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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

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Wednesday, December 30, 2009

नववर्ष का विचार : हमें सुधरना होगा

नव वर्ष पर सबों को हार्दिक शुभकामनाएं।

हरेक वर्ष हम नववर्ष पर एक-दुसरे को शुभकामनाएं देते है। पर कभी हमने सोचा है कि सिर्फ शुभकामनाएं भर दे देने से क्या हमारा समाज व देश उन्नति कर सकेगा। कभी नहीं, हमें अपने समाज से बुराई को हटाना होगा। जब तक हम समाज में व्याप्त बुराई को हटाने में कोई सहयोग नहीं करते हैं तो सिर्फ शुभकामनाएं देने से कुछ नहीं होगा। कितने लोग सोचते व कहते हैं कि एक हमारे चाहने से क्या होगा .......... पूरा दुनियाँ ऐसी हैं तो क्या एक सिर्फ हमारे सुधरने से दुनियाँ सुधर जायेगी ............ इस तरह से लोग कई बात कहते हैं। पर हमें सोचना व समझना चाहिए कि हम और आप जैसे व्यक्तियों से ही यह समाज बना है। तब फिर हमारे व आपके सुधरने से यह समाज क्यों न सुधरेगा? याद रखें हमारे-आपके सहयोग से ही इस देश की उन्नति संभव है। और हमारे-आपके सहयोग से ही देश से अपराध व भ्रष्टाचार समाप्त हो सकती है। अन्यथा देश की अपराध व भ्रष्टाचार हमें ही कुचल देगी।

अतः हम सबों से यह आह्वान करना चाहता हूँ कि अपने में सुधार लाते हुए समाज को सुधारने में अपना योगदान दें। यही हमारी नववर्ष की खुशी होगी।

हम बदलेंगे युग बदलेगा।
हम सुधरेंगे युग सुधरेगा॥

धन्यवाद।


आपका
महेश कुमार वर्मा

Tuesday, December 15, 2009

बारात का मतलब

मैंने अपने पिछले पोस्ट में बताया कि किस प्रकार हमारे समाज में जबरन लड़कियों की शादी करायी जाती है? फिर यदि शादी के रश्म को किसी भी तरह पूरा करने को ही शादी मानें तो होने वाले शादियों के गवाह या साक्ष्य कितने बन पाते हैं? हिन्दू परिवार से जुड़े रहने के कारण हिन्दू परिवार के कुछ शादियों को देखने का अवसर मुझे मिला है, अतः आएं इन शादियों पर कुछ विचार करें।

लोग कहते हैं कि बारात जाने का मतलब होता है कि वे बारात उस शादी के गवाह व साक्ष्य बनते हैं। पर मैं देखता हूँ कि गए बारात की उपस्थिति में तो शादी होती ही नहीं हैं तो उस बाराती को प्रत्यक्षदर्शी साक्षी या गवाह कैसे माना जाए? सामान्यतः देखा जाता हैं कि बारात लड़के वाले के यहाँ से लड़की वाले के यहाँ जाती है। और लड़की वाले के घर में ही शादी का कार्यक्रम होता है। पर उस शादी के कार्यक्रम में बाराती नहीं जाते हैं बल्कि शादी कुछ लड़के वाले व कुछ लड़की वाले के ही उपस्थिति में सम्पन्न होता है। कहीं-कहीं तो शादी के अंतिम मुख्य रश्म सिन्दुरदान के समय सामने पर्दा दे दिया जाता है और उपस्थित लोगों को भी शादी के इस मुख्य रश्म के दर्शक व साक्षी बनने से रोका जाता है। तो जब बाराती उस शादी के समय उपस्थित रहता ही नहीं है तो फिर उस बाराती को प्रत्यक्षदर्शी / साक्षी / गवाह कैसे कहा जा सकता है। तो इस प्रकार सामान्य तौर पर बाराती को प्रत्यक्षदर्शी नहीं कहा जा सकता है। और इस प्रकार 'बारात के जाने का मतलब गवाह बनना' यह कहना सही नहीं है।
पाठकों पर ही मैं इस प्रश्न को छोड़ रहा हूँ कि बारात का मतलब सिर्फ मनोरंजन ही है या और कुछ?

Monday, December 14, 2009

जहाँ जबरन शादी होती है

मित्रों, आज हम आपको उस स्थान के बारे में बताने जा रहा हूँ जहाँ जबरन शादी होती है। चौकिये नहीं, यह कोई कोरी-काल्पनिक बात नहीं बल्कि वास्तविकता है। आगे पढ़ें (Click Here)

Sunday, December 13, 2009

जागो बहना जागो

हर परिवार, हर जाति, हर समाज में शादी बड़ी धूमधाम से होती है। शादी को लोग मांगलिक व शुभ मानते हैं। दुल्हन अपने बाबुल के घर को छोड़कर पिया संग ससुराल जाती है और फिर वही ससुराल ही उसका घर-परिवार हो जाता है। दुल्हन का एक नया जीवन शुरू होता है। ससुराल में दुल्हन को अपने बाबुल के घर से भिन्न परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। अपने नए जीवन के विषम परिस्थिति में दुल्हन को अपने को ढालना पड़ता है। उसी प्रकार दूल्हा को भी अपने जीवनसाथी के साथ सामंजस्य स्थापित कर रहना पड़ता है ताकि दोनों की जीवन रूपी नैया सही ढंग से चल सके।
हर माँ-बाप अपने संतान के लिए चाहते है कि उसका जीवन सही ढंग से बीते। कन्या के व्यस्क होते ही माँ-बाप उसके लिए योग्य वर के तलाश में लग जाते हैं। पर दहेज समस्या व गरीबी के कारण कितने माँ-बाप कम उम्र में ही अपनी बेटी की व्याह रचा देते हैं तो कितने योग्य वर न ढूंढ़ पाते हैं और किसी तरह बेटी का व्याह रचाकर छुट्टी कर लेते हैं। हरेक लड़का-लड़की को अपने जीवन-साथी के संदर्भ में मन में एक सपना / एक ईच्छा / एक ख्वाहिश रहती है या उसके होने वाले दूल्हा या दुल्हन कैसी है यह जानने की इच्छा होती है। पर हमारे समाज में बेटी के व्याह में बेटी से उसके शादी के बारे में कोई राय नहीं ली जाती हैं। यहाँ तक कि उसके भावी वर के बारे में भी उसे जानकारी नहीं दी जाती है। बेटी संकीर्ण मानसिकता के समाज में इस प्रकार से दबी व फँसी रहती है कि वह अपने शादी के बारे में अपना विचार किसी से कह भी नहीं सकती है। जिस लड़का से उसकी शादी ठीक की जा रही है उसके बारे में वह किसी से पूछ भी नहीं सकती है और यदि उसे उस लड़का के बारे में कोई ऐसी बात मालूम भी होती है जिस कारण वह उसके साथ शादी न करना चाहे तो यह बात भी वह किसी को बता नहीं सकती है और यदि वह अपने ही शादी में अपनी ओर से कुछ कही तो उसपर तमाम इल्जाम लगने में भी देर न होती है। तो इस प्रकार अपने ही शादी में लड़की अपने इच्छानुसार कुछ भी नहीं कर सकती है। शादी में न तो लड़की के इच्छा को स्थान दिया जाता है, न तो उससे कुछ पूछा ही जाता है, न तो उसका कुछ सुना ही जाता है। और इस प्रकार बुद्धि-विवेक रहते हुए भी वह लड़की कठपुतली के समान रहती है और जबरन उसकी शादी किसी लड़के से करा दी जाती है चाहे वह उस लड़की को पसंद हो या न हो। लड़की को वह लड़का पसंद नहीं है या लड़की से कोई विचार नहीं लिया जाए और उसकी शादी करायी जाती है तो यह शादी जबरन नहीं तो और क्या है?
इस प्रकार लड़कियों के जबरन शादी हमारे समाज में लगभग सभी घरों में हो रहे हैं। पर सोचें कि क्या यह जबरन शादी उचित है? एक समय हमारे देश में स्वयंवर की प्रथा थी, जहाँ कन्या को भी ख़ुद अपना वर चुनने का अधिकार था। पर आज वहीं उस
की कुछ नहीं सुनी जाती है और जबरन उसकी शादी करा दी जाती है।

हमारे समाज में इस तरह के कार्य हमारी पतितता को ही दर्शाता है। हमें अपने समाज के इस कृत्य पर शर्मिंदगी होनी चाहिए। मैं अपने देश के तमाम बहनों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे महिला प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाएं।
देश के बहना तुम जागो
तुम मानव हो
तुममे बुद्धि-विवेक है
तुम्हारी चुप्पी ही तुम्हें दबाती है
अतः अपने बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करो
अन्याय के विरुद्ध लड़ो
समाज से महिला प्रताड़ना को उखाड़ फेंको
व महिलाओं को शीर्ष स्थान पर स्थापित करो
जागो बहना जागो
जागो बहना जागो

Sunday, November 22, 2009

भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान

जिस देश में भ्रष्टाचार होती है, उस देश के हम वासी हैं
दिस देश में न्याय का होता हलाल, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ बोलने का नहीं है अधिकार, उस देश के हम वासी हैं
जहाँ स्वतंत्र रहते हुए भी हैं गुलाम, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ धर्म से बड़ा पैसा है, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ पैसे से बिकती है सरकार, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ पैसे के सामने न्यायालय भी होता अंधा, उस देश के हम वासी हैं।
भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान
नहीं है कहीं धर्म का नामों-निशान
उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ हर रोज अपराध होती है, उस देश के हम वासी हैं।
मेरा देश भले हो बेईमान, पर फिर भी है यह महान
होकर बेईमान है जो महान, उस देश के हम वासी हैं।

Sunday, October 18, 2009

हमें मनुष्य बनना होगा

दिवाली का पर्व बीत गया और अब महापर्व छठ निकट गया है। आपको याद होगा पिछले वर्ष छठ पर्व के उपरांत पशुओं ने कवि के रचना के माध्यम से मनुष्य को मुर्ख की संज्ञा देता हुए शाप दिया था कि इनका व्रत निष्फल जाएगा। क्या हम मनुष्य पशुओं के शाप से मुक्त होंगे?

हम मनुष्य को सबसे बुद्धिमान विवेकशील प्राणी कहते हैं पर वास्तव में इनका जीवन आज पशु से भी बदतर है, तभी तो ये पशुओं का दुःख-दर्द नहीं समझते हैं उन्हें मारकर अपना पेट भरते हैंकिसी भी दृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति ने मनुष्य को मांसाहारी जीव के रूप में नहीं बनाया है पर मनुष्य प्रकृति के नियम को तोड़कर मांसाहार करता हैउस समय मनुष्य अपनी सारी बुद्धि खो देता है और पशु से भी बदतर बन जाता
है।

अतः कवि हमें जोर डालते हुए मनुष्य बनने के लिए कहता है :

हमें मनुष्य बनना होगा
पशुओं का दर्द समझना होगा
प्रकृति के साथ चलना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा

बन सके नारायण तो
नर का कर्तव्य निभाना होगा
अंदर के बुराई को हटाना होगा
अच्छाई को लाना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा


-- महेश कुमार वर्मा

--

Saturday, October 17, 2009

दीपावली की शुभकामनाएं

दीपावली की शुभकामनाएं

अंतर में ज्ञान का दीप जलाकर सत्य के प्रकाश में ईमानदारिता के राह पर चलें।

Friday, October 9, 2009

दीपावली का संकल्प

दुर्गा पूजा व दशहरा बीत गया। ईद भी बीत गया और अब आ गया बुराई पर अच्छाई के विजय व अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक पर्व दीपावली। दीपावली का पर्व हमें अंधकार से प्रकाश में जाने की प्रेरणा देता है। इस पर्व के अवसर पर कई दिन पहले से ही लोग अपने घरों की साफ-सफाई में लग जाते है।
कार्त्तिक मास के
अमावस को मनाया जाने वाला इस पर्व को अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक माना जाता है। इस दिन शाम में लोग लक्ष्मी-गणेश का पूजन कर अपने घरों में दीप जलाते हैं। लोग घरों को दीपक से सजाते हैं और दीपक के रोशनी से ही अमावस की वह काली रात उजियाला में बदल जाता है। वैसे अब दीपक का स्थान मोमबत्ती व विद्युत-बल्ब भी ले लिया है। पर इस दिन लोग अपने घरों को दीप, मोमबत्ती, इत्यादि से प्रकाशवान बनाते हैं व खुशियाँ मनाते हैं। इस दिन धन की देवी लक्ष्मी की पूजा होती है अतः व्यापारी वर्ग में व दुकानों में इस पर्व का विशेष महत्त्व है व उस दिन लोग माँ लक्ष्मीं की पूजा कर धन-धान्य की कामना करते हैं।
पर्व में खुशियाँ मनाना व पर्व के आधार पर अच्छे राह पर चलना तो ठीक है पर लोग कुछ लापरवाही व कुछ अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से भी नहीं चुकते हैं। आप खुद देखिए, अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक पर्व दीपावली के लिए लोग महीनों पहले से अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं पर दीपावली के दिन क्या करते हैं। उस दिन लोग बम-पटाखे व आतिशबाजी से ध्वनि व वायु प्रदूषित कर हमारे पर्यावरण व वातावरण को ही नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि खुद के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाते हैं। ......... अंधकार से प्रकाश में जाना तो ठीक है, साफ-सफाई भी ठीक है पर वातावरण प्रदूषित कर खुद की स्वास्थ्य खराब करना कहाँ तक उचित है? जरा सोचें, दीपावली अंधकार से प्रकाश में जाने का पर्व है न की स्वच्छ वातावरण को प्रदूषित करने का। .....................
दूसरी ओर कितने लोगों की यह संकीर्ण मानसिकता रहती है की इस दिन रात में जुआ / सट्टा / पचीसी खेला जाता है / खेलना चाहिए और अपने इसी संकीर्ण मानसिकता के कारण कितने लोग उस रात जुआ खेलते हैं / पैसे सट्टा में लगाते हैं व हजारों रुपये बर्बाद करते हैं। पर सोचें, क्या हुआ जुआ खेलकर ...... एक ओर धन की देवी लक्ष्मी की पूजा व दूसरी ओर जुआ / सट्टा में हार कर धन बर्बाद करना ................ क्यों, ऐसा क्यों? ................... वास्तव में जुआ खेलना धन कमाने का उचित तरीका है ही नहीं। ..................

दीपावली अंधकार से प्रकाश में जाने का पर्व है और इस दिन अपने में बुराई रूपी अंधकार को हटाकर अच्छाई रूपी प्रकाश को लाना चाहिएतो क्यों इस दिवाली में हम बुरे मार्ग से हटकर अच्छे मार्ग पर चलने का संकल्प लें


Monday, September 28, 2009

पहले राम बनो

आज विजया दशमी का पर्व है। इसी दिन लोग दशहरा पर्व का समापन भी करते हैं। कहा जाता है कि दस सिरों वाला रावण इसी दिन हारा था यानि भगवान राम के हाथों मारा गया था। और इसी के यादगार में लोग इस दिन रावण का पुतला जलाते हैं और खुशियाँ मानते हैं। पर लोग यह भूल जाते हैं कि रावण बहुत ही बड़ा विद्वान था। रावण के मरते वक्त खुद भगवान राम ने भी विद्वान रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने गए थे। क्या राम रावण के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए जाकर गलती किए? क्या भगवान राम के इस कार्य से हमें सिख नहीं लेनी चाहिए? .......... निःसंदेह हमें भगवान राम के इस कार्य से सिख लेनी चाहिए। आखिर भगवान राम के इस कार्य से हमें क्या सिख मिलती है? इस घटना से हमें यही सिख मिलती है कि शत्रु के भी अच्छे गुणों को ग्रहण करें. रावण बहुत ही बड़ा विद्वान व पंडित था। भले ही किसी एक घटना के कारण वह भगवान राम के हाथों मारा गया। पर उसकी विद्वता को इंकार नहीं किया जा सकता है। और इसी कारण ही भगवान राम भी उनके पास शिक्षा ग्रहण करने गए। हमें किसी के जीवन से उसके बुराई को छोड़कर अच्छाई को ग्रहण करना चाहिए। अतः हमें भी विजया दशमी का यह पर्व भी इसी लक्ष्य को रखकर मनाना चाहिए। पर हम करते क्या हैं। सिर्फ रावण का पुतला जलाने का ही रश्म मानते हैं। और कोई अच्छाई को ग्रहण करने का कार्य नहीं करते है। विजया दशमी के दिन बेवजह के बेकसूर जीव को मारकर उसके मांस खाकर अपना पेट भरते हैं। क्या भगवान राम ने ऐसा किया था? नहीं न? तब हम ऐसा क्यों करते है? और यदि सिर्फ रावण के पुतला को जलाकर ही विजया दशमी का पर्व मनाना है तो जरा सोचें कि रावण को तो राम ने मारा था पर यहाँ राम है कहाँ जो रावण को मारेगा? जब आप राम के तरह नहीं हैं तो आपको रावण का पुतला जलाकर रावण की निंदा कर विजया दशमी का पर्व मानाने का अधिकार कैसे हैं?

विजया दशमी का पर्व मनाओ पर पहले राम बनो तब रावण को मारना।

Saturday, September 19, 2009

करें मानवता को महान

नमस्कार

आज से शारदीय नवरात्र आरंभ हो गया हैऔर इसके साथ ही दशहरा दुर्गा पूजा का पर्व का भी शुभारंभ होगयाइस खुशी के माहौल में और भी खुशी गयी कि दो दिनों के बाद आपसी प्रेम भाईचारा का पवित्र पर्व ईदहैइन खुशी पवित्र पर्व के अवसर पर आम जनों से मेरा आग्रह है कि इन पर्वों को खुशी पवित्रता के साथ ही मनाएं तथा इन पर्वों में बुराई को आने दें


पर्व है प्रेम भाईचारा का
रखें इसे पवित्र अल्लाह के नाम
पर्व है अन्याय पर न्याय के विजय का
रखें इसे स्वच्छ भगवान के नाम
गर तुम करोगे मांसाहार
तो पर्व हो जाएगा दूषित
हम हो जायेंगे बदनाम
अतः रोको इन कुप्रथाओं को मानवता के नाम
मत करो हिंसा अल्लाह भगवान के नाम
पर्व है पवित्र रखो इसे पवित्र
मत करो इसे दूषित
पर्व है पवित्र
प्रेम भाईचारा का पर्व है बड़ा महान
अन्याय पर न्याय की विजय से होती है
मानवता की पहचान
हम हैं मानव
करें मानवता को महान
करें मानवता को महान

-----------

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना

प्रेम है बहुत महान

मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है?

मुर्ख मनुष्य

बकरे की जुबान


Tuesday, September 15, 2009

क्यों खफा हो मुझसे

क्यों खफा हो मुझसे यह तो बता
क्यों चुप हो यह तो बता
तुम्हारी चुप्पी मेरे दिल में यों चुभती है
जिसका वर्णन मैं कर सकता नहीं
फिर भी इस आश के साथ जिन्दा हूँ
कि तुम्हारी चुप्पी टूटेगी और
एक दिन तुम मेरे साथ दोगे
मेरे साथ दोगे व मेरे दर्द सुनोगे
मेरे दर्द सुनोगे व उसे दूर करोगे
मेरे चाह को पूरा करोगे
व मेरे दर्द को दूर करोगे
और यदि तुम ऐसा नहीं करोगे
तो फिर तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
तुमसे मेरी दोस्ती किस काम की
जब मेरे दुःख में साथ ही न दो
पर फिर भी इसी आश के साथ हूँ
कि तुम मेरा साथ दोगे
व मेरी सहायता करोगे


--
महेश कुमार वर्मा
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E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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Friday, August 14, 2009

स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प

कल १५ अगस्त, २००९ को राष्ट्र स्वतंत्रता की ६२वीं वर्षगाँठ मना रहा हैलोग इस अवसर को मनाने के लिएतरह-तरह की तैयारियाँ किए हैंमैं जानना चाहता हूँ कि आज हम अपने को कैसे स्वतंत्र कहें? क्यों? आप खुद देखें सोचें कि क्या आज हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? आज हमें किस चीज की स्वतंत्रता मिली है, इसपर सोचेंआज हमें तो न्याय पाने का अधिकार है तो आज हमें अन्याय के विरुद्ध बोलने का अधिकार हैइतना ही नहीं हमारी कितनी ही अधिकारों का आज हनन हो गया हैबच्चे पढने खेलने के लिए भी स्वतंत्र नहीं हैं और उन्हें काम पर लगा दिया जाता हैऔर जब उन्हें काम पर लगाया जाता है तो भी फिर उन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती हैतब फिर हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं? आज हम देखते है कि किसी के साथ जब अन्याय होता है तो वह अपनी शिकायत भी नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी शिकायत सुनने फिर उसपर कारवाई होने तक उसे इतना परेशान होना पड़ता है कि उसे न्याय कोसों दूर दिखाई पड़ती हैयदि वह उस पर लगा भी रहा तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसे न्याय मिल ही जाएगातब फिर ऐसी स्थिति में हम कैसे अपने को अपने देश को स्वतंत्र कहें?
हाँ, यहाँ अपराधी स्वतंत्र जरुर हो रहे हैं और अब वे बेहिचक अपराध को अंजाम दे रहे हैं और फिर उसके विरुद्ध कार्रवाई में कमी हुई हैयह कोरी बात नहीं बल्कि वास्तविकता है
तब फिर हम स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाएँ? आखिर किस मुँह से हम अपने अपने देश को स्वतंत्र कहें? क्या हम हमारे देश अपराध को नियंत्रित करने के लिए नहीं बल्कि अपराध को बढ़ाने के लिए हैंनहीं, हमें हमारे देश को ऐसा नहीं बनना हैआएँ इस स्वतंत्रता दिवस में अपने देश को अपराध मुक्त बनाने में एक-दुसरे का सहयोग करने का संकल्प लें


-- महेश कुमार वर्मा
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स्वतंत्रता दिवस पर अन्य रचनाएँ

Sunday, July 19, 2009

तीन भिखारी

तीन भिखारी

 

हाथ में कटोरा लिए

आधा कपड़ा फटे हुए

आधा तन उघड़े हुए

एक हाथ में लाठी लिए

झुकी कमर से चल रहे

लोगों से हैं कह रहे

दे दो बाबू दे दो

इस बुढ़े को दे दो

तू एक पैसे देगा

वो दस लाख देगा

दे दो बाबू दे दो

दे दो बाबू दे दो

उसे देख कई चलने वाले

सिक्‍के डाल देते कटोरी में उसके

कोई अपने आप से कहता

यही है इन लोगों का धंधा

तो कोई नजर छुपाकर बढ़ जाते

व सुरक्षित रखते अपने पैसे

सुरक्षित रखते अपने पैसे

सड़क पर के भिखारी ये

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

 

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

वही पुराना ऑफिस

जहॉं मैं वर्षों कार्य किया

वही पुराना ऑफिस

जहॉं से मैं रिटायर हुआ

मेरे रिटायर होने पर

किया था विदाई समारोह सहकर्मियों ने

दिया था कुछ उपहार मेरे सह‍कर्मियों ने

वही पुराना ऑफिस

वही पुराना ऑफिस जब मैं पहुँचा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

बड़ा बाबू ऐनक पहने

मोटे फाईल में व्‍यस्‍त थे

मुझे देख ऐनक उतार

मुझको वे समझाने लगे

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

कहा उसने

नहीं दोगे तो होगा नहीं काम तुम्‍हारा

अब नहीं है यहॉं ईमानदारी तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

अब तुम्‍हारा नहीं है यहॉं कोई सम्‍मान

दे दो वरना कर दुँगा तुम्‍हें बदनाम

फिर नहीं होगा तुम्‍हारा काम

फिर नहीं होगा तुम्‍हार काम

 

मैं वापस आ गया

मैं वापस आ गया

सोचने लगा

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

यह सोचने पर मैं विवश था

यह सोचने पर मैं विवश था

कि यह तो

उस सड़क किनारे के

भिखारी से भी बदतर निकला

जिसने मेरे पैसे को भी

अपना ही समझा

जिसने मेरे पैसे को भी अपनो ही समझा

 

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

गया मैं थाना पुलिस के पास

होती दारोगा बाबू से मुलाकात

जो सामने ऑफिस में ही थे

कलम लिए कुछ लिख रहे थे

उनके ईशारे पर

सामने कुर्सी पर मैं बैठा

और सुनाया अपना दुखड़ा

कहा मैं बिल्‍कुल साफ-सुथरा

नहीं है मेरे पास कोई पैसा

आपसे ही है मुझे आशा

आपसे ही है मुझे आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

काम तो हो जाएगा

पर देना होगा कुछ पैसा

फिर तुम्‍हारा सारा पैसा

तुम्‍हारे हाथ में होगा

और वह बड़ा बाबू

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

पर कुछ तो देना होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

 

मैंने कहा

मेरे पास नहीं है पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

वहाँ न दिया तो

आपके लिए

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

पर एक आपसे ही है आशा

एक आपसे ही है आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

पर दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

कहा उसने संतरी से

निकालो इसे बाहर

और ले जाओ यहॉं से

है नहीं पैसा

और करता है बकवास

ले जाओ इसे यहॉं से

ले जाओ इसे यहॉं से

आया संतरी

बड़ी-बड़ी मुँछों वाला

रंग था उसका बिल्‍कुल काला

हाथ में लिए था डंडा

खींच मुझे बाहर निकाला

मैं कुछ कहना चाहा

पर उसने एक न सुना

धक्‍का देकर बाहर निकाला

दो-चार थप्‍पड़ भी लगाया

और मुझे निकाल दिया

और मुझे निकाल दिया

 

आया फिर मैं अपने घर में

आया फिर मैं अपने घर में

सोचने लगा

कि ये पुलिस हैं या हैं जल्‍लाद

ये रक्षक हैं या हैं भक्षक

करते हैं ये धर्म की रक्षा

या करते हैं धर्म को ही हलाल

या करते हैं धर्म को ही हलाल

मैं सोचने लगा

कि ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

सड़क का भिखारी

अपने पेट के लिए मॉंगते हैं

ऑफिस का किरानी

मेरे पैसे को अपना ही समझ लिया

और ये पुलिस

ये तो

ये तो मेरे पैसे व मेरे शरीर

दोनों पर अपना अधिकार जमाया

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मार भगाया

 

किरानी रूपी भिखारी

सड़क के भिखारी से बदतर निकला

पर पुलिस रूपी ये भिखारी

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

जो मेरे शरीर को भी मेरा न समझा

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मर भगाया

पुलिस रूपी ये जल्‍लाद

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

 

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महेश कुमार वर्मा
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Tuesday, July 14, 2009

अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों

हमारे देश को स्वतंत्र हुए ६२ वर्ष हो गए और अब हम पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं, कोई कुछ करने वाला नहीं है। चाहे भ्रष्टाचार का मामला हो या अपराध का मामला हो हम बेरोकटोक आगे बढ़ रहे हैं। आखिर हम स्वतंत्र जो हैं, मेरे कार्य पर कोई भला क्यों अंकुश लगाएगा? इतना ही नहीं हम अपने पहनावे में भी पूर्ण स्वतंत्र हो गए हैं। अपने इच्छानुसार हम ज्यादा कपड़े पहनें या कम पहनें, दुसरे को क्यों कुछ भी लेना-देना? तब तो आज फिल्म से लेकर हमारे समाज तक में शरीर पर से वस्त्र घटने लगे हैं। और यही देखकर मेरे कलम को भी नहीं रहा गया और उसे यह गीत गाना पड़ा :
हट गए हैं वस्त्र तन से साथियों।
अब तुहारे हवाले बदन साथियों॥
हो गए हैं फिदा सनम साथियों।
होंगे न जुदा सनम साथियों।
साँस थमती नहीं नब्ज जमती नहीं।
तुमसे मिलने को हैं बेकरार साथियों।
अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों॥
हो गए हैं निर्वस्त्र दिलदार साथियों।
है तुम्हारा इंतजार आशिकी साथियों।
अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों।
अब तुम्हारे हवाले बदन साथियों॥
(व्यंग्य)
रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

Saturday, April 25, 2009

विकलांग पुलिस प्रशासन ने अपराधियों के समक्ष घुटने टेके व पीड़ित को खुद मामला सलटाने को कहा

हमारी पुलिस प्रशासन का हालात कैसी है इसका अंदाजा इसी घटना से लगाया जा सकता है कि आगामी ३०.०४.२००९ को लोकसभा चुनाव है और इससे मात्र ८ दिन पहले २२.०४.२००९ को एक प्रा. वि. के हेडमास्टर श्री चितरंजन भगत का अपहरण होता है। पर घटना के चौथे दिन आज २५.०४.२००९ के अब तक भी पुलिस द्वारा न तो अपहर्ता के विरुद्ध कोई खाश कार्रवाई ही की गयी है न तो अपहृत को ही उनके चंगुल से मुक्त कराया गया है जबकि अपहर्ता व अपहृत से मोबाईल पर बराबर बात हो रही है। इसके बावजूद भी पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं की जा रही है। आरक्षी अधीक्षक (एस. पी.) ने स्पष्ट रूप से कल २४.०४.२००९ को पीड़ित वालों को कह दिया कि मेरे पास कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है। वहीं डी. एस. पी. ने कह दिया कि आपलोग खुद अपने स्तर से मामला को सलटा लें। उल्लेखनीय है कि अपहर्ता द्वारा मोबाईल पर ६ लाख रूपये फिरौती की माँग की गयी है (जो बाद में कम कर ४ लाख कर दिया गया है) और पैसे जमा करने के लिए आज २५.०४.२००९ तक का समय दिया गया है अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी दी गयी है। पर पुलिस अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी है। एस. पी. के अनुसार कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है। जब इस मामला में कार्रवाई करने के लिए प्रशासन के पास फोर्स नहीं है तो आप सोच सकते है कि ५ दिनों के बाद ३०.०४.२००९ को होने वाले चुनाव कितना निष्पक्ष होगा? ............ आख़िर पुलिसवाले करेंगे भी क्या? इस घटना में पुलिसवाले व थाना का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है, इसका भी प्रमाण मिला है, जो इस घटना से स्पष्ट है :

अपहर्ता व अपहृत का फोन हमेशा पीड़ित के एक नजदीकी के मोबाईल पर आता है जिसमें अपहर्ता पैसे की माँग करते हैं अन्यथा अपहृत को जान से मार डालने की धमकी देते हैं। ..... मोबाईल धारक द्वारा हुए बातचीत की रिकॉर्डिंग कर ली जाती है और फिर वे इस रिकार्डिंग को संबंधित सलखुआ(सहरसा) थाना के पुलिस अधिकारी को सुनाते हैं। तो फिर बाद में अपराधकर्मियों द्वारा फोन पर कहा जाता है कि आप थाना गए थे और वहाँ हमलोगों के बातचीत के रिकॉर्डिंग सुनाये हैं ........... इस प्रकार कहकर उन्हें धमकी दी जाती है ........................ अब आप खुद सोचें कि थाना में रिकॉर्डिंग सुनाया गया तो यह ख़बर अपराधकर्मियों तक कैसे पहुँचा? यह इसी बात को प्रमाणित करता है कि थाना और पुलिसवाले का अपराधकर्मी से साथ-गाँठ है और इसी कारण ही वे कोई विशेष कार्रवाई नहीं कर रहे हैं और इस केस से अपना पिंड छुड़ाने के लिए कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए फोर्स नहीं है, आप अपने स्तर से ही मामला को सलटा लें (यानि पैसे के लेन-देन करके छुड़वा लें)।

इस पुरे घटनाक्रम से हमारी पुलिसिया तंत्र की हालात स्पष्ट होती है जो यदि चाहे तो अपहृत को तुरत मुक्त करा सकता है पर अपराधी से खुद उनकी साथ-गाँठ होने के कारण वे कुछ नहीं कर रही है। घटना बिहार राज्य के सहरसा जिला के सलखुआ थाना क्षेत्र की है। अपहृत श्री चितरंजन भगत सहरसा के संतनगर मुहल्ला के निवासी हैं तथा सलखुआ(सहरसा) के फरकिया क्षेत्र स्थित प्रा. वि., रंगनिया(अलानी) में हेडमास्टर के पद पर पदस्थापित हैं; जिन्हें गत बुधवार यानि २२.०४.२००९ को स्कूल जाने के क्रम में पंचभीरा घाट के समीप सशस्त्र अपराधकर्मियों द्वारा अपहरण कर लिया गया। ...................... इस क्षेत्र में यानी सुपौल लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में अगले कुछ दिनों बाद ३०.०४.२००९ को लोक सभा चुनाव होनी है। अब आप खुद सोचें कि क्या पुलिस प्रशासन की यह हालात यहाँ लोक सभा चुनाव कराने के लिए उचित है? ............. क्या इस हालात में यहाँ निष्पक्ष चुनाव हो सकता है? ................. क्या यहाँ के आम जनता सुरक्षित है? ......................... नहीं, यहाँ न तो आम जनता ही सुरक्षित है और न ही यहाँ के पुलिस प्रशासन ही चुस्त व दुरुस्त है जो सही ढंग से चुनाव करा सके। इस प्रकार यहाँ के यानी लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र सुपौल की वर्तमान स्थिति चुनाव कराने लायक नहीं है। .......... यों भी जब एक अपहरण के मामला में पुलिस कुछ नहीं कर रही है और एस. पी. खुद कह दिए कि कार्रवाई करने के लिए उनके पास फोर्स नहीं है तो फिर ऐसे विकलांग पुलिस प्रशासन के भरोसे लोक सभा चुनाव कैसे कराया जा सकता है? .....................................

(घटना की जानकारी विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त जानकारी पर आधारित)

http://popularindia.blogspot.com/

Tuesday, April 21, 2009

पाप की विदाई

आओ साथ मिलकर लड़ें अपनी लड़ाई
दुनियाँ से पाप और अत्याचार को दें हमेशा के लिए विदाई
फिर कभी न आए ये पाप हम इंसानों के बीच
नहीं बनें हम हैवान इंसानों के बीच
हम हैं इंसान
नहीं बनेंगे हैवान
आएगी पाप यदि मेरे बीच
तो दिखा दूंगा उन्हें सबसे नीच
आओ साथ मिलकर लड़ें अपनी लड़ाई
और हमेशा के लिए करें पाप की विदाई

-- महेश कुमार वर्मा
२१.०४.२००९


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Sunday, April 19, 2009

न्याय व अन्याय


वो क्या देगा न्याय

जो न जानता है कि

क्या होता है न्याय

वो क्या देगा न्याय

जो जीवन भर किया अन्याय

न्याय और अन्याय के बीच मरती है भोली जनता

वो क्या जानेगा इसका दर्द

जो है खुद बेदर्द
जो है खुद बेदर्द

-- महेश कुमार वर्मा

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Monday, April 6, 2009

गलती

मुझे नहीं मालूम कि मेरी क्या गलती है
मुझे तो बस इतना मालूम
कि गलती मेरी साथ हुयी
न्याय पाने की थी आशा
पर न्याय पाना भी दुस्वार हुआ
गलती बताने वाले कोई नहीं
पर सजा देने वाले हजार हुए
मेरा सुनने वाला कोई नही
पर आरोप लगाने वाले हजार हुए
घाव पर मलहम लगाने वाला कोई नहीं
पर नमक छिडकने वाले हजार हुए
साथ देने वाला कोई नहीं
पर आगे बढ़ाकर धक्का दे गिराने वाले हजार हुए
मौत से बचाने वाला कोई नहीं
पर मौत देने वाले हजार हुए
चाहते है वे मेरी मौत
तो ठीक है मुझे मौत के गले लगा दो
पर एक गुजारिश है तुमसे
कि ऐसा न करना अब किसी से
न होना कभी तुम धर्म भ्रष्ट
न देना किसी को ऐसा कष्ट
न देना किसी को ऐसा कष्ट
मुझे नहीं मालूम कि मेरी क्या गलती है
मुझे तो बस इतना मालूम
कि गलती मेरी साथ हुयी

गलती मेरी साथ हुयी
-- महेश कुमार वर्मा

Wednesday, April 1, 2009

नशा!

नशा!
नशा शराब में नहीं
नशा बोतल में नहीं
नशा तो मेरे मन में है
यदि होती शराब में नशा
तो नाचती वो बोतल
यदि होती बोतल में नशा
तो नाचती वो बोतल
पर नशा तो मेरे उस मन में है
जिसने खुद को पागल बनाया
व बोतल व शराब से दोस्ती निभाया
नशा शराब में नहीं
नशा मेरे मन में है
नशा मेरे मन में है
और बोतल बेचारा बदनाम है
नशा बोतल में नहीं
नशा मेरे मन में है
नशा मेरे मन में है

Saturday, March 7, 2009

होली

सबों को होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

होली का पवित्र पर्व नजदीक है। मैं व्यक्तिगत रूप से सबों से आग्रह करना चाहता हूँ कि होली के पवित्र पर्व को पवित्र बनाएं रखें व इसे दूषित नहीं करें। कितने लोग इस होली के पर्व के ही दिन पुराने शत्रुता का बदला लेते हैं। कितने लोग पवित्र होली के दिन शराब पीकर मतवाला बने रहते हैं और पवित्र होली को दूषित कर देते हैं। कितने लोग जबरन ही किसी को उसके न चाहने पर भी उसे रंग या अन्य पदार्थ देते हैं। कितने लोग के मंशा सिर्फ शरारत करने की ही रहती है। पर ऐसा नहीं होनी चाहिए। होली आपसी प्रेम का पर्व है न कि शरारत करने का पर्व। होली प्रेम का पर्व है। पर कितने लोग इस दिन विशेष रूप से मांसाहार भोजन करते हैं, जो कि उचित नहीं है। आयें आपसी प्रेम के पर्व होली में मांसाहार का विरोध करें व सबों से प्रेम करें।

कृपया पवित्र होली को पवित्र बनाए रखें। पुनः होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।

आपका

महेश कुमार वर्मा

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http://popularindia.blogspot.com/search/label/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%८०

Thursday, February 26, 2009

आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए प्रकाशक जिम्मेवार क्यों?

आज मैं निम्न पोस्ट पढ़ा :

ब्लागर हैं तो क्या? कानून से ऊपर नहीं (http://teesarakhamba.blogspot.com/2009/02/blog-post_26.html)

ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में (http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=76)

वैसे मैं सम्बंधित ब्लॉग को या इससे सम्बंधित समाचार को अन्यत्र कहीं नहीं पढ़ा या सुना हूँ। पर इस ब्लॉग में लेखक ने जो बात कहना चाहा है वह तो मैं समझ गया. पर एक बात मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि यदि कोई साईट या ब्लॉग या समाचारपत्र ऐसा है जो किसी विषय पर आम लोगों की निष्पक्ष विचार आमंत्रित करता है और सम्बंधित साईट या पत्र का उद्देश्य रहता है कि वह आम लोगों की निष्पक्ष विचार को सार्वजानिक करे ताकि आम जनता यह जान सके कि इस विषय पर किसका क्या विचार है. तब यदि कोई व्यक्ति उसपर अपने विचार में या टिप्पणी में कोई आपत्तिजनक बात लिखता है तो इसके लिए साईट या पत्र का स्वामी जिम्मेवार क्यों होगा और उसपर कार्रवाई क्यों होगी? उसका तो उद्देश्य तो आम लोगों के विचार को सार्वजानिक करना था. .................... ऐसी स्थिति में तो कार्रवाई सम्बंधित विचारक / टिप्पणीकार पर होनी चाहिए न कि साईट / ब्लॉग / समाचारपत्र के स्वामी पर. यदि किसी साईट या पत्र पर आये टिप्पणी से ही किसी के (या टिप्पणीकार के) अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए सम्बंधित साईट / पत्र के स्वामी या प्रकाशक जिम्मेवार क्यों व कैसे होगा? ................... ऐसी स्थिति में यदि कसी के टिपण्णी से किसी के अपराधिक प्रकृति का पता चलता है तो इसके लिए टिप्पणीकार जिम्मेवार होगा और कार्रवाई भी उसी पर होनी चाहिए न कि साईट या पत्र के स्वामी या प्रकाशक पर.............


ऊपर वर्णित पोस्ट के लेखक, प्रकाशक व पाठक कृपया इसपर अपनी राय स्पष्ट करें.

Saturday, January 24, 2009

गणतंत्र दिवस : एक प्रश्न

दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के ५९ वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। प्रश्न उठता है की हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाएँ? क्या सिर्फ इसलिए कि हम भारतीय है? जरा सोचें कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए पर आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिली है?

कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गयी है। पर वास्तविकता इनसे कोसों दूर है। वास्तविकता के जमीं पर हम आयें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं। इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय ही होता है।

यह बात सिर्फ कहने-सुनने के लिए ही नहीं बल्कि वास्तविकता है। आप ख़ुद देखें आज बच्चों को उचित शिक्ष भी नहीं मिल पाती है। उन्हें पढने व खेलने का भी अधिकार नहीं है और बचपन से ही उनसे मजदूरी करायी जाती है। ....... आज महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है और महिला वर्ग हमेशा पुरुषों द्वारा प्रताडित ही होती रहती है। आज पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है और तंग आकर वह अपराधी भी बन जा रहा है। आज भारत में न्यायप्रिय राजा नहीं है बल्कि यहाँ सभी मुद्राप्रिय हैं। कभी दुनियाँ को धर्म की शिक्षा देने वाला भारत आज खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है। और इसके लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ-साथ खुद हमारे समाज हैं। जी हाँ, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है कि आज अन्याय व जुल्म के सताए व्यक्ति को उचित न्याय भी नहीं मिल पाता है। पुलिस से लेकर अदालत तक सभी मुद्राप्रिय हो गए हैं और यहाँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुद्रा के आधार पर न्याय होता है। ऐसे कई मामला देखे जाते हैं जहाँ न्यायलय में न्याय करने के लिए बैठे हमारे न्यायाधिश भी पैसे लेकर पैसे वाले के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। अपराध बढ़ाने में तो शायद सबसे बड़ा हाथ समाज से अपराध को मुक्त कराने के लिए बैठे हमारे पुलिसिया तंत्र का ही है। जहाँ यदि आप अपने ऊपर हुए किसी जुल्म व अन्याय के शिकायत करने जाएँ तो आपके साथ क्या जुल्म हुआ यह नहीं देखा जाता है बल्कि देखा जाता है कि आपके पास क्या पैसा है। इतना ही नहीं, अपराधी अपना लाभांश इन पुलिस को देकर ही अपने अपराध के व्यवसाय में दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं। ................. अपराधों को बढ़ाने में हमारा समाज भी पीछे नहीं है। भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं। .........................

इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय मैं भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है? .................... और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? ........ आयें अपने समाज व देश से अन्याय, भ्रष्टाचार व जुल्म को उखाड़ फेकने के लिए कदम आगे बढाकर राष्ट्रहित में कार्य करें।

धन्यवाद।

आपका

महेश कुमार वर्मा

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