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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

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Wednesday, January 27, 2010

जाति के आधार पर समाज को बांटने में सरकार कितनी दोषी

सोचनीय है कि एक ओर धर्म व जाति के आधार पर भेद-भाव समाप्त करने की बात कही जाती है और दूसरी ओर धर्म व जाति के आधार पर आरक्षण दिया जाता है। विचारने पर तो यही बात सामने आती है कि धर्म व जाति के आधार पर समाज को बांटने का कार्य करने में सबसे ज्यादा हाथ हमारी यह धर्म व जाति के आधार पर के आरक्षण व्यवस्था है। यह कोई कोरी बहस नहीं है बल्कि सौ फीसदी सही है। आप खुद देख सकते हैं कि हमारे समाज में किसी भी जाति के लोगों को एक जगह रहने में या अपना व्यापार करने में कोई दिक्कत नहीं है। पर हमारी कानून की क्या व्यवस्था है? कानून कि व्यवस्था है कि जाति प्रमाण पत्र ले आओ तो यह सुविधा मिलेगा....... तो फलां जाति के लिए इतना आरक्षण तो फलां जाति के लिए इतना आरक्षण..........आप खुद देखें कि सरकार व कानून ने समाज को जाति के आधार पर कितने वर्गों में बांटा है...... फॉरवर्ड, बैकवर्ड, पिछड़ा वर्ग, अन्यन्त पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति , दलित, महादलित............. आप कहेंगे कि जाति की व्यवस्था हमारे समाज में पहले से ही है और वहाँ इससे भी अधिक बहुतों जातियां हैं। पर आप खुद सोचें कि हमारे समाज में एक शादी को छोड़कर अन्य कहीं भी जाति को लेकर किसी को रहने या कार्य करने में कोई दिक्कत नहीं है। हाँ, पहले हमारे समाज में जातिवाद था पर अब समाज इसे छोड़ रही है पर अफसोस कि अब हमारे सरकार की जाति पर आधारित आरक्षण व्यवस्था इसे बढा रही है।
किसी ने सही कहा है :
सरकार कहती है जाति-पाती हटाओ।
कानून कहता है जाति प्रमाण पत्र ले आओ॥
क्या यह षडयंत्र है।
नहीं यह लोकतंत्र है॥
---------
मेरे इस आलेख पर पाठक अपनी निष्पक्ष विचार देने की कृपा करें।
आपका
महेश

12 comments:

Udan Tashtari said...

वोट बैंक की राजनीति है...सरकार ही जिम्मेदार है पूरी तरह से वरना किसके पास समय है मँहगाई, भूखमरी और बेरोजगारी से निपटने के बाद इन सब बातों के लिए.

दिनेशराय द्विवेदी said...

सही है, आरक्षण की व्यवस्था पिछड़ों को ऊपर उठाने और यह भेद समाप्त करने के लिए हुई थी। लेकिन दवा ही मर्ज बन गई है। इस दवा का बंद होना निहायत जरूरी है। बीमारी के लिए कोई नया इलाज तलाशना चाहिए।

निर्मला कपिला said...

सरकार कहती है जाति-पाती हटाओ।

कानून कहता है जाति प्रमाण पत्र ले आओ॥

क्या यह षडयंत्र है।

नहीं यह लोकतंत्र है॥
बिलकुल सही है वो वोट की राजनीति मे अपनी रोटियाँ सेकते हैं अच्छा सवाल उठाया हैाभार्

अंजना said...

ये तो सब वोट लेने के तरीके है ।सब जानते भी है लेकिन फिर भी सब अन्धे है।यही तो आज के लोकतंत्र की परिभाषा है!!!

राज भाटिय़ा said...

यह सब तो हठकंडे है वोट बटोरने के ,लेकिन अब जनता को जागरुक होना चाहिये,सबूत माया ही है जिन के वोट ले कर बनी क्या उस समाज का भला कर सकी? काग्रेस आज तक क्या मुसलमानो का भला कर सकी?ओर अब जनता को इस वोट बेंक की राज नीति से बचना चाहिये

PRAFUL said...

KYU NA SARKAR JAATI KO HI KHATM KAR DE,JAB KISI KI KOI JAATI HI NAHI RAHEGI TO FIR AARAKSHAN KAISA,HAR AADMI KEVAL APNE NAAM SE JANA JAAYEGA NA KI USKI JAATI SE,UPAR KAI MAHANUBHAVO NE APNE VICHAR DIYE HAI JAATI KE VIRODH ME LEKIN APNI JAATI JARUR LIKHI HAI UN SABHI NE,ME IS PAR WRITER SAHAB KE VICHAR JAANNE KA ICCHUK HU,KINDLY REPLY WRITER SAHAB

महेश कुमार वर्मा : Mahesh Kumar Verma said...

प्रफुल जी,
मेरे ब्लॉग पर आने व इस पोस्ट पर अपना विचार देने के लिए धन्यवाद।
जैसा कि आपने लिखा है कि ऊपर कई महानुभाव जाति के विरोध में लिखे हैं और साथ में अपनी जाति भी लिखे हैं। -- इस संबंध में, -- ऐसा तो मैं नहीं दिख रहा हूँ कि इस पोस्ट में किसी ने अपनी जाति का उल्लेख किया हो। यदि आपका इशारा नाम के साथ लगे surname (उपनाम) से है तो वह तो नाम का एक हिस्सा है। जिसे नाम के साथ लिखना ही पड़ेगा। पर आपको यह समझना चाहिए कि यह जरूरी नहीं है कि उपनाम से जाति का बोध होता ही हो। ...........
जहाँ तक यदि आप व्यक्तिगत रूप से मेरे बारे जानना चाहते हैं तो मैं आपको बता दूँ कि मैं अपने को मानव जाति के अलावा किसी भी जाति का नहीं मानता हूँ क्योंकि मैं जाति-पाति नहीं मानता हूँ। कहीं भी किसी भी सरकारी या प्राइवेट फॉर्म वगैरह पर भी जब जाति या धर्म लिखने या उपलब्ध विकल्प में से चुनने को कहा जाता है तो मैं वहाँ लिखने में या तो क्रॉस ("X") कर देता हूँ या "कोई नहीं" लिखता हूँ और यदि उपलब्ध विकल्प में से चुनना रहता है तो वहाँ मैं "अन्य" का चयन करता हूँ। ......... और आपको जानना चाहिए कि यह कोई गलत नहीं है। हमारे देश के संविधान में यह व्यवस्था की गयी है कि कोई व्यक्ति विशेष भी किसी खास धर्म का न रहकर "धर्म-निरपेक्ष" रह सकता है। ...........

आपका -
महेश

Unknown said...

Reservation hatao bharat baacho

Anonymous said...


गरीबी हटाओ आन्दोलन नहीं है आरक्षण
आरक्षण को समझने के लिए आरक्षण का इतिहास भी झाक लेना जरुरी है |
आरक्षण की शुरूआती मांग हुई थी 1891 में | उस समय भारत में अंग्रेज राज
करते थे | अंग्रेज सरकार ने कई नौकरियां निकलवाई थी लेकिन भर्ती प्रक्रिया
में भारतीयों से भेदभाव के चलते सिर्फ अंग्रेजो को ही नौकरी दी जाती थी, और
काबिल भारतीय नौकरी से वंचित रह जाते थे |
भारतीयों ने नौकरी में आरक्षण के लिए आन्दोलन किया | भारतीयों का नौकरी में
आरक्षण का आंदोलन सफल रहा और हमारे कई भाइयो को इसका फायदा हुआ |
आजादी के बाद कई लोगो को इस बात का यकीं था की पिछडो के साथ भेदभाव के चलते
उन्हें नौकरियों में काबिल होने के बावजूद जगह नहीं दी जाएगी, क्योकि
जितना भेदभाव अंग्रेज भारतीयों से करते थे उससे कही ज्यादा भेदभाव भारतीय
पिछड़ी जाती के लोगो से करते है |
सवाल यह उठता है की क्या पिछड़ी जातियों के साथ भेदभाव ख़त्म हो गया है ?
जवाब है नहीं | Being Indian Group ने एक सर्वे किया, जिससे पता चला की जहा
गावो में यह भेदभाव स्पष्ट रूप से मौजूद है वाही शहरों में यह अदृश्य और
अप्रत्यक्ष रूप से जिन्दा है |

अरे भाई
समाज के कुछ तबके ऐसे है जिन्हें Helping Hand देने की जरुरत है |

आज भी बिहार और उत्तरप्रदेश में गावो के बाहर दलितों के टोले बना दिए गए
है, जिन्हें समाज का हिस्सा नहीं समझा जाता | और उनकी परछाई भी नहीं पड़ने
दी जाती |
विदेशो में भी आरक्षण होता है, पर वहा इसे आरक्षण नाम से नहीं, अफर्मेटिव
एक्शन और पोसिटिव डिस्क्रिमिनेशन के नाम से जाना जाता है | देश में भेदभाव
तब ख़त्म होगा जब एक दलित लड़का एक सवर्ण लड़की का हाथ मांगेगा और सवर्ण माता
पिता ख़ुशी-ख़ुशी उस लड़की का हाथ दलित के हाथ में दे देंगे |
एसा अगले 1000 सालो में शायद हो जाए, तब तक तो, इन भंगीयो को अपनी लड़की कौन
देगा हट हट हूरररर.........

मेरे प्यारे भाइयो सामजिक भेदभाव मिटा दो, में आपको विश्वास दिलाता हु की
आरक्षण भी मिट जाएगा | अब बोलो कौन-कौन तैयार है अपनी बहन की शादी भंगी
चमार से कराने को | Comment में लिखो "मै तैयार हु" देखते है कितने लोग
लिखते है ? मै पुरे विश्वास के साथ कहता हु, एक भी नहीं लिखेगा !!!!!

Anonymous said...


गरीबी हटाओ आन्दोलन नहीं है आरक्षण
आरक्षण को समझने के लिए आरक्षण का इतिहास भी झाक लेना जरुरी है |
आरक्षण की शुरूआती मांग हुई थी 1891 में | उस समय भारत में अंग्रेज राज
करते थे | अंग्रेज सरकार ने कई नौकरियां निकलवाई थी लेकिन भर्ती प्रक्रिया
में भारतीयों से भेदभाव के चलते सिर्फ अंग्रेजो को ही नौकरी दी जाती थी, और
काबिल भारतीय नौकरी से वंचित रह जाते थे |
भारतीयों ने नौकरी में आरक्षण के लिए आन्दोलन किया | भारतीयों का नौकरी में
आरक्षण का आंदोलन सफल रहा और हमारे कई भाइयो को इसका फायदा हुआ |
आजादी के बाद कई लोगो को इस बात का यकीं था की पिछडो के साथ भेदभाव के चलते
उन्हें नौकरियों में काबिल होने के बावजूद जगह नहीं दी जाएगी, क्योकि
जितना भेदभाव अंग्रेज भारतीयों से करते थे उससे कही ज्यादा भेदभाव भारतीय
पिछड़ी जाती के लोगो से करते है |
सवाल यह उठता है की क्या पिछड़ी जातियों के साथ भेदभाव ख़त्म हो गया है ?
जवाब है नहीं | Being Indian Group ने एक सर्वे किया, जिससे पता चला की जहा
गावो में यह भेदभाव स्पष्ट रूप से मौजूद है वाही शहरों में यह अदृश्य और
अप्रत्यक्ष रूप से जिन्दा है |

अरे भाई
समाज के कुछ तबके ऐसे है जिन्हें Helping Hand देने की जरुरत है |

आज भी बिहार और उत्तरप्रदेश में गावो के बाहर दलितों के टोले बना दिए गए
है, जिन्हें समाज का हिस्सा नहीं समझा जाता | और उनकी परछाई भी नहीं पड़ने
दी जाती |
विदेशो में भी आरक्षण होता है, पर वहा इसे आरक्षण नाम से नहीं, अफर्मेटिव
एक्शन और पोसिटिव डिस्क्रिमिनेशन के नाम से जाना जाता है | देश में भेदभाव
तब ख़त्म होगा जब एक दलित लड़का एक सवर्ण लड़की का हाथ मांगेगा और सवर्ण माता
पिता ख़ुशी-ख़ुशी उस लड़की का हाथ दलित के हाथ में दे देंगे |
एसा अगले 1000 सालो में शायद हो जाए, तब तक तो, इन भंगीयो को अपनी लड़की कौन
देगा हट हट हूरररर.........

मेरे प्यारे भाइयो सामजिक भेदभाव मिटा दो, में आपको विश्वास दिलाता हु की
आरक्षण भी मिट जाएगा | अब बोलो कौन-कौन तैयार है अपनी बहन की शादी भंगी
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