : २०।०७।२००८
स्थान : पटना
लेखक : MAHESH KUMAR VERMA
पता : DTDC Courier Office,
Satyanarayan Market,
Opposite Maruti (KARLO) Show Room,
Boring Road, Patna (Bihar)
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E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
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7/20/2008 08:16:00 PM
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जी हाँ, यह प्रश्न विचारनिए है कि चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है? इस बात में कोई दो राय नहीं कि चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग जीव हत्या को बढावा देना है। (क्यों?)
हम चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग करते हैं आख़िर तब ही तो बाज़ार में इसकी मांग होती है और इसी कारण ही चर्म उद्योग फल-फूल रहा है। तो इस प्रकार हम यदि चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन करते हैं तो उस जीव हत्या के लिए हम भी जिम्मेवार बनते हैं जिसके चर्म से वह वस्तु बनती है। (क्यों?)
और इसमें कोई दो राय नहीं कि जीव हत्या एक महापाप है। अतः हमें चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन बंद करना चाहिए।
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वह बकरा ने आपको क्या किया था?
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
शाकाहारी भोजन : शंका समाधान
मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0
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4/22/2008 09:39:00 PM
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आत्म-चिंतन: वह बकरा ने आपको क्या किया था?
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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
शाकाहारी भोजन : शंका समाधान
http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0
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3/27/2008 09:14:00 PM
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3/21/2008 08:35:00 AM
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मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया
न कोई जान सका न कोई पहचान सका
यह यों पड़ा ही रह गया
मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया
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3/09/2008 07:08:00 PM
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1/25/2008 03:03:00 PM
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1/19/2008 08:42:00 AM
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