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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
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Thursday, January 10, 2013

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष


मित्रों,



कुछ दिन बाद राष्ट्र 64वाँ गणतंत्र दिवस मनाएगा। भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष हो गए पर यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भी आम लोग नारकीय जीवन जी रहे हैं। ये पग-पग पर जुल्म व अन्याय के शोषण हो रहे हैं  आज ये न तो सुरक्षित हैं न तो इन्हें उचित न्याय ही मिल पाता है। हर ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। गलत व अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने पर ये और भी असुरक्षित हो जाते हैं, साथ ही ऐसी स्थिति में इनके साथ गलत व अन्याय और भी बढ जाता है। आज न्याय पाना भी मुश्किल हो गया है। अदालत में भी न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को उसके जिन्दा रहते न्याय मिल ही जाएगा यह कहना भी मुश्किल है, तथा जबतक न्याय नहीं मिला तबतक वे मानसिक पीड़ा झेलते रहते हैं।  कितने लोग इस प्रकार के जुल्म, शोषण व अव्यवस्था के शिकार से मानसिक रुप से इतने प्रताड़ित होते हैं कि ऊब कर वे या तो मौत को गले लगा लेते हैं या अपराध जगत में कदम रख देते हैं।



सोचें कि इस प्रकार के परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर कब हमें स्वच्छ व अपराध मुक्त समाज मिलेगी?



-- महेश कुमार वर्मा

Sunday, July 15, 2012

परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास करें


परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास करें

यह सभी जानते हैं कि परीक्षा में कदाचार से विद्यार्थी के शिक्षा का सही आकलन नहीं हो पाता है.  और कदाचार के द्वारा परीक्षा पास कर उच्चतर वर्ग में नामांकन लेने के बाद फिर विद्यार्थी किस प्रकार क्या सीख पाएगा यह आप समझ ही रहे हैं.  वे कभी भी अपने विषय का सही ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकेंगे. पर इतना समझने के बावजूद भी विद्यार्थी व उनके अभिभावक किसी भी तरह से कदाचार से परीक्षा पास करना ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं.  और इस कार्य में अभिभावक की अलावा स्कूल, कॉलेज, इंस्टीच्यूट के परीक्षा संचालन के स्टॉफ सहित केन्द्राधीक्षक की भी अहम भूमिका रहती है.  और वे तो अब कदाचार के सीमा को इतना तक पार कर गये हैं कि इसके बाद तो परीक्षा शब्द का मतलब ही नहीं रह जाता है.  ...........  परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास होना, प्रश्न का उत्तर लिखे बिना परीक्षा पास होना .............. ये सब इन्हीं कदाचार के उदाहरण हैं.  ..................  जी हाँ, इस तरह के कदाचार भी जोर-शोर से चल रहा है व संबंधित पदाधिकारी का पॉकेट भी अच्ची तरह से गरम हो रहा है.  और इस तरह की घटनाएँ छोटे परीक्षाओं से लेकर अच्छे-अच्छे विश्वविद्यालय के परीक्षाओं में भी हो रही है.  ................  ऐसा ही एक घटना मैं आपको सुनाना चाहता हूँ जो परीक्षा के इस कदाचार को भी प्रमाणित करती है व कदाचार में सेंटर के डायरेक्टर का साथ नहीं देने पर किस प्रकार वे एक ईमानदार स्टॉफ को कार्य पर नहीं रखते हैं, यह भी स्पष्ट होता है.  तो सुनें वह घटना जो मेरे ही साथ घटी है -
27 जनवरी 2012 की बात है – मेरी मुलाकात मौलाना मजहरूल हक अरबी एवं फारसी विश्वविद्यालय (Maulana Mazharul Haque Arbic and Persian University) के अंतर्गत चलने वाले Patliputra Institute of Technology and Management, Patliputra Colony, Patna डायरेक्टर Prof. V. K. Singh (Mob. No.: 9386803802) से हुयी.  मुझसे मिलने के बाद वे मुझसे प्रभावित हुये.  वे मुझे अपने यहाँ कार्य पर रखना चाहे.  मैं भी अच्छा कार्य ढूँढ ही रहा था.  ............  वे मुझसे बातचीत कर मेरा Resume विचारार्थ रख लिए.  कुछ दिनों के बाद वे मुझे बुलाये व Computer पर कार्य करवाकर मेरा Interview लिए व फिर मेरा सारा Certificates का Xerox Copy व एक फोटो जमा करवा लिए.  ......................
इसके बाद वे मुझे रोज बुलाने लगे तथा मेरा कागजात University भेज दिए हैं ............... आज order होगा ............. कल order होगा .......... Registrar अभी बाहर गये हुए हैं, वे आएँगे तब order हो जाएगा ............... आपका selection बेगुसराय सेंटर के लिए confirm है ................. 1 मार्च को joining करना है .............. Registrar बीमार पड़ गए हैं ............. – इस प्रकार की बात वे करने लगे पर वे मुझे रोज आकर मिल लेने के लिए कहते थे.
इसी तरह की बातें कई दिनों तक होती रही.  इसी बीच 17.02.2012 से उस centre पर यानी Patliputra Institute of Technology and Management पर B. Com. की परीक्षा प्रारंभ होने वाली थी.  इस परीक्षा के लिए Director V. K. Singh मुझे एक परीक्षार्थी का परीक्षा का copy लिखने के लिए कहे.  मुझे copy मिलता और मैं उसे अपने घर पर ले जाकर लिखता ............ इस कार्य के लिये वे मुझे पैसे का प्रलोभन भी दिए.  उसी तरह मैं यहाँ भी इस कार्य से इंकार नहीं किया जिस प्रकार मैं RSBY के कार्य में इंकार नहीं किया था. .................  17 तारीख आने पर University के Programme के अनुसार परीक्षा प्रारंभ हो गयी पर उस परीक्षार्थी का copy नहीं लिखा गया.  एक दिन Director V. K. Singh पुनः कह रहे थे कि copy रखा हुआ है, कहो तो दे देते हैं लिख दो ........... पर वे सिर्फ अपना फायदा ही देख रहे थे, वे मुझे पहले पैसा देने के लिए तैयार नहीं हुए और मैं स्पष्ट कह दिया कि पहले payment होगा तब लिखेंगे और इस प्रकार मैं copy लिखने के लिए तैयार नहीं हुआ.  .................  इसपर वे मुझपर गुस्सा गये व बोले कि जब तुमको मुझपर विश्वास ही नहीं है तो फिर मैं क्यों तुमको रखूँगा, जाओ यहाँ से ................ पर फिर बाद में मेरा appointment का order के बारे में पता करने के लिए बोले.  ................  पर अंततः 25 या 26 फरवरी तक यह कार्य नहीं हुआ.  फिर आगे मैं पुछना भी छोड़ दिया.  इसके बाद मैं न तो उनसे मिला न तो फोन ही किया.  .......................
इस घटना से क्या निष्कर्ष निकलता है, आप खुद समझ सकते हैं.  ..................... यह तो स्पष्ट ही है कि मौलाना मजहरूल हक अरबी एवं फारसी विश्वविद्यालय के Patliputra Institute of Technology and Management, Patliputra, Patna में परीक्षार्थी को centre पर गए बिना भी परीक्षार्थी का copy लिखा जाता है व परीक्षा के दिन बित जाने की बाद भी copy लिखा जाता है. ............................
अब आप सोच सकते हैं कि जहाँ नितिश सरकार के कार्यकाल में विकास की चर्चा है वहाँ वास्तव में यह राज्य विकास की ओर है या शिक्षा-जगत में इस प्रकार के कदाचार से पतन की ओर है?  ........................  और आप सोचें कि शिक्षा-जगत में इस प्रकार के कदाचार से क्या बिहार या हमारा देश कभी विकास कर पाएगा?

-- महेश कुमार वर्मा


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Thursday, January 28, 2010

आरक्षण नीति : उचित या अनुचित

मैंने अपने पिछले पोस्ट में बताया कि किस प्रकार सरकार जाति के आधार पर समाज को बाँट रही है। सरकार जाति के आधार पर आरक्षण करके देश को विकाश के ओर ले जा रही है या पतन की ओर? विचारने पर यह बात सामने आता है कि जाति के आधार पर या किसी भी आधार पर आरक्षण होने के कारण योग्य उम्मीदवार का चयन न होकर अयोग्य उम्मीदवार का चयन करना पड़ता है। जी हाँ, जिस वर्ग के लिए जो आरक्षण है उसे उस आरक्षण का लाभ देने के लिए यदि उस वर्ग विशेष में योग्य उम्मीदवार नहीं है तो अयोग्य को चुन लिया जाता है भले ही उसका परिणाम जो भी हो। ऐसा प्रतियोगी परीक्षा से लेकर राजनीति तक में हो रही है। आप खुद देखें -- चुनाव में जो सीट किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षित रहता है तो उस क्षेत्र में उस वर्ग विशेष के बाहर के कोई व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि यदि उस आरक्षित वर्ग विशेष में यदि योग्य व्यक्ति न भी हैं तो किसी भी अयोग्य ही सही, व्यक्ति चुनाव लड़ते हैं और जितने के बाद ......................... अयोग्य व्यक्ति जितने के बाद क्या करेंगे यह आप समझ ही सकते हैं। इस प्रकार आरक्षण की इस व्यवस्था से हमारा देश उन्नति की ओर नहीं बल्कि पतन की ओर ही जाता है। कितने सीट महिला के लिए आरक्षित रहती है। वहाँ यदि कोई योग्य महिला नहीं रहती है तो फिर उसी तरह आरक्षण के कारण किसी न किसी महिला को ही जन प्रतिनिधि बनना पड़ता है। पर जितने के बाद क्या वह अपने विवेक से कुछ कर पाती है। उसका सारा कार्य उसका पति या कोई अन्य करता है। वह तो सिर्फ नाम का ही जन प्रतिनिधि रहती है। अब आप बताएं कि जब जितने के बाद भी वहाँ उसका पति या अन्य ही कार्य करता है तो महिला के नाम पर उस आरक्षण का क्या हुआ? ऐसी स्थिति सिर्फ चुनाव में ही नहीं, सरकारी नौकरियों व प्रतियोगी परीक्षाओं में भी है। और वहाँ आरक्षण के कारण अयोग्य को भी बड़े से बड़े जिम्मेदारी वाला कार्य सौंप दी जाती है और इसका सीधा असर आम जन पर पड़ता है।
इस प्रकार आरक्षण की निति से देश उन्नति की ओर नहीं बल्कि पतन की ओर ही जाती है। सरकार को यह समझना चाहिए कि कमजोर वर्ग को ऊँचा उठाने के लिए आरक्षण नहीं बल्कि उसे वैसी व्यवस्था व साधन चाहिए जिससे वह अपने को मेधा सूचि में ला सके। और फिर बिना किसी जाति के आधार पर वह आरक्षित श्रेणी से आए नहीं कहलाकर योग्य कहलाये।
ऊँची डाली को छूने के लिए हमें ऊपर उठना चाहिए न कि डाली को ही झुकाना चाहिए। उसी तरह कमजोर को योग्य बनाकर उसे कार्य सौंपे न कि आरक्षण से कार्य को ही झुका दें।
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पाठक अपना निष्पक्ष विचार देने की कृपा करें।
आपका
महेश

Tuesday, January 26, 2010

देश से अपराध भगाना है, खुशहाल जीवन लाना है।

आज राष्ट्र 61 वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। भारत को स्वतंत्र हुए 62 वर्ष व गणतंत्र हुए 60 वर्ष हो गए। पर इतने अवधि में हमने क्या पाया? क्या देश के आम नागरिकों को देश के विकाश का वास्तविक फायदा मिल पाया है? इस बात पर विचारने पर हम पाते हैं कि कहने के लिए देश कितनी भी प्रगति क्यों न कर लिया हो पर आम लोगों के जीवन में इस प्रगति का कोई फायदा नहीं है। आज देखें हरेक जगह बेईमानी व भ्रष्टाचार फैला है और इसका सीधा असर आम जन पर पड़ रहा है। पर इस प्रकार के स्थिति के लिए जिम्मेवार कौन है? इसके लिए जिम्मेवार देश के बाहर के कोई दुश्मन नहीं बल्कि देश में ही रहने वाले हम व आप सहित पूरा देश है। और यदि हम अपने देश के अंदरूनी भ्रष्टाचार पर काबू नहीं पाएंगे तो वह दिन दूर नहीं जब हम पुनः अपने देश के अंदर के ही दुश्मन के गुलाम बन जाएंगे। हमें जागना होगा व देश के दुश्मन को भगाना होगा और इसके लिए हम सबों को साथ मिलकर चलना होगा। तो आएं अपने देश के अंदर फैले अपराध, बेईमानी व भ्रष्टाचार को समाप्त कर व देश में मानवता व सच्चाई-ईमानदारिता के धर्म की स्थापना कर देश को अपराध मुक्त व खुशहाल बनाने में अपना सहयोग करें।

देश से अपराध भगाना है।

खुशहाल जीवन लाना है॥

जय हिंद।

जय भारत॥

Sunday, December 13, 2009

जागो बहना जागो

हर परिवार, हर जाति, हर समाज में शादी बड़ी धूमधाम से होती है। शादी को लोग मांगलिक व शुभ मानते हैं। दुल्हन अपने बाबुल के घर को छोड़कर पिया संग ससुराल जाती है और फिर वही ससुराल ही उसका घर-परिवार हो जाता है। दुल्हन का एक नया जीवन शुरू होता है। ससुराल में दुल्हन को अपने बाबुल के घर से भिन्न परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। अपने नए जीवन के विषम परिस्थिति में दुल्हन को अपने को ढालना पड़ता है। उसी प्रकार दूल्हा को भी अपने जीवनसाथी के साथ सामंजस्य स्थापित कर रहना पड़ता है ताकि दोनों की जीवन रूपी नैया सही ढंग से चल सके।
हर माँ-बाप अपने संतान के लिए चाहते है कि उसका जीवन सही ढंग से बीते। कन्या के व्यस्क होते ही माँ-बाप उसके लिए योग्य वर के तलाश में लग जाते हैं। पर दहेज समस्या व गरीबी के कारण कितने माँ-बाप कम उम्र में ही अपनी बेटी की व्याह रचा देते हैं तो कितने योग्य वर न ढूंढ़ पाते हैं और किसी तरह बेटी का व्याह रचाकर छुट्टी कर लेते हैं। हरेक लड़का-लड़की को अपने जीवन-साथी के संदर्भ में मन में एक सपना / एक ईच्छा / एक ख्वाहिश रहती है या उसके होने वाले दूल्हा या दुल्हन कैसी है यह जानने की इच्छा होती है। पर हमारे समाज में बेटी के व्याह में बेटी से उसके शादी के बारे में कोई राय नहीं ली जाती हैं। यहाँ तक कि उसके भावी वर के बारे में भी उसे जानकारी नहीं दी जाती है। बेटी संकीर्ण मानसिकता के समाज में इस प्रकार से दबी व फँसी रहती है कि वह अपने शादी के बारे में अपना विचार किसी से कह भी नहीं सकती है। जिस लड़का से उसकी शादी ठीक की जा रही है उसके बारे में वह किसी से पूछ भी नहीं सकती है और यदि उसे उस लड़का के बारे में कोई ऐसी बात मालूम भी होती है जिस कारण वह उसके साथ शादी न करना चाहे तो यह बात भी वह किसी को बता नहीं सकती है और यदि वह अपने ही शादी में अपनी ओर से कुछ कही तो उसपर तमाम इल्जाम लगने में भी देर न होती है। तो इस प्रकार अपने ही शादी में लड़की अपने इच्छानुसार कुछ भी नहीं कर सकती है। शादी में न तो लड़की के इच्छा को स्थान दिया जाता है, न तो उससे कुछ पूछा ही जाता है, न तो उसका कुछ सुना ही जाता है। और इस प्रकार बुद्धि-विवेक रहते हुए भी वह लड़की कठपुतली के समान रहती है और जबरन उसकी शादी किसी लड़के से करा दी जाती है चाहे वह उस लड़की को पसंद हो या न हो। लड़की को वह लड़का पसंद नहीं है या लड़की से कोई विचार नहीं लिया जाए और उसकी शादी करायी जाती है तो यह शादी जबरन नहीं तो और क्या है?
इस प्रकार लड़कियों के जबरन शादी हमारे समाज में लगभग सभी घरों में हो रहे हैं। पर सोचें कि क्या यह जबरन शादी उचित है? एक समय हमारे देश में स्वयंवर की प्रथा थी, जहाँ कन्या को भी ख़ुद अपना वर चुनने का अधिकार था। पर आज वहीं उस
की कुछ नहीं सुनी जाती है और जबरन उसकी शादी करा दी जाती है।

हमारे समाज में इस तरह के कार्य हमारी पतितता को ही दर्शाता है। हमें अपने समाज के इस कृत्य पर शर्मिंदगी होनी चाहिए। मैं अपने देश के तमाम बहनों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे महिला प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाएं।
देश के बहना तुम जागो
तुम मानव हो
तुममे बुद्धि-विवेक है
तुम्हारी चुप्पी ही तुम्हें दबाती है
अतः अपने बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करो
अन्याय के विरुद्ध लड़ो
समाज से महिला प्रताड़ना को उखाड़ फेंको
व महिलाओं को शीर्ष स्थान पर स्थापित करो
जागो बहना जागो
जागो बहना जागो

Friday, August 14, 2009

स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प

कल १५ अगस्त, २००९ को राष्ट्र स्वतंत्रता की ६२वीं वर्षगाँठ मना रहा है। लोग इस अवसर को मनाने के लिएतरह-तरह की तैयारियाँ किए हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि आज हम अपने को कैसे स्वतंत्र कहें? क्यों? आप खुद देखें व सोचें कि क्या आज हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? आज हमें किस चीज की स्वतंत्रता मिली है, इसपर सोचें। आज हमें न तो न्याय पाने का अधिकार है न तो आज हमें अन्याय के विरुद्ध बोलने का अधिकार है। इतना ही नहीं हमारी कितनी ही अधिकारों का आज हनन हो गया है। बच्चे पढने व खेलने के लिए भी स्वतंत्र नहीं हैं और उन्हें काम पर लगा दिया जाता है। और जब उन्हें काम पर लगाया जाता है तो भी फिर उन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती है। तब फिर हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं? आज हम देखते है कि किसी के साथ जब अन्याय होता है तो वह अपनी शिकायत भी नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी शिकायत सुनने व फिर उसपर कारवाई होने तक उसे इतना परेशान होना पड़ता है कि उसे न्याय कोसों दूर दिखाई पड़ती है। यदि वह उस पर लगा भी रहा तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसे न्याय मिल ही जाएगा। तब फिर ऐसी स्थिति में हम कैसे अपने को व अपने देश को स्वतंत्र कहें?
हाँ, यहाँ अपराधी स्वतंत्र जरुर हो रहे हैं और अब वे बेहिचक अपराध को अंजाम दे रहे हैं और फिर उसके विरुद्ध कार्रवाई में कमी हुई है। यह कोरी बात नहीं बल्कि वास्तविकता है।
तब फिर हम स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाएँ? आखिर किस मुँह से हम अपने व अपने देश को स्वतंत्र कहें? क्या हम व हमारे देश अपराध को नियंत्रित करने के लिए नहीं बल्कि अपराध को बढ़ाने के लिए हैं। नहीं, हमें व हमारे देश को ऐसा नहीं बनना है। आएँ इस स्वतंत्रता दिवस में अपने देश को अपराध मुक्त बनाने में एक-दुसरे का सहयोग करने का संकल्प लें।


-- महेश कुमार वर्मा
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स्वतंत्रता दिवस पर अन्य रचनाएँ

Saturday, January 24, 2009

गणतंत्र दिवस : एक प्रश्न

दो दिनों के बाद २६ जनवरी २००९ को हम गणतंत्र दिवस के ५९ वीं वर्षगाँठ मनाएँगे। प्रश्न उठता है की हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाएँ? क्या सिर्फ इसलिए कि हम भारतीय है? जरा सोचें कि हमारे देश भारत वर्ष को स्वतंत्र हुए आज ६१ वर्ष वर्ष व गणतंत्र हुए ५९ वर्ष बीत गए पर आज तक देशवासियों को वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार नहीं मिली है?

कानून के पुस्तकों में व कागजी घोषणाओं में तो देशवासियों को सारी सुविधाएँ, वास्तविक स्वतंत्रता व उचित अधिकार मिल गयी है। पर वास्तविकता इनसे कोसों दूर है। वास्तविकता के जमीं पर हम आयें तो हम देखेंगे कि आज देशवासी ख़ुद अपने ही देश में गुलामी की स्थिति में जी रहे हैं। इन्हें न तो वास्तविक स्वतंत्रता मिली है न तो उचित अधिकार मिला है और न तो जरुरत पड़ने पर इनके साथ उचित न्याय ही होता है।

यह बात सिर्फ कहने-सुनने के लिए ही नहीं बल्कि वास्तविकता है। आप ख़ुद देखें आज बच्चों को उचित शिक्ष भी नहीं मिल पाती है। उन्हें पढने व खेलने का भी अधिकार नहीं है और बचपन से ही उनसे मजदूरी करायी जाती है। ....... आज महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ने का भी अधिकार नहीं है और महिला वर्ग हमेशा पुरुषों द्वारा प्रताडित ही होती रहती है। आज पीड़ित को उचित न्याय नहीं मिल पाता है और तंग आकर वह अपराधी भी बन जा रहा है। आज भारत में न्यायप्रिय राजा नहीं है बल्कि यहाँ सभी मुद्राप्रिय हैं। कभी दुनियाँ को धर्म की शिक्षा देने वाला भारत आज खुद भ्रष्टाचार, बेईमानी व तरह-तरह के जुल्म के खाई में गिरा हुआ है। और इसके लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका के साथ-साथ खुद हमारे समाज हैं। जी हाँ, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। आज हमारे न्यायपालिका व कार्यपालिका की व्यवस्था ऐसी है कि आज अन्याय व जुल्म के सताए व्यक्ति को उचित न्याय भी नहीं मिल पाता है। पुलिस से लेकर अदालत तक सभी मुद्राप्रिय हो गए हैं और यहाँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुद्रा के आधार पर न्याय होता है। ऐसे कई मामला देखे जाते हैं जहाँ न्यायलय में न्याय करने के लिए बैठे हमारे न्यायाधिश भी पैसे लेकर पैसे वाले के पक्ष में फैसला सुनाते हैं। अपराध बढ़ाने में तो शायद सबसे बड़ा हाथ समाज से अपराध को मुक्त कराने के लिए बैठे हमारे पुलिसिया तंत्र का ही है। जहाँ यदि आप अपने ऊपर हुए किसी जुल्म व अन्याय के शिकायत करने जाएँ तो आपके साथ क्या जुल्म हुआ यह नहीं देखा जाता है बल्कि देखा जाता है कि आपके पास क्या पैसा है। इतना ही नहीं, अपराधी अपना लाभांश इन पुलिस को देकर ही अपने अपराध के व्यवसाय में दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति कर रहे हैं। ................. अपराधों को बढ़ाने में हमारा समाज भी पीछे नहीं है। भ्रूण-हत्या हो या बच्चों व कन्या को शिक्षा से वंचित करना व बाल मजदूरी का अपराध हो या महिलाओं को प्रताड़ित करने का मामला हो या दहेज़ समस्या हो, इन सब अपराधों की जड़ हमारा समाज ही है और इसमें कोई दो राय नहीं की इसी समाज में ये अपराध पल व बढ़ रहे हैं। .........................

इन सारे जुल्म व शोषण के शिकार होते हैं एक भोले-भाले आम नागरिक जिनके पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है और वे शारीरिक व मानसिक कष्ट में अपने जीवन बर्बाद करते रहते हैं। आप खुद सोचें कि हमारे देश में इतनी समस्याएँ व अराजकता रहने के बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं। जहाँ न्यायलय मैं भी न्याय नहीं मिलता है तो हम कैसे कह सकते है कि हमारा देश गणतंत्र है? .................... और ऐसी स्थिति में हमें गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? ........ आयें अपने समाज व देश से अन्याय, भ्रष्टाचार व जुल्म को उखाड़ फेकने के लिए कदम आगे बढाकर राष्ट्रहित में कार्य करें।

धन्यवाद।

आपका

महेश कुमार वर्मा

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इन्हें भी पढ़ें :

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पंच : परमेश्वर या पापी

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मुर्ख मनुष्य

बकरे की जुबान

Friday, December 5, 2008

शहीदों को श्रद्धांजलि

क्या फायदा हुआ तुम्हें

किसी का घर सुना करके

किसी के मांग का सिंदूर उतार के

किसी को अनाथ करके

किसी को यों ही तड़पा के

किसी को बेमौत मार के

क्या फायदा हुआ तुम्हें

सबों को दर्द देके

है तुम्हारे पास कोई जवाब

नहीं है

क्योंकि तुम ख़ुद बेदर्द हो

क्या जानोगे दुसरे के दर्द

पर याद रखना

परमात्मा के दरबार में

तुम्हें तुम्हारे हर कर्म का जवाब देना होगा

हर कर्म का जवाब देना होगा

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शहीदों को श्रद्धांजलि

-- महेश कुमार वर्मा

Thursday, September 4, 2008

ये रिश्ता चीज होती है क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या
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पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

था कभी भाई-भाई का रिश्ता
कभी न बिछुड़ने वाला रिश्ता
जो हमेशा साथ-साथ खेलता
हमेशा साथ-साथ पढ़ता
हमेशा साथ-साथ खाता
हमेशा साथ-साथ रहता
पर आज जब वे बड़ा व समझदार हुए
तो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हुए
हथियार लेकर दोनों आमने-सामने हुए
भाई-भाई का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


किया था शादी पति-पत्नी के रिश्ता के साथ
जीवन भर साथ निभाने को
पर रह गयी दहेज़ में कमी
तो न दिया उसे साथ रहने को
और जिन्दा ही पत्नी को जला डाला
क्योंकि था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
जीवन भर साथ निभाने का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


था पिता-पुत्र का रिश्ता
पिता ने उसे अपने बुढ़ापे का सहारा समझा
पर उसने तो दुश्मन से भी भयंकर निकला
निकाल दिया पिता को घर से
भूखे-प्यासे छोड़ दिया
नहीं मरा पिता तो उसने
जहर देकर मार दिया
बुढ़ापे का सहारा आज उसी का कातिल बना
था इन्सान पर आज वह हैवान बना
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या

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http://merekavimitra.blogspot.com/2008/08/rishte-par-kavitayen-kavya-pallavan.html#mahesh

Tuesday, July 22, 2008

मुझे भी जन्म लेने दो

तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो


रचनाकार : महेश कुमार वर्मा
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Sunday, July 20, 2008

कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं........


यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। ........आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। ........... यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना या उससे घृणा करना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ................

--महेश कुमार वर्मा

दिनांक : २०।०७।२००८

स्थान : पटना

लेखक : MAHESH KUMAR VERMA

पता : DTDC Courier Office,

Satyanarayan Market,

Opposite Maruti (KARLO) Show Room,

Boring Road, Patna (Bihar)

PIN-800001 (INDIA)

E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com

Webpges : http://popularindia.blogspot.com/

http://aatm-chintan.blogspot.com/

http://dharm-darshan.blogspot.com/

Contact No. : +919955239846

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भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध

जघन्य अपराध

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