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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015
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Saturday, July 1, 2017

सबसे बड़ा अपराधी

सबसे बड़ा अपराधी 
अपने आसपास जब नजर दौड़ाता हूँ तो हमें सबसे बड़ा अपराधी के रूप में पुलिस वाले ही दिखाई पड़ते हैं। ये पुलिस वाले चौक चौराहा पर गाड़ी वाले, ऑIटो वाले से नाजायज  पैसे वसूल करते हैं, ये ऑटो पर सवार होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं पर ऑटो वाले को किराया भी नहीं देते हैं। चौक चौराहे पर फुटपाथ पर लगने वाले दुकान से ये खा लेते हैं पर उन्हें पैसे तक नहीं देते हैं। हर जगह पुलिस का मनमाना है। जहां इनकी जरूरत होती है वहां ये नहीं जाते हैं और जहां इनकी जरूरत नहीं होती है वहां ये बेवजह लोगों को तंग करते हैं।
यह सोचनीय है कि पुलिस वाले की स्थिति ऐसी क्यों है?
सही में यदि हमारा पुलिसिया तंत्र ठीक हो जाए तो 75% अपराध खुद बंद हो जाएगी।
-महेश कुमार वर्मा
01.07.2017
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

Friday, August 23, 2013

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

31.12.2012  को मैं justice.verma@nic.in को मैं बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर अपना निजी विचार e-mail से लिखा था उसे मैं यहाँ हुबहू दे रहा हूँ. पाठक अपना विचार दें. 
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MAHESH KUMAR Verma 31 December 2012 11:13
To: justice.verma@nic.in
महेश कुमार वर्मा
Webpage : http://popularindia.blogspot.in
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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महाशय,
सरकार बलात्कारियों की सजा के संदर्भ में आम लोगों की से राय माँगी  है। इसी संदर्भ में यह ई-मेल किया जा रहा है जिसमें मेरा निजी विचार दिया जा रहा है।  --

बलात्कारियों की सजा क्या होनी चाहिए इस बात पर चर्चा करने से पहले मैं इस बात पर चर्चा करना चाहूँगा कि बलात्कार या कोई भी अपराध के लिए अपराधी को सजा देने का क्या उद्देश्य होना चाहिए? निश्चित रूप से सजा का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह अपराधी या अन्य भी पुनः भविष्य में वैसी अपराध करने का दुस्साहस न करे। और इस प्रकार अपराधी को सजा देकर अपराध मुक्त समाज की स्थापना करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही सजा तय की जानी  चाहिए। इस बात पर विचार करने पर हम पाते हैं कि किसी भी अपराध के लिए सजा ऐसा नहीं होना चाहिए की अपराधी को सजा के दौरान कुछ समय के लिए कष्ट तो हो पर फिर सजा के बाद उसमें सुधार नहीं पाया जाए तथा सजा ऐसी भी नहीं होनी चाहिए की सजा का असर सिर्फ उस अपराधी पर ही पड़े तथा अन्य उस सजा से सबक न ले व अपने में सुधार न करे। अर्थात सजा वैसी होनी चाहिए कि उस सजा के बाद अपराधी में सुधार हो और वह पुनः वैसा अपराध न करे तथा सजा से अन्य भी सबक ले व फिर कोई वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। यानि सजा का उद्देश्य सिर्फ अपराधी को कष्ट देना ही नहीं बल्कि अपराधी व समाज में सुधार लाना होना चाहिए।

इन सब बातों पर विचार करने पर हम पाते हैं कि पैसे वाले अपराधी के लिए आर्थिक दंड की सजा का कोई मतलब नहीं रह जाता है उसी तरह अपराध के लिए जान दाव पर लगाने वाले या मानव बम बनने वाले अपराधी के लिए वर्तमान तरीके से दी जाने वाली मौत की सजा (समाज से दूर अकेले में फाँसी देना) का कोई मतलब नहीं रह जाता है। हाँ, किसी अपराध में अपराधी को यदि मौत की सजा ही देनी है तो समाज के बीच  में उसे पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे तड़पा कर मौत की सजा दी जानी चाहिए और उसकी स्थिति को विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर प्रसारित किया जाना चाहिए ताकि उसे अन्य लोग भी देख सके और उसका असर ऐसा पड़े कि फिर कोई भी वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। वैसे एक दृष्टी से मौत की सजा उचित नहीं है क्योंकि हम मानव हैं और मानव को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी माना गया है। तो अपराधी को मौत की सजा देना हमारी / हम मानव की बुद्धिमत्ता नहीं है बल्कि हमारी बुद्धिमत्ता तो अपराधी में सुधार लाकर उसे स्वच्छ विचार वाला बना देने में है। और इस प्रकार मौत की सजा देने के स्थान पर उसे सार्वजानिक स्थान पर पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे रखे दिया जाए व साथ-साथ उसे उचित सिक्षा देकर उसमें सुधार का प्रयास भी किया जाए व उसमें सुधार लाया जाए। और फिर स्वच्छ विचारधारा के साथ उसे भी जीने का मौका दिया जाए। हाँ, उसे लगातार एकदम ही भूखे भी न रखा जाना चाहिए बल्कि अपना उसे अपना अपराध महसूस करने व अपने में सुधार के लिए सोचने व ऐसा करने के लिए जिंदा रहने के लिए कुछ दिनों के अंतराल पर भोजन या जो उचित हो देकर उसे जिंदा रखा जाना चाहिए। और सजा के दौरान यदि यह प्रतित नहीं होता है कि उसमें सुधार हो गया है तो जीवन भर उसे उसी तरह से उसी सजा में रखा जाना चाहिए। सार्वजानिक रूप से सजा दिया जाए ताकि अन्य लोग उसे उस स्थिति में देखकर सबक ले और फिर कोई भी वैसा अपराध न करे। सजा के दौरान उस अपराधी की स्थिति का प्रसारण विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर भी होनी चाहिए ताकि उस सजा को अधिकाधिक लोग देखे और उसका असर व्यापक रूप से पड़े व सजा का यह उद्देश्य सफल हो कि फिर कोई ऐसी अपराध करने का दुस्साहस न करे।

हाँ, मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यहाँ भूखे रखने की सजा मौत / फाँसी की सजा के स्थान पर रखना उचित समझता हूँ पर किस अपराध में ऐसी सजा की व्यवस्था हो इसकी चर्चा मैं यहाँ नहीं कर रहा हूँ। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वर्तमान में जिस तरह से समाज से दूर फाँसी की सजा दी जाती है उससे अन्य अपराध प्रवृति के व्यक्ति पर विशेष असर नहीं पड़ता है क्योंकि उनकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की ही रहती है और उसके सामने सजा न होने पर उसकी मानसिकता में बदलाव नहीं आता है।

अब में आता हूँ बलात्कार पर सजा की बात पर। बलात्कारी की सजा क्या होनी चाहिए -- वास्तव में यह एक महत्तवपूर्ण प्रश्न है। वास्तव में बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या यौन शोषण एक जघन्य अपराध है और इस अपराध के साथ अपराधी पशुता से भी नीचे गिर जाता है। इस अपराध के बाद अपराधी मानव कहलाने लायक नहीं रह जाता है। अतः निश्चित रूप से ऐसे अपराधी को कड़ी-से-कड़ी सजा मिलनी चाहिए तथा सजा ऐसी होनी चाहिए जिसका समाज पर व्यापक असर हो और फिर कोई भी ऐसी अपराध करने का विचार भी मन में न लाए। मेरे विचार से ऊपर मेरे द्वारा बताये गए भूखे रखने की सजा से भी कठोर सजा इस अपराध के लिए होना चाहिए। पर वह कठोर सजा क्या हो इसपर गंभीरता से सोचकर तय किया जाए। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वह कठोरतम सजा जो भी हो पर इस अपराध में पीड़िता के ईलाज में खर्च व पीड़िता को दी जाने वाली मुवावजा की रकम अपराधी से वसूल किया जाना चाहिए।

अंत में मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि सजा तो अपराध हो जाने के बाद दी जाती है। हमें वैसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अपराध हो ही नहीं। और ऐसी व्यवस्था के लिए हरेक मामला पर उचित व्यवस्था, उचित प्रशासन तथा उचित व त्वरित कार्रवाई के साथ-साथ प्रारंभ से ही बच्चों को उचित शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि आगे बढ़कर उसकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की न बने।

धन्यवाद।

आपका -
महेश

Wednesday, August 15, 2012

स्वैच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं?

स्वैच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं?

मित्रों, आज हम स्वतंत्रता के 65वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं।  देश की स्थिति को देखते हुए इस मौके पर मुझे तो बहुत कुछ कहने की ईच्छा होती है पर क्या करूँ हमारे देश में व्यवस्था ऐसी हो गयी है कि बोलने का भी अधिकार नहीं रह गया है।   आप खुद देखें कि हरेक जगह यह आलम है कि लोग निर्बल को दबा रहे हैं और पीड़ीत असहाय होने के कारण चुप रहता है और यदि वह अपने साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है तो उसके साथ और भी कष्ट व शोषण होने लगता है तथा उसे न्याय भी नहीं मिलाता है।  पीड़ीत न्याय के लिए कोर्ट व सरकारी दफ्तर का चक्कर लगा कर थक जाता है और उसे न्याय नहीं मिलती है।  ऐसी स्थिति में कभी-कभी तो पीड़ीत मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित होता है कि वह आत्महत्या तक कर बैठता है।  वैसे आत्महत्या सही नहीं है।  पर कोई भी यों ही शौक से आत्महत्या नहीं करता है बल्कि यदि कोई आत्महत्या करता है तो उसके आत्महत्या का कारण कोई और ही होता है।  आत्महत्या करने वाले के पास जब कोई चारा नहीं बचता है तब ही वह ऐसा कदम उठाता है।  आखिर वह करे भी क्या?  उसे तो कुछ बोलने का भी अधिकार नहीं रह जाता है उसे न्याय पाने का भी अधिकार नहीं रह जाता है तो वह पीड़ीत करेगा भी क्या?  जब उसके ऊपर हो रहे अन्याय से उसका जीना ही मुश्किल हो जाए व अन्याय उसे जीने में ही बाधा पहुंचाए तो वह आत्महत्या नहीं तो और क्या करेगा?
कभी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस बात के लिए फटकार लगाई थी की जब सरकार वेश्याप्रथा व देहव्यापार को बंद नहीं कर सकती है तो इसे अनुमति ही क्यों नहीं दे देती है?  सुप्रीम कोर्ट का यह फटकार सही था।  उसी तरह मैं सरकार व कानून व्यवस्था से पूछना चाहता हूँ कि जब सरकार पीड़ीत को न्याय नहीं दिला  सकती है तो फिर उसे खुद लड़-झगड़ कर अपना फैसला करने का अधिकार क्यों नहीं दे देती है या फिर अन्याय से जब उसे जीना मुश्किल हो रहा हो तो उसे स्वेच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं दे देती है?  मेरी यह बात लोगों को ख़राब लग सकता है पर यह बात सही है कि कई लोगों की आज स्थिति ऐसी ही है। 

-- महेश कुमार वर्मा 

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Sunday, July 19, 2009

तीन भिखारी

तीन भिखारी

 

हाथ में कटोरा लिए

आधा कपड़ा फटे हुए

आधा तन उघड़े हुए

एक हाथ में लाठी लिए

झुकी कमर से चल रहे

लोगों से हैं कह रहे

दे दो बाबू दे दो

इस बुढ़े को दे दो

तू एक पैसे देगा

वो दस लाख देगा

दे दो बाबू दे दो

दे दो बाबू दे दो

उसे देख कई चलने वाले

सिक्‍के डाल देते कटोरी में उसके

कोई अपने आप से कहता

यही है इन लोगों का धंधा

तो कोई नजर छुपाकर बढ़ जाते

व सुरक्षित रखते अपने पैसे

सुरक्षित रखते अपने पैसे

सड़क पर के भिखारी ये

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

मॉंगते दो पैसे अपने पेट के लिए

 

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

थोड़ी दूर चलने पर

पहुँचा मैं अपने पुराने ऑफिस में

वही पुराना ऑफिस

जहॉं मैं वर्षों कार्य किया

वही पुराना ऑफिस

जहॉं से मैं रिटायर हुआ

मेरे रिटायर होने पर

किया था विदाई समारोह सहकर्मियों ने

दिया था कुछ उपहार मेरे सह‍कर्मियों ने

वही पुराना ऑफिस

वही पुराना ऑफिस जब मैं पहुँचा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

लेने अपने रिटायर्मेंट का पैसा

बड़ा बाबू ऐनक पहने

मोटे फाईल में व्‍यस्‍त थे

मुझे देख ऐनक उतार

मुझको वे समझाने लगे

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

मॉंग रहे थे मुझसे पैसे

कहा उसने

नहीं दोगे तो होगा नहीं काम तुम्‍हारा

अब नहीं है यहॉं ईमानदारी तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

मेरे कलम पर है पैसा तुम्‍हारा

अब तुम्‍हारा नहीं है यहॉं कोई सम्‍मान

दे दो वरना कर दुँगा तुम्‍हें बदनाम

फिर नहीं होगा तुम्‍हारा काम

फिर नहीं होगा तुम्‍हार काम

 

मैं वापस आ गया

मैं वापस आ गया

सोचने लगा

मेरे ही पैसे मुझे देने के लिए

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

मॉंगते हैं ये पैसे मुझसे

यह सोचने पर मैं विवश था

यह सोचने पर मैं विवश था

कि यह तो

उस सड़क किनारे के

भिखारी से भी बदतर निकला

जिसने मेरे पैसे को भी

अपना ही समझा

जिसने मेरे पैसे को भी अपनो ही समझा

 

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

नहीं था मेरे पास कोई चारा

सोचा कि लूँ पुलिस का सहारा

गया मैं थाना पुलिस के पास

होती दारोगा बाबू से मुलाकात

जो सामने ऑफिस में ही थे

कलम लिए कुछ लिख रहे थे

उनके ईशारे पर

सामने कुर्सी पर मैं बैठा

और सुनाया अपना दुखड़ा

कहा मैं बिल्‍कुल साफ-सुथरा

नहीं है मेरे पास कोई पैसा

आपसे ही है मुझे आशा

आपसे ही है मुझे आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

दारोगा बाबू ने कुछ सोचकर कहा

काम तो हो जाएगा

पर देना होगा कुछ पैसा

फिर तुम्‍हारा सारा पैसा

तुम्‍हारे हाथ में होगा

और वह बड़ा बाबू

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

वह बड़ा बाबू भी हवालात में होगा

पर कुछ तो देना होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

बिना दिए कुछ नहीं होगा

 

मैंने कहा

मेरे पास नहीं है पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

वहाँ न दिया तो

आपके लिए

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

लाऊँ मैं कहॉं से पैसा

मेरे पास नहीं है पैसा

पर एक आपसे ही है आशा

एक आपसे ही है आशा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

दिला दो मुझे मेरा पैसा

 

पर दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

दारोगा बाबू ने कुछ नहीं सुना

कहा उसने संतरी से

निकालो इसे बाहर

और ले जाओ यहॉं से

है नहीं पैसा

और करता है बकवास

ले जाओ इसे यहॉं से

ले जाओ इसे यहॉं से

आया संतरी

बड़ी-बड़ी मुँछों वाला

रंग था उसका बिल्‍कुल काला

हाथ में लिए था डंडा

खींच मुझे बाहर निकाला

मैं कुछ कहना चाहा

पर उसने एक न सुना

धक्‍का देकर बाहर निकाला

दो-चार थप्‍पड़ भी लगाया

और मुझे निकाल दिया

और मुझे निकाल दिया

 

आया फिर मैं अपने घर में

आया फिर मैं अपने घर में

सोचने लगा

कि ये पुलिस हैं या हैं जल्‍लाद

ये रक्षक हैं या हैं भक्षक

करते हैं ये धर्म की रक्षा

या करते हैं धर्म को ही हलाल

या करते हैं धर्म को ही हलाल

मैं सोचने लगा

कि ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

ये क्‍यों मॉंगते हैं मुझसे

सड़क का भिखारी

अपने पेट के लिए मॉंगते हैं

ऑफिस का किरानी

मेरे पैसे को अपना ही समझ लिया

और ये पुलिस

ये तो

ये तो मेरे पैसे व मेरे शरीर

दोनों पर अपना अधिकार जमाया

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मार भगाया

 

किरानी रूपी भिखारी

सड़क के भिखारी से बदतर निकला

पर पुलिस रूपी ये भिखारी

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

जो मेरे शरीर को भी मेरा न समझा

और बेवजह मुझे मार भगाया

बेवजह मुझे मर भगाया

पुलिस रूपी ये जल्‍लाद

सबसे बड़ा घिनौना निकला

सबसे बड़ा घिनौना निकला

 

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महेश कुमार वर्मा
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Contact No. : +919955239846
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Sunday, April 19, 2009

न्याय व अन्याय


वो क्या देगा न्याय

जो न जानता है कि

क्या होता है न्याय

वो क्या देगा न्याय

जो जीवन भर किया अन्याय

न्याय और अन्याय के बीच मरती है भोली जनता

वो क्या जानेगा इसका दर्द

जो है खुद बेदर्द
जो है खुद बेदर्द

-- महेश कुमार वर्मा

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