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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

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Saturday, November 2, 2013

दीपावली की शुभकामना

दीपावली की शुभकामना 

सबों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ


Friday, August 23, 2013

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

31.12.2012  को मैं justice.verma@nic.in को मैं बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर अपना निजी विचार e-mail से लिखा था उसे मैं यहाँ हुबहू दे रहा हूँ. पाठक अपना विचार दें. 
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MAHESH KUMAR Verma 31 December 2012 11:13
To: justice.verma@nic.in
महेश कुमार वर्मा
Webpage : http://popularindia.blogspot.in
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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महाशय,
सरकार बलात्कारियों की सजा के संदर्भ में आम लोगों की से राय माँगी  है। इसी संदर्भ में यह ई-मेल किया जा रहा है जिसमें मेरा निजी विचार दिया जा रहा है।  --

बलात्कारियों की सजा क्या होनी चाहिए इस बात पर चर्चा करने से पहले मैं इस बात पर चर्चा करना चाहूँगा कि बलात्कार या कोई भी अपराध के लिए अपराधी को सजा देने का क्या उद्देश्य होना चाहिए? निश्चित रूप से सजा का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह अपराधी या अन्य भी पुनः भविष्य में वैसी अपराध करने का दुस्साहस न करे। और इस प्रकार अपराधी को सजा देकर अपराध मुक्त समाज की स्थापना करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही सजा तय की जानी  चाहिए। इस बात पर विचार करने पर हम पाते हैं कि किसी भी अपराध के लिए सजा ऐसा नहीं होना चाहिए की अपराधी को सजा के दौरान कुछ समय के लिए कष्ट तो हो पर फिर सजा के बाद उसमें सुधार नहीं पाया जाए तथा सजा ऐसी भी नहीं होनी चाहिए की सजा का असर सिर्फ उस अपराधी पर ही पड़े तथा अन्य उस सजा से सबक न ले व अपने में सुधार न करे। अर्थात सजा वैसी होनी चाहिए कि उस सजा के बाद अपराधी में सुधार हो और वह पुनः वैसा अपराध न करे तथा सजा से अन्य भी सबक ले व फिर कोई वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। यानि सजा का उद्देश्य सिर्फ अपराधी को कष्ट देना ही नहीं बल्कि अपराधी व समाज में सुधार लाना होना चाहिए।

इन सब बातों पर विचार करने पर हम पाते हैं कि पैसे वाले अपराधी के लिए आर्थिक दंड की सजा का कोई मतलब नहीं रह जाता है उसी तरह अपराध के लिए जान दाव पर लगाने वाले या मानव बम बनने वाले अपराधी के लिए वर्तमान तरीके से दी जाने वाली मौत की सजा (समाज से दूर अकेले में फाँसी देना) का कोई मतलब नहीं रह जाता है। हाँ, किसी अपराध में अपराधी को यदि मौत की सजा ही देनी है तो समाज के बीच  में उसे पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे तड़पा कर मौत की सजा दी जानी चाहिए और उसकी स्थिति को विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर प्रसारित किया जाना चाहिए ताकि उसे अन्य लोग भी देख सके और उसका असर ऐसा पड़े कि फिर कोई भी वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। वैसे एक दृष्टी से मौत की सजा उचित नहीं है क्योंकि हम मानव हैं और मानव को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी माना गया है। तो अपराधी को मौत की सजा देना हमारी / हम मानव की बुद्धिमत्ता नहीं है बल्कि हमारी बुद्धिमत्ता तो अपराधी में सुधार लाकर उसे स्वच्छ विचार वाला बना देने में है। और इस प्रकार मौत की सजा देने के स्थान पर उसे सार्वजानिक स्थान पर पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे रखे दिया जाए व साथ-साथ उसे उचित सिक्षा देकर उसमें सुधार का प्रयास भी किया जाए व उसमें सुधार लाया जाए। और फिर स्वच्छ विचारधारा के साथ उसे भी जीने का मौका दिया जाए। हाँ, उसे लगातार एकदम ही भूखे भी न रखा जाना चाहिए बल्कि अपना उसे अपना अपराध महसूस करने व अपने में सुधार के लिए सोचने व ऐसा करने के लिए जिंदा रहने के लिए कुछ दिनों के अंतराल पर भोजन या जो उचित हो देकर उसे जिंदा रखा जाना चाहिए। और सजा के दौरान यदि यह प्रतित नहीं होता है कि उसमें सुधार हो गया है तो जीवन भर उसे उसी तरह से उसी सजा में रखा जाना चाहिए। सार्वजानिक रूप से सजा दिया जाए ताकि अन्य लोग उसे उस स्थिति में देखकर सबक ले और फिर कोई भी वैसा अपराध न करे। सजा के दौरान उस अपराधी की स्थिति का प्रसारण विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर भी होनी चाहिए ताकि उस सजा को अधिकाधिक लोग देखे और उसका असर व्यापक रूप से पड़े व सजा का यह उद्देश्य सफल हो कि फिर कोई ऐसी अपराध करने का दुस्साहस न करे।

हाँ, मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यहाँ भूखे रखने की सजा मौत / फाँसी की सजा के स्थान पर रखना उचित समझता हूँ पर किस अपराध में ऐसी सजा की व्यवस्था हो इसकी चर्चा मैं यहाँ नहीं कर रहा हूँ। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वर्तमान में जिस तरह से समाज से दूर फाँसी की सजा दी जाती है उससे अन्य अपराध प्रवृति के व्यक्ति पर विशेष असर नहीं पड़ता है क्योंकि उनकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की ही रहती है और उसके सामने सजा न होने पर उसकी मानसिकता में बदलाव नहीं आता है।

अब में आता हूँ बलात्कार पर सजा की बात पर। बलात्कारी की सजा क्या होनी चाहिए -- वास्तव में यह एक महत्तवपूर्ण प्रश्न है। वास्तव में बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या यौन शोषण एक जघन्य अपराध है और इस अपराध के साथ अपराधी पशुता से भी नीचे गिर जाता है। इस अपराध के बाद अपराधी मानव कहलाने लायक नहीं रह जाता है। अतः निश्चित रूप से ऐसे अपराधी को कड़ी-से-कड़ी सजा मिलनी चाहिए तथा सजा ऐसी होनी चाहिए जिसका समाज पर व्यापक असर हो और फिर कोई भी ऐसी अपराध करने का विचार भी मन में न लाए। मेरे विचार से ऊपर मेरे द्वारा बताये गए भूखे रखने की सजा से भी कठोर सजा इस अपराध के लिए होना चाहिए। पर वह कठोर सजा क्या हो इसपर गंभीरता से सोचकर तय किया जाए। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वह कठोरतम सजा जो भी हो पर इस अपराध में पीड़िता के ईलाज में खर्च व पीड़िता को दी जाने वाली मुवावजा की रकम अपराधी से वसूल किया जाना चाहिए।

अंत में मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि सजा तो अपराध हो जाने के बाद दी जाती है। हमें वैसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अपराध हो ही नहीं। और ऐसी व्यवस्था के लिए हरेक मामला पर उचित व्यवस्था, उचित प्रशासन तथा उचित व त्वरित कार्रवाई के साथ-साथ प्रारंभ से ही बच्चों को उचित शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि आगे बढ़कर उसकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की न बने।

धन्यवाद।

आपका -
महेश

Monday, March 25, 2013

होली : शुभकामना, निवेदन व अपील


होली : शुभकामना, निवेदन व अपील



सबों को पवित्र होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

पवित्र होली प्रेम व आपसी भाईचारा का पर्व है अतः इसे प्रेम व भाईचारा का ही पर्व रहने दें। इसे किसी विवाद व शत्रुता का बदला लेने का पर्व न बनाएँ। तथा सभी तरह का वैर व कटुता का भाव भुलाकर आपसी प्रेम-भाव बनाए रखें। किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करें। जबरन किसी को रंग या गुलाल न लगायें।

धन्यवाद।

आपका - 
महेश 

होली : शुभकामना व निवेदन

होली : शुभकामना व निवेदन 



सबों को पवित्र होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

पवित्र होली प्रेम व आपसी भाईचारा का पर्व है अतः इसे प्रेम व भाईचारा का ही पर्व रहने दें। इसे किसी विवाद व शत्रुता का बदला लेने का पर्व न बनाएँ। किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करें। जबरन किसी को रंग या गुलाल न लगायें।

धन्यवाद।

आपका - 
महेश 

Thursday, March 21, 2013

जिंदा हूँ सब जानते हैं

जिंदा हूँ सब जानते हैं 



जिंदा हूँ सब जानते हैं 
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं
या मेरे लिएअपने को मृत समझते हैं
इसीलिए तो मुझसे दूरी बनाये रहते हैं
जिंदा हूँ सब जानते हैं 
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं

मैं तो कई बार मरके भी जिंदा हूँ
पर तुम तो जिंदा रहके भी मृत हो
मैँ जिंदा हूँ तुम्हारे प्यार पाने को
पर तुम मृत हो मुझे तडपाने को

छुप-छुप कर मिलना
रात-रात भर बातें करना
अपने दिल की बात बताना
यह सब मुझे याद है
पर तुम्हारे बिना जीवन ये बर्बाद है

क्यों आने दिया दुनियाँ को
हमारे संबंध व प्यार के बीच
दुनियाँ वाले तो मजा उड़ाएँगे
पर वे प्यार को कभी न समझ पाएँगे
जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं

जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं




-- महेश कुमार वर्मा 
21.03.2013

छत्तीस साल पहले

छत्तीस साल पहले 

छत्तीस साल पहले 
आज ही के दिन 
मेरी माँ ने मुझे दिया था जन्म 
पर आज जिंदा रहके भी 
दोनों को मिला है मरण 
क्योंकि दुनियाँ वालों ने 
दोनों को एक-दुसरे से छिना 
फिर मारने की धमकी के कारण 
माँ ने मुझसे मिलना  छोड़ा 
था मैं उनतीस का 
और आज हूँ मैं छत्तीस का 
सात साल बीत गए 
पर माँ है उसी कातिल पुत्र के साथ 
जिसने आठ साल पहले 
पिता को मारा 
भूखे रखकर उन्हें मार डाला 
और घर पर अधिकार जमाया 
बीवी की बात मानी 
पर उसे भी धोखा दिया 
जिस कारण बीवी ने उन्हें छोड़ दिया 
व एक नहीं चार-चार को 
जेल का हवा खाना पड़ा 
पिताजी का संजोया परिवार 
बिखर-बिखर कर रह गया 
छत्तीस साल पहले
आज ही के दिन 
मेरी माँ ने मुझे दिया था जन्म 
पर आज जिंदा रहके भी 
दोनों को मिला है मरण 
छत्तीस साल पहले
आज ही के दिन 
मेरी माँ ने मुझे दिया था जन्म 

-- महेश कुमार वर्मा
21.03.2013

Friday, March 8, 2013

देश के बहना जागो

जागो बहना


मैं अपने देश के तमाम बहनों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे महिला प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाएं।




देश के बहना जागो
तुम मानव हो
तुममे बुद्धि-विवेक है
अतः अपने बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करो
अन्याय के विरुद्ध लड़ो
समाज से महिला प्रताड़ना को उखाड़ फेंको 
व महिलाओं को शीर्ष स्थान पर स्थापित करो
जागो बहना जागो 
जागो बहना जागो



Tuesday, February 26, 2013

मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी?

मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी?


मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी 

न कोई पत्र न कोई मेसेज
न कोई संवाद न कोई फोन
छोड़ के क्यों तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी

कब तक लेगी तुम मेरे प्यार की परीक्षा
आखिर क्या है तुम्हारी इच्छा
जाना ही था तो प्रेम पूर्वक कह देती
पर इतना कष्ट तुम मुझे न देती

अब कैसे रह पाऊंगा मैं
कैसे जी पाऊंगा मैं
तेरे इंतजार में हूँ मैं उस दिन से भूखा
जिस दिन से मुझे छोड़ के तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी

तेरे कारण ही था मैं जिंदा
अब कैसे मैं रह पाऊंगा
अब कैसे मैं जी पाऊंगा
फिर भी है मुझे यह आस
कि आयेगी तुम जरुर मेरे पास
है मुझे यह विश्वास
कि आयेगी तुम जरुर मेरे पास

भूखे कष्ट में तुमसे यही सवाल करता हूँ
कि मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी


रचयिता -- महेश कुमार वर्मा
दिनांक - 26.02.2013

Thursday, January 10, 2013

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष


मित्रों,



कुछ दिन बाद राष्ट्र 64वाँ गणतंत्र दिवस मनाएगा। भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष हो गए पर यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भी आम लोग नारकीय जीवन जी रहे हैं। ये पग-पग पर जुल्म व अन्याय के शोषण हो रहे हैं  आज ये न तो सुरक्षित हैं न तो इन्हें उचित न्याय ही मिल पाता है। हर ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। गलत व अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने पर ये और भी असुरक्षित हो जाते हैं, साथ ही ऐसी स्थिति में इनके साथ गलत व अन्याय और भी बढ जाता है। आज न्याय पाना भी मुश्किल हो गया है। अदालत में भी न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को उसके जिन्दा रहते न्याय मिल ही जाएगा यह कहना भी मुश्किल है, तथा जबतक न्याय नहीं मिला तबतक वे मानसिक पीड़ा झेलते रहते हैं।  कितने लोग इस प्रकार के जुल्म, शोषण व अव्यवस्था के शिकार से मानसिक रुप से इतने प्रताड़ित होते हैं कि ऊब कर वे या तो मौत को गले लगा लेते हैं या अपराध जगत में कदम रख देते हैं।



सोचें कि इस प्रकार के परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर कब हमें स्वच्छ व अपराध मुक्त समाज मिलेगी?



-- महेश कुमार वर्मा

यहाँ आप हिन्दी में लिख सकते हैं :