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Justice For Mahesh Kumar Verma

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Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
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Monday, November 10, 2014

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी 

पटना के गांधी मैदान में CRD (Centre For Readership Development) (http://www.crdindia.org/) के तरफ से 21वीं पुस्तक मेला का आयोजन किया गया है जो 07.11.2014 से 18.11.2014 तक है. कल 09.11.2014 को मैं भी पुस्तक मेला घुमने गया. पर मेला में प्रवेश से पहले से ही असुविधा नजर आने लगी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं देखा. देखने से यही प्रतीत होता है कि सुविधा के नाम पर इतना पैसा लेकर सुविधा न देकर सिर्फ पैसा ठगा गया है. आप जानना चाहेंगे कि आखिर मैं वहाँ ऐसी क्या कमी देखा जो मैं इस तरह लिख रहा हूँ. कमी एक-दो नहीं बल्कि कई कमियाँ थी. आगे मैं उन कमियों व कुव्यवस्था का वर्णन कर रहा हूँ: 
  1. टिकट लेकर अन्दर जाने से पहले ही मुझे अव्यस्था नजर आने लगी. हुआ यह कि जब मैं एक टिकट काउंटर पर टिकट लेने गया तो देखा कि वहाँ 2 विद्यार्थी अपने एक सौ रुपये का नोट प्राप्त करने के लिये परेशान थे जो टिकट काउंटर में अन्दर से गिर गया था. काउंटर पर बैठे महिला क्लर्क से जब मैं पूछा तो वह बतायी कि नोट बाहर जो दिवार खड़ा किया गया है और उस क्लर्क के डेस्क के बीच के जगह में गिर गया है जो अब इसके हटने पर ही मिल सकता है. उनके अनुसार वह दिवार व डेस्क वहाँ जाम किया हुआ है और उसके बिना हटे नोट तक नहीं पहुँचा जा सकता है. ................... यदि उस महिला क्लर्क के द्वारा बतायी गयी यह बात सही है तो सवाल उठता है कि उस दिवार व डेस्क के बीच में खाली जगह क्यों छोड़ा गया जो वहाँ नोट गिर गया. ........... फिर यदि नोट वहाँ गिर ही गया तो वह महिला क्लर्क उस विद्यार्थी को नोट प्राप्त कराने के लिये मेला प्रशासन को खबर करके उसे नोट वापस दिलाने में मदद क्यों नहीं कर रही थी? ......................... आखिर वह महिला क्लर्क उन विद्यार्थी की कोई सहायता नहीं की. वे विद्यार्थी बाहर से दिवार निचे से तोड़कर नोट निकालना चाह रहे थे. फिर मैं उन विद्यार्थी को सलाह दिया कि एक टिकट लेकर अंदर चले जाइए और अन्दर में मेला का ऑफिस होगा वहाँ जानकारी दे दीजिये तब वे अपने व्यक्ति से नोट निकलवाने का कोशिश कर सकते हैं, खुद मत तोड़िए. फिर मैं अपना टिकट लेकर मेला के अंदर गया. बाद में वे विद्यार्थी अपनी समस्या मेला प्रशासन को दिये या नहीं यह मुझे नहीं मालुम. 
  2. मेला में स्टाल के प्रवेश द्वार पर स्टाल नंबर स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए था, जो नहीं था. स्टाल नंबर लिखे जाने से लोगों को ख़ास स्टाल को पहचानने में या पुनः उस स्टाल पर आने में सहूलियत होती. 
  3. मेला में किसी भी बैंक का कम-से-कम एक अस्थायी या मोबाइल एटीएम रहना चाहिए था ताकि लोगों के पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर वे एटीएम से पैसा निकाल कर अपनी खरीददारी जारी रख सके. पर ऐसा कोई एटीएम वहाँ नहीं था. जिस कारण लोगों को परेशानी संभव है. खुद मेरे पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर मुझे चुने हुये कुछ पुस्तकें वापस करने पड़े. 
  4. मेला के बाहर या अंदर कोई भी पुलिसकर्मी नहीं था. यह प्रशासन की बहुत ही बड़ी चुक थी. कुछ ही माह पहले उसी गांधी मैदान में रावण-दहन के कार्यक्रम में भगदड़ से कम-से-कम 33 लोगों की जान गयी थी और इसमें पुलिस प्रशासन की बहुत ही बड़ी लापरवाही सामने आयी थी. पर पुलिस प्रशासन या जिला प्रशासन इससे सबक नहीं ली और इस पुस्तक मेला में पुलिस की कोई व्यवस्था ही नहीं थी. 
  5. अगजनी जैसी घटनाओं से निपटने के लिये वहाँ कोई दमकल नहीं था. मेला के अंदर कुछ जगह आग बुझाने वाला मशीन (जो ऑफिस वगैरह में रहता है) देखा जरुर पर वह मेला के तरफ से था या स्टाल का अपना था यह मैं नहीं कह सकता हूँ. 
  6. मेला के अंदर पेशाब-पैखाना के लिये मूत्रालय व सौचालय तो था पर पुरे मेला में पानी की व्यवस्था कहीं भी नहीं था. स्थिति यह था कि जहां खाने-पीने का स्टाल लगा था वहाँ भी पानी की व्यवस्था नहीं था. स्थिति यह थी कि यदि आपको पीने के लिये या कोई अन्य काम के लिये पानी की जरुरत है तो आपको वहाँ के खाने-पीने के स्टाल से पैसे देकर बोतल वाला पानी खरीदना पड़ेगा. .................. मेला में निःशुल्क पीने का पानी की व्यवस्था होनी चाहिये. इसके लिये चापाकल लगाया जा सकता था. 
  7. मेला में अनाउंसमेंट कर यह प्रचार तो किया जा रहा था कि कोई भी पुस्तक खरीदने पर बिल जरुर ले लें. साथ ही गेट पर के कर्मचारियों को अनाउंसमेंट कर कहा जा रहा था कि बिना बिल के कोई किताब को बाहर न जाने दिया जाये. पर वहाँ इस तरह की कोई चेकिंग नहीं हो रही थी जिससे कि यह पता चले कि लोग जो किताब बाहर ले जा रहे हैं वह खरीदकर ले जा रहे हैं या चुराकर. बाहर निकलते समय वहाँ के कर्मचारी सिर्फ बिल पर (बिने देखे, बिना पढ़े, बिना मिलाये) एक मुहर लगा दे रहे थे. ऐसी स्थिति में कोई भी कितनी भी मात्रा में किताब चुराकर बाहर ले जाये तो वहाँ के कर्मचारी या प्रशासन को पता तक नहीं चलेगा.
  8. इन सबों के अलावा मैं वहाँ पर एक और बहुत बड़ी अनियमितता देखा. वह यह है कि मैं जब राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल पर पुस्तकें देख रहा था तो वहाँ एक थैला (पोलीथिन) में एक पुस्तक देखा जिसके साथ पुस्तक का बिल भी था, जो कि शायद किसी का छुट गया था. वहाँ मेरे नजदीक में जो दो व्यक्ति थे उनसे मैं इस संबंध में पूछा तो वे बताये कि उनका नहीं है. फिर मैं सोचा कि कोई किताब खरीदा है और उसका छुट गया है सो इसे सही व्यक्ति तक पहुँचाने की कोशिश करनी चाहिये. यह बात सोचकर मैं उस स्टाल के बिल काटने वाले को इस बात की जानकारी दी तो वे अपने एक स्टाफ को यह कहते हुये वह किताब लाने को कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवा देंगे. फिर मैं उस स्टाफ को वह पुस्तक का थैला (पोलीथिन) दिखाया, जिसे वह लाकर उसी बिल काटने वाले को जो उसे पुस्तक लाने को कहा था, दे दिया. उस वक्त मैं फिर उस बिल काटने वाले से कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवाकर जिसका है सही व्यक्ति को दिलवा दीजिये. इसपर वे किताब वहाँ रख लिये और कहे कि अभी अनाउंसमेंट करवाने का समय नहीं है. .............. फिर मैं उस स्टाल से निकल गया और शेष मेला घुमा. पर बाद में भी मैं इस घटना पर सोचा कि जिसका भी पुस्तक है वह पैसा देकर खरीदा है और वह छुट गया है अतः वह पुस्तक सही व्यक्ति तक पहुँच जाये. मुझे लग रहा था कि वह स्टाल वाला अनाउंसमेंट नहीं कराएगा. अतः मैं खुद इस घटना के बारे में मेला प्रशासन को सूचित करने को सोचा. और फिर मैं मेला प्रशासन के ऑफिस पर गया. वहाँ बाहर खड़े गार्ड मुझसे काम पूछने लगे तो मैं बताया कि ऑफिस के किसी व्यक्ति से मिलवाइये. इसपर वे काम का डिटेल्स पूछने लगे. मैं उसे काम बताना चाहा पर फिर मैं पूछा कि काम आप ही सुनियेगा या किसी से भेंट कराईयेगा. इस पर वह गार्ड बोला कि काम बताइये न. तब मैं उसे काम बताने ही वाला था कि अंदर से मेला के Convenor अमित झा अंदर से बाहर आये. मैं उनसे पहले से मिला हुआ था अतः मैं उन्हें पहचान गया वे भी मुझे पहचान गये. फिर मैं गार्ड के पास से हटकर उनके साथ ही बाहर आ गया. मैं उन्हें राजा पॉकेट बुक्स में किताब मिलने वाली उपरोक्त घटना बताते हुये बताया कि वह किताब रख लिया है और कहा कि अनाउंसमेंट कराने का समय नहीं है. इसपर अमित जी भी बोले कि ठीक ही कहा अभी किसको समय है. आगे वे बोले कि जिसका किताब है वह खुद मेरे पास अनाउंसमेंट करवाने आयेगा. तब मैं अमित जी को कहा कि लेकिन किताब मिल गया है. अमित जी बोले हाँ यही राज पॉकेट न (उस समय हमलोग राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल के सामने से ही गुजर रहे थे)? ............ अमित जी कोई कारवाई नहीं किये और आगे बढ़ गये, फिर मैं भी उनका साथ छोड़ दिया. ................... क्या मेला प्रशासन / अमित जी / राजा पॉकेट बुक्स वाले का यह कार्रवाई / व्यवहार सही था? क्या राजा पॉकेट वाले को वह किताब मेला ऑफिस में जमा करवाकर अनाउंसमेंट नहीं करवाना चाहिये था? क्या अमित जी को जानकारी मिलने पर राजा पॉकेट के स्टाल से वह किताब उठवा कर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवाने का फर्ज नहीं था? ........................... बाद में मैं सोच रहा था कि मैं राजा पॉकेट वाले को क्यों यह बताया, खुद वह किताब ले जाकर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवा देता. ............... फिर बाद में मैं मेला से बाहर आ गया. ................ पता नहीं उस किताब के बारे में अब तक कोई अनाउंसमेंट हुआ या नहीं और सही व्यक्ति को वह मिला या नहीं? बाद में या आज यदि अनाउंसमेंट हुआ भी होगा तो अब शायद सही व्यक्ति तक उस किताब का पहुँच पाना मुश्किल है क्योंकि सामान्यतः कोई एक बार ही मेला जाता है. वह व्यकित (जिसका वह किताब था) कल मेला गया था तो फिर आज नहीं गया होगा. यदि कल उसी समय अनाउंसमेंट किया जाता तो शायद उस व्यक्ति को उसकी खोयी किताब मिल जाती. ................. पर शायद वहाँ सभी सिर्फ अपने फायदे के लिये ही थे. किसी के नुकसान पर सोचने वाला कोई नहीं था. 
तो यह थी पुस्तक मेला की अव्यवस्था की कहानी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं होने के पीछे की सच्चाई क्या है? क्या पुस्तक मेला में व्यवस्था के नाम पर स्टाल वालों से व आगंतुक से जो इतनी ज्यादा मात्रा में पैसे लिये गये व लिये जा रहे हैं वह सिर्फ अपने पॉकेट गरम करने के लिये? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं है कि वे आम लोग व आगंतुक के सुविधा के लिये भी सोचे? क्या आयोजक को ऐसी व्यवस्था करने का कर्तव्य नहीं है कि आगंतुक का नुकसान न हो और यदि नुकसान हो गया तो यथासंभव उस नुकसान की पूर्ति के लिये कम-से-कम मानवीय कर्तव्य भी निभाया जाये? 


-- महेश कुमार वर्मा 
(स्वतंत्र लेखक)

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