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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

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Wednesday, December 31, 2008

नव वर्ष के शुभ किरण

नव वर्ष के शुभ किरण


नव वर्ष के शुभ किरण
स्‍वच्‍छ करे मेरा तन व मन
चले एक ऐसा पवन
कि झूम उठे सारा चमन
हर कलियाँ खिलती रहे
हर बगिया महकती रहे
मज़हब की खुशबु उठती रहे
ज्ञान की धारा बहती रहे
नव वर्ष के शुभ किरण
स्‍वच्‍छ करे मेरा तन व मन
स्‍वच्‍छ करे मेरा तन व मन

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सबों को नव वर्ष की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

Friday, December 5, 2008

शहीदों को श्रद्धांजलि

क्या फायदा हुआ तुम्हें

किसी का घर सुना करके

किसी के मांग का सिंदूर उतार के

किसी को अनाथ करके

किसी को यों ही तड़पा के

किसी को बेमौत मार के

क्या फायदा हुआ तुम्हें

सबों को दर्द देके

है तुम्हारे पास कोई जवाब

नहीं है

क्योंकि तुम ख़ुद बेदर्द हो

क्या जानोगे दुसरे के दर्द

पर याद रखना

परमात्मा के दरबार में

तुम्हें तुम्हारे हर कर्म का जवाब देना होगा

हर कर्म का जवाब देना होगा

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शहीदों को श्रद्धांजलि

-- महेश कुमार वर्मा

Monday, December 1, 2008

याद

याद

हर रोज तुम आती हो
हर वक्त साथ रहती हो
तुम्हारे साथ रहने के कारण ही
मैं राह चल पाता हूँ
तुम साथ रहती हो
पर फिर भी
नहीं कर पाता तुम्हारा शरीर-स्पर्श
कारण तुम शरीर से नहीं
बल्कि तुम्हारी सिर्फ याद आती है
तुम्हारी सिर्फ याद आती है

तुम्हारी याद में वो बल है
जो मुझे आगे बढ़ाता है
तुम्हारी याद में वो आकर्षण है
जो मुझे तुम्हारे करीब लाता है
तुम्हारी याद में वो एकता है
जो हमदोनों को एक बनाता है
तुम्हारी याद में वो संजीवनी है
जो मुझे जीवित रखता है
तो भला तुम्हारी याद कैसे न आए
तुम्हारी याद कैसे न आए



-- महेश कुमार वर्मा

Sunday, November 30, 2008

एक भिखारी ऐसा भी

देखा मैं एक ऐसा भिखारी

जो खा रहा था खैनी

सोचा

पेट भरने के लिए

कुछ नहीं है उसके पास

माँगता है कुछ लेकर आस

दया करके

कोई कुछ खाने देता है

कोई कुछ पैसे देता है

पर वह

वह भिखारी

मिले पैसे से

खैनी खाता है

सोचने पर मैं मजबूर हुआ

कि इसे पैसे देना

पुण्य है या पाप है

पुण्य है या पाप है

यह कोई कविता नहीं

नहीं यह कोई कहानी है

यह मेरी आँखों देखी हकीकत है

आँखों देखी हकीकत है

आप भी विचारें

उसे भिक्षा में पैसे देना

पुण्य है या पाप है

पुण्य है या पाप है

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मेरी आँखों देखी हकीकत पर आधारित

-- महेश कुमार वर्मा

क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया

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क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया


मेरे बेटों की नजरों में मैं बुढ़ा हो गया
उनकी नजरों में मैं बेकार हो गया
अब नहीं मैं उनके किसी काम का
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया
इसीलिए तो उसने मुझे घर से निकाला
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया॥

उनकी नजरों में
मुझे निकालकर
वे चैन से रह पाएँगे
आराम से सो पाएँगे
नहीं होगा तब
कोई उनके ऊपर
अपना मालिक
ख़ुद वे ही रहेंगे
न कोई बोलने वाला रहेगा
न कोई टोकने वाला रहेगा
जो मर्जी होगा
अपनी इच्छा से करेगा
कुछ नहीं तो कम-से-कम
बुढे बाप के सेवा से तो छुटकारा मिलेगा
बस इसीलिए उसने मुझे निकाला।
बस इसीलिए उसने मुझे निकाला॥

पर, ऐ दुष्ट पुत्र!
क्या तुमने कभी ये है सोचा
कि किसने तुझे उंगली पकड़कर
चलना है सिखाया
क्या तुमने कभी ये है सोचा
कि तुम्हारे जन्म के बाद
किसने तुम्हारी परवरिश की
कि किसके कारण आज तुम पढ़-लिख कर
बड़ा होकर गौरवान्वित महसूस करते हो
क्या तुमने कभी ये है सोचा
कि किसके गोद में तुम घूमते थे
और किस प्रकार तुमने
एक-एक शब्द करके बोलना सीखा।

तुम्हारे यही बाप ने
तुम्हें बोलना सीखाया
तुम्हें चलना सीखाया
तुम्हें पाल-पोष कर बड़ा किया
व मेरे ही कारण
तुम पढ़-लिखकर
आज अपने पैरों पर खड़ा हो।
पर आज तुम मुझे ही भूल गया
और मुझे घर से निकल दिया
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।

आज मैं तुम्हारे कोई काम का नहीं
आज तुम्हारे लिए सिर्फ
तुम्हारी बीवी व बच्चे हैं
अपने बीवी के कारण तुम
अपने माँ-बाप को भूल गया
और हमें घर से निकाला
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।

पर तुम ये कभी मत भूलना
कि एक दिन तुम भी होगा बुढ़ा
और उस समय
तुम्हारा भी शरीर शिथिल पड़ जाएगा
और तुम भी शारीरिक श्रम नहीं कर पाएगा
सोचो उस समय तुम क्या करोगे
कैसे रहोगे
कैसे खाओगे।

सोच बेटा सोच
यह तो है प्रकृति का नियम
कि बच्चा एक दिन जवान होगा
जवानी बुढापा में बदलेगा
और बुढापा के बाद फिर सबको
है परमात्मा के पास जाना
नहीं है किसी को इससे बचना।
नहीं है किसी को इससे बचना॥
यह है प्रकृति का नियम
इसपर न तो मेरा वश है न तुम्हारा
ये हमेशा से चल रहा है
और इसे हमेशा चलते ही है रहना।
इसे हमेशा चलते ही है रहना॥

सोच बेटा सोच
कि मुझे घर से निकालकर
क्या तुम प्रकृति के नियम बदल देगा
और क्या तुम कभी बुढ़ा नहीं होगा
जिस बाप ने तुम्हें जन्म दिया
उसे ही तुम आज घर से निकाला
क्योंकि वह बुढ़ा हो गया।
पर सोच बेटा सोच
एक दिन तुम भी होगा बुढ़ा।
एक दिन तुम भी होगा बुढ़ा॥

घर से निकाला है मुझे जबसे
सोच रहा हूँ मैं तुम्हारे बारे में तबसे
कि कैसे बनेगा मेरा लाल
एक नेक इंसान
कैसे आएगा उसे सद्बुद्धि
और किस प्रकार रहेगा
आगे दुनियाँ में वह
यही सोचकर मेरा
शरीर सुख रहा है
मेरे मन में सिर्फ
तुम्हारा ही ख्याल आ रहा है
कि कैसे बनोगे तुम नेक इंसान।
कैसे बनोगे तुम नेक इंसान॥

तुम हो इंसान
मत बनो हैवान
सबका मालिक है भगवान
पर तुम अपनी मानवता को पहचान
और बनो एक नेक इंसान।
बनो एक नेक इंसान॥
मेरी तो यही ख्वाहिश है बेटा
मेरी तो यही ख्वाहिश है बेटा
पर तुमने मुझे घर से निकाला
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया।
क्योंकि मैं बुढ़ा हो गया॥

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रचयिता :
My Photo
महेश कुमार वर्मा
DTDC कुरियर ऑफिस,
सत्यनारायण मार्केट,
मारुती (कारलो) शो रूम के सामने,
बोरिंग रोड, पटना (बिहार),
पिन : 800001 (भारत);
Webpage : http://popularindia.blogspot.com/
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846

Thursday, November 27, 2008

जिस बेटे को उंगली पकड़कर


जिस बेटे को उंगली पकड़कर
चलना था सिखलाया
जिसे गोद में रखकर
बोलना था सिखलाया
आज उसी बेटे ने मुझे
धक्का देकर
घर से है निकाला।
घर से है निकाला॥


उसकी पत्नी ने उससे कहा
इस बुढे का रहना मुझे नहीं है भाता
लगाओ इस बुढे को कहीं भी ठिकाना
वरना तोड़ लो मुझसे नाता।
वरना तोड़ लो मुझसे नाता॥


माना उसने प्यारी बीवी की बात
किया मुझपर कटु वचनों की बरसात
बोला उसने,
ऐ बुढा!
तुम्हारा नही है यहाँ कोई काम
चले जाओ यहाँ से
और हमें शान्ति से रहने दो
वरना हाथ-पैर तोड़कर बाहर कर दूंगा
फिर भी नहीं मानोगे तो
जहर देकर मार दूंगा!
जहर देकर मार दूंगा!!
पहले किया मैंने
उसके बात को अनसुना
पर उसने मेरा भोजन बंद किया
व मुझे भूखे ही रखने लगा
फिर एक दिन मुझे

धक्का देकर
घर से भी निकाल दिया।
घर से भी निकाल दिया॥


तब से भटक रहा हूँ
अकेले रह रहा हूँ
कोई नहीं है अब मेरा
सिर्फ ईश्वर ही है सहारा।
सिर्फ ईश्वर ही है सहारा॥


जिस बेटे को उंगली पकड़कर
चलना था सिखलाया
जिसे गोद में रखकर
बोलना था सिखलाया
आज उसी बेटे ने मुझे
धक्का देकर
घर से है निकाला।
घर से है निकाला॥


रचयिता -- महेश कुमार वर्मा

Sunday, November 23, 2008

गर तू ना होती

गर तू ना होती

गर तू ना होती तो कौन मेरे पास होता
गर तू ना होती तो कौन मेरे साथ होता
गर तू ना होती तो कौन मेरा अपना होता
गर तू ना होती तो सारा जहाँ सपना होता
गर तू ना होती तो जीवन नहीं ये पूरा होता
गर तू ना होती तो जीवन ये अधुरा होता
गर तू ना होती तो नहीं ये जीवन होता
गर तू ना होती तो नहीं ये गज़ल होता
कहना है बस एक बार तू मान जा
मान जा मेरे दिल को बहला जा
मान जा जीने का राह दिखा जा
मान जा मेरे जीवन को सँवार जा
गर तू ना होती तो नहीं ये जीवन होता
गर तू ना होती तो नहीं ये गज़ल होता


रचयिता : महेश कुमार वर्मा

Friday, November 14, 2008

छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए

छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए
*******************************



दुनियाँ वाले मुझे तुमसे अब नहीं है कुछ कहना।
मुझे यहाँ रहने का अब नहीं है कोई बहाना॥

क्या फायदा हुआ तुझे मुझको यूँ ही तड़पा कर।
क्या फायदा हुआ तुझे मुझको यूँ ही रुला कर॥
क्या फायदा हुआ तुझे मुझसे मेरा अधिकार छिनकर।
क्या फायदा हुआ तुझे मेरे जीने का आधार छिनकर॥
यदि मैं कुछ नहीं कर सकता उसके लिए।
तो मैं जिऊँगा फिर किसके लिए॥
जीने का अंतिम आधार था वह मेरे लिए।
मौत से बचने का एक ही सहारा था वह मेरे लिए॥
आया था मैं मौत के बहुत ही करीब से।
जीने की आशा थी अब सिर्फ उसी से॥
जीने के लिए मुझे उसके लिए कुछ करना जरुरी था।
उसके लिए मुझे जीना भी बहुत जरुरी था॥
उसके लिए मेरा सपना रह जाएगा अधुरा।
उस सपना को फिर कौन करेगा पूरा॥
एक सिर्फ वही बचा था मेरे लिए।
उसे छिनकर कुछ नहीं छोड़ा तुम मेरे लिए॥
अब मुझे कुछ नहीं कहना है तुमसे।
चलाओ दुनियाँ को तुम अपनी मन से॥
नहीं कुछ रहा यहाँ अब मेरे लिए।
नहीं रहा मैं यहाँ अब किसी के लिए॥
छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए।
छोड़ दूंगा सारी दुनियाँ मैं तुम्हारे लिए॥

------------------------------http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/d5274d12d3216ye5

Wednesday, November 5, 2008

मुर्ख मनुष्य

देख मुर्ख मनुष्य को
करता है ये छठ पर्व
चाहता है हजारों कामना
छठ करने के लिए
कितनी सारी व्यवस्था करता है
भगवान से हजारों कामना चाहता है
खरना करता है
उपवास रहता है
नदी जाता है
सूर्य को अर्ध्य देता है
ताकि उसकी मनोकामना पुरी हो
पर उसका नहाय-खाय
खरना, उपवास
व सूर्य को अर्ध्य देना
सब तब हो जाता है बेकार
जब छठ के तुरत बाद
वह भूल जाता है
अपने धर्म व कर्म को
और करता है
मुझपर बेवजह प्रहार
मैं ही नहीं
मेरे जैसे हजारो
बकरे मारे जाते है
छठ के पारण दिन
लेते हैं मनुष्य
बेवजह इनकी जान
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान

मुर्ख मनुष्य
करके मेरा बध
छठ के अपने पुण्य को
ख़ुद मिटा देता है
और ले आता है
अपने खाते में
सिर्फ पाप ही पाप
इसीलिए तो नहीं करता है ये
कोई तरक्की
नहीं करता है, नहीं करेगा
कभी ये कोई तरक्की
ये फल है ख़ुद कर्म की उनकी
नहीं करेगा कभी ये कोई तरक्की
नहीं करेगा कभी ये कोई तरक्की

अरे मुर्ख व पापी मनुष्य
मेरी गलती मुझे बताओ
मेरा अपराध मझे बताओ
तुमने मुझे क्यों मारा
मुझ बेगुनाहों को क्यों रुलाया
मारकर मुझे तुम
तरक्की कर सकते नहीं
शांत तुम रह सकते नहीं
चैन से तू सो सकते नहीं
चैन से तू सो सकते नहीं

कहता है तुमसे ये बकरा
अपना भविष्य तुमने ख़ुद है उकेरा
अवश्य मिलेगा तुम्हें मुझे मारने का फल
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल


-- महेश कुमार वर्मा

Tuesday, October 28, 2008

अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे

अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
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उजड़ि गेल घर बाढ़ में
डूबि गेल पूँजी व्यापार में
ना बा कहूँ रहे के ठिकाना
ना बा कुछु खाय के ठिकाना
दिया से अपन घर के सजाएब कैसे
जुआड़ी सैंया के हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे

ना बा घर ना बा दुआर
भगवान तोहार मूर्ति हम बिठाएब कैसे
तोहार आरती हम उतारब कैसे
हो अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे
अबकी दिवाली हम मनाएब कैसे

Monday, October 27, 2008

दीवाली

मनाएँ हम मिलकर दीवाली

ना हो प्रकाश से कोई जगह खाली

अन्धकार से प्रकाश में जाना है

जीवन में प्रकाश लाना है

दीवाली के दीपक से यही सीख लेना हैं

सारे जग से अंधकार मिटाना है

दुनियाँ में प्रकाश फैलाना है 

हरेक जगह प्रकाश फैलाना है॥ 


-- महेश कुमार वर्मा 


दीपावली की शुभकामनाएँ


प्रकाश पर्व दीपावली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है। अतः आएँ इस दीपावली में अपने अंदर के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप जलाएँ और सारे जगत को प्रकाशमय बनाएँ।

सबों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

Sunday, October 26, 2008

दिवाली में जलते हैं पैसे


होती थी यह वर्षों पहले

जब दिवाली में जलते थे दिये

पर अब चाहे हो जैसे

दिवाली में जलते हैं पैसे

छोड़ते हैं बम-पटाखे

और छोड़ते हैं रॉकेट

फैलाते है प्रदुषण

बढ़ाते हैं बीमारी

चाहे हो जैसे

पर दिवाली में जलते हैं पैसे

दिवाली मैं दिये अब जलते नहीं

दिये के स्थान पर है अब मोमबत्ती

मोमबत्ती का स्थान भी ले लिया अब बिजली

बिना बिजली के नहीं होता अब दिवाली

पर आपस में ख़ुशी बाँटने के जगह

खेलकर जुआ करते हैं पैसे की बर्बादी

चाहे हो जैसे 

पर दिवाली में जलते हैं पैसे 

दिवाली में जलते हैं पैसे


--महेश कुमार वर्मा

Friday, October 17, 2008

प्रेम है बहुत महान

प्रेम है बहुत महान

ये है मानवता की पहचान

प्रेम ही है जो दुश्मन को दोस्त बनाते हैं

प्रेम ही है जो पशुओं को भी मित्र बनाते हैं

प्रेम ही है जो सबों को आपस में बांधे रखता है

प्रेम ही है जो सबों को बिछुड़ने से रोकता है

प्रेम न होता तो ये सारा रिश्ता नाता न होता

प्रेम न होता तो दुनियाँ का काम न होता

प्रेम न होता तो दुनियाँ में चलना मुश्किल था

प्रेम न होता तो हमें जी पाना मुश्किल था

अतः प्रेम करना सीखो

आपस में मिलकर रहना सीखो

सबों से प्रेम करो

नहीं किसी से वैर करो

प्रेम है बहुत महान

ये है मानवता की पहचान

प्रेम है बहुत महान

प्रेम है बहुत महान

Tuesday, October 7, 2008

सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ


सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ

Thursday, September 25, 2008

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥


--महेश कुमार वर्मा

Tuesday, September 23, 2008

अपना समाज महान होगा


समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें मानवता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें सच्चरित्रता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें ईमानदारिता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें निष्पक्षता आएगी॥
जब आएगी मुझमें मानवता
जब आएगी मुझमें ईमानदारिता
तब होगी हमारी अपनी सत्ता
तब होगी हमारी अपनी सत्ता
तब नहीं कोई भ्रष्ट होगा
तब नहीं कोई बेईमान होगा
तब नहीं कहीं अन्याय होगा
तब नहीं कहीं अत्याचार होगा
तब नहीं किसी से शिकवा होगा
सभी जगह प्रेम व करुणा होगा
आपस में भाईचारा होगा
स्वच्छ व सुंदर समाज होगा
तब अपना समाज महान होगा
तब अपना समाज महान होगा

रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

Sunday, September 14, 2008

है किसी में हिम्मत तो

अब तक तो चुप था पर

अब चुप रह सकता नहीं

मरना होगा मर जाएंगे पर

मैं सर झुका सकता नहीं

है किसी में हिम्मत तो मेरे बातों का जवाब दे दे

है किसी में ईमानदारी तो सच्चाई सामने ला दे

सत्य धर्म से प्यार

किसे सुनाऊँ मैं अपनी हाल
हाल मेरा है बेहाल
मर जाऊँगा मिट जाऊँगा
नहीं मानूंगा मैं हार
झूठ को नहीं स्वीकारुँगा
सत्य को नहीं छोडूँगा
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार

Friday, September 12, 2008

कोई अपना मुझे नजर नहीं आता

चाहता था कुछ कहना पर कह न पा रहा हूँ
चाहता था कुछ लिखना पर लिख न पा रहा हूँ
करूँ मैं क्या मुझे पता नहीं चलता
जीने का कोई सहारा अब नजर नहीं आता
चाहा था नई जिन्दगी जीने को
पर बचा है अब सिर्फ मरने को
चाहता था कुछ कहना पर कह नहीं सकता
चाहता था कुछ लिखना पर लिख नहीं सकता
कैसे कहूँ कैसे सुनाऊँ पता नहीं चलता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता

Tuesday, September 9, 2008

दिल

दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है
भर जाएंगे शरीर के जख्म दिन नहीं तो महीनों में जरुर
पर नहीं भरेंगे दिल का जख्म यह बात है जरुर
तड़पते रह जाओगे दिल का जख्म लेकर
पर नहीं आएँगे कोई तुम्हें अपना समझकर
जमाना हो गया है बेदर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
क्योंकि जमाना हो गया है बेदर्द
दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है

Monday, September 8, 2008

बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते

बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
निभा सको तो साथ देगी जीवन भर ये रिश्ते
नहीं तो सिर्फ कहलाने को रह जाएँगे ये रिश्ते
बनते हैं पल भर में, बिगड़ते हैं पल भर में ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते

Thursday, September 4, 2008

ये रिश्ता चीज होती है क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या
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पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

था कभी भाई-भाई का रिश्ता
कभी बिछुड़ने वाला रिश्ता
जो हमेशा साथ-साथ खेलता
हमेशा साथ-साथ पढ़ता
हमेशा साथ-साथ खाता
हमेशा साथ-साथ रहता
पर आज जब वे बड़ा समझदार हुए
तो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हुए
हथियार लेकर दोनों आमने-सामने हुए
भाई-भाई का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


किया था शादी पति-पत्नी के रिश्ता के साथ
जीवन भर साथ निभाने को
पर रह गयी दहेज़ में कमी
तो दिया उसे साथ रहने को
और जिन्दा ही पत्नी को जला डाला
क्योंकि था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
जीवन भर साथ निभाने का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


था पिता-पुत्र का रिश्ता
पिता ने उसे अपने बुढ़ापे का सहारा समझा
पर उसने तो दुश्मन से भी भयंकर निकला
निकाल दिया पिता को घर से
भूखे-प्यासे छोड़ दिया
नहीं मरा पिता तो उसने
जहर देकर मार दिया
बुढ़ापे का सहारा आज उसी का कातिल बना
था इन्सान पर आज वह हैवान बना
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या

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http://merekavimitra.blogspot.com/2008/08/rishte-par-kavitayen-kavya-pallavan.html#mahesh

Tuesday, September 2, 2008

बाल शिक्षा बनाम बाल मजदूरी

आज सरकार शिक्षा पर जोर दे रही है तथा तरह-तरह के योजनाएं चला रही हैं। पर उस सरकार को क्या यह वास्तविकता मालूम है कि उनके योजनाओं का कितना लाभ बच्चों को मिल रहा है। सरकार को यह नहीं मालूम है कि उनके द्वारा लागु किए गए दोपहर के भोजन का कार्यक्रम की सारी रकम व अनाज स्कूल के शिक्षकों द्वारा चट कर दिए जाते हैं और बच्चों को भोजन नहीं मिलता है और यदि कहीं कभी-कभी थोड़ा-बहुत मिल भी जाता है तो वह घटिया किस्म का ही रहता है। ............ और इस कारण आज सरकारी स्कूल जाने वाले बच्चे-बच्चे "घोटाला" शब्द से वाकिफ हो गए हैं और वे जानते हैं कि उनके लिए आए अनाज उनको न मिलकर शिक्षकों के घर पहुँच रहे हैं। ..............
आज सरकार १४ वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने की बात कह रही है। पर क्या सरकार कभी इस सच्चाई को जानने की कोशिश की कि कितने बच्चे स्कूल जाते हैं व पढ़ते हैं? शायद सरकार कभी यह जानने की कोशिश नहीं की, और यदि की तो वह सही तथ्य तक नहीं पहुँच पायी। ........ आज भी ऐसे कितने बच्चे हैं जो अपनी पढ़ाई के उम्र में पढ़ाई से वंचित होकर अपने पेट पालने के लिए कहीं किसी के अन्दर काम या नौकरी कर रहे हैं। इस प्रकार के बच्चों को न तो पढ़ने का मौका मिलता है और न तो खेलने का ही मौका मिलता है। ................ बच्चो के साथ ऐसी स्थिति सिर्फ गाँव-देहात में ही नहीं शहर में भी है। जबकि बाल मजदूरी पर कानून ने रोक लगा रखी है। ............ शहर के होटलों में या अन्य स्थानों में भी ऐसे कितने बच्चे मिलेंगे जो दिन भर काम करके अपना पेट पालते हैं और न तो वे लिखना-पढ़ना जानते हैं और न तो जान पाते हैं। उन्हें तो बस दिन भर वहाँ काम करना है। उनके जीवन में न तो पढ़ाई है, न तो खेल है और न तो उनके विकास का कोई साधन है। ................... आप सोच सकते हैं कि ऐसे बच्चों का भविष्य क्या होगा? ..............
सरकार को सिर्फ घोषणाएं करने व कार्यक्रम तैयार करने से नहीं होगा .................. बल्कि हर बच्चे को उचित समय पर उचित शिक्षा व उचित वातावरण सुनिश्चित कराना होगा। हमें बच्चे के प्रतिभा को कुंठित नहीं होने देना चाहिए बल्कि प्रतिभा को जगाना चाहिए।
--- महेश कुमार वर्मा
०२.०९.२००८
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Sunday, August 24, 2008

स्त्री शिक्षा में बाधा क्यों


आज हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री जाति को उपेक्षित भाव से देखा जाता है। लड़का-लड़की में अंतर व लड़की को उपेक्षित भाव से देखना उसी समय से प्रारंभ हो जाता है जब लड़की अपने माँ के कोख से जन्म लेती है। जब लड़का जन्म लेता है तो लोग खुशियाँ मनाते हैं और वहीँ जब लड़की जन्म लेती है तो तो एक मायूसी छा जाती है; जैसे कि लड़की को जन्म लेने के बाद कोई विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा हो।

इतना ही नहीं, जन्म के बाद भी लड़का व लड़की के पालन-पोषण में काफी अंतर देखने को मिलता है। जहाँ लड़का के भोजन व रहन-सहन का खास ख्याल रखा जाता है वहीँ लड़की के संबंध में ऐसा नहीं होता है। जहाँ लड़का के पढाई-लिखाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है वहीँ लड़की को इस मायने में नजर अंदाज कर दिया जाता है। कितने लड़की को तो स्कूल जाने का भी सौभाग्य नहीं मिल पाता है। कोई लड़की यदि पराया भी तो मिडिल स्कूल या हाई स्कूल के पढ़ाई के बाद उसका पढ़ाई बंद हो जाता है और यदि उस लड़की के मन में और भी पढने की ईच्छा हो तो उसकी यह ईच्छा चूर-चूर हो जाता है और उसकी प्रतिभा भी कुंठित हो जाती है।



पर सोचें कि हम लड़का व लड़की में इतना भेद-भाव क्यों करते हैं? क्या लड़की को इस समाज में रहने व पढ़ने तथा आगे बढ़ने व कुछ करने का अधिकार नहीं है? .......... सोचने पर इसका एक यही कारण स्पष्ट होता है कि हम यह मानते हैं कि लड़की तो पराया घर जाएगी इस पर इतना ध्यान व खर्च क्यों किया जाए? धन धन हाँ, माँ-बाप अपने इसी सोच के कारण अपने बेटी का सही ढंग से न तो पालन-पोषण करते हैं न तो सही दंग से शिक्षा ही देते हैं। क्योंकि वे मानते हैं की बेटी पराया धन है इसे ससुराल में रहना है तो फिर इसके पीछे इतनी खर्च क्यों करूँ? ............ फिर एक यह भी सोच रहती है की लड़की को ज्यादा या उच्च शिक्षा देंगे तो फिर हमें उस अनुसार उसके लिए उच्च स्तर का वर ढूंढना होगा जिसमें मुझे दहेज के रूप में काफी धन देना होगा। .................... इस प्रकार दहेज समस्या के कारण भी कितने माँ-बाप अपनी बेटी को विशेष नहीं पढाते हैं। ......... पर हमें यह समझना चाहिए की हमारी यह सोच किसी भी अर्थ में उचित नहीं है। दहेज के डर से बेटी को न पढाना हमारी मुर्खता है और यह हमारी संकीर्ण व नीच विचारधारा को ही दर्शाता है। ............... इस प्रकार के सोच रखने वाले को यह समझना चाहिए कि यदि हम बेटी को उचित शिक्षा दें और पढ़ा-लिखा कर आगे बढाएँ तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। यदि लड़की पढ़-लिखकर नौकरी या कोई रोजगार करती है तो इसमें हर्ज क्या? ऐसी स्थिति में ऐसे लड़के भी आसानी से मिल सकते हैं जो बिना दहेज के या कम दहेज के उससे शादी करे। और यदि ऐसा नहीं होता है तो यदि लड़की पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी है, आत्मनिर्भर है तो इसमें हर्ज क्या?............... इस प्रकार हमें यह समझना चाहिए कि बेटी को पढ़ा-लिखा कर आगे बढ़ाने से दहेज समस्या बढती नहीं है बल्कि बहुत हद तक दहेज समस्या का समाधान होता है। ................

अतः हमारी समाज को अपनी इस नीच सोच को बदलना चाहिए व बेटा-बेटी में फर्क न कर लड़का-लड़की दोनों को सही ढंग से पालन-पोषण व उचित शिक्षा देना चाहिए।

हाँ, यह बात भी सही है कि धीरे-धीरे हम जागरूक हो रहे हैं तथा अब कितने परिवारों में बेटी को भी उच्च शिक्षा दी जा रही है। पर इस कार्य में अभी हम बहुत ही पीछे हैं, हमें और आगे बढ़ना होगा।

अपने नीच सोच को हटाना होगा।
बेटा-बेटी में अन्तर पाटना होगा॥
बेटी को आगे बढ़ाना होगा।
जिम्मेदार माँ-बाप का फर्ज निभाना होगा॥

Saturday, August 23, 2008

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

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गीता में भगवान श्री कृष्ण ने हमें हमेशा अपने कर्म करते रहने की ही शिक्षा दिए हैं। अतः श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व को हमें यों ही नहीं बिताना चाहिए बल्कि इस अवसर पर हमें अपने कर्म को करते हुए अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित होना चाहिए।

Sunday, August 17, 2008

दिल का जख्म


कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

है जख्म ये जो भरती नहीं
है इसकी दवा जो मिलती नहीं
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे


क्या सुनाऊं दिल का हाल
पापियों ने किया इसे बेहाल
थी अरमां आसमां छूने को
पर ऊँचाई से उसने ऐसा धकेला
कि दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
किसी तरह टुकड़े को जोड़कर
नया जीवन जीना चाहा
पर आगे के राह में
उसने ऐसा रोड़ा लगाया
कि दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का दर्द बढ़ता ही गया
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे


बहुत कोशिश की दिल के जख्म को भरने की
पर नहीं किया था रत्ती भर भी सद्व्यवहार उसने
किया था मेरे दिल पर आघात ही आघात उसने
मेरे दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का जख्म बढ़ता ही गया
मुझसे उसने दुनियाँ का सब कुछ छीन लिया
नहीं छोड़ा उसने कुछ भी मेरे लिए
सिवाय दिल के जख्म के
सिवाय दिल के जख्म के
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

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http://kathavyatha.blogspot.com/#septkavita1


Friday, August 15, 2008

आया है स्वतंत्रता दिवस

सबों को स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
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आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म याद कराने को।
भूल न जाना तुम हिंदुस्तान के मज़हब को॥

हो जाओ तैयार सब कुछ न्योछावर करने को।

सहना होगा थोड़ा कष्ट भारतमाता के लाज बचाने को॥

आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म याद कराने को।

आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म निभाने को॥

Thursday, August 14, 2008

सबसे न्यारा सबसे प्यारा

सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा
हर बच्चे यहाँ के हैं सच्चे
इनको किसी का डर नहीं
इनके मन में कोई पाप नहीं
बस अपना कार्य करना है
जीवन में आगे बढ़ना हैं
अपना नाम कमाना है
भारत को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाना है
बस मत रोको इन्हें आगे बढ़ने में
मदद करो इन्हें आगे बढ़ने में
सहायता करो इन्हें बढ़ने में
मत लगने दो इनपर किसी भी प्रकार का धब्बा
इसी पर है देश की आशा
गर चुक गए तुम तो मिलेगी निराशा ही निराशा
बस यही है तुमसे आशा
मदद करो इन्हें बढ़ने में
और हाथ बढाओ देश को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने में
सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा

Wednesday, August 13, 2008

भारतमाता के हम वीर सपूत



भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे
दुश्मन चाहे लाख आए
अपने कर्तव्य को नहीं भूलेंगे
अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे
अन्याय को नहीं स्वीकारेंगे
भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे

आगे बढ़ते रहे हैं
आगे ही बढ़ते रहेंगे
अन्याय व भ्रष्टाचार को
इस देश से निकाल फेकेंगे
सच्चाई व ईमानदारिता के समाज हम बनाएँगे
भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे

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भारतमाता के हम वीर

Wednesday, August 6, 2008

स्वतंत्रता दिवस नहीं शोक दिवस

मना रहे हैं स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
पढ़ा रहे हैं सदाचारिता की पाठ
कर रहे हैं आपस में गरीबों के राशि के बंदरबाँट
यही है भारतीय स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
आज मेरा देश स्वतंत्र है
पर इस देश के निवासी गुलाम हैं
भ्रष्टाचार व अन्याय के गुलाम
जुल्म व शोषण के गुलाम
घूसखोरी व अत्याचार के गुलाम
एक नहीं दो नहीं सभी हैं इनके गुलाम
यही है मेरे देश की पहचान
यहाँ किसी को बोलने का भी अधिकार नहीं है
यहाँ किसी को न्याय पाने का भी अधिकार नहीं है
नहीं होती है यहाँ आम जन के साथ न्याय
आम जन के लिए तो न्याय माँगना भी गुनाह हो जाता है
यदि माँगा वह न्याय और नहीं दिया पैसा
तो रक्षक भी उसका दुश्मन हो जाता है
क्योंकि यहाँ पैसे की ही बात सुनी जाती है
व पैसे की ही जीत होती है
एक नहीं दो नहीं नीचे से ऊपर तक सभी जगह है घूसखोरी व अत्याचार
इसे बंद करने के लिए नहीं है कोई सरकार
होती रही है होती रहेगी अन्याय व अत्याचार
हमें न्याय पाने का भी नहीं है अधिकार
हमें सच बोलने का भी नहीं है अधिकार
तो फिर क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता दिवस
आज सच्चाई व इमानदारी का नहीं है नामों निशान
भारत में धर्म की कोई नहीं है पहचान
चूँकि भारत में सच्चाई, ईमानदारी व धर्म सभी का हो गया है नाश
तो क्यों न स्वतंत्रता दिवस के स्थान पर शोक दिवस ही मनाया जाए

रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

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स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ

Saturday, July 26, 2008

महापाप

इसमें कोई दो राय नहीं कि कन्या भ्रूण हत्या बढ़ने का सर्वाधिक मुख्य कारण संतान के रूप में लड़की की चाह न होकर लड़का की चाह होना रहता है।



अतः जबतक समाज की मानसिकता को बदलकर नर व नारी एक सामान की भावना नहीं लाई जाएगी तबतक इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है। और इसके लिए समाज को ही सोचना पड़ेगा व आगे आना पड़ेगा।



फिर आख़िर संतान के रूप में लोग लड़की क्यों नहीं चाहते हैं? हमें इस पर भी सोचना चाहिए और इसमें जो कारण उचित हों उसे दूर करने का उपाय समाज को ही करना होगा। ऐसे ही कारणों में से एक कारण है : दहेज-समस्या।



हमारी समाज दहेज रूपी दानव को नष्ट करने का कोई पहल नहीं करती है, पर जन्म से पूर्व अपने ही संतान को नष्ट करने का पहल जरुर करती है। सोचिए आख़िर कितनी संकीर्ण व नीच विचारधारा की है हमारी समाज। ......... और यदि हमारी समाज इतनी नीच विचारधारा की है तो हमें समाज के इस विचारधारा का विरोध करने में संकोच नहीं करना चाहिए।


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फिर कन्या भ्रूण हत्या ही क्यों , नर या मादा किसी भी प्रकार की भ्रूण हत्या महापाप है। उस माँ-बाप के लिए अपने संतान के प्रति इससे बड़ा कुकर्म और क्या होगा, जिसने ख़ुद संतान के जन्म के लिए प्रयोजन किया व फिर जन्म से पहले ही अपने ही संतान को नष्ट कर दिया।


कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं किसी भी लिंग की भ्रूण हत्या महापाप है।


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कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

मुझे भी जन्म लेने दो

Friday, July 25, 2008

संतमत आश्रम या अपराध का अड्डा

नीचे के समाचार को पढ़ें व विचारे:

जब संतमत-सत्संग के आश्रम में इस प्रकार की घटना हो सकती है तो अन्य जगह ऐसी घटना नहीं होगी यह कैसी सुनिश्चित की जाएगी? जो संतमत-सत्संग ख़ुद अपने प्रमुख आश्रम को व अपने प्रमुख संतों को सुरक्षित नहीं रख सकी तथा आरोपी भी प्रमुख संत-महात्मा ही है, वह संतमत-सत्संग कैसे शान्ति फैलाएगी? कैसे अब लोग इन साधु-महात्माओं पर विश्वास करे???

ताजा समाचार है कि जिन्हें गोली लगी उनहोंने कल यानि २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया।

अब आप सोचें कि अध्यात्म के आड़ में संतमत-सत्संग का आश्रम क्या अपराध का अड्डा नहीं बन रहा है?

शान्ति के संदेश देने वाले साधु-महात्मा क्या अपराध नहीं कर रहे हैं?

तो नीचे २३.०७.२००८ के समाचार-पत्र का समाचार पढें व विचारें। उल्लेखनिए है कि साधु दयानंद ने २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया है।

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=1#

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=17#

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भागलपुर, अपराध संवाददाता : जिले के बरारी थाना अंतर्गत कुप्पा घाट स्थित महर्षि मेही आश्रम पर कब्जे को लेकर सोमवार की देर रात आश्रम के एक साधु दयानंद दास को गोली मार दी गई। जिन्हें गंभीर हालत में जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया, जहां उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इस संबंध में स्वामी दयानंद के बयान पर मंगलवार को आश्रम के चार पदाधिकारियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। जिनमें महर्षि मेंही आश्रम में कब्जे को लेकर साधु को मारी गोली महर्षि मेंही आश्रम .. अखिल भारतीय संतमत सतसंग महासभा के आशुतोष बाबा, महामंत्री करुनेश्वर सिंह, सह मंत्री राजेन्द्र सिंह व प्रबंधक महापात्रा बाबा के नाम शामिल हैं। इधर, देर शाम डीआईजी रघुनाथ प्रसाद सिंह आश्रम पहुंच मौके का जायजा लिया तथा घटना को आश्रम विवाद का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि जांच के बाद ही आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उधर, एसपी कुंदन कृष्णन को आशंका है कि महंत को उसकी ही रिवाल्वर से गोली लगी है। यदि हत्या की नीयत से गोली चलाई गई होती तो गोली कमर की नीचले हिस्से में क्यों लगती। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। सुपौल जिले के करजाइन बाजार निवासी वैद्यनाथ प्रसाद यादव के पुत्र स्वामी दयानंद दास ने प्राथमिकी में कहा है कि वह गुरुमहाराज के समाधि स्थल के पीछे स्थित कमरा नंबर तीन में सो रहे थे तथा कमरे का दरवाजा खुला हुआ था। इसी बीच रात के पौने तीन बजे के करीब उसके कमर में गोली मार दी गई। गोली लगते ही वे विस्तर से नीचे गिर चिल्लाने लगे परन्तु वहां कोई नहीं आया। बाद में उन्हें मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने कहा कि नामजद चारों लोग मिलकर आश्रम से उसे निकालवाना चाहते थे। क्योंकि आश्रम में हो रहे गोरख धंधे की उसे जानकारी थी। इसके अलावा वे आशुतोष बाबा का आचार्य के उत्तराधिकारी बनने का भी विरोध करते थे। उन्होंने बताया कि उनके मित्र पंकज दास को जबसे आश्रम से बाहर निकाला गया है तब से उसने आशुतोष बाबा को प्रणाम करना तक बंद कर दिया था। इस बात को लेकर भी आशुतोष बाबा नाखुश थे। इन्हीं सब कारणों से एक साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया। इस संबंध में कमरा नंबर एक में रहनेवाले मोनू बाबा, कमरा नंबर पांच के तेजनारायण जो आश्रम की खेती करते हैं तथा सामने वाले कमरे में रहने वाले सफाईकर्मी योगेन्द्र सिंह ने बताया कि वे लोग सो रहे थे। जिस समय घटना घटी उस समय बिजली नहीं थी। इन लोगों का कहना है कि घटना को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया तथा घटना के वक्त मोनू बाबा व तेजनारायण के कमरे को भी बाहर से बंद कर दिया गया था। इधर, मंत्री राजेन्द्र सिंह, व्यवस्थापक महापात्रा व आशुतोष बाबा ने लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इनलोगों ने दयानंद दास को आश्रम से निकालने की बात को गलत करार देते हुए कहा कि आश्रम के लोग ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करेंगे। उनलोगों ने बताया कि महामंत्री करूणेश्र्वर सिंह 19 जुलाई से ही बाहर हैं। घटना के कारणों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए इन लोगों ने इसकी निंदा की है। जांच पूर्व निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी : हरिनंदन बाबा भागलपुर : महर्षि मेंही आश्रम के आचार्य स्वामी हरिनंदन बाबा ने कहा कि घटना की जानकारी उन्हें वार्निग घंटी के बाद रात्रि करीब पौने तीन बजे हुई। हालांकि घटना की वास्तविकता का अब तक उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना को अंजाम बाहरी तत्वों या फिर आश्रम के लोगों द्वारा दिया गया है यह विचारनीय बिंदु है। इसकी गहन जांच कराई जाएगी तथा जांच पूर्व किसी निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी होगी। इस घटना से आश्रम की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। उन्होंने वर्तमान में आश्रम में किसी तरह के विवाद से भी इनकार किया है। व्यवस्था में कमी की बात मानते हुए उन्होंने कहा कि देर शाम आश्रम में आए बाहरी लोगों एवं कमरों की अच्छी तरह जांच होनी चाहिए। जांच में कोताही बरतने का नतीजा सामने है।

Tuesday, July 22, 2008

मुझे भी जन्म लेने दो

तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो


रचनाकार : महेश कुमार वर्मा
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Sunday, July 20, 2008

कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं........


यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। ........आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। ........... यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना या उससे घृणा करना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ................

--महेश कुमार वर्मा

दिनांक : २०।०७।२००८

स्थान : पटना

लेखक : MAHESH KUMAR VERMA

पता : DTDC Courier Office,

Satyanarayan Market,

Opposite Maruti (KARLO) Show Room,

Boring Road, Patna (Bihar)

PIN-800001 (INDIA)

E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com

Webpges : http://popularindia.blogspot.com/

http://aatm-chintan.blogspot.com/

http://dharm-darshan.blogspot.com/

Contact No. : +919955239846

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भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध

जघन्य अपराध

Tuesday, April 22, 2008

चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है?

जी हाँ, यह प्रश्न विचारनिए है कि चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है? इस बात में कोई दो राय नहीं कि चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग जीव हत्या को बढावा देना है। (क्यों?)

हम चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग करते हैं आख़िर तब ही तो बाज़ार में इसकी मांग होती है और इसी कारण ही चर्म उद्योग फल-फूल रहा है। तो इस प्रकार हम यदि चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन करते हैं तो उस जीव हत्या के लिए हम भी जिम्मेवार बनते हैं जिसके चर्म से वह वस्तु बनती है। (क्यों?)

और इसमें कोई दो राय नहीं कि जीव हत्या एक महापाप है। अतः हमें चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन बंद करना चाहिए।

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वह बकरा ने आपको क्या किया था?
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
शाकाहारी भोजन : शंका समाधान
मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Friday, March 21, 2008

होली के अवसर पर एक अपील

पवित्र होली का पर्व आपस में वैर व दुश्मनी या शत्रुता की भावना भुलाकर आपस में प्रेम स्थापित करने का पर्व है। पर आज कितने लोग अपने पुराने दुश्मनी का बदला होली के दिन ही लेते हैं तथा कितने लोग होली के दिन शरारत करने से नहीं चुकते हैं। पर हमें ख्याल रखना चाहिए की पवित्र होली का पर्व शरारत करने का पर्व नहीं है बल्कि यह प्रेम का पर्व है। इस होली के अवसर पर मैं सबों से अपील करना चाहता हूँ कि वे होली का पर्व प्रेम पूर्वक मनाएं न कि शरारती के साथ तथा आपसी वैर भावना भुलाकर आपस में प्रेम स्थापित करें। साथ ही मांस-मदिरा का सेवन भी त्यागना चाहिए।

होली के शुभकामनाओं के साथ।

आपका
महेश कुमार वर्मा
http://popularindia.blogspot.com/

Sunday, March 9, 2008

मेरा जीवन खुला किताब

मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया
न कोई जान सका न कोई पहचान सका
यह यों पड़ा ही रह गया
मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया

Friday, January 25, 2008

मेरे देश की कहानी

सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों आओ सुनो मेरे देश की कहानी
जहाँ रोज होती है घोटाला और होती है बेईमानी
और कुछ हो या ना हो भ्रष्टाचार ही है देश की निशानी
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों आओ सुनो मेरे देश की कहानी

बेईमानी, भ्रष्टाचार, घुसखोरी और अत्याचार
इसी पर तो टिकी है इस देश की सरकार
नहीं हो भ्रष्टाचार तो ये जी नहीं पाएंगे
इसीलिए तो भ्रष्टाचार को ये कभी नहीं छोड़ेंगे

बढ़ रहे हैं बढ़ रहे हैं ये बढ़ते ही रहेंगे
भ्रष्टाचार को ये नंबर वन का बिजनेस बनाएँगे

तड़पते को रुलाएंगे
मरते को मारेंगे
धर्मं को भुलाएँगे
पैसे को पहचानेंगे
सबों पर अपना रॉब जमाएँगे
दुनियाँ में ताकतवर कहलाएँगे

और कुछ नहीं है इनका विचार
बढ़ते ही रहेगी देश में अत्याचार

पुरुष हो या हो महिला
गरीब हो या हो लाचार
सबों के साथ होगी दुर्व्यवहार व अत्याचार
यही तो है इनको शक्तिशाली कहलाने का आधार

छोड़ देंगे यदि इसे
तो नहीं चल पाएगी इनकी सरकार

यह नई बात नहीं
यह तो है वर्षों पुरानी
यहाँ हमेशा होती रही
बेईमानी ही बेईमानी

बस यही है यहाँ की कहानी
यही है मेरे देश की कहानी
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Saturday, January 19, 2008

कहाँ जाऊंगा मैं तुम्हें छोड़कर

कहाँ जाऊंगा मैं तुम्हें छोड़कर
नहीं रह सकता में तुमसे नाता तोड़कर
चले न जाना तुम मेरा दिल तोड़कर
आ जाना तुम मेरा अपना बनकर
जी नहीं सकता मैं तुम्हें छोड़कर
जी नहीं सकता मैं तुम्हें छोड़कर

Wednesday, January 16, 2008

मुझे शांतिपूर्वक जाने दो

यदि कोई नहीं है इस दुनिया में सच्चाई पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में सच्चाई का साथ देने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में ईमानदारिता पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में निष्पक्षता पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में मुझको न्याय दिलाने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में मुझको सुनने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में मुझसे बातें करने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में गलत व झूठ का बहिष्कार करने वाला
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे विरुद्ध कुछ कहने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे विरुद्ध कुछ करने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे विरुद्ध कुछ करवाने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे किसी कार्य में आपत्ति करने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मुझे कुछ करने से रोकने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे राह में विध्न डालने का
और ऐसी स्थिति में मुझे जिंदा रहना भी बेकार है
और ऐसी स्थिति में मुझे मर जाना ही बेहतर है
और ऐसी स्थिति में नहीं है किसी को मुझे मरने से रोकने का अधिकार
क्योंकि मैं तो हूँ सारी दुनिया के लिए बेकार
तब तो फिर मर ही जाऊंगा
तब फिर तुझे मैं कुछ न कहूँगा
तब तुमको नहीं होगी कोई दिक्कत मुझसे
तब तुम रहना चैन व आराम से
क्योंकि तब तुम्हारी सारी समस्या का अंत हो जाएगा
तुम्हारे नजर में यह पापी तुमसे हमेशा-हमेशा के लिए दूर चला जाएगा
मैं चला जाऊंगा
फिर कभी न आऊंगा तुम्हारे नजरों के सामने
मैं चला जाऊंगा
फिर कोई पापी न होगा तुम्हारे नजरों के सामने
तब जाता हूँ
मुझे जाने दो
पर एक विनती है
मुझे शांतिपूर्वक जाने दो
बस एक चोटी सी अन्तिम इच्छा पूरी कर दो
और मुझे शांतिपूर्वक जाने दो

...............

०६०६३०

Sunday, January 13, 2008

विचार : दूध का सेवन कहाँ तक उचित है

आज मिठाई का चलन खूब हो गया है, कोई विशेष समारोह हो तो वहाँ नास्ता में मिठाई , मेहमान को नास्ता कराना हो तो वहाँ मिठाई ........... इत्यादि कई प्रकार से मिठाई का उपभोग हो रहा है। ............ अधिकांश मिठाई के निर्माण में दूध का ही उपयोग किया जाता है। दूध का उपयोग मिठाई बनाने के अलावा भी कई कार्यों में होता है। चाय का उपयोग तो हरेक जगह धड़ल्ले से हो रहा है जिसमें दूध का ही प्रयोग किया जाता है। ........... कुल मिलाकर कहें तो आज दूध का उपयोग लोगों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। ........... पर सोचें कि यह दूध हम कहाँ से लाते हैं? ............ यह दूध हम किसी न किसी स्तनधारी जीव (भारत में मुख्यतः गाय व भैंस) से लेते है, जिसे वह अपने बच्चे के लिए पैदा करती है। हम एक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मानव होकर एक पशु के बच्चा को अपने माँ का दूध पीने से वंचित कर देते हैं और खुद उसका दूध हम पीते हैं। ........... जब हमें इन पशु से दूध प्राप्त करना होता है तो हम क्या करते हैं? ............... बच्चा को अलग बांध देते हैं फिर वह पशु जिसे दुहना रहता है उसका भी पैर बांध देते हैं और तब फिर हम दुहकर दूध प्राप्त करते हैं। और इस बीच बेचारा वह पशु का बच्चा दूध पीने के लिए छटपटाते रहता है। ..............हम बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी होकर कितना जुल्म करते हैं इन बच्चों पर जिसकी माँ ने उसे जन्म देने के बाद उसके आहार के लिए अपने थन / स्तन में दूध उत्पादित करती है उसे हम उस बच्चे को न देकर खुद पीते हैं। ............... क्या यह उचित है? ..............कभी नहीं, नैतिकता के दृष्टि से यह कभी भी उचित नहीं है कि हम सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मानव होकर एक पशु के बच्चे पर इस प्रकार का जुल्म करके उसका आहार को हम ग्रहण करें। ............. ख्याल रखें कि कोई भी स्तनधारी जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु वह अपने दूध का उत्पादन सिर्फ अपने शिशु / बच्चा के लिए ही करता है न कि अन्य के लिए और यह प्रकृति का नियम है। .............. इस प्रकार हमें सिर्फ अपने ही माँ का दूध पीने का अधिकार है जो हम अपने शैश्यावस्था में पी चुके होते हैं और इसके अलावा हमें अन्य किसी भी जीव का दूध पीने का कोई अधिकार नहीं है। और इस प्रकार हमें दूध या दूध से बने किसी भी पदार्थ का उपभोग नहीं करना चाहिए क्योंकि दूध हमारे लिए नहीं बल्कि उस बच्चे के लिए होता है जिसे हम भूखे रखकर जबरन उसके माँ के थन से दूध निकालते हैं।
हमें नवजात पशु पर व उसके जननी (माँ) पर जुल्म ढाना बंद करके किसी भी प्रकार से दूध का उपयोग बंद करना चाहिए।

इंसान नहीं हैवान हैं हम

इंसान नहीं हैवान हैं हम
मारते बेकसूर जीव को और
भरते अपना पेट हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम

मत कहो हमें सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी
यहाँ हम रोज करते हैं बेईमानी

करते हैं अत्याचार
होती है बलात्कार
देते हैं रिश्वत
कोई नहीं करता है बहिष्कार

एक दिन नहीं रोज का है धंधा
पहुंचाते हैं पैसा
डालते हैं डाका
देते हैं उसे भी आधा
पैसे दो मौज मनाओ
कुछ न कहेंगे कुछ न करेंगे
अपना काम करते रहो
वे यों ही सोते रहेंगे
न्याय के लिए आने वाले को हंटर लगाएंगे
वे पुलिस हैं पुलिस ही कहलाएंगे
यह थी हमारी एक झलक
यहाँ होती है अत्याचार झपकते ही पलक
अन्याय करने में सब है मतवाला
जो जितना बड़ा है उसका मुँह उतना ही काला

इंसान नहीं हैवान हैं हम
कलियुग के शैतान हैं हम
मत कहो हमें सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी
हैं हम दुनिया के सर्वाधिक खतरनाक प्राणी
इंसान नहीं हैवान हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम

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http://kavimanch.blogspot.com/#poem18

कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर

आते हैं आंखों में आंसू यह जानकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर
अंधे हैं वो आँख रखकर
बहरे हैं वो कान रखकर
गूंगे हैं वो मुँह रखकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर

हैवानियत की हद कर दी उसने
इंसानियत की नाम नहीं है
कितने भी बड़े क्यों न हो
मानवता की पहचान नहीं है
कहने को तो हैं वो सज्जन
पर दुर्जन से कम नहीं हैं
कुछ बोलो तो होगी पिटाई
जल्लाद से वो कम नहीं हैं
हैं वो हैवान इन्सान बनकर
तड़पाते हैं वो हमेशा शैतान बनकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर

Saturday, January 12, 2008

भारतीय गणतंत्र के ५८ वर्ष

कुछ ही दिनों बाद हम भारतीय गणतंत्र के ५८ वीं वर्षगांठ मनाने वाले हैं। ५८ वर्ष पूर्व २६ जनवरी १९५० को हमारा देश भारत गणतंत्र हुआ था जिसकी वर्षगांठ हरेक वर्ष २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप दिनों मनाया जाता है इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूरे भारत वर्ष में हजारों-लाखों रुपये खर्च किये जाते हैं। पर हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि गणतंत्र दिवस मनाने की सार्थकता कितनी सफल होती है। ............



वास्तविकता के जमीं पर आएं तो हम देखते हैं कि भले ही हमारा देश आज स्वतंत्र है पर आज इस देश के नागरिकों को वास्तविक रूप से न तो न्याय पाने का अधिकार है और न तो इन्हें अभिव्यक्ति की ही स्वतंत्रता है। यह कोरी बातें नहीं बल्कि वास्तविकता है। कानून में भले हमें इस प्रकार की स्वतंत्रता व अधिकार मिली है पर वास्तविकता आज यही है कि आम लोगों के लिए आज न्याय पाना उस सपने कि तरह है जो अंततः कोरी कल्पना ही साबित होती है। आज आम लोगों के साथ जुल्म ढाए जाते हैं और यदि वह न्याय की मांग करता है तो न्याय पाना तो दूर की बात उसके साथ और भी अन्याय व अत्याचार किया जाता। जो रक्षक के रूप में खड़ा रहते हैं वे भक्षक बन जाते हैं और जो पंच परमेश्वर के नाम पर रहते हैं वे पापी बन जाते हैं। .......

जरा सोचें कि जब हमारे देश में पीड़ित के साथ न्याय नहीं हो तो ऐसी स्थिति में गणतंत्र दिवस व स्वाधिनता दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? आज भले ही भारत स्वतंत्र है पर भारतवासी अन्याय का गुलाम है और जब तक आमलोगों को न्याय दिलाना सुनिश्चित नहीं हो जाती है तब तक स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस मनाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। .......


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न्यायालय में भी नहीं है न्याय


पंच : परमेश्वर या पापी


आज का संसार


यह दिल की आवाज़ है


कैसे करूं मैं नववर्ष का स्वागत

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