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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

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Tuesday, November 11, 2014

क्या मेला के आयोजक आय व व्यय के डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं?

क्या मेला के आयोजक आय व व्यय के डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं?

कल मैं पटना पुस्तक मेला 2014 के व्यवस्था पर जो सवाल उठाया था उसे आज दैनिक भास्कर के DB स्टार के पृष्ट 2 पर प्रकाशित किया गया है. मामला को समाचार पत्र में स्थान देने के लिये दैनिक भास्कर परिवार को धन्यवाद. 
http://epaper.bhaskar.com/detail/?id=8855&boxid=111114024621&ch=bihar&map=map&currentTab=tabs-1&pagedate=11%2F11%2F2014&editioncode=385&pageno=2&view=image 


DB स्टार में प्रकाशित खबर के अनुसार मेला के व्यवस्था पर मेला के आयोजन समिति के रत्नेश्वर जी कहे कि अपनी तरफ से हम कोई कमी नहीं छोड़े हैं पर इतनी संख्या में लोग आते हैं अतः संभव है कि एक-दो की उम्मीदों पर हम खरे नहीं उतरे.

रत्नेश्वर जी का यह बयान पूर्णतः टाल-मटोल वाला बयान है. मैं आयोजन समिति से जानना चाहता हूँ कि वे आम लोगों के लिये आखिर किस सुविधा की व्यवस्था किये हैं? स्टाल वालों से व आगंतुक से इतनी अधिक मात्रा में पैसे लिये जाने के बाद भी तो आपने कोई व्यवस्था नहीं किया है, सिवाय पार्टीशन कर स्टाल वाले को अपने किताब रखने के लिये जगह देने के. आप खुद अपनी कमी को देखें.
  1. टिकट काउंटर पर काउंटर नंबर नहीं है जिससे कि किसी भी प्रकार के दिक्कत होने पर सही काउंटर की जानकारी देते हुये कोई सूचना या शिकायत उचित स्थानों तक पहुंचाया जा सके.
  2. इसी तरह पुस्तकों के स्टालों पर भी स्टाल नंबर नहीं लिखा गया जिससे कि लोग किसी खास स्टाल को आसानी से पहचान सके या वहाँ दुबारा आसानी से पहुँच सके.
  3. मेला कैंपस के बाहर व भीतर मुख्य प्रवेश द्वार के नजदीक सभी स्टालों के आयोजकों के नाम उनके स्टाल नंबर सहित एक बड़ी बोर्ड में लिखा रहना चाहिये था. ताकि लोग किसी खाश प्रकाशक के बारे में यह जान सके कि उनका स्टाल लगा है या नहीं और है तो वह कहाँ पर है. पर आपने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं किया.
  4. आपको किसी भी प्रकार के समस्या / सहायता / शिकायत दर्ज करने के लिये एक हेल्प लाइन नंबर की व्यवस्था करना चाहिये था. और इस नंबर को प्रवेश द्वार के बाहर व भीतर प्रवेश द्वार के नजदीक व अन्य जगहों पर भी स्पष्ट रूप से बैनर लगाकर या अन्य उचित तरीका से डिस्प्ले कराना चाहिये था. साथ ही इसके लिये आपका एक स्टाल मुख्य प्रवेश द्वार के नजदीक रहना भी चाहिये ताकि जरुरत पड़ने पर लोग उनसे कुछ पूछ सके या कोई सहायता ले सके. पर आपने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं किया.
  5. आप मेला में तो कुछ बैंक का स्टाल लगवा दिये पर किसी भी बैंक का एक भी एटीएम नहीं लगवाये. एटीएम मेला के लिये एक महत्वपूर्ण सुविधा है ताकि लोगों के पॉकेट के पैसा समाप्त हो जाने पर भी वे एटीएम से पैसा निकाल कर अपनी खरीददारी जारी रख सके.
  6. आप यह तो महसूस किये कि आने वाले लोगों के पेशाब-पैखाना के लिये मूत्रालय व सौचालय होना चाहिये और आप ऐसा व्यवस्था किये भी. पर आप यह महसूस नहीं किये कि पेशाब-पैखाना के बाद अंग धोने के लिये पानी की व्यवस्था भी होनी चाहिये. इसी तरह आपने पीने के लिये भी पानी की व्यवस्था नहीं किये. यहाँ तक कि जहाँ खाने-पीने / नास्ता / खाना का स्टाल है उसके नजदीक भी आपने पानी की व्यवस्था नहीं किये. पुरे मेला में कहीं भी पानी की व्यवस्था नहीं है, सिवाय स्टाल से पैसे पानी के बोतल बिक्री का. क्या आपकी सोच में पानी का कोई महत्व नहीं है?
  7. आप स्टाल वालों से प्रति स्टाल दस हजार रुपये से ढाई लाख रुपये तक लिये पर उनकी पुस्तकों की सुरक्षा के लिये आपने कोई व्यवस्था नहीं किया. यहाँ तक कि बाहर निकलने वाले लोगों के साथ के किताब और बिल को भी नहीं चेक किया जा रहा है. यदि आप यहाँ कहेंगे कि स्टाल वालों को खुद अपनी पुस्तक की सुरक्षा करनी है कि कोई किताब चुराकर नहीं ले जाये. तब मैं आपने पूछना चाहता हूँ कि तो आप प्रति स्टाल दस हजार रुपये से ढाई लाख रुपये तक किस कार्य के लिये लिये? क्या यह रकम सिर्फ एक पार्टीशन कर किताब रखने की जगह भर देने लिये लिया गया है?
  8. आप आने वाले पुस्तक प्रेमी / आगंतुक से प्रवेश शुल्क के रूप में 5 रुपये ले रहे हैं. साथ ही आगंतुक के साइकिल या वाहन लगाने ले किये पार्किंग चार्ज भी अलग से ले रहे हैं. आखिर पार्किंग चार्ज व प्रवेश शुल्क के रूप में पैसे लेने की क्या जरुरत हैं? स्टाल वालों से प्रति स्टाल दस हजार से ढाई लाख रुपये तक जो लिये गये हैं, क्या वह इतनी पर्याप्त रकम नहीं है कि प्रवेश व पार्किंग निःशुल्क किया जा सके. सीधी सी बात है कि यदि आप स्टाल वाले से इतनी बड़ी रकम लिये हैं तो आपको प्रवेश व पार्किंग निःशुल्क रखना चाहिये. और यदि आप प्रवेश व पार्किंग के लिये पैसे लेते हैं तो आपको स्टाल वालों से पैसा नहीं लेना चाहिये.
  9. किसी भी प्रकार के अनहोनी या अपराध होने की स्थिति में सुरक्षा व्यवस्था के लिये या इससे निबटने के लिये आपने कोई पुलिसकर्मी को तैनात नहीं करवाया.
  10. अगजनी जैसी घटनाओं से तत्काल निबटने के लिये आपने वहाँ नजदीक में कोई दमकल की व्यवस्था भी नहीं किये.
  11. आपको आकस्मिक स्थिति से निबटने के लिये वहाँ First Aid की व्यवस्था भी करनी चाहिये थी पर आपने यह भी नहीं किया.

इस प्रकार आपने स्टाल वालों से व आने वाले आगंतुक से बहुत ही भारी मात्रा में पैसा वसूल करने के बाद भी किसी भी तरह की मूलभूत सुविधा की व्यवस्था नहीं किया. क्या आप मेला के आय व व्यय का पूर्ण डिटेल्स सार्वजनिक कर सकते हैं ताकि स्टाल वाले व आम लोग यह जान सके कि उनके पैसे का कितना सदुपयोग हुआ है?

-- महेश कुमार वर्मा 
(स्वतंत्र लेखक)

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http://popularindia.blogspot.in/2014/11/21-2014.html 

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=707012126051518&set=a.318709188215149.73629.100002282104031&type=1 

Monday, November 10, 2014

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी

21वीं पटना पुस्तक मेला 2014 : व्यवस्था या व्यवस्था के नाम पर ठगी 

पटना के गांधी मैदान में CRD (Centre For Readership Development) (http://www.crdindia.org/) के तरफ से 21वीं पुस्तक मेला का आयोजन किया गया है जो 07.11.2014 से 18.11.2014 तक है. कल 09.11.2014 को मैं भी पुस्तक मेला घुमने गया. पर मेला में प्रवेश से पहले से ही असुविधा नजर आने लगी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं देखा. देखने से यही प्रतीत होता है कि सुविधा के नाम पर इतना पैसा लेकर सुविधा न देकर सिर्फ पैसा ठगा गया है. आप जानना चाहेंगे कि आखिर मैं वहाँ ऐसी क्या कमी देखा जो मैं इस तरह लिख रहा हूँ. कमी एक-दो नहीं बल्कि कई कमियाँ थी. आगे मैं उन कमियों व कुव्यवस्था का वर्णन कर रहा हूँ: 
  1. टिकट लेकर अन्दर जाने से पहले ही मुझे अव्यस्था नजर आने लगी. हुआ यह कि जब मैं एक टिकट काउंटर पर टिकट लेने गया तो देखा कि वहाँ 2 विद्यार्थी अपने एक सौ रुपये का नोट प्राप्त करने के लिये परेशान थे जो टिकट काउंटर में अन्दर से गिर गया था. काउंटर पर बैठे महिला क्लर्क से जब मैं पूछा तो वह बतायी कि नोट बाहर जो दिवार खड़ा किया गया है और उस क्लर्क के डेस्क के बीच के जगह में गिर गया है जो अब इसके हटने पर ही मिल सकता है. उनके अनुसार वह दिवार व डेस्क वहाँ जाम किया हुआ है और उसके बिना हटे नोट तक नहीं पहुँचा जा सकता है. ................... यदि उस महिला क्लर्क के द्वारा बतायी गयी यह बात सही है तो सवाल उठता है कि उस दिवार व डेस्क के बीच में खाली जगह क्यों छोड़ा गया जो वहाँ नोट गिर गया. ........... फिर यदि नोट वहाँ गिर ही गया तो वह महिला क्लर्क उस विद्यार्थी को नोट प्राप्त कराने के लिये मेला प्रशासन को खबर करके उसे नोट वापस दिलाने में मदद क्यों नहीं कर रही थी? ......................... आखिर वह महिला क्लर्क उन विद्यार्थी की कोई सहायता नहीं की. वे विद्यार्थी बाहर से दिवार निचे से तोड़कर नोट निकालना चाह रहे थे. फिर मैं उन विद्यार्थी को सलाह दिया कि एक टिकट लेकर अंदर चले जाइए और अन्दर में मेला का ऑफिस होगा वहाँ जानकारी दे दीजिये तब वे अपने व्यक्ति से नोट निकलवाने का कोशिश कर सकते हैं, खुद मत तोड़िए. फिर मैं अपना टिकट लेकर मेला के अंदर गया. बाद में वे विद्यार्थी अपनी समस्या मेला प्रशासन को दिये या नहीं यह मुझे नहीं मालुम. 
  2. मेला में स्टाल के प्रवेश द्वार पर स्टाल नंबर स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए था, जो नहीं था. स्टाल नंबर लिखे जाने से लोगों को ख़ास स्टाल को पहचानने में या पुनः उस स्टाल पर आने में सहूलियत होती. 
  3. मेला में किसी भी बैंक का कम-से-कम एक अस्थायी या मोबाइल एटीएम रहना चाहिए था ताकि लोगों के पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर वे एटीएम से पैसा निकाल कर अपनी खरीददारी जारी रख सके. पर ऐसा कोई एटीएम वहाँ नहीं था. जिस कारण लोगों को परेशानी संभव है. खुद मेरे पॉकेट का नकदी समाप्त हो जाने पर मुझे चुने हुये कुछ पुस्तकें वापस करने पड़े. 
  4. मेला के बाहर या अंदर कोई भी पुलिसकर्मी नहीं था. यह प्रशासन की बहुत ही बड़ी चुक थी. कुछ ही माह पहले उसी गांधी मैदान में रावण-दहन के कार्यक्रम में भगदड़ से कम-से-कम 33 लोगों की जान गयी थी और इसमें पुलिस प्रशासन की बहुत ही बड़ी लापरवाही सामने आयी थी. पर पुलिस प्रशासन या जिला प्रशासन इससे सबक नहीं ली और इस पुस्तक मेला में पुलिस की कोई व्यवस्था ही नहीं थी. 
  5. अगजनी जैसी घटनाओं से निपटने के लिये वहाँ कोई दमकल नहीं था. मेला के अंदर कुछ जगह आग बुझाने वाला मशीन (जो ऑफिस वगैरह में रहता है) देखा जरुर पर वह मेला के तरफ से था या स्टाल का अपना था यह मैं नहीं कह सकता हूँ. 
  6. मेला के अंदर पेशाब-पैखाना के लिये मूत्रालय व सौचालय तो था पर पुरे मेला में पानी की व्यवस्था कहीं भी नहीं था. स्थिति यह था कि जहां खाने-पीने का स्टाल लगा था वहाँ भी पानी की व्यवस्था नहीं था. स्थिति यह थी कि यदि आपको पीने के लिये या कोई अन्य काम के लिये पानी की जरुरत है तो आपको वहाँ के खाने-पीने के स्टाल से पैसे देकर बोतल वाला पानी खरीदना पड़ेगा. .................. मेला में निःशुल्क पीने का पानी की व्यवस्था होनी चाहिये. इसके लिये चापाकल लगाया जा सकता था. 
  7. मेला में अनाउंसमेंट कर यह प्रचार तो किया जा रहा था कि कोई भी पुस्तक खरीदने पर बिल जरुर ले लें. साथ ही गेट पर के कर्मचारियों को अनाउंसमेंट कर कहा जा रहा था कि बिना बिल के कोई किताब को बाहर न जाने दिया जाये. पर वहाँ इस तरह की कोई चेकिंग नहीं हो रही थी जिससे कि यह पता चले कि लोग जो किताब बाहर ले जा रहे हैं वह खरीदकर ले जा रहे हैं या चुराकर. बाहर निकलते समय वहाँ के कर्मचारी सिर्फ बिल पर (बिने देखे, बिना पढ़े, बिना मिलाये) एक मुहर लगा दे रहे थे. ऐसी स्थिति में कोई भी कितनी भी मात्रा में किताब चुराकर बाहर ले जाये तो वहाँ के कर्मचारी या प्रशासन को पता तक नहीं चलेगा.
  8. इन सबों के अलावा मैं वहाँ पर एक और बहुत बड़ी अनियमितता देखा. वह यह है कि मैं जब राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल पर पुस्तकें देख रहा था तो वहाँ एक थैला (पोलीथिन) में एक पुस्तक देखा जिसके साथ पुस्तक का बिल भी था, जो कि शायद किसी का छुट गया था. वहाँ मेरे नजदीक में जो दो व्यक्ति थे उनसे मैं इस संबंध में पूछा तो वे बताये कि उनका नहीं है. फिर मैं सोचा कि कोई किताब खरीदा है और उसका छुट गया है सो इसे सही व्यक्ति तक पहुँचाने की कोशिश करनी चाहिये. यह बात सोचकर मैं उस स्टाल के बिल काटने वाले को इस बात की जानकारी दी तो वे अपने एक स्टाफ को यह कहते हुये वह किताब लाने को कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवा देंगे. फिर मैं उस स्टाफ को वह पुस्तक का थैला (पोलीथिन) दिखाया, जिसे वह लाकर उसी बिल काटने वाले को जो उसे पुस्तक लाने को कहा था, दे दिया. उस वक्त मैं फिर उस बिल काटने वाले से कहा कि इसका अनाउंसमेंट करवाकर जिसका है सही व्यक्ति को दिलवा दीजिये. इसपर वे किताब वहाँ रख लिये और कहे कि अभी अनाउंसमेंट करवाने का समय नहीं है. .............. फिर मैं उस स्टाल से निकल गया और शेष मेला घुमा. पर बाद में भी मैं इस घटना पर सोचा कि जिसका भी पुस्तक है वह पैसा देकर खरीदा है और वह छुट गया है अतः वह पुस्तक सही व्यक्ति तक पहुँच जाये. मुझे लग रहा था कि वह स्टाल वाला अनाउंसमेंट नहीं कराएगा. अतः मैं खुद इस घटना के बारे में मेला प्रशासन को सूचित करने को सोचा. और फिर मैं मेला प्रशासन के ऑफिस पर गया. वहाँ बाहर खड़े गार्ड मुझसे काम पूछने लगे तो मैं बताया कि ऑफिस के किसी व्यक्ति से मिलवाइये. इसपर वे काम का डिटेल्स पूछने लगे. मैं उसे काम बताना चाहा पर फिर मैं पूछा कि काम आप ही सुनियेगा या किसी से भेंट कराईयेगा. इस पर वह गार्ड बोला कि काम बताइये न. तब मैं उसे काम बताने ही वाला था कि अंदर से मेला के Convenor अमित झा अंदर से बाहर आये. मैं उनसे पहले से मिला हुआ था अतः मैं उन्हें पहचान गया वे भी मुझे पहचान गये. फिर मैं गार्ड के पास से हटकर उनके साथ ही बाहर आ गया. मैं उन्हें राजा पॉकेट बुक्स में किताब मिलने वाली उपरोक्त घटना बताते हुये बताया कि वह किताब रख लिया है और कहा कि अनाउंसमेंट कराने का समय नहीं है. इसपर अमित जी भी बोले कि ठीक ही कहा अभी किसको समय है. आगे वे बोले कि जिसका किताब है वह खुद मेरे पास अनाउंसमेंट करवाने आयेगा. तब मैं अमित जी को कहा कि लेकिन किताब मिल गया है. अमित जी बोले हाँ यही राज पॉकेट न (उस समय हमलोग राजा पॉकेट बुक्स के स्टाल के सामने से ही गुजर रहे थे)? ............ अमित जी कोई कारवाई नहीं किये और आगे बढ़ गये, फिर मैं भी उनका साथ छोड़ दिया. ................... क्या मेला प्रशासन / अमित जी / राजा पॉकेट बुक्स वाले का यह कार्रवाई / व्यवहार सही था? क्या राजा पॉकेट वाले को वह किताब मेला ऑफिस में जमा करवाकर अनाउंसमेंट नहीं करवाना चाहिये था? क्या अमित जी को जानकारी मिलने पर राजा पॉकेट के स्टाल से वह किताब उठवा कर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवाने का फर्ज नहीं था? ........................... बाद में मैं सोच रहा था कि मैं राजा पॉकेट वाले को क्यों यह बताया, खुद वह किताब ले जाकर मेला ऑफिस में जमा कर अनाउंसमेंट करवा देता. ............... फिर बाद में मैं मेला से बाहर आ गया. ................ पता नहीं उस किताब के बारे में अब तक कोई अनाउंसमेंट हुआ या नहीं और सही व्यक्ति को वह मिला या नहीं? बाद में या आज यदि अनाउंसमेंट हुआ भी होगा तो अब शायद सही व्यक्ति तक उस किताब का पहुँच पाना मुश्किल है क्योंकि सामान्यतः कोई एक बार ही मेला जाता है. वह व्यकित (जिसका वह किताब था) कल मेला गया था तो फिर आज नहीं गया होगा. यदि कल उसी समय अनाउंसमेंट किया जाता तो शायद उस व्यक्ति को उसकी खोयी किताब मिल जाती. ................. पर शायद वहाँ सभी सिर्फ अपने फायदे के लिये ही थे. किसी के नुकसान पर सोचने वाला कोई नहीं था. 
तो यह थी पुस्तक मेला की अव्यवस्था की कहानी. मेला में लगे स्टाल वालों से प्रति स्टाल रु. 10,337 से रु. 2,49,439 तक लिया गया है. उसके अलावा मेला में आने वाले लोगों से प्रति व्यक्ति रु. 5 का टिकट लिया जाता है और साथ ही आगंतुक यदि अपने साथ कोई वाहन (साईकिल / मोटर साईकिल / कार) से आते हैं तो इसका पार्किंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है. आयोजक द्वारा इतने बड़ी रकम स्टाल वालों से व आगंतुक से लिये जाने के बावजूद मैं वहाँ कोई खास व्यवस्था नहीं होने के पीछे की सच्चाई क्या है? क्या पुस्तक मेला में व्यवस्था के नाम पर स्टाल वालों से व आगंतुक से जो इतनी ज्यादा मात्रा में पैसे लिये गये व लिये जा रहे हैं वह सिर्फ अपने पॉकेट गरम करने के लिये? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं है कि वे आम लोग व आगंतुक के सुविधा के लिये भी सोचे? क्या आयोजक को ऐसी व्यवस्था करने का कर्तव्य नहीं है कि आगंतुक का नुकसान न हो और यदि नुकसान हो गया तो यथासंभव उस नुकसान की पूर्ति के लिये कम-से-कम मानवीय कर्तव्य भी निभाया जाये? 


-- महेश कुमार वर्मा 
(स्वतंत्र लेखक)

Thursday, March 6, 2014

मीना व उसकी माँ

मीना व उसकी माँ


दिवाली के दिन शाम से ही बंटी अपने दोस्तों के साथ पटाखे छोड़ने मौज मनाने में लगा थाघर में माँ बेटी मीना के साथ मेहमानों के आवभगत में लगी थीजो भी दीपावली की शुभकामना देने मिलने आते थे उन्हें घर में बने पकवान थोड़ा सा मिठाई से मुँह मीठा कराया जाता था

काफी देर तक मेहमानों का आना होते रहामेहमानों के आवभगत के बाद मीना माँ से कही - "मैं भी जाती हूँ खाने।"

"जाओ खा लो।"

माँ के इतना कहने पर मीना खाने चली गयीपर माँ ने फिर पीछे से आवाज लगाई - "मीना बिटिया"

"हाँ मम्मी"

"सुबह का चावल पड़ा होगा, वह भी खा लेना।"

"पर माँ वह चावल तो बासी हो गया, क्या मैं पकवान नहीं खाऊँ?

"चावल बरबाद हो जाएगा उसे खा ले, पकवान कल खा लेना।"

"नहीं खाऊँगी मैं।" -- इतना कहकर मीना क्रूध  उदास मन से अपने बिछावन पर चली गयीहमेशा ही मीना को बचा हुआ भोजन खाना पड़ता था

काफी देर तक मीना जब खाने के लिए नहीं गयी तब माँ गुस्सा में आवाज लगाते हुए नजदीक गयी -- "मीना, भोजन की, जाओ भोजन कर लो।"

मीना - "मैं चावल नहीं खाऊँगी।"

"क्यों?"

"वह बासी हो गयी। मेरे टीचर कहते हैं कि बासी भोजन मत करो खुले बाजार का सामान जिसपर धुल मक्खी बैठती है उसे मत खाओ।"

माँ का गुस्सा बढ़ गया, वह गुस्साते हुए बोली - "चलो खाएगी या नहीं?" माँ मीना का हाथ पकड़कर खींचकर बिछावन से नीचे कर दी। 

मीना माँ के मार के डर से भोजन करने चली गयीमाँ अपने ही आप कहने लगी - 'स्कूल क्या भेजने लगी कि मुझे ही पढ़ाने लगी हैइससे अच्छा तो नहीं पढाती।' वहीँ कोने में बैठी बूढी दादी बड़बड़ायी - "आजकल तो बेटी पैदा करना ही पाप है।"


मीना थोड़ी सी सुबह वाला चावल खाकर सोने चली गयीइधर बंटी आया तो वह पुनः पकवान मिठाई खायामीना हमेशा घर में अपने बंटी में भेदभाव देखती थी। उस दिन का यह घटना उसके मन में बैठ गयी और वह सोचने लगी कि रोज-रोज बचा भात मैं ही क्यों खाऊँ, बंटी भैया क्यों नहीं खायेगा?' ......... आज की मिठाई मीना अभी तक नहीं खाई थी, इस कारण उसे नींद नहीं रही थी और काफी देर तक वह बिछावन पर जगी रही। फिर जाने कब उसे नींद गयी


कुछ ही दिनों के बाद माँ छठ पर्व की तैयारी में कार्य में व्यस्त थीमाँ को बेटी मीना से कार्य में काफी सहायता मिल रही थीजहाँ मीना माँ को कार्य में सहायता करती वहीँ बंटी को यदि माँ कोई कार्य के लिए कहती तो वह टाल देता कार्य नहीं करता। .......... अब वह माँ यह महसुश कर चुकी थी मीना बिटिया से उसे काफी सहायता मिली मीना की सहायता से ही वह इतनी व्यवस्था कर सकी है


अब माँ यह अच्छी तरह समझ चुकी थी कि बेटा बेटी दोनों को अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही दृष्टि से देखनी चाहिएअब माँ का मीना के प्रति व्यव्हार बदल गया था। अब वह बंटी मीना दोनों को समान रूप से देखती थी अब उसकी यही ख्वाहिश थी कि दोनों पढ़-लिख कर आगे बढ़े


लेखक -- महेश कुमार वर्मा 


Tuesday, March 4, 2014

नेता

नेता
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थे कभी गरीब इंसान।
नेता बने हुये धनवान॥
छोटा सा घर महल में बदला।
घुमने के लिए कार आया॥
भूल गए जन हित की बातें।
पर अवैध वसूली कभी न भूलते॥
क्षेत्र विकास के पैसे अपने घर में हैं लगाते।
गरीब जनता को और भी अधिक हैं सताते॥
बने हैं नेता जबसे।
पैसे ही पहचानते तबसे॥
नहीं पहचानते और किसी को।
छोड़ राजनीति कुछ न आता उनको॥
थे कभी गरीब इंसान।
आज है उनकी अलग पहचान॥
नेता बने हुये धनवान।
नेता बने हुये धनवान॥
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