वक्त पर होती है पहचान
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Justice For Mahesh Kumar Verma
Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....
Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
Saturday, September 26, 2015
बुरा वक्त का अच्छा संदेश
वक्त पर होती है पहचान
Tuesday, March 4, 2014
नेता
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थे कभी गरीब इंसान।
नेता बने हुये धनवान॥
छोटा सा घर महल में बदला।
घुमने के लिए कार आया॥
भूल गए जन हित की बातें।
पर अवैध वसूली कभी न भूलते॥
क्षेत्र विकास के पैसे अपने घर में हैं लगाते।
गरीब जनता को और भी अधिक हैं सताते॥
बने हैं नेता जबसे।
पैसे ही पहचानते तबसे॥
नहीं पहचानते और किसी को।
छोड़ राजनीति कुछ न आता उनको॥
थे कभी गरीब इंसान।
आज है उनकी अलग पहचान॥
नेता बने हुये धनवान।
नेता बने हुये धनवान॥
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Thursday, March 21, 2013
जिंदा हूँ सब जानते हैं
जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं
या मेरे लिएअपने को मृत समझते हैं
इसीलिए तो मुझसे दूरी बनाये रहते हैं
जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं
मैं तो कई बार मरके भी जिंदा हूँ
पर तुम तो जिंदा रहके भी मृत हो
मैँ जिंदा हूँ तुम्हारे प्यार पाने को
पर तुम मृत हो मुझे तडपाने को
छुप-छुप कर मिलना
रात-रात भर बातें करना
अपने दिल की बात बताना
यह सब मुझे याद है
पर तुम्हारे बिना जीवन ये बर्बाद है
क्यों आने दिया दुनियाँ को
हमारे संबंध व प्यार के बीच
दुनियाँ वाले तो मजा उड़ाएँगे
पर वे प्यार को कभी न समझ पाएँगे
जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं
जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं
छत्तीस साल पहले
छत्तीस साल पहले
21.03.2013
Friday, March 8, 2013
देश के बहना जागो
मैं अपने देश के तमाम बहनों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे महिला प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाएं।
Tuesday, February 26, 2013
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी?
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी
न कोई पत्र न कोई मेसेज
न कोई संवाद न कोई फोन
छोड़ के क्यों तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी
कब तक लेगी तुम मेरे प्यार की परीक्षा
आखिर क्या है तुम्हारी इच्छा
जाना ही था तो प्रेम पूर्वक कह देती
पर इतना कष्ट तुम मुझे न देती
अब कैसे रह पाऊंगा मैं
कैसे जी पाऊंगा मैं
तेरे इंतजार में हूँ मैं उस दिन से भूखा
जिस दिन से मुझे छोड़ के तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी
तेरे कारण ही था मैं जिंदा
अब कैसे मैं रह पाऊंगा
अब कैसे मैं जी पाऊंगा
फिर भी है मुझे यह आस
कि आयेगी तुम जरुर मेरे पास
है मुझे यह विश्वास
कि आयेगी तुम जरुर मेरे पास
भूखे कष्ट में तुमसे यही सवाल करता हूँ
कि मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी
दिनांक - 26.02.2013
Sunday, December 30, 2012
महिला हूँ तो क्या हुआ
मुझमें भी दिल व दिमाग है
अब तक सहती रही
पर अब न सहूंगी
Sunday, September 9, 2012
मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंद
मेरा कष्ट बढ़ाकर तुमको आता है आनंद
मुझे छटपटाता देखकर तेरा पुलकित होता मन
दिल तड़पाकर क्या चाहते हो
दिल दुखाकर क्या चाहते हो
मुझको रुलाकर क्या चाहते हो
क्या चाहते हो
क्या चाहते हो
खुलके बोलो स्पष्ट बोलो
चुप क्यों हो मुँह तो खोलो
क्या चाहिए कह भी दो ना
जो भी चाहिए स्पष्ट बोलो
मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंद
मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंद
Friday, August 31, 2012
प्यार की परीक्षा
मेरे प्यार को तुने पैरों तले रौंद दिया
पर तेरे पग धुरी को भी मैं प्रसाद के तरह स्वीकार किया
किस तरह लोगे मेरे प्यार की परिक्षा
भूखे रखकर, अग्नि में जलाकर या जहर पीलाकर
चाहे जिस तरह ले लो मेरे प्यार की परीक्षा
पर तुम्हें चाहा है तुम्हें ही चाहेंगे
तड़पाओगे तो तड़पते रहेंगे
रुलाओगे तो रोते रहेंगे
भूखे रखोगे तो भूखे ही रहेंगे
पर तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे
क्योंकि किया हूँ मैं तुमसे प्यार
किया हूँ मैं तुमसे प्यार
Sunday, October 24, 2010
जब दुःख की बदली छाती है
Sunday, January 24, 2010
क्यों न करूँ मैं गणतंत्र दिवस का बहिष्कार
सोचने पर हमने है विचारा
है नहीं यहाँ बच्चों को पढने का अधिकार
है नहीं बच्चों को खेलने का अधिकार
बच्चे करते हैं होटल में काम
बेचते हैं रेल पर नशा तमाम
देखने वाला नहीं है कोई उसे
फिर हमने देश को गणतंत्र माना कैसे
गणतंत्र दिवस है आया
सोचने पर हमने विचारा
नहीं है यहाँ पीड़ित को न्याय का अधिकार
गुनाहगार घूमता है खुला बाजार
न है न्याय पाने का अधिकार
न है न्याय करने का अधिकार
न है सच बोलने का अधिकार
न है सच पर चलने का अधिकार
देश में फैली है भ्रष्टाचार
हो रही है सबों के साथ बलात्कार
तो फिर क्यों कहते हैं मेरा देश है महान
क्यों मनाऊं मैं गणतंत्र दिवस का त्यौहार
क्यों न करूँ मैं गणतंत्र दिवस का बहिष्कार
क्यों न करूँ मैं गणतंत्र दिवस का बहिष्कार
Sunday, December 13, 2009
जागो बहना जागो
हमारे समाज में इस तरह के कार्य हमारी पतितता को ही दर्शाता है। हमें अपने समाज के इस कृत्य पर शर्मिंदगी होनी चाहिए। मैं अपने देश के तमाम बहनों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे महिला प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाएं।
देश के बहना तुम जागो
तुम मानव हो
तुममे बुद्धि-विवेक हैतुम्हारी चुप्पी ही तुम्हें दबाती है
अतः अपने बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करो
अन्याय के विरुद्ध लड़ो
समाज से महिला प्रताड़ना को उखाड़ फेंको
व महिलाओं को शीर्ष स्थान पर स्थापित करो
जागो बहना जागो
जागो बहना जागो
Sunday, November 22, 2009
भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान
जहाँ पैसे के सामने न्यायालय भी होता अंधा, उस देश के हम वासी हैं।
भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान।
मेरा देश भले हो बेईमान, पर फिर भी है यह महान।
Sunday, October 18, 2009
हमें मनुष्य बनना होगा
हम मनुष्य को सबसे बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी कहते हैं पर वास्तव में इनका जीवन आज पशु से भी बदतर है, तभी तो ये पशुओं का दुःख-दर्द नहीं समझते हैं व उन्हें मारकर अपना पेट भरते हैं। किसी भी दृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति ने मनुष्य को मांसाहारी जीव के रूप में नहीं बनाया है पर मनुष्य प्रकृति के नियम को तोड़कर मांसाहार करता है। उस समय मनुष्य अपनी सारी बुद्धि खो देता है और पशु से भी बदतर बन जाता है।
अतः कवि हमें जोर डालते हुए मनुष्य बनने के लिए कहता है :
पशुओं का दर्द समझना होगा
प्रकृति के साथ चलना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा॥
न बन सके नारायण तो
नर का कर्तव्य निभाना होगा
अंदर के बुराई को हटाना होगा
व अच्छाई को लाना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा।
हमें मनुष्य बनना होगा॥
-- महेश कुमार वर्मा
Saturday, September 19, 2009
करें मानवता को महान
आज से शारदीय नवरात्र आरंभ हो गया है। और इसके साथ ही दशहरा व दुर्गा पूजा का पर्व का भी शुभारंभ होगया। इस खुशी के माहौल में और भी खुशी आ गयी कि दो दिनों के बाद आपसी प्रेम व भाईचारा का पवित्र पर्व ईदहै। इन खुशी व पवित्र पर्व के अवसर पर आम जनों से मेरा आग्रह है कि इन पर्वों को खुशी व पवित्रता के साथ ही मनाएं तथा इन पर्वों में बुराई को न आने दें।
पर्व है प्रेम व भाईचारा का
रखें इसे पवित्र अल्लाह के नाम
पर्व है अन्याय पर न्याय के विजय का
रखें इसे स्वच्छ भगवान के नाम
गर तुम करोगे मांसाहार
तो पर्व हो जाएगा दूषित
व हम हो जायेंगे बदनाम
अतः रोको इन कुप्रथाओं को मानवता के नाम
मत करो हिंसा अल्लाह व भगवान के नाम
पर्व है पवित्र रखो इसे पवित्र
मत करो इसे दूषित
पर्व है पवित्र
प्रेम व भाईचारा का पर्व है बड़ा महान
अन्याय पर न्याय की विजय से होती है
मानवता की पहचान
हम हैं मानव
करें मानवता को महान
करें मानवता को महान
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है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना
प्रेम है बहुत महान
मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
शाकाहारी भोजन : शंका समाधान
वह बकरा ने आपको क्या किया था?
चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है?
मुर्ख मनुष्य
बकरे की जुबानTuesday, September 15, 2009
क्यों खफा हो मुझसे
क्यों चुप हो यह तो बता
तुम्हारी चुप्पी मेरे दिल में यों चुभती है
जिसका वर्णन मैं कर सकता नहीं
फिर भी इस आश के साथ जिन्दा हूँ
कि तुम्हारी चुप्पी टूटेगी और
एक दिन तुम मेरे साथ दोगे
मेरे साथ दोगे व मेरे दर्द सुनोगे
मेरे दर्द सुनोगे व उसे दूर करोगे
मेरे चाह को पूरा करोगे
व मेरे दर्द को दूर करोगे
और यदि तुम ऐसा नहीं करोगे
तो फिर तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
जब मेरे दुःख में साथ ही न दो
पर फिर भी इसी आश के साथ हूँ
कि तुम मेरा साथ दोगे
व मेरी सहायता करोगे
--
महेश कुमार वर्मा
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Contact No. : +919955239846
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Sunday, July 19, 2009
तीन भिखारी
तीन भिखारी
हाथ में कटोरा लिए
आधा कपड़ा फटे हुए
आधा तन उघड़े हुए
एक हाथ में लाठी लिए
झुकी कमर से चल रहे
लोगों से हैं कह रहे
दे दो बाबू दे दो
इस बुढ़े को दे दो
तू एक पैसे देगा
वो दस लाख देगा
दे दो बाबू दे दो
दे दो बाबू दे दो
उसे देख कई चलने वाले
सिक्के डाल देते कटोरी में उसके
कोई अपने आप से कहता
यही है इन लोगों का धंधा
तो कोई नजर छुपाकर बढ़ जाते
व सुरक्षित रखते अपने पैसे
सुरक्षित रखते अपने पैसे
सड़क पर के भिखारी ये
मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए
मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए
थोड़ी दूर चलने पर
पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में
थोड़ी दूर चलने पर
पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में
वही पुराना ऑफिस
जहॉं मैं वर्षों कार्य किया
वही पुराना ऑफिस
जहॉं से मैं रिटायर हुआ
मेरे रिटायर होने पर
किया था विदाई समारोह सहकर्मियों ने
दिया था कुछ उपहार मेरे सहकर्मियों ने
वही पुराना ऑफिस
वही पुराना ऑफिस जब मैं पहुँचा
लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा
लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा
बड़ा बाबू ऐनक पहने
मोटे फाईल में व्यस्त थे
मुझे देख ऐनक उतार
मुझको वे समझाने लगे
मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए
मॉंग रहे थे मुझसे पैसे
मॉंग रहे थे मुझसे पैसे
कहा उसने
नहीं दोगे तो होगा नहीं काम तुम्हारा
अब नहीं है यहॉं ईमानदारी तुम्हारा
मेरे कलम पर है पैसा तुम्हारा
मेरे कलम पर है पैसा तुम्हारा
अब तुम्हारा नहीं है यहॉं कोई सम्मान
दे दो वरना कर दुँगा तुम्हें बदनाम
फिर नहीं होगा तुम्हारा काम
फिर नहीं होगा तुम्हार काम
मैं वापस आ गया
मैं वापस आ गया
सोचने लगा
मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए
मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे
मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे
यह सोचने पर मैं विवश था
यह सोचने पर मैं विवश था
कि यह तो
उस सड़क किनारे के
भिखारी से भी बदतर निकला
जिसने मेरे पैसे को भी
अपना ही समझा
जिसने मेरे पैसे को भी अपनो ही समझा
नहीं था मेरे पास कोई चारा
सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा
नहीं था मेरे पास कोई चारा
सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा
गया मैं थाना पुलिस के पास
होती दारोगा बाबू से मुलाकात
जो सामने ऑफिस में ही थे
कलम लिए कुछ लिख रहे थे
उनके ईशारे पर
सामने कुर्सी पर मैं बैठा
और सुनाया अपना दुखड़ा
कहा मैं बिल्कुल साफ-सुथरा
नहीं है मेरे पास कोई पैसा
आपसे ही है मुझे आशा
आपसे ही है मुझे आशा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा
दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा
काम तो हो जाएगा
पर देना होगा कुछ पैसा
फिर तुम्हारा सारा पैसा
तुम्हारे हाथ में होगा
और वह बड़ा बाबू
वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा
वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा
पर कुछ तो देना होगा
बिना दिए कुछ नहीं होगा
बिना दिए कुछ नहीं होगा
मैंने कहा
मेरे पास नहीं है पैसा
मेरे पास नहीं है पैसा
वहाँ न दिया तो
आपके लिए
लाऊँ मैं कहॉं से पैसा
लाऊँ मैं कहॉं से पैसा
मेरे पास नहीं है पैसा
पर एक आपसे ही है आशा
एक आपसे ही है आशा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
दिला दो मुझे मेरा पैसा
पर दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना
दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना
कहा उसने संतरी से
निकालो इसे बाहर
और ले जाओ यहॉं से
है नहीं पैसा
और करता है बकवास
ले जाओ इसे यहॉं से
ले जाओ इसे यहॉं से
आया संतरी
बड़ी-बड़ी मुँछों वाला
रंग था उसका बिल्कुल काला
हाथ में लिए था डंडा
खींच मुझे बाहर निकाला
मैं कुछ कहना चाहा
पर उसने एक न सुना
धक्का देकर बाहर निकाला
दो-चार थप्पड़ भी लगाया
और मुझे निकाल दिया
और मुझे निकाल दिया
आया फिर मैं अपने घर में
आया फिर मैं अपने घर में
सोचने लगा
कि ये पुलिस हैं या हैं जल्लाद
ये रक्षक हैं या हैं भक्षक
करते हैं ये धर्म की रक्षा
या करते हैं धर्म को ही हलाल
या करते हैं धर्म को ही हलाल
मैं सोचने लगा
कि ये क्यों मॉंगते हैं मुझसे
ये क्यों मॉंगते हैं मुझसे
सड़क का भिखारी
अपने पेट के लिए मॉंगते हैं
ऑफिस का किरानी
मेरे पैसे को अपना ही समझ लिया
और ये पुलिस
ये तो
ये तो मेरे पैसे व मेरे शरीर
दोनों पर अपना अधिकार जमाया
और बेवजह मुझे मार भगाया
बेवजह मुझे मार भगाया
किरानी रूपी भिखारी
सड़क के भिखारी से बदतर निकला
पर पुलिस रूपी ये भिखारी
सबसे बड़ा घिनौना निकला
सबसे बड़ा घिनौना निकला
जो मेरे शरीर को भी मेरा न समझा
और बेवजह मुझे मार भगाया
बेवजह मुझे मर भगाया
पुलिस रूपी ये जल्लाद
सबसे बड़ा घिनौना निकला
सबसे बड़ा घिनौना निकला
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महेश कुमार वर्मा
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Tuesday, July 14, 2009
अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों
Tuesday, April 21, 2009
पाप की विदाई
दुनियाँ से पाप और अत्याचार को दें हमेशा के लिए विदाई
फिर कभी न आए ये पाप हम इंसानों के बीच
नहीं बनें हम हैवान इंसानों के बीच
हम हैं इंसान
नहीं बनेंगे हैवान
आएगी पाप यदि मेरे बीच
तो दिखा दूंगा उन्हें सबसे नीच
आओ साथ मिलकर लड़ें अपनी लड़ाई
और हमेशा के लिए करें पाप की विदाई
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