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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

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Wednesday, December 26, 2007

कैसे करूं मैं नववर्ष का स्वागत

दिन बीते माह बीते वर्ष बीत गए
कितने आए कितने गए उम्र बीत गए
कहना न होगा हम चाँद सितारों पर पहुँच गए
पर धर्म के राह पर हम अभी तक न आए
नहीं मिलती है अदालत में न्याय
व्याप्त है चारों ओर अन्याय ही अन्याय
जब करो न्याय की बात
तो होगी अन्याय से मुलाकात
लाए हो सौगात तो होगी तुम्हारी बात
नहीं तो खाने पड़ सकते हैं दो-चार लात
बहुत बड़ी है उनकी औकात
भेज सकते हैं निर्दोष को भी हवालात
लौट जाना पड़ता है मुँह लटकाकर
क्योंकि रक्षक बना है भक्षक हथियार उठाकर
पता नहीं कब होगी धर्म की स्थापना
न जाने कैसा होगा आने वाला जमाना
नहीं है कहीं न्याय की सुगबुगाहट
चारों ओर है अन्याय का ही आहट
कैसे करूँ मैं नववर्ष का स्वागत
कैसे करूँ मैं नववर्ष का स्वागत

Friday, December 21, 2007

आज का संसार

न्याय मांगने पर जहाँ होता है प्रहार
छीन लेता है मुख का आहार
पीड़ित के साथ होता है दुराचार
यही तो है आज का संसार

Thursday, December 20, 2007

यह दिल की आवाज़ है

बात बहुत खास है
यहाँ सुशासन नहीं कुशासन है
यहाँ रक्षक ही भक्षक है
न्याय मिलने की नहीं आश है
क्योंकि पंच परमेश्वर नहीं पंच पापी है
कोई नहीं अपना है
यह दिल की आवाज़ है

Sunday, December 9, 2007

जमाना हो गया है बेदर्द

दिले दर्द को बयां कर नहीं सकता
दर्द को सह पाना आसान नहीं है
आसानी से मर नहीं सकता
ऐसी स्थिति में जिंदा रहना भी आसान नहीं है
सुनाऊं किसे मैं अपना दर्द
जमाना हो गया है बेदर्द
जो सुनना चाहा मेरा दर्द
जमाना उसे मुझसे दूर किया
जमाना उसे मुझसे दूर किया
क्योंकि जमाना हो गया है बेदर्द

Monday, December 3, 2007

मेरा जीवन नहीं है खुशहाल

कोई मुझसे प्रभावित है
तो कोई मुझसे खफा है
कोई विशेष विषय पर मेरा विचार जानना चाहता है
तो कोई मेरे शब्दों से कोसों भागता है
कोई मेरे बारे में विस्तृत जानना चाहता है
तो कोई मेरे नाम से घबराता है
कोई दरवाजा पर करोड़ों लिए खड़ा है
तो कोई दरवाजा पर से (मुझे) भूखों भगाया है
पता नहीं क्या होगा
मत पुछो मेरा हाल
चाहे जो भी होगा
पर अब मेरा जीवन नहीं है खुशहाल

Friday, November 30, 2007

तुमसे जुदाई का दर्द सहा नहीं जाता

तुमसे जुदाई का दर्द सहा नहीं जाता
तेरे बिना अब रहा नहीं जाता
खाई थी जीवन भर साथ देने की क़समें
खाई थी साथ-साथ जीने-मरने की क़समें
पर बेदर्द जमाना ने ऐसी जुदाई दी
कि फिर पास आना मुश्किल है
तुमसे मिलना मुश्किल है
आपस में बातें करना मुश्किल है
पर तोड़ दो इन सारे बंधनों को
और पास आ जाओ पास आ जाओ
तुमसे जुदाई का दर्द सहा नहीं जाता
तेरे बिना अब रहा नहीं जाता

Wednesday, November 28, 2007

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

पिछले दिनों दिल की आवाज़ पर मांसाहार से संबंधित मेरा दो विचार (i) मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन व (ii) मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित प्रकाशित किए गए। इन ब्लाग्स पर पाठकों द्वारा प्राप्त प्रतिक्रिया में मेरे विचार के पक्ष में व विपक्ष में दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं थी। जिसमें पाठकों द्वारा कुछ प्रश्न भी उठाए गए। प्रस्तुत आलेख पाठकों द्वारा उठाए गए प्रश्नों के जवाब के रूप में प्रस्तुत है।
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कितने लोग मांसाहार के पक्ष में यह तर्क देते हैं की शाकाहार भोजन में हम जब पेड़-पौधे रूपी जीव की हत्या कर सकते हैं तो फिर मांसाहार भोजन से परहेज क्यों? इस तर्क के जवाब में मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि शाकाहार भोजन में वनस्पति को कष्ट होता है यह बात सही है पर मांसाहार भोजन में जंतु की हत्या होती है। और आपको यह समझना चाहिए कि जो भी पेड़-पौधे होते हैं वह फल अपने लिए नहीं उपजाते हैं बल्कि वह फल मनुष्य व अन्य पशु के भोजन के लिए ही होता है। पर कोई भी जंतु अपनी संतान का उत्पादन मनुष्य के भोजन के लिए नहीं करता है। जिस प्रकार आपको अपने संतान या अपने प्राणों से प्रेम रहता है उसी प्रकार उस जंतु को भी अपने प्राणों व अपनी संतान से प्रेम रहता है जिसे मारकर हम खाते हैं। जहाँ तक रही फल की बात तो पेड़ तो फल का उत्पादन मनुष्य व अन्य पशु के लिए ही करता है। आप फल को आसानी से तोड़कर खा सकते हैं, पेड़ कोई आपत्ति नहीं करेगा। यदि आप उस फल को न तोडें तो कुछ दिनों के बाद पेड़ खुद उस फल को छोड़ देता है क्योंकि पेड़ ने फल अपने लिए उत्पादित नहीं किए थे।
मांसाहार के पक्ष में कितने लोगों का तर्क रहता है कि यह प्रकृति का नियम है कि एक जीव दूसरे जीव का भोजन करते हैं, यदि मांसाहार भोजन बंद कर दिया जाए तो उस शाकाहारी जीव , जिनका मांस खाया जाया जाता है, की संख्या काफी बढ़ जाएगी और वे हमारी फसल नष्ट कर देंगे। इस तर्क के संदर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि विवेकशील मनुष्य के द्वारा यह तर्क देना शोभा नहीं देता है। उन्हें यह जानना चाहिए कि प्रकृति के द्वारा नियम में जो आहार-श्रृंखला है उसमें यह कहीं नहीं है कि मनुष्य वनस्पति के अलावे दूसरे जीव को खाएगा। हाँ, अन्य जंगली जीवों के साथ ऐसा है कि मांसाहारी जीव शाकाहारी जीव को खाते हैं, पर मनुष्य के साथ प्रकृति का यह नियम नहीं है। रही यह बात कि यदि हम मांसाहार भोजन न करें तो शाकाहारी जीवों कि संख्या बढ़ जाएगी और वी हमारी फसल नष्ट कर देंगे तो इस संदर्भ में बुद्धिमान मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह शाकाहारी जीव जिनका हम भोजन करते हैं वे पहले वास्तव में जंगल में ही रहते थे पर हम मनुष्य ही उसे जंगल से हटाकर अपने साथ बस्ती में ले आए। ........... फिर हम उन्हें पालकर उनकी संख्या वृद्धि में तो खुद हम ही सहायक बन रहे हैं तब फिर यह कहना किसी भी अर्थ में उचित नहीं है कि यदि नहीं खाएंगे तो उनकी संख्या बढ़ जाएगी। ...........
मनुष्य सर्वाधिक श्रेष्ठ व सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी है और इस कारण मनुष्य को अन्य जीवो का भक्षक बनना मनुष्य जाति के लिए शर्म व कलंक की बात है।

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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Sunday, November 18, 2007

पंच : परमेश्वर या पापी

सुना था पंचायत में पंच आते हैं
जो ईमानदार व निष्पक्ष होते हैं
वह धर्मानुकुल उचित निर्णय सुनाते हैं
इसी लिए पंच को परमेश्वर कहते हैं
पर जब मैं देखा कि
आए हुए पंच ईमानदार नहीं पक्षपाती है
वह दूसरे पक्ष को सुनने वाला नहीं
बल्कि एकतरफा दोषी का साथ देने वाला है
वह निष्पक्ष फैसला करने वाला नहीं
बल्कि निर्दोष पर ही जानलेवा हमला करने वाला है
तो मुझे सोचना पड़ा कि
यह पंच परमेश्वर नहीं बल्कि पंच पापी है

Saturday, November 17, 2007

तेरी याद में

सोता हूँ तेरी याद में
जागता हूँ तेरी याद में
खाता हूँ तेरी याद में
पीता हूँ तेरी याद में
लिखता हूँ तेरी याद में
सब कुछ करता हूँ तेरी याद में
हर पल बीतता है तेरी याद में
सब कुछ समर्पित है तेरी याद में
मेरा दिल धड़कता है तेरी याद में
बस तेरी याद में तेरी याद में

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

मनुष्य जाति के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और कुछ नहीं होगी कि यह बेकसूर जीवों को मारकर फिर उसे खाकर अपना पेट भरता है। धिक्कार है ऐसी मनुष्य जाति को जो अपने को सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील कहता है। उस समय कहाँ जाती है उसकी बुद्धिमत्ता व विवेकशीलता जब वह बेकसूर जीवों को मारकर उसे खाता है? क्या यही उसकी बुद्धिमत्ता है कि निरपराध जीवों को मारकर अपनी पेट भरे? क्या यही उसकी बुद्धिमत्ता है कि अपने से कमजोर जीव को मारकर अपना पेट भरे?..................
किसी भी सूरत में मांसाहार भोजन उचित नहीं है। जिस प्रकार हमें अपने प्राणों से प्रेम रहता है उसी प्रकार हमें उन जीवों के लिए भी सोचना चाहिए जिन्हें मारकर हम खाते है। ..........

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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Sunday, November 11, 2007

इतना कष्ट दिया तुने

इतना कष्ट दिया तुने कि अब तड़पा भी नहीं जाता है
इतना रुलाया तुने कि अब रोया भी नहीं जाता है
इतना प्यार था तुमसे कि अब साथ छोड़ा भी नहीं जाता है
इतना अन्याय किया तुने कि अब साथ रहा भी नहीं जाता है

तुझे लोगों ने श्रेष्ठ व बुद्धिजीवी समझा
पर तुम सबसे बड़ा पापी व अधर्मी निकला
तुझे लोगों ने दिल का साफ समझा
पर तुम मीठा जहर निकला
तुमसे लोगों न चाहा था उचित व्यवहार
पर तुमने किया सबों के साथ दुर्व्यवहार

तुमपर मैं किया था बहुत ही विश्वास
पर कभी न सोचा था कि तुम करोगे ऐसा आघात
पर अब मुझे नहीं होगी यह बर्दाश्त
क्योंकि तुने किया बहुत ही घिनौना वारदात

एक शंकर था आदि काल में जिसने विष का पान किया
एक शंकर तुम हो जिसने सबका सर्वनाश किया
इतना अन्याय किया तुने कि अब साथ रहा भी नही जाता है
इतना प्यार था तुमसे कि अब साथ छोड़ा भी नहीं जाता है

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यह रचना महेश कुमार वर्मा द्वारा १९.०८.२००६ को लिखा गया था।

Thursday, November 8, 2007

दिवाली दिन है खुशियाँ मनाने का

दिवाली दिन है खुशियाँ मनाने का
न कि बाद में पछताने का
दिवाली दिन है बुराई पर अच्छाई के विजय का
न कि जुआ में पैसे बर्बाद करने का
दिवाली दिन है अन्धकार से प्रकाश में जाने का
न कि बम-पटाखा से प्रदुषण फैलाने का
दिवाली दिन है आपस में खुशियाँ बटाने का
न कि बम-पटाखा से घायल होने का
दिवाली दिन है खुशियाँ मनाने का
न कि बाद में पछताने का

आख़िर क्या गलती थी मेरी

आख़िर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मुझे बदनाम व अपमानित किया
आख़िर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मेरे साथ दुर्व्यवहार किया
आखिर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मेरे साथ मार-पिट किया
आखिर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मुझे घर से निकला

चुप क्यों हो
बोलते क्यों नहीं हो
मुझे जवाब चाहिए
आखिर क्या गलती थी मेरी
आख़िर किस गलती की
सजा दे रहे हो मुझे
बोलो, बोलते क्यों नहीं हो
जवाब दो, मुझे जवाब चाहिए
आखिर क्या गलती थी मेरी

यही न कि
मैं तुम्हारे द्वारा बोले गए झूठ का विरोध किया
व तुम्हें सच्चाई बताना चाहा
बस यही न
इसी गलती की सजा दे रहे हो तुम
यानी सच बोलने की सजा

यदि सच बोलना है गुनाह तो जिंदा रहना भी है गुनाह
ठीक है, मर जाउंगा मिट जाउंगा
पर नहीं रहूंगा झूठ को स्वीकारकर
और मेरे मरने के लिए जिम्मेवार होगे तुम
तुम यानी झूठ बोलने के मामला में सबसे खतरनाक
व इस पृथ्वी पर का सबसे बड़ा अन्यायी व पापी व्यक्ति शिव शंकर

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यह रचना महेश कमर वर्मा द्वारा २६.०६.२००६ को लिखा गया था।
LS280

Saturday, November 3, 2007

हमें अपनी मंजिल को पाना है

हमें अपनी मंजिल को पाना है
हर चुनौती को स्वीकारना है
राह में चाहे जो भी बाधा आए
दुश्मन चाहे लाखों कांटा बिछाए
हरेक बाधा को तोड़ना है
हमें अपनी मंजिल को पाना है

अपना कर्म करते जा

अपना कर्म करते जा
जीवन में आगे बढ़ते जा
देखो कभी न तुम मुड़कर
सोचो कभी न तुम रूककर
हर परिस्थिति में बढ़ते जा
हरेक बढ़ा को तोड़ते जा
अपना कर्म करते जा
जीवन में आगे बढ़ते जा

Friday, October 26, 2007

अपराधी बनने का एक कारण यह भी

कोई भी व्यक्ति यों ही अपराधी नहीं बन जाता है या यों ही अपराध नहीं कर बैठता है या कोई भी व्यक्ति यों ही आत्महत्या नहीं करता है बल्कि कोई मानसिक प्रताड़ना से या कोई अन्य कारण से वह इतना टूट जाता है कि उसे अपने मामला में आगे बढ़ने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है, कोई उसका साथ देने वाला या सुनने वाला नहीं रह जाता है तो अपने ऊपर किये जा रहे अन्याय से उबकर परिस्थितिवश वह या तो अपराध कर बैठता या अपराधी बन जाता है या तो फिर आत्महत्या कर लेता है ।................
वास्तव में कितने लोगों को आज न्याय पाना तो दूर कि बात उन्हें न्याय मांगने का भी अधिकार नहीं है और यदि वह न्याय कि मांग किया तो उसके साथ और भी ज्यादा अन्याय होने लगता है । .............और उसके साथ अन्याय जब चरम-सीमा पर पहुंच जाती है, उसके साथ मानसिक प्रताड़ना इतनी अधिक हो जाती है कि ऐसी स्थिति में कभी-कभी पीड़ित विवश होकर हथियार उठा लेता है या फिर ऐसी ही स्थिति में कभी-कभी पीड़ित या तो आत्महत्या कर लेता है या फिर अपराधी बन जाता है या फिर मानसिक प्रताड़ना से जूझकर पागल हो जाता है । ................
.............................
पाठक कृपया इस विषय पर अपना निष्पक्ष विचार दें ।

Thursday, October 25, 2007

आखिर कब तक

क्यों तड़पाते हो मुझे
क्यों कष्ट देते हो मुझे
क्यों लोगों को गुमराह करते हो तुम
इसीलिए क्योंकि मैं
हमेशा सत्य पर रहा
इसीलिए क्योंकि मैं
कभी झूठ नहीं बोला
इसीलिए क्योंकि मैं
हमेशा तुम्हें अपना समझा
कब तक तपाओगे मुझे
कब तक कष्ट दोगे मुझे
कब तक करोगे तुम अन्याय
कब करोगे तुम मेरे साथ न्याय
क्या तुम कभी नहीं आओगे सच्चाई पर
क्या तुम कभी नहीं करोगे न्याय
मैंने तुम्हें झूठ बोलने के मामला में
सबसे खतरनाक व्यक्ति घोषित किया
मैंने तुम्हें इस पृथ्वी पर का
सबसे बड़ा अन्यायी व पापी व्यक्ति घोषित किया
क्या तुम्हारे अन्याय का अंत नहीं होगा
क्या तुम सच्चाई व इमानदारी पर नहीं आओगे
आखिर क्या चाहते हो तुम
आखिर तुमको मुझसे बात करने का सहस क्यों नहीं है
इसीलिए क्योंकि तुम हमेशा गलत व झूठ पर रहे
आखिर कब तक चलेगी तुम्हारी अन्याय
और कब तक मैं जीवन और मौत के बीच जूझता रहूंगा
तुम हो शिव शंकर मैं हूँ महेश
पर हम दोनों में कब तक चलेगी यह लड़ाई विशेष
चुप क्यों हो
मुझे जवाब चाहिए
आखिर कब तक चलेगी तुम्हारी अन्याय
आखिर कब तक

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यह रचना महेश कुमार वर्मा द्वारा ०४.०६.२००६ को लिखा गया था ।

Monday, October 22, 2007

महिलाओं को चुपचाप सबकुछ सहते रहना प्रताड़ना को बढावा देना है

हमें यह नहीं भूलना चाहिए की हर सफलता के पीछे किसी-न-किसी रूप में एक महिला का हाथ रहता है । आज पुरुष वर्ग घर में जहाँ अपने हरेक कार्य के लिए एक महिला पर निर्भर रहते हैं वहीं अनावश्यक कभी वह आपे से बाहर होकर उसी महिला को तरह-तरह के यातना व प्रताड़ना देने लगते हैं । उस समय वह यह भूल जाता है कि उसके भोजन से लेकर उसके घर के सारी व्यवस्था के लिए वह इसी महिला पर निर्भर है । जिस समय पुरुष को अपना कार्य निकालना हो उस समय उसे वही महिला बहुत ही प्यारी लगती है तथा अन्य समय वह बेवजह उसी महिला पर क्रोधित होते रहते हैं तथा उस महिला को तरह-तरह के यातनाएँ भी देते हैं । ऐसी स्थिति में महिला यदि चुपचाप सब-कुछ सहते रहे तो यह पुरुष द्वारा की जा रही प्रताड़ना को बढावा देना ही होगा और ऐसी स्थिति में वह पुरुष कभी भी अपनी आदत से बाज नहीं आएगा । अतः महिलाओं को चुपचाप सब-कुछ नहीं सहकर पुरुष द्वारा की जा रही बेवजह प्रताड़ना का विरोध करना चाहिए । और ऐसा करने पर ही आँख रहते अंधे पुरुष को यह समझ में आएगी कि महिला उसके लिए कितनी महत्तवपूर्ण है ।
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यह महेश कुमार वर्मा द्वारा २०.०६.२००७ को लिखा गया था जिसे जून २००७ के कादम्बिनी के मतान्तर में भेजा गया था ।

Friday, October 19, 2007

मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

कई स्थानों पर लोग विजया दशमी के दिन मांसाहार भोजन करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? एक ओर हम पूरे धूम-धाम से दुर्गा-पूजा का पर्व मनाते हैं, जिसमें हम अनेक देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं और फिर दूसरी और इस पर्व के समाप्ति के दिन हम मांसाहार भोजन करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? क्या दुर्गा पूजा व दशहरा पर्व का उद्देश्य मांसाहार भोजन है जो हम अपने इस पर्व की समाप्ति मांसाहार भोजन से करते हैं? कभी नहीं, इस पर्व का ऐसा उद्देश्य कभी नहीं है। यह पर्व हमें अन्याय से लड़ने की सिख देती है,...........तो फिर हम बेकसूर जीवों को मारकर फिर उसका भोजन करके खुद अन्याय क्यों करते हैं? ख्याल रखें की यह पर्व अन्याय से लड़ने के लिए है न कि अन्याय करने के लिए। .........


आज हम बहुत ही गर्व के साथ कहते हैं कि मनुष्य इस पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी है। पर जरा सोचें कि एक बेकसूर जीवों को मरना व कष्ट देना क्या यही हमारी बुद्धिमत्ता है? ........ जरा सोचें कि हम अपने प्राणों से या अपने बच्चों से कितना प्यार करते हैं, क्या इसी प्रकार हमें दूसरे जीवों के लिए नहीं सोचना चाहिए? जिन जीवों को हम मारकर भोजन करते हैं उनमें भी उसी प्रकार आत्मा है जैसे मुझमेंआपमें है तथा उसे भी उसी प्रकार कष्ट होता है जैसे मुझे व आपको होता है। सोचें को आपको जब थोडा कष्ट होता है तो आपको कैसा लगता है ...........? उसी प्रकार सब जीवों को कष्ट होता है? ........ सोचें कि यदि आप बेकसूर हों और आपको कोई कष्ट देगा तो आपको कैसा लगेगा? ........ उसी प्रकार उस जीव के लिए भी सोचें जिसे मारकर हम खाते हैं? ............ इस पृथ्वी पर के सबसे अधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मनुष्य के लिए यह शर्म की बात है कि वह सिर्फ अपने पेट व जिह्वा स्वाद के लिए बेकसूर जीवों को मारकर उसका मांस का भोजन करे। .......... ऐसी स्थिति में मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी कहना 'बुद्धिमत्ता' व 'विवेकशीलता' शब्द का अपमान करना है। और ऐसी स्थिति में मनुष्य को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी न कहकर मनुष्य को पशु से भी बदतर कहना अनुचित नहीं होगा। (क्यों?)

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मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Thursday, October 18, 2007

सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ

सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ । वर्तमान में हमलोग दुर्गा पूजा मना रहे हैं । जिधर देखें उधर दुर्गा पूजा की तैयारी है । दुर्गा पूजा में सजावट में हम कितने खर्च करते हैं व हर्सोल्लास के साथ दुर्गा पूजा का पर्व मनाते हैं । दुर्गा पूजा का पर्व पूरे १० दिनों का पर्व हैं । प्रत्येक वर्ष आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को कलश स्थापना के साथ नवरात्रारम्भ होता है तथा नौ दिनों तक विधिवत मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद दशमी के दिन प्रतिमा विसर्जन के रश्म के साथ दुर्गा पूजा का पर्व समाप्त होता है । इस दशमी के दिन को विजया दशमी भी कहते हैं । कहते हैं इसी दिन भगवान रामचंद्र ने लंकापति रावण को मारा था और इसी दिन दस सिर वाला रावण हारा था इसीलिए इस पर्व को दशहरा भी कहते हैं।
सिर्फ दुर्गा पूजा ही नहीं अन्य पर्व भी हमलोग प्रतिवर्ष नियमित रूप से मनाते हैं । सिर्फ धार्मिक पर्व ही नहीं कई घटनाओं का वर्षगांठ या साल-गिरह हम मनातें हैं तथा कई महापुरुष के जन्म-दिन के वर्षगांठ पर उन्हें याद करते हैं । स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस व गांधी-जयंती को तो भारत में राष्ट्रीय पर्व मान लिया गया है । इतना ही नहीं अन्य कई घटनाओं का हम वर्षगांठ या साल-गिरह मनाते हैं जिसमें हम उन घटनाओं को याद करते हैं । हम अपने घर-परिवार में भी अपने या बच्चे के या घर के अन्य सदस्य के जन्म के वर्षगांठ मनाते हैं।
कुल मिलाकर कई वर्षगांठ व साल गिरह पर हम काफी रकम खर्च करते हैं पर सोचनीय है कि किसी भी घटना का वर्षगांठ या साल गिरह मनाने के पीछे हमारा क्या उद्देश्य रहना चाहिए ? जिस घटना के वर्षगांठ या साल-गिरह हम मनाते हैं क्या उस घटना से मुझे वास्तविक सिख नहीं लेनी चाहिए ? इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी घटना के वर्षगांठ या साल गिरह मनाने के पीछे हमारा उद्देश्य उस घटना को याद कर उससे अच्छाई को ग्रहण करना व बुराई को त्यागना होना चाहिए । साथ ही घटनाओं को याद कर मुझे यह भी महसूस करना चाहिए कि उस घटना में कहाँ भूल हुयी और उससे हमें भविष्य के लिए सिख लेनी चाहिए । किसी भी घटना के वर्षगांठ या साल गिरह मनाने में जबतक हम उससे कुछ सिख ग्रहण नहीं करते हैं और उसे अमल में नहीं लाते हैं तबतक उस घटना का साल-गिरह मानना निरर्थक ही होगा भले ही उसके पीछे हजारों रुपये क्यों न खर्च किये गए हों । ................दुर्गा पूजा में हम पूरे नवरात्र दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं जिसमें अंततः हम यही देखते हैं कि दानवों कि हार होती है और इसके लिए देवी को उनसे लड़ना पडा था । ................
तो आयें इस दुर्गा पूजा में हम सिर्फ बाहरी सजावट में ही पैसे खर्च न करें बल्कि इस पूजा में अन्याय व बुराई के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ संकल्पित हों तथा अपने में जो भी बुराई हैं उसे निकाल फेकें।
आपका
महेश

Tuesday, October 16, 2007

कादम्बिनी युवा वर्ग की एक अद्वितीय पत्रिका है

कादम्बिनी पत्रिका से मैं वर्षों से परिचित हूँ पर पहले मैं इसे खरीदकर नहीं पढ़ता था । मौका निकलकर पुस्तकालय में जाकर पढ़ता था या तो वह भी नहीं हो पाता था । पर अब पिछले कई माह से मैं इसे नियमित रूप से खरीदकर पढ रह हूँ । यह पत्रिका युवा वर्ग के लिए एक अद्वितीय पत्रिका है । इसके सभी स्तम्भ अच्छे हैं । वैसे खासकर इसके साहित्यिक स्तम्भ कविता व कहानी से मैं इसके ओर आकर्षित हूँ तथा मुझमें लेखन का शौक ही इस पत्रिका का नियमित ग्राहक बनाया । वैसे इस पत्रिका का स्थाई स्तम्भ ज्ञान कोष, योग, आई टी नुक्कढ़, मतांतर, स्त्री : बाहर-भीतर भी काभी अच्छे हैं । मतांतर व स्त्री : बाहर-भीतर जैसे स्तम्भ पत्रिका में हमेशा ही प्रकाशित होते रहना चाहिए तथा हरेक युवा पाठक को इसे पढकर उसपर चिन्तन-मनन करना चाहिए व हरेक को मतान्तर में हिस्सा लेना चाहिए । यह पत्रिका युवा वर्ग के लिए एक अद्वितीय पत्रिका है । पत्रिका में जिस तरह अन्य लेखकों के पता प्रकाशित किया जता है उसी तरह स्त्री : बाहर-भीतर स्तम्भ के लेखिका तसलीमा नसरीन के भी पता प्रकाशित किया जाना चाहिए । ..........
कादम्बिनी के अक्टूबर २००७ का अंक काफी अच्छा लगा । इस अंक के कवर स्टोरी "ब्लाग हो तो बात बने" बहुत ही प्रभावित किया तथा इससे प्रभावित होकर मैं अपना ब्लाग http://popularindia.blogspot.com बना लिया । इस ब्लाग में मैं हिंदी में लिखने में असमर्थ था तो मैने लेखक बालेन्दु जी से E-mail द्वारा सम्पर्क स्थापित किया फिर उनके मार्गदर्शन से मैं ब्लाग में हिंदी में लिखने की विधि जान गया । अब मैं इसमें हिंदी में लिख लेता हूँ । मैं अपना ब्लाग बना लिया इसमें मैं अपना स्वतंत्र विचार रख सकता हूँ । लेखन में मेरी रूचि के कारण यह मेरे लिए बहुत ही अच्छी है । par यह सब कादम्बिनी व बालेन्दु जी के प्रयास से ही हुआ है जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता । इसके लिए कादम्बिनी व बालेन्दु जी को बहुत-बहुत धन्यवाद् ।
अपने ब्लाग में मेरे द्वारा समाज के विभिन्न विषयों पर स्वतंत्र विचार व तर्क देने की योजना है । बस थोडा इंतजार करें । पर इसके लिए मैं कादम्बिनी व बालेन्दु जी से और सहयोग कि आशा करुंगा ।
अंत में कादम्बिनी परिवार व 'ब्लाग हो तो बात बने' के लेखक बालेन्दु जी को दुर्गा पूजा व दीपावली के अवसर पर ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ ।
आपका

महेश

Monday, October 15, 2007

आपका दिन मंगलमय हो

नमस्कार,
कृपया इन्तजार करें, मैं जल्द ही इस ब्लोग पर तार्किक विषय से सम्बंधित विषय ला रह हूँ। बस थोडा इन्तजार करें।

Sunday, October 7, 2007

Thanks Kadambini

Thanks Kadambini for informatin of blogging. I am a new blogger.

Good morning

I am a new bloger. In this blog I send many topics for discussion. Please wait

Thanks

यहाँ आप हिन्दी में लिख सकते हैं :