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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
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Friday, March 22, 2019

7 वर्षीय बच्ची की संदेहास्पद मौत पर पुलिस की संदेहास्पद भूमिका

7 वर्षीय बच्ची की संदेहास्पद मौत पर पुलिस की संदेहास्पद भूमिका

कल होली के दिन 21 मार्च 2019 को पटना के मैनपुरा में LCT घाट व रामजानकी मंदिर के बीच कनुआन गली में एक 7 वर्षीय बच्ची की संदेहास्पद मौत हो गई।  इस संदेहास्पद मौत से कई सवाल उठ रहे हैं। घटनास्थल पर पुलिस तो पहुंची पर पुलिस की भूमिका सारी घटना पर और भी संदेह पैदा करने लगी है। आगे मैं इस घटना से संबंधित कई उठने वाले सवाल और पुलिस की भूमिका को सामने कर रहा हूं क्योंकि पुलिस की जो भूमिका रही है उससे आमजन को पुलिस की भूमिका पर से भरोसा उठ जाएगा। इतना ही नहीं पुलिस की इस भूमिका से अपराधियों की संख्या और भी बढ़ेगी यानी कुल मिलाकर पुलिस के कार्य का यह रवैया अपराधियों को और भी अपराध करने में  साहस प्रदान करती है। तो आइये घटना की विस्तृत जानकारी लेते हैं।
मैनपुरा के कनुआन गली में एक 7 वर्ष की लड़की की संदेहास्पद मौत हुई। लड़की को उसी के घर में मृत पाया गया। लड़की को किस अवस्था में मृत पाया गया इस संबंध में अलग-अलग बात आम लोगों के सामने आ रही है।  एक तरफ यह बात सामने आ रही है कि घर की मच्छरदानी से या मच्छरदानी के रस्सी से लिपट कर बच्ची खुद मर गई। वहीं दूसरी तरफ यह बात सामने आ रही है कि लड़की का शव कमरा में दरवाजा और दीवार के बीच में खड़ी हुई पाई गई और उसके गले में गमछा लपेटा हुआ था। इस दोनों स्थिति में लाश के पाए जाने की स्थिति अलग-अलग है। आम जनता के पास जो समाचार आयी है उससे यही कहा जा रहा है कि लड़की खुद फांसी लगाकर मरी है।  अब सवाल यह उठता है क्या 7 वर्ष की लड़की खुद फांसी लगाकर मर सकती है? अब सवाल उठता है कि यदि किसी भी तरह या खुद लड़की गले में रस्सी या गमछा लगाकर खुद मरना चाहे तो यह बात स्पष्ट है गला पर दबाव बढ़ने के बाद दर्द व दबाव के कारण लड़की के हाथ से दबाव हट जाता और फिर वह मरती नहीं बल्कि बच जाती क्योंकि वह टंगी हुयी नहीं थी। पर लड़की को मृत पाया गया। यह भी कहा जा रहा है कि फाँसी लगाकर मरने से शव के गले पर रस्सी का दाग रहता पर इसके गले पर रस्सी का दाग नहीं था। अतः मरने का कारण फाँसी नहीं बल्कि कुछ और है। इस प्रकार यह बात गले से नीचे नहीं उतर रही है कि 7 वर्ष की लड़की ने खुद मच्छरदानी या गमछा से  खुद फाँसी लगाकर मरी हो!
खैर जिस स्थिति में भी शव मिला हो व मौत जिस कारण से भी हुयी हो पर घटनास्थल पर पुलिस आयी। अब पुलिस को घर के किसी लोग या अन्य किसी लोगों ने बुलाया या पुलिस खुद किसी तरह समाचार मिलने पर पहुँची, जो भी हो। पर इस प्रकार की संदेहास्पद मौत होने पर पुलिस का कर्तव्य होता है कि घटना की सही जाँच करे व मौत का सही कारण का पता करे और इस जाँच के लिए पुलिस का यही कर्तव्य होता है कि शव का पोस्टमार्टम कराये।  पर पुलिस ने क्या की? पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम या घटना के संबंध में जाँच जैसी कोई काम नहीं की। हाँ, ऐसी बात नहीं है कि पुलिस ने घटना की प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार किया है बल्कि यह बात सामने आ रही है कि खुद घरवाले शव का पोस्टमार्टम होने नहीं दिए और प्राथमिकी भी दर्ज नहीं होने दिए। इस संबंध में जो भी कहा जा रहा है उस अनुसार पुलिस को पैसे-वगैरह देकर केस का एंट्री नहीं होने दिया गया। अब सवाल है कि क्या इस प्रकार के संदेहास्पद मौत के स्थिति में यदि घरवाले प्राथमिकी दर्ज कराना नहीं चाहते हैं तो क्या पुलिस को खुद प्राथमिकी दर्ज कर जाँच नहीं करनी चाहिए? ऐसी स्थिति में पुलिस को खुद ही प्राथमिकी दर्ज कर उचित जाँच कर उचित कार्रवाई करनी चाहिए थी। पर पुलिस ने ऐसा नहीं किया।
इन सारे संदेहास्पद स्थिति के बीच लोगों में यह बात चर्चा में है कि लड़की के साथ किसी ने दुष्कर्म किया व उसके बाद उसे मार दिया और घरवाले लोक-लज्जा के कारण शव का पोस्टमार्टम होने नहीं दिए व पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं होने दिए। अब यदि यह बात सच है तो चर्चा में यह बात है कि घर वाले ऐसा करके अपराधियों का साहस और भी बढ़ा रहे हैं क्योंकि अगर अपराधियों पर कार्रवाई नहीं होती है तो अब उनको अपराध करने में और बल ही मिलेगा। इन सारे घटनाक्रमों के बाद आम जनता को इन सारी बातों की सच्चाई की जानकारी होनी चाहिए वरना आम जनता को पुलिस पर से पूर्ण रूप से विश्वास उठ जाएगा क्योंकि आमजन तो यही देख रहे हैं कि पुलिस आई और न तो प्राथमिकी ही दर्ज हुयी व न तो शव का पोस्टमार्टम ही हुआ। आखिर इन सारे सवालों का जवाब तक तक अनसुलझा ही रह जाएगा जब तक कि जाँच  नहीं होती है।
(यहाँ दी गयी घटना की जानकारी कुछ स्थानीय लोगों से प्राप्त अपुष्ट खबरों  के अनुसार है।)
-महेश कुमार वर्मा
22.03.2019

Wednesday, September 30, 2015

दुष्कर्म व बलात्कार बनाम हमारा समाज

दुष्कर्म व बलात्कार बनाम हमारा समाज

आज लिंग भेद समाप्त कर महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा व हक दिलाने की बात कही जा रही है। भले ही कानून द्वारा महिलाओं को पुरुष के समान दर्जा मिल गया हो पर निचली स्तर पर हमारे समाज में आज भी महिलाएँ पुरुषों के अपेक्षा काफी निम्न स्तर का जीवन जी रही हैं व पुरुषों द्वारा शोषित, प्रताड़ित होने के साथ-साथ बलात्कार व दुष्कर्म का शिकार भी हो रही हैं। आखिर महिलाओं के साथ ऐसा क्यों होता है? क्या महिलाओं को सुखी पूर्वक व सम्मान के साथ जीने का हक नहीं है?
बलात्कार व दुष्कर्म के मामला को लेकर इस बात पर कई बार बहस छिड़ी है कि इन घटनाओं के लिए दोषी कौन है? सभी इस मामला में अपने-अपने ढ़ंग से तर्क देकर अपना-अपना पक्ष रखते हैं। कोई लड़की या महिला को तो कोई उनके पहनावा को तो कोई दुष्कर्मी युवक को तो कोई किसी और को दोष देता है। पर क्या हमने कभी यह सोचा है कि इन सब घटनाओं के पीछे हमारे सामाजिक व्यवस्था की कितनी दोष है? यह बात तो सही है ही कि यदि परिवार, विद्यालय व समाज द्वारा शुरू से ही सभी बच्चों (लड़का व लड़की दोनों) को सही संस्कार दिया जाए तो वे बच्चे बड़े होने पर भी संस्कारित रहेंगे व तब फिर ऐसी घटनाओं में कमी होगी। पर इसके अलावा भी हमें इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि आज भी हमारे समाज में लड़कियों व महिलाओं को उनके मौलिक अधिकार से वंचित किया जाता है व उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिलती है। इस कारण भी ऐसी घटनाओं में बढ़ोत्तरीहोती है।
आज हमारे समाज में क्या होता है? लड़कियों को किसी लड़के से बात करने या मिलने पर रोक लगायी जाती है। कोई लड़की व लड़का में दोस्ती है तब भी या यों भी वे खुलकर न मिल सकते हैं, न बात कर सकते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी लड़की व लड़का को बात करते कोई देख लिया तो फिर उस लड़की पर घर में व समाज में तरह-तरह के लांछन लगने शुरू हो जाते हैं व उनके साथ मारपीट भी होने लगती है। ................ आखिर ऐसा क्यों? लड़की को किसी के साथ खुलकर मिलने व बात करने का अधिकार क्यों नहीं है? क्या वह लड़की बनकर जन्म ली है सिर्फ इसीलिए? नहीं यह बात नहीं है। बात तो यह है कि यहाँ इस पुरुष प्रधान समाज में सारे नियम-कानून तो इस ढ़ंग से बने हैं कि सभी सुख-सुविधा व अधिकार पुरुष के पास हो व महिला को कोई अधिकार ही न मिले व महिला पुरुष के इशारे पर नाचे व पुरुष के लिए खिलौना बनकर रहे। .............. तब तो आज हमारे समाज में शादी के मामले में भी लड़की को अपने मन से अपने जीवनसाथी चुनने का भी अधिकार नहीं है। आज हमारे समाज में शादी में लड़की से उसके इच्छा-अनिच्छा के बारे में भी नहीं पूछा जाता है। बल्कि माँ-बाप अपने मन से किसी लड़के से उसकी शादी करा देते हैं। यदि लड़की उनके फैसले के विरुद्ध कुछ कह भी दे तो उसपर विचार नहीं होता है बल्कि उस लड़की को और भी खरी-खोटी सुननी पड़ती है। इस प्रकार लड़की अपनी जीवनसाथी के चुनाव में भी अपना विचार नहीं दे सकती है। और इस प्रकार माँ-बाप द्वारा लड़की की जो शादी करायी जाती है वह जबरन करायी गयी शादी ही होती है, जिसे जिंदगी भर लड़की को झेलना पड़ता है।
आखिर लड़की को अपने जीवनसाथी चुनने का अधिकार क्यों नहीं है? लड़की को किसी से स्वतंत्र रूप से मिलने और बात करने का अधिकार क्यों नहीं है? हमारे समाज की यह व्यवस्था सुव्यवस्था नहीं बल्कि एक कुव्यवस्था है। और इसी के परिणामस्वरूप यह होता है कि कोई लड़की-लड़का सामान्य रूप में भी यदि आपस में मिलते हैं या बात करते हैं तो वे अपने माँ-बाप या अभिभावक के नजरों से छिपकर मिलते हैं ताकि कोई उन्हें देखे न। और इसी तरह यदि किसी लड़की-लड़का में प्रेम हो जाता है तो वे हमेशा लोगों से नजरें चुराकर छिपकर मिलने लगते हैं। ............... यदि हमारे समाज में लड़का-लड़की के मिलने पर रोक न हो व लड़का-लड़की सभी को अपने जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार हो तब फिर ये लोग इस प्रकार छिपकर कभी नहीं मिलेंगे। पर हमारे समाज में ऐसी स्वतंत्रता नहीं है। जिस कारण ये लोग छिपकर मिलते हैं। पर इस प्रकार छिपकर मिलने में हमेशा उन्हें पकड़े जाने या मार खाने का डर भी बना रहता है। साथ ही इस प्रकार छिपकर मिलने में उन्हें न तो मिलने की संतुष्टि पूरी होती है और न तो बात करने की ही संतुष्टि पूरी होती है। बाद में उनकी स्थिति ऐसी हो जाती है की वे न तो घर-समाज से भागकर शादी ही कर पाते हैं न तो अपने प्रेम-प्रसंग की बात घर-समाज में कह ही पाते हैं। कितने भागकर शादी कर भी लेते है पर फिर भी यदि वे पकड़े जाते हैं तो उन्हें घर-समाज से डांट-डपट सुननी पड़ती है या फिर उन्हें समाज में रहने के लिए जगह भी नहीं मिलती है। आखिर ऐसा क्यों? लड़का हो या लड़की, क्यों नहीं सभी को स्वतंत्र रूप से जीने, लोगों से मिलने, बात करने व अपने जीवनसाथी चुनने का अधिकार है? हमारे समाज के इसी कुव्यवस्था का एक दुष्परिणाम यह भी है की इसी कुव्यवस्था में कुछ लड़के या युवक ऐसे हो जाते हैं जो अपने विपरीत लिंगी साथी से खुलकर न मिलने या न बात करने या हमेशा किसी भी विपरीत लिंगी से बात करने या मिलने में बाधा के कारण अपना मानसिक संतुलन इस हद तक खो देते हैं कि फिर उसका स्वभाव कामुकता हो जाती है और फिर वे किसी भी लड़की या महिला के साथ बलात्कार या दुष्कर्म की घटना को अंजाम दे देते हैं। वहीं इसी तरह मानसिक संतुलन खोने की स्थिति में कुछ युवक ऐसे हो जाते हैं जो झूठा प्यार का नाटक कर लड़कियों को फँसाना शुरू कर देते हैं। और इस तरह के झूठा प्यार में फँसे लड़कियों के साथ आगे धोखा ही होता है। ...................
इस प्रकार हमारे समाज में लड़की-लड़का को आपस में मिलने-जुलने या बात करने पर जो रोक लगी हुयी है तथा उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने व अपना जीवनसाथी चुनने का जो अधिकार प्राप्त नहीं है उस कारण ही दुष्कर्म व बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यदि हमारे समाज में लड़की-लड़का सबों को स्वतंत्र रूप से जीने, आपस में खुलकर किसी से भी मिलने, बात करने व अपना जीवनसाथी खुद चुनने का पूर्ण अधिकार मिल जाए तो निश्चित रूप से दुष्कर्म व बलात्कार जैसी घटनाओं में कमी आएगी।

-    महेश कुमार वर्मा
16.09.2015
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(इस आलेख में उल्लेखित विचार लेखक के निजी विचार हैं।)


Friday, August 23, 2013

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

31.12.2012  को मैं justice.verma@nic.in को मैं बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर अपना निजी विचार e-mail से लिखा था उसे मैं यहाँ हुबहू दे रहा हूँ. पाठक अपना विचार दें. 
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MAHESH KUMAR Verma 31 December 2012 11:13
To: justice.verma@nic.in
महेश कुमार वर्मा
Webpage : http://popularindia.blogspot.in
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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महाशय,
सरकार बलात्कारियों की सजा के संदर्भ में आम लोगों की से राय माँगी  है। इसी संदर्भ में यह ई-मेल किया जा रहा है जिसमें मेरा निजी विचार दिया जा रहा है।  --

बलात्कारियों की सजा क्या होनी चाहिए इस बात पर चर्चा करने से पहले मैं इस बात पर चर्चा करना चाहूँगा कि बलात्कार या कोई भी अपराध के लिए अपराधी को सजा देने का क्या उद्देश्य होना चाहिए? निश्चित रूप से सजा का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह अपराधी या अन्य भी पुनः भविष्य में वैसी अपराध करने का दुस्साहस न करे। और इस प्रकार अपराधी को सजा देकर अपराध मुक्त समाज की स्थापना करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही सजा तय की जानी  चाहिए। इस बात पर विचार करने पर हम पाते हैं कि किसी भी अपराध के लिए सजा ऐसा नहीं होना चाहिए की अपराधी को सजा के दौरान कुछ समय के लिए कष्ट तो हो पर फिर सजा के बाद उसमें सुधार नहीं पाया जाए तथा सजा ऐसी भी नहीं होनी चाहिए की सजा का असर सिर्फ उस अपराधी पर ही पड़े तथा अन्य उस सजा से सबक न ले व अपने में सुधार न करे। अर्थात सजा वैसी होनी चाहिए कि उस सजा के बाद अपराधी में सुधार हो और वह पुनः वैसा अपराध न करे तथा सजा से अन्य भी सबक ले व फिर कोई वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। यानि सजा का उद्देश्य सिर्फ अपराधी को कष्ट देना ही नहीं बल्कि अपराधी व समाज में सुधार लाना होना चाहिए।

इन सब बातों पर विचार करने पर हम पाते हैं कि पैसे वाले अपराधी के लिए आर्थिक दंड की सजा का कोई मतलब नहीं रह जाता है उसी तरह अपराध के लिए जान दाव पर लगाने वाले या मानव बम बनने वाले अपराधी के लिए वर्तमान तरीके से दी जाने वाली मौत की सजा (समाज से दूर अकेले में फाँसी देना) का कोई मतलब नहीं रह जाता है। हाँ, किसी अपराध में अपराधी को यदि मौत की सजा ही देनी है तो समाज के बीच  में उसे पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे तड़पा कर मौत की सजा दी जानी चाहिए और उसकी स्थिति को विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर प्रसारित किया जाना चाहिए ताकि उसे अन्य लोग भी देख सके और उसका असर ऐसा पड़े कि फिर कोई भी वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। वैसे एक दृष्टी से मौत की सजा उचित नहीं है क्योंकि हम मानव हैं और मानव को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी माना गया है। तो अपराधी को मौत की सजा देना हमारी / हम मानव की बुद्धिमत्ता नहीं है बल्कि हमारी बुद्धिमत्ता तो अपराधी में सुधार लाकर उसे स्वच्छ विचार वाला बना देने में है। और इस प्रकार मौत की सजा देने के स्थान पर उसे सार्वजानिक स्थान पर पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे रखे दिया जाए व साथ-साथ उसे उचित सिक्षा देकर उसमें सुधार का प्रयास भी किया जाए व उसमें सुधार लाया जाए। और फिर स्वच्छ विचारधारा के साथ उसे भी जीने का मौका दिया जाए। हाँ, उसे लगातार एकदम ही भूखे भी न रखा जाना चाहिए बल्कि अपना उसे अपना अपराध महसूस करने व अपने में सुधार के लिए सोचने व ऐसा करने के लिए जिंदा रहने के लिए कुछ दिनों के अंतराल पर भोजन या जो उचित हो देकर उसे जिंदा रखा जाना चाहिए। और सजा के दौरान यदि यह प्रतित नहीं होता है कि उसमें सुधार हो गया है तो जीवन भर उसे उसी तरह से उसी सजा में रखा जाना चाहिए। सार्वजानिक रूप से सजा दिया जाए ताकि अन्य लोग उसे उस स्थिति में देखकर सबक ले और फिर कोई भी वैसा अपराध न करे। सजा के दौरान उस अपराधी की स्थिति का प्रसारण विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर भी होनी चाहिए ताकि उस सजा को अधिकाधिक लोग देखे और उसका असर व्यापक रूप से पड़े व सजा का यह उद्देश्य सफल हो कि फिर कोई ऐसी अपराध करने का दुस्साहस न करे।

हाँ, मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यहाँ भूखे रखने की सजा मौत / फाँसी की सजा के स्थान पर रखना उचित समझता हूँ पर किस अपराध में ऐसी सजा की व्यवस्था हो इसकी चर्चा मैं यहाँ नहीं कर रहा हूँ। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वर्तमान में जिस तरह से समाज से दूर फाँसी की सजा दी जाती है उससे अन्य अपराध प्रवृति के व्यक्ति पर विशेष असर नहीं पड़ता है क्योंकि उनकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की ही रहती है और उसके सामने सजा न होने पर उसकी मानसिकता में बदलाव नहीं आता है।

अब में आता हूँ बलात्कार पर सजा की बात पर। बलात्कारी की सजा क्या होनी चाहिए -- वास्तव में यह एक महत्तवपूर्ण प्रश्न है। वास्तव में बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या यौन शोषण एक जघन्य अपराध है और इस अपराध के साथ अपराधी पशुता से भी नीचे गिर जाता है। इस अपराध के बाद अपराधी मानव कहलाने लायक नहीं रह जाता है। अतः निश्चित रूप से ऐसे अपराधी को कड़ी-से-कड़ी सजा मिलनी चाहिए तथा सजा ऐसी होनी चाहिए जिसका समाज पर व्यापक असर हो और फिर कोई भी ऐसी अपराध करने का विचार भी मन में न लाए। मेरे विचार से ऊपर मेरे द्वारा बताये गए भूखे रखने की सजा से भी कठोर सजा इस अपराध के लिए होना चाहिए। पर वह कठोर सजा क्या हो इसपर गंभीरता से सोचकर तय किया जाए। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वह कठोरतम सजा जो भी हो पर इस अपराध में पीड़िता के ईलाज में खर्च व पीड़िता को दी जाने वाली मुवावजा की रकम अपराधी से वसूल किया जाना चाहिए।

अंत में मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि सजा तो अपराध हो जाने के बाद दी जाती है। हमें वैसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अपराध हो ही नहीं। और ऐसी व्यवस्था के लिए हरेक मामला पर उचित व्यवस्था, उचित प्रशासन तथा उचित व त्वरित कार्रवाई के साथ-साथ प्रारंभ से ही बच्चों को उचित शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि आगे बढ़कर उसकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की न बने।

धन्यवाद।

आपका -
महेश

Sunday, December 30, 2012

मुझे जन्म ही लेने क्यों दिया


 मुझे जन्म ही लेने क्यों दिया



आज उस समय मेरे आँखों में आंसू आ गए जब मैंने देखा की लडकियां असुरक्षा के कारण खुद को गर्भ में ही मार देने की बात उठाई। जी हाँ, 16.12.2012 के दिल्ली के सामूहिक दुष्कर्म और फिर पीड़िता की मौत को लेकर पटना के कारगिल चौक पर लोग शोक में मौन रखे। साथ ही न्याय के लिए नारा लगा रहे थे जिसमें लड़के-लड़कियों के हाथ में विभिन्न नारा लिखे पोस्टर थे जिसमें एक पर लिखा था - "KILL ME IN THE WOMB IF YOU CAN'T PROTECT".

बिडंबना है कि एक और लोग कन्या भ्रूण हत्या रोकने की बात करते हैं वहीं दूसरी और असुरक्षा के कारण लडकियां यह कहने को मजबूर है कि यदि उनकी सुरक्षा नहीं हो सकती है तो उसे गर्भ में ही मार दिया जाए। सोचें, उनका कहना भी सही है। हमें बदलाव लाना होगा। लड़की व महिला को सुरक्षा देना होगा। मानते हैं कि बलात्कार जैसी घटना बलात्कारी के गलत मानसिकता का प्रभाव है पर ऐसी घटना रुकने का नाम नहीं ले रही है तो ऐसे में लड़कियां यह सवाल उठाएगी ही कि क्या उसकी यही गलती है कि वह लड़की है? यदि उसकी यही गलती है और इस कारण उसे सुरक्षा नहीं मिलेगा तो उसे जन्म ही क्यों लेने दिया गया?

हमें हरेक परिस्थिति पर विचारना होगा। यह बात भी सही है कि हमारे समाज में जो बाल-विवाह हो रहे हैं उसके कारण में अन्य कारणों के अलावा एक कारण यह भी है कि सयानी कुवांरी लड़की सुरक्षित नहीं है और इसी कारण माँ-बाप जल्द ही शादी कर उसे ससुराल भेज देना चाहते हैं।

-- महेश कुमार वर्मा
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