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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
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Friday, September 24, 2010

हम हिन्दू-मुस्लिम नहीं, हम मानव हैं

भगवान ने हमें इंसान बनाया
पर जाति और धर्म की लड़ाई हमने खुद है पाला
हिन्दू हों या मुस्लिम हों
हम सभी हैं मानव
मानव मेरी जाति
सत्य व मानवता मेरा धर्म
क्यों लड़ें हम धर्म व जाति के नाम पर
रमजान (RAMJAN) के प्रारंभ में है राम (RAM)
दिवाली (DIWALI) अंत में है अली (ALI)
तो फिर हम कैसे दो हुए?
हम दो नहीं हम एक हैं
हम हिन्दू-मुस्लिम नहीं
हम मानव हैं
हम इंसान हैं
सत्य व मानवता मेरा धर्म
इंसानियत मेरा फर्ज
हम दो नहीं हम एक हैं
हम मानव हैं
हम मानव हैं




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महेश कुमार वर्मा
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Saturday, September 19, 2009

करें मानवता को महान

नमस्कार।

आज से शारदीय नवरात्र आरंभ हो गया है। और इसके साथ ही दशहरा व दुर्गा पूजा का पर्व का भी शुभारंभ होगया। इस खुशी के माहौल में और भी खुशी आ गयी कि दो दिनों के बाद आपसी प्रेम व भाईचारा का पवित्र पर्व ईदहै। इन खुशी व पवित्र पर्व के अवसर पर आम जनों से मेरा आग्रह है कि इन पर्वों को खुशी व पवित्रता के साथ ही मनाएं तथा इन पर्वों में बुराई को न आने दें।


पर्व है प्रेम व भाईचारा का
रखें इसे पवित्र अल्लाह के नाम
पर्व है अन्याय पर न्याय के विजय का
रखें इसे स्वच्छ भगवान के नाम
गर तुम करोगे मांसाहार
तो पर्व हो जाएगा दूषित
व हम हो जायेंगे बदनाम
अतः रोको इन कुप्रथाओं को मानवता के नाम
मत करो हिंसा अल्लाह व भगवान के नाम
पर्व है पवित्र रखो इसे पवित्र
मत करो इसे दूषित
पर्व है पवित्र
प्रेम व भाईचारा का पर्व है बड़ा महान
अन्याय पर न्याय की विजय से होती है
मानवता की पहचान
हम हैं मानव
करें मानवता को महान
करें मानवता को महान

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है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना

प्रेम है बहुत महान

मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है?

मुर्ख मनुष्य

बकरे की जुबान


Sunday, July 19, 2009

तीन भिखारी

तीन भिखारी

 

हाथ में कटोरा लिए

आधा कपड़ा फटे हुए

आधा तन उघड़े हुए

एक हाथ में लाठी लिए

झुकी कमर से चल रहे

लोगों से हैं कह रहे

दे दो बाबू दे दो

इस बुढ़े को दे दो

तू एक पैसे देगा

वो दस लाख देगा

दे दो बाबू दे दो

दे दो बाबू दे दो

उसे देख कई चलने वाले

सिक्‍के डाल देते कटोरी में उसके

कोई अपने आप से कहता

यही है इन लोगों का धंधा

तो कोई नजर छुपाकर बढ़ जाते

व सुरक्षित रखते अपने पैसे

सुरक्षित रखते अपने पैसे

सड़क पर के भिखारी ये

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

 

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

वही पुराना ऑफिस

जहॉं मैं वर्षों कार्य किया

वही पुराना ऑफिस

जहॉं से मैं रिटायर हुआ

मेरे रिटायर होने पर

किया था विदाई समारोह सहकर्मियों ने

दिया था कुछ उपहार मेरे सह‍कर्मियों ने

वही पुराना ऑफिस

वही पुराना ऑफिस जब मैं पहुँचा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

बड़ा बाबू ऐनक पहने

मोटे फाईल में व्‍यस्‍त थे

मुझे देख ऐनक उतार

मुझको वे समझाने लगे

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

कहा उसने

नहीं दोगे तो होगा नहीं काम तुम्‍हारा

अब नहीं है यहॉं ईमानदारी तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

अब तुम्‍हारा नहीं है यहॉं कोई सम्‍मान

दे दो वरना कर दुँगा तुम्‍हें बदनाम

फिर नहीं होगा तुम्‍हारा काम

फिर नहीं होगा तुम्‍हार काम

 

मैं वापस आ गया

मैं वापस आ गया

सोचने लगा

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

यह सोचने पर मैं विवश था

यह सोचने पर मैं विवश था

कि यह तो

उस सड़क किनारे के

भिखारी से भी बदतर निकला

जिसने मेरे पैसे को भी

अपना ही समझा

जिसने मेरे पैसे को भी अपनो ही समझा

 

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

गया मैं थाना पुलिस के पास

होती दारोगा बाबू से मुलाकात

जो सामने ऑफिस में ही थे

कलम लिए कुछ लिख रहे थे

उनके ईशारे पर

सामने कुर्सी पर मैं बैठा

और सुनाया अपना दुखड़ा

कहा मैं बिल्‍कुल साफ-सुथरा

नहीं है मेरे पास कोई पैसा

आपसे ही है मुझे आशा

आपसे ही है मुझे आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

काम तो हो जाएगा

पर देना होगा कुछ पैसा

फिर तुम्‍हारा सारा पैसा

तुम्‍हारे हाथ में होगा

और वह बड़ा बाबू

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

पर कुछ तो देना होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

 

मैंने कहा

मेरे पास नहीं है पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

वहाँ न दिया तो

आपके लिए

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

पर एक आपसे ही है आशा

एक आपसे ही है आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

पर दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

कहा उसने संतरी से

निकालो इसे बाहर

और ले जाओ यहॉं से

है नहीं पैसा

और करता है बकवास

ले जाओ इसे यहॉं से

ले जाओ इसे यहॉं से

आया संतरी

बड़ी-बड़ी मुँछों वाला

रंग था उसका बिल्‍कुल काला

हाथ में लिए था डंडा

खींच मुझे बाहर निकाला

मैं कुछ कहना चाहा

पर उसने एक न सुना

धक्‍का देकर बाहर निकाला

दो-चार थप्‍पड़ भी लगाया

और मुझे निकाल दिया

और मुझे निकाल दिया

 

आया फिर मैं अपने घर में

आया फिर मैं अपने घर में

सोचने लगा

कि ये पुलिस हैं या हैं जल्‍लाद

ये रक्षक हैं या हैं भक्षक

करते हैं ये धर्म की रक्षा

या करते हैं धर्म को ही हलाल

या करते हैं धर्म को ही हलाल

मैं सोचने लगा

कि ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

सड़क का भिखारी

अपने पेट के लिए मॉंगते हैं

ऑफिस का किरानी

मेरे पैसे को अपना ही समझ लिया

और ये पुलिस

ये तो

ये तो मेरे पैसे व मेरे शरीर

दोनों पर अपना अधिकार जमाया

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मार भगाया

 

किरानी रूपी भिखारी

सड़क के भिखारी से बदतर निकला

पर पुलिस रूपी ये भिखारी

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

जो मेरे शरीर को भी मेरा न समझा

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मर भगाया

पुलिस रूपी ये जल्‍लाद

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

 

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महेश कुमार वर्मा
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Saturday, January 24, 2009

गणतंत्र दिवस : एक प्रश्न

दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के ५९ वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। प्रश्न उठता है की हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाएँ? क्या सिर्फ इसलिए कि हम भारतीय है? जरा सोचें कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए पर आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिली है?

कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गयी है। पर वास्तविकता इनसे कोसों दूर है। वास्तविकता के जमीं पर हम आयें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं। इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय ही होता है।

यह बात सिर्फ कहने-सुनने के लिए ही नहीं बल्कि वास्तविकता है। आप ख़ुद देखें आज बच्चों को उचित शिक्ष भी नहीं मिल पाती है। उन्हें पढने व खेलने का भी अधिकार नहीं है और बचपन से ही उनसे मजदूरी करायी जाती है। ....... आज महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है और महिला वर्ग हमेशा पुरुषों द्वारा प्रताडित ही होती रहती है। आज पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है और तंग आकर वह अपराधी भी बन जा रहा है। आज भारत में न्यायप्रिय राजा नहीं है बल्कि यहाँ सभी मुद्राप्रिय हैं। कभी दुनियाँ को धर्म की शिक्षा देने वाला भारत आज खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है। और इसके लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ-साथ खुद हमारे समाज हैं। जी हाँ, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है कि आज अन्याय व जुल्म के सताए व्यक्ति को उचित न्याय भी नहीं मिल पाता है। पुलिस से लेकर अदालत तक सभी मुद्राप्रिय हो गए हैं और यहाँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुद्रा के आधार पर न्याय होता है। ऐसे कई मामला देखे जाते हैं जहाँ न्यायलय में न्याय करने के लिए बैठे हमारे न्यायाधिश भी पैसे लेकर पैसे वाले के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। अपराध बढ़ाने में तो शायद सबसे बड़ा हाथ समाज से अपराध को मुक्त कराने के लिए बैठे हमारे पुलिसिया तंत्र का ही है। जहाँ यदि आप अपने ऊपर हुए किसी जुल्म व अन्याय के शिकायत करने जाएँ तो आपके साथ क्या जुल्म हुआ यह नहीं देखा जाता है बल्कि देखा जाता है कि आपके पास क्या पैसा है। इतना ही नहीं, अपराधी अपना लाभांश इन पुलिस को देकर ही अपने अपराध के व्यवसाय में दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं। ................. अपराधों को बढ़ाने में हमारा समाज भी पीछे नहीं है। भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं। .........................

इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय मैं भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है? .................... और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? ........ आयें अपने समाज व देश से अन्याय, भ्रष्टाचार व जुल्म को उखाड़ फेकने के लिए कदम आगे बढाकर राष्ट्रहित में कार्य करें।

धन्यवाद।

आपका

महेश कुमार वर्मा

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इन्हें भी पढ़ें :

महिलाओं को चुपचाप सबकुछ सहते रहना प्रताड़ना को बढावा देना है

अपराधी बनने का एक कारण यह भी

पंच : परमेश्वर या पापी

आज का संसार

कैसे करूं मैं नववर्ष का स्वागत

न्यायालय में भी नहीं है न्याय

भारतीय गणतंत्र के ५८ वर्ष

इंसान नहीं हैवान हैं हम

मेरे देश की कहानी

कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध

मुझे भी जन्म लेने दो

महापाप

स्वतंत्रता दिवस नहीं शोक दिवस

स्त्री शिक्षा में बाधा क्यों

बाल शिक्षा बनाम बाल मजदूरी

मुर्ख मनुष्य

बकरे की जुबान

Friday, December 5, 2008

शहीदों को श्रद्धांजलि

क्या फायदा हुआ तुम्हें

किसी का घर सुना करके

किसी के मांग का सिंदूर उतार के

किसी को अनाथ करके

किसी को यों ही तड़पा के

किसी को बेमौत मार के

क्या फायदा हुआ तुम्हें

सबों को दर्द देके

है तुम्हारे पास कोई जवाब

नहीं है

क्योंकि तुम ख़ुद बेदर्द हो

क्या जानोगे दुसरे के दर्द

पर याद रखना

परमात्मा के दरबार में

तुम्हें तुम्हारे हर कर्म का जवाब देना होगा

हर कर्म का जवाब देना होगा

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शहीदों को श्रद्धांजलि

-- महेश कुमार वर्मा

Thursday, September 25, 2008

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥


--महेश कुमार वर्मा

Sunday, September 14, 2008

सत्य धर्म से प्यार

किसे सुनाऊँ मैं अपनी हाल
हाल मेरा है बेहाल
मर जाऊँगा मिट जाऊँगा
नहीं मानूंगा मैं हार
झूठ को नहीं स्वीकारुँगा
सत्य को नहीं छोडूँगा
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार

Saturday, August 23, 2008

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

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गीता में भगवान श्री कृष्ण ने हमें हमेशा अपने कर्म करते रहने की ही शिक्षा दिए हैं। अतः श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व को हमें यों ही नहीं बिताना चाहिए बल्कि इस अवसर पर हमें अपने कर्म को करते हुए अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित होना चाहिए।

Saturday, July 26, 2008

महापाप

इसमें कोई दो राय नहीं कि कन्या भ्रूण हत्या बढ़ने का सर्वाधिक मुख्य कारण संतान के रूप में लड़की की चाह न होकर लड़का की चाह होना रहता है।



अतः जबतक समाज की मानसिकता को बदलकर नर व नारी एक सामान की भावना नहीं लाई जाएगी तबतक इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है। और इसके लिए समाज को ही सोचना पड़ेगा व आगे आना पड़ेगा।



फिर आख़िर संतान के रूप में लोग लड़की क्यों नहीं चाहते हैं? हमें इस पर भी सोचना चाहिए और इसमें जो कारण उचित हों उसे दूर करने का उपाय समाज को ही करना होगा। ऐसे ही कारणों में से एक कारण है : दहेज-समस्या।



हमारी समाज दहेज रूपी दानव को नष्ट करने का कोई पहल नहीं करती है, पर जन्म से पूर्व अपने ही संतान को नष्ट करने का पहल जरुर करती है। सोचिए आख़िर कितनी संकीर्ण व नीच विचारधारा की है हमारी समाज। ......... और यदि हमारी समाज इतनी नीच विचारधारा की है तो हमें समाज के इस विचारधारा का विरोध करने में संकोच नहीं करना चाहिए।


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फिर कन्या भ्रूण हत्या ही क्यों , नर या मादा किसी भी प्रकार की भ्रूण हत्या महापाप है। उस माँ-बाप के लिए अपने संतान के प्रति इससे बड़ा कुकर्म और क्या होगा, जिसने ख़ुद संतान के जन्म के लिए प्रयोजन किया व फिर जन्म से पहले ही अपने ही संतान को नष्ट कर दिया।


कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं किसी भी लिंग की भ्रूण हत्या महापाप है।


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कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

मुझे भी जन्म लेने दो

Tuesday, July 22, 2008

मुझे भी जन्म लेने दो

तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो


रचनाकार : महेश कुमार वर्मा
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Sunday, July 20, 2008

कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं........


यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। ........आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। ........... यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना या उससे घृणा करना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ................

--महेश कुमार वर्मा

दिनांक : २०।०७।२००८

स्थान : पटना

लेखक : MAHESH KUMAR VERMA

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भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध

जघन्य अपराध

Sunday, January 13, 2008

विचार : दूध का सेवन कहाँ तक उचित है

आज मिठाई का चलन खूब हो गया है, कोई विशेष समारोह हो तो वहाँ नास्ता में मिठाई , मेहमान को नास्ता कराना हो तो वहाँ मिठाई ........... इत्यादि कई प्रकार से मिठाई का उपभोग हो रहा है। ............ अधिकांश मिठाई के निर्माण में दूध का ही उपयोग किया जाता है। दूध का उपयोग मिठाई बनाने के अलावा भी कई कार्यों में होता है। चाय का उपयोग तो हरेक जगह धड़ल्ले से हो रहा है जिसमें दूध का ही प्रयोग किया जाता है। ........... कुल मिलाकर कहें तो आज दूध का उपयोग लोगों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। ........... पर सोचें कि यह दूध हम कहाँ से लाते हैं? ............ यह दूध हम किसी न किसी स्तनधारी जीव (भारत में मुख्यतः गाय व भैंस) से लेते है, जिसे वह अपने बच्चे के लिए पैदा करती है। हम एक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मानव होकर एक पशु के बच्चा को अपने माँ का दूध पीने से वंचित कर देते हैं और खुद उसका दूध हम पीते हैं। ........... जब हमें इन पशु से दूध प्राप्त करना होता है तो हम क्या करते हैं? ............... बच्चा को अलग बांध देते हैं फिर वह पशु जिसे दुहना रहता है उसका भी पैर बांध देते हैं और तब फिर हम दुहकर दूध प्राप्त करते हैं। और इस बीच बेचारा वह पशु का बच्चा दूध पीने के लिए छटपटाते रहता है। ..............हम बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी होकर कितना जुल्म करते हैं इन बच्चों पर जिसकी माँ ने उसे जन्म देने के बाद उसके आहार के लिए अपने थन / स्तन में दूध उत्पादित करती है उसे हम उस बच्चे को न देकर खुद पीते हैं। ............... क्या यह उचित है? ..............कभी नहीं, नैतिकता के दृष्टि से यह कभी भी उचित नहीं है कि हम सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मानव होकर एक पशु के बच्चे पर इस प्रकार का जुल्म करके उसका आहार को हम ग्रहण करें। ............. ख्याल रखें कि कोई भी स्तनधारी जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु वह अपने दूध का उत्पादन सिर्फ अपने शिशु / बच्चा के लिए ही करता है न कि अन्य के लिए और यह प्रकृति का नियम है। .............. इस प्रकार हमें सिर्फ अपने ही माँ का दूध पीने का अधिकार है जो हम अपने शैश्यावस्था में पी चुके होते हैं और इसके अलावा हमें अन्य किसी भी जीव का दूध पीने का कोई अधिकार नहीं है। और इस प्रकार हमें दूध या दूध से बने किसी भी पदार्थ का उपभोग नहीं करना चाहिए क्योंकि दूध हमारे लिए नहीं बल्कि उस बच्चे के लिए होता है जिसे हम भूखे रखकर जबरन उसके माँ के थन से दूध निकालते हैं।
हमें नवजात पशु पर व उसके जननी (माँ) पर जुल्म ढाना बंद करके किसी भी प्रकार से दूध का उपयोग बंद करना चाहिए।

Saturday, January 12, 2008

भारतीय गणतंत्र के ५८ वर्ष

कुछ ही दिनों बाद हम भारतीय गणतंत्र के ५८ वीं वर्षगांठ मनाने वाले हैं। ५८ वर्ष पूर्व २६ जनवरी १९५० को हमारा देश भारत गणतंत्र हुआ था जिसकी वर्षगांठ हरेक वर्ष २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप दिनों मनाया जाता है इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूरे भारत वर्ष में हजारों-लाखों रुपये खर्च किये जाते हैं। पर हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि गणतंत्र दिवस मनाने की सार्थकता कितनी सफल होती है। ............



वास्तविकता के जमीं पर आएं तो हम देखते हैं कि भले ही हमारा देश आज स्वतंत्र है पर आज इस देश के नागरिकों को वास्तविक रूप से न तो न्याय पाने का अधिकार है और न तो इन्हें अभिव्यक्ति की ही स्वतंत्रता है। यह कोरी बातें नहीं बल्कि वास्तविकता है। कानून में भले हमें इस प्रकार की स्वतंत्रता व अधिकार मिली है पर वास्तविकता आज यही है कि आम लोगों के लिए आज न्याय पाना उस सपने कि तरह है जो अंततः कोरी कल्पना ही साबित होती है। आज आम लोगों के साथ जुल्म ढाए जाते हैं और यदि वह न्याय की मांग करता है तो न्याय पाना तो दूर की बात उसके साथ और भी अन्याय व अत्याचार किया जाता। जो रक्षक के रूप में खड़ा रहते हैं वे भक्षक बन जाते हैं और जो पंच परमेश्वर के नाम पर रहते हैं वे पापी बन जाते हैं। .......

जरा सोचें कि जब हमारे देश में पीड़ित के साथ न्याय नहीं हो तो ऐसी स्थिति में गणतंत्र दिवस व स्वाधिनता दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? आज भले ही भारत स्वतंत्र है पर भारतवासी अन्याय का गुलाम है और जब तक आमलोगों को न्याय दिलाना सुनिश्चित नहीं हो जाती है तब तक स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस मनाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। .......


.............

न्यायालय में भी नहीं है न्याय


पंच : परमेश्वर या पापी


आज का संसार


यह दिल की आवाज़ है


कैसे करूं मैं नववर्ष का स्वागत

न्यायालय में भी नहीं है न्याय

......... नव वर्ष के स्वागत में हम अनेकों प्रकार से जश्न मानते हैं तथा एक-दूसरे को नव वर्ष का बधाई देते हैं। पर क्या सिर्फ बधाई भर दे देने मात्र से हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है? नव वर्ष के आगमन पर हम एक-दूसरे को बधाई व शुभ-कामना दें और फिर सालों भर अपने धर्म व कर्तव्य को भूल जाएँ, क्या यही मेरा कार्य होना चाहिए? ............

नव वर्ष के आगमन के साथ ही हम लग जाते हैं गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में। अगले माह हम फिर गणतंत्र दिवस मनाएंगे। हम गणतंत्र की ५७ वीं वर्षगांठ में फिर तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित करेंगे व हजारों रुपये खर्च करेंगे। पर क्या हमने कभी सोचा है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रात्मक राज्य भारत में हम गणतंत्र दिवस पर हजारों-लाखों रुपये खर्च कर देते हैं पर भारत को गणतंत्र हुए आज ५७ वर्ष हो जाने पर भी आज भारत के जनता को न्याय नहीं मिल पाती है। न्याय मिलना तो दूर की बात, कभी-कभी तो लोगों को न्याय की मांग तक करने का अधिकार का हनन होता है। कभी-कभी तो अदालत द्वारा भी सही फैसला नहीं सुनाया जाता है और दोषी सजा-मुक्त हो जाता है तथा निर्दोष को सजा भुगतना पड़ता है। कुछ ही दिनों पहले की घटना में एक ऐसा ही उदाहरण मिलता है 'जेसिका लाल हत्याकांड' के मामला में; जिसमें हाईकोर्ट द्वारा जो फैसला सुनाया गया वह निचली अदालत के फैसले से पूर्णतः विपरीत था। जहाँ निचली अदालत ने 'मनु' को निर्दोष बताकर बरी कर दिया था वहीं उच्च न्यायालय ने 'मनु' को दोषी व हत्यारा बताकर उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। ............. सोचें कि यदि निचली अदालत के फैसले व जांच पर रहा जाता तो क्या दोषी को सजा मिल पाती? सोचें कि आख़िर निचली अदालत द्वारा सच्चाई तक क्यों नहीं पहुँचा गया? ................ ऐसा एक नहीं कई मामला रहता है जिसमें अदालत द्वारा गलत फैसला सुनाया जाता है और दोषी आजाद रहता है व निर्दोष सजा भुगतता है। ............ सोचें कि आखिर किस मुँह से हम यह कहकर अपने को गौरवांवित महसूस करते हैं कि हम भारतीय गणतंत्र की ५७ वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। -- सिर्फ दिखावा के लिए गणतंत्र दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है। हमें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि हरेक व्यक्ति को न्याय मिले। ............. सिर्फ यह कहने मात्र से नहीं होगा कि सभी को न्याय पाने का अधिकार है बल्कि सबों के साथ न्याय करना भी होगा। - वास्तव में कितने लोगों को आज न्याय पाना तो दूर की बात उन्हें न्याय मांगने का भी अधिकार नहीं है और यदि वह न्याय की मांग किया तो उसके साथ और भी ज्यादा अन्याय होने लगता है। ......... और उसके साथ अन्याय जब चरम सीमा पर पहुंच जाती है, उसके साथ मानसिक प्रताड़ना इतनी आधिक हो जाती है कि ऐसी स्थिति में कभी-कभी पीड़ित विवश होकर हथियार को लेता को या फिर ऐसी ही स्थिति में कभी-कभी पीड़ित या तो आत्महत्या कर लेता है या या फिर अपराधी बन जाता या फिर मानसिक प्रताड़ना से जूझकर पागल हो जाता है। ..........

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(यह महेश कुमार वर्मा द्वारा २४.१२.२००६ को लिखे एक पत्र से लिया गया है।)

Wednesday, December 26, 2007

कैसे करूं मैं नववर्ष का स्वागत

दिन बीते माह बीते वर्ष बीत गए
कितने आए कितने गए उम्र बीत गए
कहना न होगा हम चाँद सितारों पर पहुँच गए
पर धर्म के राह पर हम अभी तक न आए
नहीं मिलती है अदालत में न्याय
व्याप्त है चारों ओर अन्याय ही अन्याय
जब करो न्याय की बात
तो होगी अन्याय से मुलाकात
लाए हो सौगात तो होगी तुम्हारी बात
नहीं तो खाने पड़ सकते हैं दो-चार लात
बहुत बड़ी है उनकी औकात
भेज सकते हैं निर्दोष को भी हवालात
लौट जाना पड़ता है मुँह लटकाकर
क्योंकि रक्षक बना है भक्षक हथियार उठाकर
पता नहीं कब होगी धर्म की स्थापना
न जाने कैसा होगा आने वाला जमाना
नहीं है कहीं न्याय की सुगबुगाहट
चारों ओर है अन्याय का ही आहट
कैसे करूँ मैं नववर्ष का स्वागत
कैसे करूँ मैं नववर्ष का स्वागत

Wednesday, November 28, 2007

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

पिछले दिनों दिल की आवाज़ पर मांसाहार से संबंधित मेरा दो विचार (i) मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन व (ii) मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित प्रकाशित किए गए। इन ब्लाग्स पर पाठकों द्वारा प्राप्त प्रतिक्रिया में मेरे विचार के पक्ष में व विपक्ष में दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं थी। जिसमें पाठकों द्वारा कुछ प्रश्न भी उठाए गए। प्रस्तुत आलेख पाठकों द्वारा उठाए गए प्रश्नों के जवाब के रूप में प्रस्तुत है।
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कितने लोग मांसाहार के पक्ष में यह तर्क देते हैं की शाकाहार भोजन में हम जब पेड़-पौधे रूपी जीव की हत्या कर सकते हैं तो फिर मांसाहार भोजन से परहेज क्यों? इस तर्क के जवाब में मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि शाकाहार भोजन में वनस्पति को कष्ट होता है यह बात सही है पर मांसाहार भोजन में जंतु की हत्या होती है। और आपको यह समझना चाहिए कि जो भी पेड़-पौधे होते हैं वह फल अपने लिए नहीं उपजाते हैं बल्कि वह फल मनुष्य व अन्य पशु के भोजन के लिए ही होता है। पर कोई भी जंतु अपनी संतान का उत्पादन मनुष्य के भोजन के लिए नहीं करता है। जिस प्रकार आपको अपने संतान या अपने प्राणों से प्रेम रहता है उसी प्रकार उस जंतु को भी अपने प्राणों व अपनी संतान से प्रेम रहता है जिसे मारकर हम खाते हैं। जहाँ तक रही फल की बात तो पेड़ तो फल का उत्पादन मनुष्य व अन्य पशु के लिए ही करता है। आप फल को आसानी से तोड़कर खा सकते हैं, पेड़ कोई आपत्ति नहीं करेगा। यदि आप उस फल को न तोडें तो कुछ दिनों के बाद पेड़ खुद उस फल को छोड़ देता है क्योंकि पेड़ ने फल अपने लिए उत्पादित नहीं किए थे।
मांसाहार के पक्ष में कितने लोगों का तर्क रहता है कि यह प्रकृति का नियम है कि एक जीव दूसरे जीव का भोजन करते हैं, यदि मांसाहार भोजन बंद कर दिया जाए तो उस शाकाहारी जीव , जिनका मांस खाया जाया जाता है, की संख्या काफी बढ़ जाएगी और वे हमारी फसल नष्ट कर देंगे। इस तर्क के संदर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि विवेकशील मनुष्य के द्वारा यह तर्क देना शोभा नहीं देता है। उन्हें यह जानना चाहिए कि प्रकृति के द्वारा नियम में जो आहार-श्रृंखला है उसमें यह कहीं नहीं है कि मनुष्य वनस्पति के अलावे दूसरे जीव को खाएगा। हाँ, अन्य जंगली जीवों के साथ ऐसा है कि मांसाहारी जीव शाकाहारी जीव को खाते हैं, पर मनुष्य के साथ प्रकृति का यह नियम नहीं है। रही यह बात कि यदि हम मांसाहार भोजन न करें तो शाकाहारी जीवों कि संख्या बढ़ जाएगी और वी हमारी फसल नष्ट कर देंगे तो इस संदर्भ में बुद्धिमान मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह शाकाहारी जीव जिनका हम भोजन करते हैं वे पहले वास्तव में जंगल में ही रहते थे पर हम मनुष्य ही उसे जंगल से हटाकर अपने साथ बस्ती में ले आए। ........... फिर हम उन्हें पालकर उनकी संख्या वृद्धि में तो खुद हम ही सहायक बन रहे हैं तब फिर यह कहना किसी भी अर्थ में उचित नहीं है कि यदि नहीं खाएंगे तो उनकी संख्या बढ़ जाएगी। ...........
मनुष्य सर्वाधिक श्रेष्ठ व सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी है और इस कारण मनुष्य को अन्य जीवो का भक्षक बनना मनुष्य जाति के लिए शर्म व कलंक की बात है।

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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Sunday, November 18, 2007

पंच : परमेश्वर या पापी

सुना था पंचायत में पंच आते हैं
जो ईमानदार व निष्पक्ष होते हैं
वह धर्मानुकुल उचित निर्णय सुनाते हैं
इसी लिए पंच को परमेश्वर कहते हैं
पर जब मैं देखा कि
आए हुए पंच ईमानदार नहीं पक्षपाती है
वह दूसरे पक्ष को सुनने वाला नहीं
बल्कि एकतरफा दोषी का साथ देने वाला है
वह निष्पक्ष फैसला करने वाला नहीं
बल्कि निर्दोष पर ही जानलेवा हमला करने वाला है
तो मुझे सोचना पड़ा कि
यह पंच परमेश्वर नहीं बल्कि पंच पापी है

Saturday, November 17, 2007

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

मनुष्य जाति के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और कुछ नहीं होगी कि यह बेकसूर जीवों को मारकर फिर उसे खाकर अपना पेट भरता है। धिक्कार है ऐसी मनुष्य जाति को जो अपने को सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील कहता है। उस समय कहाँ जाती है उसकी बुद्धिमत्ता व विवेकशीलता जब वह बेकसूर जीवों को मारकर उसे खाता है? क्या यही उसकी बुद्धिमत्ता है कि निरपराध जीवों को मारकर अपनी पेट भरे? क्या यही उसकी बुद्धिमत्ता है कि अपने से कमजोर जीव को मारकर अपना पेट भरे?..................
किसी भी सूरत में मांसाहार भोजन उचित नहीं है। जिस प्रकार हमें अपने प्राणों से प्रेम रहता है उसी प्रकार हमें उन जीवों के लिए भी सोचना चाहिए जिन्हें मारकर हम खाते है। ..........

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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

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Friday, October 19, 2007

मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

कई स्थानों पर लोग विजया दशमी के दिन मांसाहार भोजन करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? एक ओर हम पूरे धूम-धाम से दुर्गा-पूजा का पर्व मनाते हैं, जिसमें हम अनेक देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं और फिर दूसरी और इस पर्व के समाप्ति के दिन हम मांसाहार भोजन करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? क्या दुर्गा पूजा व दशहरा पर्व का उद्देश्य मांसाहार भोजन है जो हम अपने इस पर्व की समाप्ति मांसाहार भोजन से करते हैं? कभी नहीं, इस पर्व का ऐसा उद्देश्य कभी नहीं है। यह पर्व हमें अन्याय से लड़ने की सिख देती है,...........तो फिर हम बेकसूर जीवों को मारकर फिर उसका भोजन करके खुद अन्याय क्यों करते हैं? ख्याल रखें की यह पर्व अन्याय से लड़ने के लिए है न कि अन्याय करने के लिए। .........


आज हम बहुत ही गर्व के साथ कहते हैं कि मनुष्य इस पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी है। पर जरा सोचें कि एक बेकसूर जीवों को मरना व कष्ट देना क्या यही हमारी बुद्धिमत्ता है? ........ जरा सोचें कि हम अपने प्राणों से या अपने बच्चों से कितना प्यार करते हैं, क्या इसी प्रकार हमें दूसरे जीवों के लिए नहीं सोचना चाहिए? जिन जीवों को हम मारकर भोजन करते हैं उनमें भी उसी प्रकार आत्मा है जैसे मुझमें व आपमें है तथा उसे भी उसी प्रकार कष्ट होता है जैसे मुझे व आपको होता है। सोचें को आपको जब थोडा कष्ट होता है तो आपको कैसा लगता है ...........? उसी प्रकार सब जीवों को कष्ट होता है? ........ सोचें कि यदि आप बेकसूर हों और आपको कोई कष्ट देगा तो आपको कैसा लगेगा? ........ उसी प्रकार उस जीव के लिए भी सोचें जिसे मारकर हम खाते हैं? ............ इस पृथ्वी पर के सबसे अधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मनुष्य के लिए यह शर्म की बात है कि वह सिर्फ अपने पेट व जिह्वा स्वाद के लिए बेकसूर जीवों को मारकर उसका मांस का भोजन करे। .......... ऐसी स्थिति में मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी कहना 'बुद्धिमत्ता' व 'विवेकशीलता' शब्द का अपमान करना है। और ऐसी स्थिति में मनुष्य को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी न कहकर मनुष्य को पशु से भी बदतर कहना अनुचित नहीं होगा। (क्यों?)

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मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

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