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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
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Saturday, November 5, 2016

अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थान : जेल

अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थान : जेल 
इस लिंक http://www.hindi.indiasamvad.co.in/…/8-members-of-banned-si… पर सवाल उठाया गया है कि मुठभेड़ में मारे गए 8 आंतकियो के पास कहां से आए ब्रांडेड जींस टीशर्ट, मंहगी घड़ी, स्पोर्टस शूज़ ? आगे कहा गया है कि लगता है कि यह जेलखाना नहीं बल्कि आतंकियों के ऐशगाह के रूप में तब्दील थी। ..............
मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि व्यावहारिक में सही में जेल के अंदर की स्थिति अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थान रहता है जहां से वे बैठे-बैठे आसानी से जेल के बाहर अपराध कर सकते है। और अंधा कानून को कभी पता भी नहीं चलेगा कि जेल में रहकर वहाँ से अपराध किया गया है। ................ चौंकिए मत यह बात सही है। जेल के अंदर विचारधीन बंदी व सजायाफ्ता बंदी सभी के लिए वहाँ हरेक तरह के सामान उपलब्ध रहते हैं। जेल के अंदर की बात को एक पंक्ति में लोग कहते हैं कि सिर्फ कहने के लिए वह जेल है पर वहाँ लड़की छोड़कर सब कुछ उपलब्ध है। ........... मुझे यह भी कहने में कोई संकोच नहीं है कि कुछ विशेष को तो वह भी मिल जाता है। ....................
मेरी बात सुनने में अटपटा लग रहा होगा पर यह हकीकत है। वहाँ मोबाइल, बीड़ी, खैनी, सिगरेट, गाँजा ये सब तो आसानी से मिलते ही हैं। बल्कि कहिए तो जेल के अंदर इसकी दुकान रहती है। हाँ, जेल प्रशासन के कागज पर यह दुकान नहीं रहती है। पर सबको मालूम रहता है कि कहाँ किस चीज की दुकान है। .............. आपको नया मोबाइल लेना है तो नया मोबाइल मिल जाएगा। सिम कार्ड लेना है तो सिम कार्ड भी मिल जाएगा। मोबाइल से बात करने के बारे में मत पूछिए --- इस संबंध में तो फ्री होकर मोबाइल से देश दुनियाँ जहां बात करना हो कीजिये। और जिसके पास मोबाइल नहीं है वह बात कराने वाली नाजायज दुकान पर पंक्ति में लगकर बात करते हैं। ..................... गाँजा की दुकान, सिगरेट की दुकान सब दुकान है वहाँ ...................... इतना ही नहीं टीवी सेट में अपना pen drive या memory card लगाकर अपना मनचाहा फिल्म आप देख सकते हैं। अपराधी लोग हॉलीवुड फिल्म अधिक देखते हैं ताकि अपराध करने का तरीका वो आसानी से सीख सके। ................. टीवी में डिश का connection लगा रहता है। जो चैनल मन वह चैनल देखिये। ................
सरकारी जेल प्रशासन के तरफ से कागजी रूप में कैंटीन, लाइब्रेरी, जीम व गीत-संगीत की व्यवस्था भी रहती है। (पर यह सब सरकारी व्यवस्था हरेक जेल में नहीं रहती है।) पर और यदि कुछ नहीं है तो घबराने की बात नहीं है। मोबाइल है न? अपने आदमी को फोन कीजिए वह आपका सामान लेकर मुलाकाती के रूप में आपसे मिलने आ जाएगा और सामान आपको मिल जाएगा। .................. आप मांस, मछली, मिठाई, व अन्य खाने-पीने का सामान आसानी से मँगवा सकते हैं। ब्रांडेड कपड़ा, जूता-चप्पल, सब कुछ मँगवा सकते हैं। ............. हथियार ................ वहाँ, बंदी में से ही कई प्राइवेट नाई है जो वहाँ नाई का काम करते हैं और बंदी उनको पैसे देकर अपना हजामत यानि बाल, दाढ़ी, मूंछ बनवाते हैं। तो जब उन नाई बंदी के पास उस्तरा और ब्लेड आ सकता है इसके अलावा कितने बंदी अपना खाना खुद पकाते हैं और इसके लिए जब उनके पास सब्जी काटने के लिए चाकू आ सकता है। तो क्या यह हथियार आना नहीं हुआ? और जब इतना कुछ हो सकता है। तो व्यवस्था करने वाला इससे बड़ा व्यवस्था भी कर सकता है। ......................
इतना ही नहीं जेल के अंदर की दुकान में बाहर के दुकान से सस्ता में अनाज (चावल, दाल, आटा वगैरह) मिलता है और बंदी उसे खरीदकर अपने घर ले जाता है। वहाँ के अनाज के रेट सुनकर आप दंग रह जाइएगा कि इतना सस्ता? सस्ता क्यों नहीं हो? कौन वहाँ बेचने वाले को अपने घर से पूंजी लगा है? वह तो बंदी के खाने के लिए जो अनाज आता है उसे वह बेचकर अपना पैसा बना लेता है। यह काम रसोइया द्वारा किया जाता है, जो सजायाफ्ता बंदी ही रहता है। ...............
कितने सजायाफ्ता बंदी वहाँ जायज पैसा तो थोड़ा ही कमाते हैं पर नाजायज पैसा खूब कमाते हैं।
जब इतना कुछ जेल के अंदर आसानी से है तो कैसे नहीं कह सकते हैं कि जेल के अंदर ऐशो आराम के सब चीज है? हाँ, यह बात भी सही है कि जो पेशेवर अपराधी हैं या जो सजायाफ्ता बंदी हैं उन्हें सारी सुविधा आसानी से उपलब्ध रहती है। और यह बात भी है कि नए विचारधीन वैसे बंदी जो पेशे से अपराधी नहीं हैं वे इन पुराने व अपराधी बंदी के द्वारा प्रताड़ित भी होते हैं। पर जो चीज खुला दुकान में मिलता है वह सबों को उपलब्ध रहता है। नए बंदी से उसे वहाँ रहने के लिए पैसे भी लिए जाते हैं। .......................... इस प्रकार वह बंदी जो पेशेवर अपराध है उसके लिए जेल वहाँ से अपराध करने का एक सुरक्षित स्थान रहता है। और उसका सबसे बड़ा कारण है कि उसके पास मोबाइल से बात करने की पूरी छुट है। और वे मोबाइल से बात कर अपना अपराध के धंधा को वहीं से बढ़ाते रहते हैं। पर जेल से बाहर किसी भी तरह के अपराध होने पर शक के आधार पर भी पुलिस उसका नाम नहीं देगी क्योंकि वह तो जेल में बंद है। .....................
मैं बहुत लंबा लिख दिया पर आप कहेंगे कि मैं किस आधार पर जेल के अंदर इस तरह की व्यवस्था होने की पुष्टि करता हूँ? तो मैं आपको बता दूँ कि मैं एक झूठा केस में निर्दोष रहते हुये भी सात माह (210 दिन) जेल में विचारधीन बंदी के रूप में रह चुका हूँ। इन सात माह में मैं तीन जेल में रहा। जिसमें मैं एक उपकारा, एक केंद्रीय कारा (सेंट्रल जेल) व एक मंडल कारा में रहा हूँ। इन सात माह में मैंने जेल के अंदर की तमाम कुव्यवस्था देखा। जेल से आने के बाद मैं जेल के अंदर के सारे कुव्यवस्था व किस प्रकार बंदी वहाँ शोषित व प्रताड़ित होते हैं वह सब सारी बात मैं सार्वजनिक करना चाहा था। इस संबंध में मैं इस लिंक https://www.facebook.com/maheshkumar.verma2/posts/855097111243018 व इस लिंक https://www.facebook.com/maheshkumar.verma2/posts/855097221243007 पर मैं स्पष्ट लिखा था कि "210 दिन के पुलिस हिरासत व जेल से मुझे बहुत ही नुकसान हुआ है। पर जेल के अंदर किस प्रकार की अव्यवस्था रहती है, यह नजदीक से देखने का अनुभव हुआ। इस जानकारी को भी मैं सार्वजनिक करूंगा कि किस प्रकार जेल में बंदी जानवरों से भी बदतर स्थिति में रहते हैं व उनकी मौलिक अधिकार का भी हनन होता है। मैं यह भी सार्वजनिक करूंगा कि किस प्रकार जेल प्रशासन के सहयोग से ही उनलोगों के पास मोबाइल, खैनी, गाँजा व अन्य आपत्तिजनक सामान पहुँचते है। मेरे द्वारा इन बातों को सार्वजनिक करने पर यदि जेल के अंदर की स्थिति में यदि सुधार हो तो मैं समझूँगा कि मेरे जेल जाने से बाहर आने पर मैं कुछ तो जनहित में कार्य कर सका व जेल जाने का कुछ तो फायदा अन्य को हुआ। अतः आप सबों से अनुरोध है कि जेल के अंदर के स्थिति में सुधार के कार्य में आगे आयें व सहयोग करें। खासकर सामाजिक कार्य से जुड़े व्यक्ति व संस्था इस कार्य के लिए आगे आयें। आपलोगों के प्रयास से जनहित में बहुत ही बड़ा कार्य हो सकता है। अंदर की सारी स्थिति व अव्यवस्था को मैं बेहिचक सार्वजनिक करने के लिए तैयार हूँ।" ---------- ऐसा मैं उपरोक लिंक पर लिखा था। पर सारी बात सार्वजनिक करने में कोई भी मेरे साथ देने को आगे नहीं आया। पर आज "इंडिया संवाद" पर "अमित बाजपेयी" http://www.hindi.indiasamvad.co.in/Author/amit-vajpayee जी का यह आलेख "मुठभेड़ में मारे गए 8 आंतकियो के पास कहां से आए ब्रांडेड जींस टीशर्ट, मंहगी घड़ी, स्पोर्टस शूज़ ?" http://www.hindi.indiasamvad.co.in/…/8-members-of-banned-si… पढ़ने के बाद मेरी चुप्पी टूट गयी और मैं यहाँ इतना लिख दिया। अभी भी और बहुतों बात हैं जैसे आखिर किस प्रकार ये सब आपत्तिजनक सामान जेल के अंदर आता है? कहाँ व कैसे इसे छिपाकर रखा जाता है जो बाहरी पुलिस वाले भी जब छापा मारते हैं तब भी उन्हें नहीं मिलती है? ...... ऐसी बहुतों बात अभी और हैं। .............
पर मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं जो लिखा हूँ वह सही है और मैं यह अपने तीनों जेल में गुजारे समय के आधार पर लिखा हूँ। हाँ, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि देश के सभी जेल ऐसे ही होंगे। पर अपने जेल में गुजारे समय के आधार पर मैं यह सही बात लिखा हूँ। यह बात मात्र सच्चाई को सार्वजनिक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। पर मैं अनुरोध करना चाहता हूँ कि मेरे इस बात को लेकर कोई मीडिया वाले या पत्रकार या पुलिस वाले या अन्य कोई मुझे बेवजह तंग न करें पर हाँ, यदि कोई और भी गहरी सच्चाई जानने के ख्याल से मुझसे पुछना चाहें तो मैं और भी अपना सारा अनुभव व सच्चाई बता सकता हूँ। पर इसके लिए मेरे किसी भी नजदीकी या मेरे कार्य-स्थल या निवास-स्थान पर जाकर वहाँ के लोग को डिस्टर्ब न करें बल्कि जो पुछना हो मुझसे पूछें। ................
धन्यवाद।
आपका -
महेश कुमार वर्मा
10:20 Pm
05.11.2016
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https://www.facebook.com/maheshkumar.verma2/posts/1128169150602478 

Tuesday, November 11, 2014

क्या मेला के आयोजक आय व व्यय के डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं?

क्या मेला के आयोजक आय व व्यय के डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं?

कल मैं पटना पुस्तक मेला 2014 के व्यवस्था पर जो सवाल उठाया था उसे आज दैनिक भास्कर के DB स्टार के पृष्ट 2 पर प्रकाशित किया गया है. मामला को समाचार पत्र में स्थान देने के लिये दैनिक भास्कर परिवार को धन्यवाद. 
http://epaper.bhaskar.com/detail/?id=8855&boxid=111114024621&ch=bihar&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=11%2F11%2F2014&editioncode=385&pageno=2&view=image 


DB स्टार में प्रकाशित खबर के अनुसार मेला के व्यवस्था पर मेला के आयोजन समिति के रत्नेश्वर जी कहे कि अपनी तरफ से हम कोई कमी नहीं छोड़े हैं पर इतनी संख्या में लोग आते हैं अतः संभव है कि एक-दो की उम्मीदों पर हम खरे नहीं उतरे.

रत्नेश्वर जी का यह बयान पूर्णतः टाल-मटोल वाला बयान है. मैं आयोजन समिति से जानना चाहता हूँ कि वे आम लोगों के लिये आखिर किस सुविधा की व्यवस्था किये हैं? स्टाल वालों से व आगंतुक से इतनी अधिक मात्रा में पैसे लिये जाने के बाद भी तो आपने कोई व्यवस्था नहीं किया है, सिवाय पार्टीशन कर स्टाल वाले को अपने किताब रखने के लिये जगह देने के. आप खुद अपनी कमी को देखें.
  1. टिकट काउंटर पर काउंटर नंबर नहीं है जिससे कि किसी भी प्रकार के दिक्कत होने पर सही काउंटर की जानकारी देते हुये कोई सूचना या शिकायत उचित स्थानों तक पहुंचाया जा सके.
  2. इसी तरह पुस्तकों के स्टालों पर भी स्टाल नंबर नहीं लिखा गया जिससे कि लोग किसी खास स्टाल को आसानी से पहचान सके या वहाँ दुबारा आसानी से पहुँच सके.
  3. मेला कैंपस के बाहर व भीतर मुख्य प्रवेश द्वार के नजदीक सभी स्टालों के आयोजकों के नाम उनके स्टाल नंबर सहित एक बड़ी बोर्ड में लिखा रहना चाहिये था. ताकि लोग किसी खाश प्रकाशक के बारे में यह जान सके कि उनका स्टाल लगा है या नहीं और है तो वह कहाँ पर है. पर आपने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं किया.
  4. आपको किसी भी प्रकार के समस्या / सहायता / शिकायत दर्ज करने के लिये एक हेल्प लाइन नंबर की व्यवस्था करना चाहिये था. और इस नंबर को प्रवेश द्वार के बाहर व भीतर प्रवेश द्वार के नजदीक व अन्य जगहों पर भी स्पष्ट रूप से बैनर लगाकर या अन्य उचित तरीका से डिस्प्ले कराना चाहिये था. साथ ही इसके लिये आपका एक स्टाल मुख्य प्रवेश द्वार के नजदीक रहना भी चाहिये ताकि जरुरत पड़ने पर लोग उनसे कुछ पूछ सके या कोई सहायता ले सके. पर आपने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं किया.
  5. आप मेला में तो कुछ बैंक का स्टाल लगवा दिये पर किसी भी बैंक का एक भी एटीएम नहीं लगवाये. एटीएम मेला के लिये एक महत्वपूर्ण सुविधा है ताकि लोगों के पॉकेट के पैसा समाप्त हो जाने पर भी वे एटीएम से पैसा निकाल कर अपनी खरीददारी जारी रख सके.
  6. आप यह तो महसूस किये कि आने वाले लोगों के पेशाब-पैखाना के लिये मूत्रालय व सौचालय होना चाहिये और आप ऐसा व्यवस्था किये भी. पर आप यह महसूस नहीं किये कि पेशाब-पैखाना के बाद अंग धोने के लिये पानी की व्यवस्था भी होनी चाहिये. इसी तरह आपने पीने के लिये भी पानी की व्यवस्था नहीं किये. यहाँ तक कि जहाँ खाने-पीने / नास्ता / खाना का स्टाल है उसके नजदीक भी आपने पानी की व्यवस्था नहीं किये. पुरे मेला में कहीं भी पानी की व्यवस्था नहीं है, सिवाय स्टाल से पैसे पानी के बोतल बिक्री का. क्या आपकी सोच में पानी का कोई महत्व नहीं है?
  7. आप स्टाल वालों से प्रति स्टाल दस हजार रुपये से ढाई लाख रुपये तक लिये पर उनकी पुस्तकों की सुरक्षा के लिये आपने कोई व्यवस्था नहीं किया. यहाँ तक कि बाहर निकलने वाले लोगों के साथ के किताब और बिल को भी नहीं चेक किया जा रहा है. यदि आप यहाँ कहेंगे कि स्टाल वालों को खुद अपनी पुस्तक की सुरक्षा करनी है कि कोई किताब चुराकर नहीं ले जाये. तब मैं आपने पूछना चाहता हूँ कि तो आप प्रति स्टाल दस हजार रुपये से ढाई लाख रुपये तक किस कार्य के लिये लिये? क्या यह रकम सिर्फ एक पार्टीशन कर किताब रखने की जगह भर देने लिये लिया गया है?
  8. आप आने वाले पुस्तक प्रेमी / आगंतुक से प्रवेश शुल्क के रूप में 5 रुपये ले रहे हैं. साथ ही आगंतुक के साइकिल या वाहन लगाने ले किये पार्किंग चार्ज भी अलग से ले रहे हैं. आखिर पार्किंग चार्ज व प्रवेश शुल्क के रूप में पैसे लेने की क्या जरुरत हैं? स्टाल वालों से प्रति स्टाल दस हजार से ढाई लाख रुपये तक जो लिये गये हैं, क्या वह इतनी पर्याप्त रकम नहीं है कि प्रवेश व पार्किंग निःशुल्क किया जा सके. सीधी सी बात है कि यदि आप स्टाल वाले से इतनी बड़ी रकम लिये हैं तो आपको प्रवेश व पार्किंग निःशुल्क रखना चाहिये. और यदि आप प्रवेश व पार्किंग के लिये पैसे लेते हैं तो आपको स्टाल वालों से पैसा नहीं लेना चाहिये.
  9. किसी भी प्रकार के अनहोनी या अपराध होने की स्थिति में सुरक्षा व्यवस्था के लिये या इससे निबटने के लिये आपने कोई पुलिसकर्मी को तैनात नहीं करवाया.
  10. अगजनी जैसी घटनाओं से तत्काल निबटने के लिये आपने वहाँ नजदीक में कोई दमकल की व्यवस्था भी नहीं किये.
  11. आपको आकस्मिक स्थिति से निबटने के लिये वहाँ First Aid की व्यवस्था भी करनी चाहिये थी पर आपने यह भी नहीं किया.

इस प्रकार आपने स्टाल वालों से व आने वाले आगंतुक से बहुत ही भारी मात्रा में पैसा वसूल करने के बाद भी किसी भी तरह की मूलभूत सुविधा की व्यवस्था नहीं किया. क्या आप मेला के आय व व्यय का पूर्ण डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं ताकि स्टाल वाले व आम लोग यह जान सके कि उनके पैसे का कितना सदुपयोग हुआ है?

-- महेश कुमार वर्मा 
(स्वतंत्र लेखक)

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http://popularindia.blogspot.in/2014/11/21-2014.html 

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=707012126051518&set=a.318709188215149.73629.100002282104031&type=1 

Monday, November 10, 2014

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी 

पटना के गांधी मैदान में CRD (Centre For Readership Development) (http://www.crdindia.org/) के तरफ से 21वीं पुस्तक मेला का आयोजन किया गया है जो 07.11.2014 से 18.11.2014 तक है. कल 09.11.2014 को मैं भी पुस्तक मेला घुमने गया. पर मेला में प्रवेश से पहले से ही असुविधा नजर आने लगी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं देखा. देखने से यही प्रतीत होता है कि सुविधा के नाम पर इतना पैसा लेकर सुविधा न देकर सिर्फ पैसा ठगा गया है. आप जानना चाहेंगे कि आखिर मैं वहाँ ऐसी क्या कमी देखा जो मैं इस तरह लिख रहा हूँ. कमी एक-दो नहीं बल्कि कई कमियाँ थी. आगे मैं उन कमियों व कुव्यवस्था का वर्णन कर रहा हूँ: 
  1. टिकट लेकर अन्दर जाने से पहले ही मुझे अव्यस्था नजर आने लगी. हुआ यह कि जब मैं एक टिकट काउंटर पर टिकट लेने गया तो देखा कि वहाँ 2 विद्यार्थी अपने एक सौ रुपये का नोट प्राप्त करने के लिये परेशान थे जो टिकट काउंटर में अन्दर से गिर गया था. काउंटर पर बैठे महिला क्लर्क से जब मैं पूछा तो वह बतायी कि नोट बाहर जो दिवार खड़ा किया गया है और उस क्लर्क के डेस्क के बीच के जगह में गिर गया है जो अब इसके हटने पर ही मिल सकता है. उनके अनुसार वह दिवार व डेस्क वहाँ जाम किया हुआ है और उसके बिना हटे नोट तक नहीं पहुँचा जा सकता है. ................... यदि उस महिला क्लर्क के द्वारा बतायी गयी यह बात सही है तो सवाल उठता है कि उस दिवार व डेस्क के बीच में खाली जगह क्यों छोड़ा गया जो वहाँ नोट गिर गया. ........... फिर यदि नोट वहाँ गिर ही गया तो वह महिला क्लर्क उस विद्यार्थी को नोट प्राप्त कराने के लिये मेला प्रशासन को खबर करके उसे नोट वापस दिलाने में मदद क्यों नहीं कर रही थी? ......................... आखिर वह महिला क्लर्क उन विद्यार्थी की कोई सहायता नहीं की. वे विद्यार्थी बाहर से दिवार निचे से तोड़कर नोट निकालना चाह रहे थे. फिर मैं उन विद्यार्थी को सलाह दिया कि एक टिकट लेकर अंदर चले जाइए और अन्दर में मेला का ऑफिस होगा वहाँ जानकारी दे दीजिये तब वे अपने व्यक्ति से नोट निकलवाने का कोशिश कर सकते हैं, खुद मत तोड़िए. फिर मैं अपना टिकट लेकर मेला के अंदर गया. बाद में वे विद्यार्थी अपनी समस्या मेला प्रशासन को दिये या नहीं यह मुझे नहीं मालुम. 
  2. मेला में स्टाल के प्रवेश द्वार पर स्टाल नंबर स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए था, जो नहीं था. स्टाल नंबर लिखे जाने से लोगों को ख़ास स्टाल को पहचानने में या पुनः उस स्टाल पर आने में सहूलियत होती. 
  3. मेला में किसी भी बैंक का कम-से-कम एक अस्थायी या मोबाइल एटीएम रहना चाहिए था ताकि लोगों के पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर वे एटीएम से पैसा निकाल कर अपनी खरीददारी जारी रख सके. पर ऐसा कोई एटीएम वहाँ नहीं था. जिस कारण लोगों को परेशानी संभव है. खुद मेरे पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर मुझे चुने हुये कुछ पुस्तकें वापस करने पड़े. 
  4. मेला के बाहर या अंदर कोई भी पुलिसकर्मी नहीं था. यह प्रशासन की बहुत ही बड़ी चुक थी. कुछ ही माह पहले उसी गांधी मैदान में रावण-दहन के कार्यक्रम में भगदड़ से कम-से-कम 33 लोगों की जान गयी थी और इसमें पुलिस प्रशासन की बहुत ही बड़ी लापरवाही सामने आयी थी. पर पुलिस प्रशासन या जिला प्रशासन इससे सबक नहीं ली और इस पुस्तक मेला में पुलिस की कोई व्यवस्था ही नहीं थी. 
  5. अगजनी जैसी घटनाओं से निपटने के लिये वहाँ कोई दमकल नहीं था. मेला के अंदर कुछ जगह आग बुझाने वाला मशीन (जो ऑफिस वगैरह में रहता है) देखा जरुर पर वह मेला के तरफ से था या स्टाल का अपना था यह मैं नहीं कह सकता हूँ. 
  6. मेला के अंदर पेशाब-पैखाना के लिये मूत्रालय व सौचालय तो था पर पुरे मेला में पानी की व्यवस्था कहीं भी नहीं था. स्थिति यह था कि जहां खाने-पीने का स्टाल लगा था वहाँ भी पानी की व्यवस्था नहीं था. स्थिति यह थी कि यदि आपको पीने के लिये या कोई अन्य काम के लिये पानी की जरुरत है तो आपको वहाँ के खाने-पीने के स्टाल से पैसे देकर बोतल वाला पानी खरीदना पड़ेगा. .................. मेला में निःशुल्क पीने का पानी की व्यवस्था होनी चाहिये. इसके लिये चापाकल लगाया जा सकता था. 
  7. मेला में अनाउंसमेंट कर यह प्रचार तो किया जा रहा था कि कोई भी पुस्तक खरीदने पर बिल जरुर ले लें. साथ ही गेट पर के कर्मचारियों को अनाउंसमेंट कर कहा जा रहा था कि बिना बिल के कोई किताब को बाहर न जाने दिया जाये. पर वहाँ इस तरह की कोई चेकिंग नहीं हो रही थी जिससे कि यह पता चले कि लोग जो किताब बाहर ले जा रहे हैं वह खरीदकर ले जा रहे हैं या चुराकर. बाहर निकलते समय वहाँ के कर्मचारी सिर्फ बिल पर (बिने देखे, बिना पढ़े, बिना मिलाये) एक मुहर लगा दे रहे थे. ऐसी स्थिति में कोई भी कितनी भी मात्रा में किताब चुराकर बाहर ले जाये तो वहाँ के कर्मचारी या प्रशासन को पता तक नहीं चलेगा.
  8. इन सबों के अलावा मैं वहाँ पर एक और बहुत बड़ी अनियमितता देखा. वह यह है कि मैं जब राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल पर पुस्तकें देख रहा था तो वहाँ एक थैला (पोलीथिन) में एक पुस्तक देखा जिसके साथ पुस्तक का बिल भी था, जो कि शायद किसी का छुट गया था. वहाँ मेरे नजदीक में जो दो व्यक्ति थे उनसे मैं इस संबंध में पूछा तो वे बताये कि उनका नहीं है. फिर मैं सोचा कि कोई किताब खरीदा है और उसका छुट गया है सो इसे सही व्यक्ति तक पहुँचाने की कोशिश करनी चाहिये. यह बात सोचकर मैं उस स्टाल के बिल काटने वाले को इस बात की जानकारी दी तो वे अपने एक स्टाफ को यह कहते हुये वह किताब लाने को कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवा देंगे. फिर मैं उस स्टाफ को वह पुस्तक का थैला (पोलीथिन) दिखाया, जिसे वह लाकर उसी बिल काटने वाले को जो उसे पुस्तक लाने को कहा था, दे दिया. उस वक्त मैं फिर उस बिल काटने वाले से कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवाकर जिसका है सही व्यक्ति को दिलवा दीजिये. इसपर वे किताब वहाँ रख लिये और कहे कि अभी अनाउंसमेंट करवाने का समय नहीं है. .............. फिर मैं उस स्टाल से निकल गया और शेष मेला घुमा. पर बाद में भी मैं इस घटना पर सोचा कि जिसका भी पुस्तक है वह पैसा देकर खरीदा है और वह छुट गया है अतः वह पुस्तक सही व्यक्ति तक पहुँच जाये. मुझे लग रहा था कि वह स्टाल वाला अनाउंसमेंट नहीं कराएगा. अतः मैं खुद इस घटना के बारे में मेला प्रशासन को सूचित करने को सोचा. और फिर मैं मेला प्रशासन के ऑफिस पर गया. वहाँ बाहर खड़े गार्ड मुझसे काम पूछने लगे तो मैं बताया कि ऑफिस के किसी व्यक्ति से मिलवाइये. इसपर वे काम का डिटेल्स पूछने लगे. मैं उसे काम बताना चाहा पर फिर मैं पूछा कि काम आप ही सुनियेगा या किसी से भेंट कराईयेगा. इस पर वह गार्ड बोला कि काम बताइये न. तब मैं उसे काम बताने ही वाला था कि अंदर से मेला के Convenor अमित झा अंदर से बाहर आये. मैं उनसे पहले से मिला हुआ था अतः मैं उन्हें पहचान गया वे भी मुझे पहचान गये. फिर मैं गार्ड के पास से हटकर उनके साथ ही बाहर आ गया. मैं उन्हें राजा पॉकेट बुक्स में किताब मिलने वाली उपरोक्त घटना बताते हुये बताया कि वह किताब रख लिया है और कहा कि अनाउंसमेंट कराने का समय नहीं है. इसपर अमित जी भी बोले कि ठीक ही कहा अभी किसको समय है. आगे वे बोले कि जिसका किताब है वह खुद मेरे पास अनाउंसमेंट करवाने आयेगा. तब मैं अमित जी को कहा कि लेकिन किताब मिल गया है. अमित जी बोले हाँ यही राज पॉकेट न (उस समय हमलोग राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल के सामने से ही गुजर रहे थे)? ............ अमित जी कोई कारवाई नहीं किये और आगे बढ़ गये, फिर मैं भी उनका साथ छोड़ दिया. ................... क्या मेला प्रशासन / अमित जी / राजा पॉकेट बुक्स वाले का यह कार्रवाई / व्यवहार सही था? क्या राजा पॉकेट वाले को वह किताब मेला ऑफिस में जमा करवाकर अनाउंसमेंट नहीं करवाना चाहिये था? क्या अमित जी को जानकारी मिलने पर राजा पॉकेट के स्टाल से वह किताब उठवा कर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवाने का फर्ज नहीं था? ........................... बाद में मैं सोच रहा था कि मैं राजा पॉकेट वाले को क्यों यह बताया, खुद वह किताब ले जाकर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवा देता. ............... फिर बाद में मैं मेला से बाहर आ गया. ................ पता नहीं उस किताब के बारे में अब तक कोई अनाउंसमेंट हुआ या नहीं और सही व्यक्ति को वह मिला या नहीं? बाद में या आज यदि अनाउंसमेंट हुआ भी होगा तो अब शायद सही व्यक्ति तक उस किताब का पहुँच पाना मुश्किल है क्योंकि सामान्यतः कोई एक बार ही मेला जाता है. वह व्यकित (जिसका वह किताब था) कल मेला गया था तो फिर आज नहीं गया होगा. यदि कल उसी समय अनाउंसमेंट किया जाता तो शायद उस व्यक्ति को उसकी खोयी किताब मिल जाती. ................. पर शायद वहाँ सभी सिर्फ अपने फायदे के लिये ही थे. किसी के नुकसान पर सोचने वाला कोई नहीं था. 
तो यह थी पुस्तक मेला की अव्यवस्था की कहानी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं होने के पीछे की सच्चाई क्या है? क्या पुस्तक मेला में व्यवस्था के नाम पर स्टाल वालों से व आगंतुक से जो इतनी ज्यादा मात्रा में पैसे लिये गये व लिये जा रहे हैं वह सिर्फ अपने पॉकेट गरम करने के लिये? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं है कि वे आम लोग व आगंतुक के सुविधा के लिये भी सोचे? क्या आयोजक को ऐसी व्यवस्था करने का कर्तव्य नहीं है कि आगंतुक का नुकसान न हो और यदि नुकसान हो गया तो यथासंभव उस नुकसान की पूर्ति के लिये कम-से-कम मानवीय कर्तव्य भी निभाया जाये? 


-- महेश कुमार वर्मा 
(स्वतंत्र लेखक)

Thursday, January 10, 2013

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष


मित्रों,



कुछ दिन बाद राष्ट्र 64वाँ गणतंत्र दिवस मनाएगा। भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष हो गए पर यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भी आम लोग नारकीय जीवन जी रहे हैं। ये पग-पग पर जुल्म व अन्याय के शोषण हो रहे हैं  आज ये न तो सुरक्षित हैं न तो इन्हें उचित न्याय ही मिल पाता है। हर ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। गलत व अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने पर ये और भी असुरक्षित हो जाते हैं, साथ ही ऐसी स्थिति में इनके साथ गलत व अन्याय और भी बढ जाता है। आज न्याय पाना भी मुश्किल हो गया है। अदालत में भी न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को उसके जिन्दा रहते न्याय मिल ही जाएगा यह कहना भी मुश्किल है, तथा जबतक न्याय नहीं मिला तबतक वे मानसिक पीड़ा झेलते रहते हैं।  कितने लोग इस प्रकार के जुल्म, शोषण व अव्यवस्था के शिकार से मानसिक रुप से इतने प्रताड़ित होते हैं कि ऊब कर वे या तो मौत को गले लगा लेते हैं या अपराध जगत में कदम रख देते हैं।



सोचें कि इस प्रकार के परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर कब हमें स्वच्छ व अपराध मुक्त समाज मिलेगी?



-- महेश कुमार वर्मा

Wednesday, August 15, 2012

स्वैच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं?

स्वैच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं?

मित्रों, आज हम स्वतंत्रता के 65वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं।  देश की स्थिति को देखते हुए इस मौके पर मुझे तो बहुत कुछ कहने की ईच्छा होती है पर क्या करूँ हमारे देश में व्यवस्था ऐसी हो गयी है कि बोलने का भी अधिकार नहीं रह गया है।   आप खुद देखें कि हरेक जगह यह आलम है कि लोग निर्बल को दबा रहे हैं और पीड़ीत असहाय होने के कारण चुप रहता है और यदि वह अपने साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है तो उसके साथ और भी कष्ट व शोषण होने लगता है तथा उसे न्याय भी नहीं मिलाता है।  पीड़ीत न्याय के लिए कोर्ट व सरकारी दफ्तर का चक्कर लगा कर थक जाता है और उसे न्याय नहीं मिलती है।  ऐसी स्थिति में कभी-कभी तो पीड़ीत मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित होता है कि वह आत्महत्या तक कर बैठता है।  वैसे आत्महत्या सही नहीं है।  पर कोई भी यों ही शौक से आत्महत्या नहीं करता है बल्कि यदि कोई आत्महत्या करता है तो उसके आत्महत्या का कारण कोई और ही होता है।  आत्महत्या करने वाले के पास जब कोई चारा नहीं बचता है तब ही वह ऐसा कदम उठाता है।  आखिर वह करे भी क्या?  उसे तो कुछ बोलने का भी अधिकार नहीं रह जाता है उसे न्याय पाने का भी अधिकार नहीं रह जाता है तो वह पीड़ीत करेगा भी क्या?  जब उसके ऊपर हो रहे अन्याय से उसका जीना ही मुश्किल हो जाए व अन्याय उसे जीने में ही बाधा पहुंचाए तो वह आत्महत्या नहीं तो और क्या करेगा?
कभी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस बात के लिए फटकार लगाई थी की जब सरकार वेश्याप्रथा व देहव्यापार को बंद नहीं कर सकती है तो इसे अनुमति ही क्यों नहीं दे देती है?  सुप्रीम कोर्ट का यह फटकार सही था।  उसी तरह मैं सरकार व कानून व्यवस्था से पूछना चाहता हूँ कि जब सरकार पीड़ीत को न्याय नहीं दिला  सकती है तो फिर उसे खुद लड़-झगड़ कर अपना फैसला करने का अधिकार क्यों नहीं दे देती है या फिर अन्याय से जब उसे जीना मुश्किल हो रहा हो तो उसे स्वेच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं दे देती है?  मेरी यह बात लोगों को ख़राब लग सकता है पर यह बात सही है कि कई लोगों की आज स्थिति ऐसी ही है। 

-- महेश कुमार वर्मा 

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Sunday, July 15, 2012

परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास करें


परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास करें

यह सभी जानते हैं कि परीक्षा में कदाचार से विद्यार्थी के शिक्षा का सही आकलन नहीं हो पाता है.  और कदाचार के द्वारा परीक्षा पास कर उच्चतर वर्ग में नामांकन लेने के बाद फिर विद्यार्थी किस प्रकार क्या सीख पाएगा यह आप समझ ही रहे हैं.  वे कभी भी अपने विषय का सही ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकेंगे. पर इतना समझने के बावजूद भी विद्यार्थी व उनके अभिभावक किसी भी तरह से कदाचार से परीक्षा पास करना ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं.  और इस कार्य में अभिभावक की अलावा स्कूल, कॉलेज, इंस्टीच्यूट के परीक्षा संचालन के स्टॉफ सहित केन्द्राधीक्षक की भी अहम भूमिका रहती है.  और वे तो अब कदाचार के सीमा को इतना तक पार कर गये हैं कि इसके बाद तो परीक्षा शब्द का मतलब ही नहीं रह जाता है.  ...........  परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास होना, प्रश्न का उत्तर लिखे बिना परीक्षा पास होना .............. ये सब इन्हीं कदाचार के उदाहरण हैं.  ..................  जी हाँ, इस तरह के कदाचार भी जोर-शोर से चल रहा है व संबंधित पदाधिकारी का पॉकेट भी अच्ची तरह से गरम हो रहा है.  और इस तरह की घटनाएँ छोटे परीक्षाओं से लेकर अच्छे-अच्छे विश्वविद्यालय के परीक्षाओं में भी हो रही है.  ................  ऐसा ही एक घटना मैं आपको सुनाना चाहता हूँ जो परीक्षा के इस कदाचार को भी प्रमाणित करती है व कदाचार में सेंटर के डायरेक्टर का साथ नहीं देने पर किस प्रकार वे एक ईमानदार स्टॉफ को कार्य पर नहीं रखते हैं, यह भी स्पष्ट होता है.  तो सुनें वह घटना जो मेरे ही साथ घटी है -
27 जनवरी 2012 की बात है – मेरी मुलाकात मौलाना मजहरूल हक अरबी एवं फारसी विश्वविद्यालय (Maulana Mazharul Haque Arbic and Persian University) के अंतर्गत चलने वाले Patliputra Institute of Technology and Management, Patliputra Colony, Patna डायरेक्टर Prof. V. K. Singh (Mob. No.: 9386803802) से हुयी.  मुझसे मिलने के बाद वे मुझसे प्रभावित हुये.  वे मुझे अपने यहाँ कार्य पर रखना चाहे.  मैं भी अच्छा कार्य ढूँढ ही रहा था.  ............  वे मुझसे बातचीत कर मेरा Resume विचारार्थ रख लिए.  कुछ दिनों के बाद वे मुझे बुलाये व Computer पर कार्य करवाकर मेरा Interview लिए व फिर मेरा सारा Certificates का Xerox Copy व एक फोटो जमा करवा लिए.  ......................
इसके बाद वे मुझे रोज बुलाने लगे तथा मेरा कागजात University भेज दिए हैं ............... आज order होगा ............. कल order होगा .......... Registrar अभी बाहर गये हुए हैं, वे आएँगे तब order हो जाएगा ............... आपका selection बेगुसराय सेंटर के लिए confirm है ................. 1 मार्च को joining करना है .............. Registrar बीमार पड़ गए हैं ............. – इस प्रकार की बात वे करने लगे पर वे मुझे रोज आकर मिल लेने के लिए कहते थे.
इसी तरह की बातें कई दिनों तक होती रही.  इसी बीच 17.02.2012 से उस centre पर यानी Patliputra Institute of Technology and Management पर B. Com. की परीक्षा प्रारंभ होने वाली थी.  इस परीक्षा के लिए Director V. K. Singh मुझे एक परीक्षार्थी का परीक्षा का copy लिखने के लिए कहे.  मुझे copy मिलता और मैं उसे अपने घर पर ले जाकर लिखता ............ इस कार्य के लिये वे मुझे पैसे का प्रलोभन भी दिए.  उसी तरह मैं यहाँ भी इस कार्य से इंकार नहीं किया जिस प्रकार मैं RSBY के कार्य में इंकार नहीं किया था. .................  17 तारीख आने पर University के Programme के अनुसार परीक्षा प्रारंभ हो गयी पर उस परीक्षार्थी का copy नहीं लिखा गया.  एक दिन Director V. K. Singh पुनः कह रहे थे कि copy रखा हुआ है, कहो तो दे देते हैं लिख दो ........... पर वे सिर्फ अपना फायदा ही देख रहे थे, वे मुझे पहले पैसा देने के लिए तैयार नहीं हुए और मैं स्पष्ट कह दिया कि पहले payment होगा तब लिखेंगे और इस प्रकार मैं copy लिखने के लिए तैयार नहीं हुआ.  .................  इसपर वे मुझपर गुस्सा गये व बोले कि जब तुमको मुझपर विश्वास ही नहीं है तो फिर मैं क्यों तुमको रखूँगा, जाओ यहाँ से ................ पर फिर बाद में मेरा appointment का order के बारे में पता करने के लिए बोले.  ................  पर अंततः 25 या 26 फरवरी तक यह कार्य नहीं हुआ.  फिर आगे मैं पुछना भी छोड़ दिया.  इसके बाद मैं न तो उनसे मिला न तो फोन ही किया.  .......................
इस घटना से क्या निष्कर्ष निकलता है, आप खुद समझ सकते हैं.  ..................... यह तो स्पष्ट ही है कि मौलाना मजहरूल हक अरबी एवं फारसी विश्वविद्यालय के Patliputra Institute of Technology and Management, Patliputra, Patna में परीक्षार्थी को centre पर गए बिना भी परीक्षार्थी का copy लिखा जाता है व परीक्षा के दिन बित जाने की बाद भी copy लिखा जाता है. ............................
अब आप सोच सकते हैं कि जहाँ नितिश सरकार के कार्यकाल में विकास की चर्चा है वहाँ वास्तव में यह राज्य विकास की ओर है या शिक्षा-जगत में इस प्रकार के कदाचार से पतन की ओर है?  ........................  और आप सोचें कि शिक्षा-जगत में इस प्रकार के कदाचार से क्या बिहार या हमारा देश कभी विकास कर पाएगा?

-- महेश कुमार वर्मा


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Tuesday, September 14, 2010

कौन है जिम्मेवार?

जिस कार्यक्रम में राज्यपाल को बुलाया गया, उस कार्यक्रम के हॉल में 3000 व्यक्ति गर्मी से परेशान थे.  न तो पंखा था न तो AC ही था.  इसके लिए जिम्मेवार कौन है?
विस्तृत के लिए यहाँ क्लिक करें. http://popularindia.blogspot.com/2010/09/silver-jubilee-celebrations-of-gyan.html 

Friday, September 10, 2010

ज्ञान निकेतन, पटना का रजत जयंती समारोह : Silver Jubilee Celebrations of Gyan Niketan, Patna

कल 09.09.2010 को ज्ञान निकेतन स्कूल का रजत जयंती समारोह स्थानीय श्रीकृष्ण मेमोरिअल हॉल, पटना में मनाया गया.  इस समारोह में दुर्भाग्य से मैं भी पहुँच गया था.  पर यदि मैं वहाँ नहीं पहुँचता तो मुझे यह रिपोर्ट लिखने का सौभाग्य नहीं मिलता.  बुलाये गए लोगों को दिए गए invitation card पर 03:30 pm तक आने के लिए लिखा गया था व समारोह प्रारंभ होने का समय 04:00 pm लिखा गया था.  मैं भी अपने ऑफिस से लगभग सवा तीन बजे छुट्टी लेकर समारोह स्थल गया.  हॉल के अंदर का हालत बहुत ही विचित्र थी.  सभी लोग गर्मी से व्याकुल थे.  हॉल के अंदर न तो पंखा की व्यवस्था थी और न ही एसी (AC) ही चल रहा था.  हॉल के अंदर (क्षमता से अधिक) लगभग तीन हजार व्यक्ति गर्मी में बंद थे व गर्मी से राहत पाने के लिए लोग अपने invitation card या रुमाल से हवा पाने की कोशिश कर रहे थे.  अपने पसीना पोछने के लिए लोग रुमाल का इस्तेमाल कर रहे थे.  आखिर स्कूल के बच्चे के कार्यक्रम में बच्चे व अभिभावक ही तो वहाँ पहुंचे थे.  वे किसी तरह समय बिता रहे थे.  महामहिम राज्यपाल श्री देवानंद कुमर को आने में लेट (विलम्ब) हुआ इस कारण अपने निर्धारित समय से कार्यक्रम प्रारंभ नहीं हुआ.  04:38 pm में कार्यक्रम प्रारंभ हुआ.  कार्यक्रम का पहला उद्घोषणा english के Good Evening शब्द के द्वारा संबोधन करके किया गया.  मैं यह सुनकर आश्चर्य में पड़ गया कि अभी 4 बजकर 38 मिनट हुए है और अभी किस आधार पर Good Evening शब्द का प्रयोग किया गया.  पूरा उद्घोषणा english में ही हुयी.  फिर महामहिम राज्यपाल श्री देवानंद कुमर आए.  खड़े होकर राष्ट्रगान गाकर उनका अभिवादन किया गया.  फिर राज्यपाल ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया.  कार्यक्रम के सभी उद्घोषणा english में की गयी.  कुछ लोग अपने भाषण हिन्दी में तो कुछ लोग english में दिए.  राज्यपाल ने लंबे समय तक अपना भाषण english में दिया.  भाषण के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ जिसमें बच्चों ने नृत्य, गीत, इत्यादि प्रस्तुत किये.  गर्मी, भगवान से वर्षा के लिए प्रार्थना, वर्षा व वर्षा के बाद का आनंद पर कई गीत व नृत्य प्रस्तुत किये गए.  लगभग साढ़े सात बजे शाम तक कार्यक्रम चला.  पर दुःख की बात है कि इस पूरे कार्यक्रम में हॉल की स्थिति व थी न तो पंखा न तो AC पूरे कार्यक्रम के दौरान लोग गर्मी से परेशान रहे.  दर्शक के अलावा मच पर के व्यक्तियों को भी बार-बार रुमाल से अपना पसीना पोछते हुए देखा गया.  वैसे मंच पर एक-दो stand fan दिखाई दे रहा था पर वह ऊँट के मुंह में जीरा का फोरन ही साबित हो रहा था.  सभी लोग गर्मी से परेशान थे.  यहाँ तक कि महामहिम राज्यपाल भी अपने भाषण के दौरान गर्मी से परेशान थे और तब उनके bodyguard ने रुमाल मंगवाकर उनके पास रुमाल भिजवाया और तब राज्यपाल ने रुमाल से अपने चेहरे के पसीना को पोछा.  अपने भाषण के बाद कुछ देर तक राज्यपाल ने कार्यक्रम देखा फिर चले गए.  गर्मी से लोगों की हालत तो व्याकुल थी कई लोग कार्यक्रम समाप्त होने से पहले ही चले गए.  कई बच्चे व कि अभिभावक भी हॉल से बाहर निकलकर शारीर में हवा लगाकर व आइसक्रीम, कुल्फी या मूंगफली वगैरह खाकर अपने शरीर को रहत दे रहे थे.  पूरे कार्यक्रम के दौरान हॉल में पिने के लिए पानी व कोई नाश्ता का कोई व्यवस्था नहीं किया गया.  बल्कि साढ़े सात बजे के लगभग जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तब जाते समय गाते पर लोगों को नाश्ता के एक-एक packet दिया जा रहा था. .....................
मैं ज्ञान निकेतन के principal व समारोह के व्यवस्थापक सहित संबंधित लोग से जानना चाहता हूँ कि वे उस हॉल में AC की व्यवस्था क्यों नहीं किया गया?  जानकारी के अनुसार हॉल में बैठने के लिए 2500 सीट है.  पर सीट फुल होने के बाद कितने लोग खड़े थे.  यानी स्पष्ट है कि कि उस हॉल में 2500 से अधिक व्यक्ति थे.  यानी लगभग तीन हजार व्यक्ति को उस हॉल में बंद कर गर्मी में कार्यक्रम हो रहा था जहाँ गर्मी से निजात पाने की कोई व्यवस्था नहीं थी.  आखिर कार्यक्रम के आयोजक का विद्यार्थी व अभिभावक के साथ कैसा व्यवहार करने की मंशा थी?  इस प्रकार के कुव्यवस्था के कार्यक्रम में महामहिम राज्यपाल को बुलाना राज्यपाल का भी अपमान है.  आखिर इस प्रकार के अव्यवस्था के लिए कौन जिम्मेवार है? 
आखिर इस प्रकार के अव्यवस्था के लिए कौन जिम्मेवार है?  क्या इस प्रकार के आयोजन के व्यवस्था को देखने वाला कोई नहीं है?  उस बंद कमरे में गर्मी में विद्यार्थी या अभिभावक के स्वास्थ्य  खराब होने के लिए जिम्मेवार कौन है?

आशा करता हूँ कि मेरे इस लेख के पाठक टिप्पणी करके अपने विचार देंगे.

आपका
महेश कुमार वर्मा
Mahesh Kumar Verma
Mob.: +919955239846

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