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Justice For Mahesh Kumar Verma
Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....
Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
Thursday, August 2, 2012
वाहन का 99% Insurance Claim फर्जी
Sunday, July 15, 2012
परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास करें
Saturday, January 24, 2009
गणतंत्र दिवस : एक प्रश्न
दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के ५९ वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। प्रश्न उठता है की हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाएँ? क्या सिर्फ इसलिए कि हम भारतीय है? जरा सोचें कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए पर आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिली है?
कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गयी है। पर वास्तविकता इनसे कोसों दूर है। वास्तविकता के जमीं पर हम आयें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं। इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय ही होता है।
यह बात सिर्फ कहने-सुनने के लिए ही नहीं बल्कि वास्तविकता है। आप ख़ुद देखें आज बच्चों को उचित शिक्ष भी नहीं मिल पाती है। उन्हें पढने व खेलने का भी अधिकार नहीं है और बचपन से ही उनसे मजदूरी करायी जाती है। ....... आज महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है और महिला वर्ग हमेशा पुरुषों द्वारा प्रताडित ही होती रहती है। आज पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है और तंग आकर वह अपराधी भी बन जा रहा है। आज भारत में न्यायप्रिय राजा नहीं है बल्कि यहाँ सभी मुद्राप्रिय हैं। कभी दुनियाँ को धर्म की शिक्षा देने वाला भारत आज खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है। और इसके लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ-साथ खुद हमारे समाज हैं। जी हाँ, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है कि आज अन्याय व जुल्म के सताए व्यक्ति को उचित न्याय भी नहीं मिल पाता है। पुलिस से लेकर अदालत तक सभी मुद्राप्रिय हो गए हैं और यहाँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुद्रा के आधार पर न्याय होता है। ऐसे कई मामला देखे जाते हैं जहाँ न्यायलय में न्याय करने के लिए बैठे हमारे न्यायाधिश भी पैसे लेकर पैसे वाले के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। अपराध बढ़ाने में तो शायद सबसे बड़ा हाथ समाज से अपराध को मुक्त कराने के लिए बैठे हमारे पुलिसिया तंत्र का ही है। जहाँ यदि आप अपने ऊपर हुए किसी जुल्म व अन्याय के शिकायत करने जाएँ तो आपके साथ क्या जुल्म हुआ यह नहीं देखा जाता है बल्कि देखा जाता है कि आपके पास क्या पैसा है। इतना ही नहीं, अपराधी अपना लाभांश इन पुलिस को देकर ही अपने अपराध के व्यवसाय में दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं। ................. अपराधों को बढ़ाने में हमारा समाज भी पीछे नहीं है। भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं। .........................
इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय मैं भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है? .................... और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? ........ आयें अपने समाज व देश से अन्याय, भ्रष्टाचार व जुल्म को उखाड़ फेकने के लिए कदम आगे बढाकर राष्ट्रहित में कार्य करें।
धन्यवाद।
आपका
महेश कुमार वर्मा
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Saturday, July 26, 2008
महापाप
इसमें कोई दो राय नहीं कि कन्या भ्रूण हत्या बढ़ने का सर्वाधिक मुख्य कारण संतान के रूप में लड़की की चाह न होकर लड़का की चाह होना रहता है।
अतः जबतक समाज की मानसिकता को बदलकर नर व नारी एक सामान की भावना नहीं लाई जाएगी तबतक इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है। और इसके लिए समाज को ही सोचना पड़ेगा व आगे आना पड़ेगा।
फिर आख़िर संतान के रूप में लोग लड़की क्यों नहीं चाहते हैं? हमें इस पर भी सोचना चाहिए और इसमें जो कारण उचित हों उसे दूर करने का उपाय समाज को ही करना होगा। ऐसे ही कारणों में से एक कारण है : दहेज-समस्या।
हमारी समाज दहेज रूपी दानव को नष्ट करने का कोई पहल नहीं करती है, पर जन्म से पूर्व अपने ही संतान को नष्ट करने का पहल जरुर करती है। सोचिए आख़िर कितनी संकीर्ण व नीच विचारधारा की है हमारी समाज। ......... और यदि हमारी समाज इतनी नीच विचारधारा की है तो हमें समाज के इस विचारधारा का विरोध करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
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फिर कन्या भ्रूण हत्या ही क्यों , नर या मादा किसी भी प्रकार की भ्रूण हत्या महापाप है। उस माँ-बाप के लिए अपने संतान के प्रति इससे बड़ा कुकर्म और क्या होगा, जिसने ख़ुद संतान के जन्म के लिए प्रयोजन किया व फिर जन्म से पहले ही अपने ही संतान को नष्ट कर दिया।
कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं किसी भी लिंग की भ्रूण हत्या महापाप है।
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कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य
Tuesday, July 22, 2008
मुझे भी जन्म लेने दो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो
Sunday, July 20, 2008
कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य
भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं........
यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। ........आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। ........... यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना या उससे घृणा करना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ................
--महेश कुमार वर्मा
दिनांक : २०।०७।२००८
स्थान : पटना
लेखक : MAHESH KUMAR VERMA
पता : DTDC Courier Office,
Satyanarayan Market,
Opposite Maruti (KARLO) Show Room,
Boring Road, Patna (Bihar)
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Sunday, January 13, 2008
विचार : दूध का सेवन कहाँ तक उचित है
Saturday, November 17, 2007
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
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