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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

Thursday, September 25, 2008

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना

है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥


--महेश कुमार वर्मा

Tuesday, September 23, 2008

अपना समाज महान होगा


समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें मानवता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें सच्चरित्रता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें ईमानदारिता आएगी॥
समाज विकास तब होगी।
जब मुझमें निष्पक्षता आएगी॥
जब आएगी मुझमें मानवता
जब आएगी मुझमें ईमानदारिता
तब होगी हमारी अपनी सत्ता
तब होगी हमारी अपनी सत्ता
तब नहीं कोई भ्रष्ट होगा
तब नहीं कोई बेईमान होगा
तब नहीं कहीं अन्याय होगा
तब नहीं कहीं अत्याचार होगा
तब नहीं किसी से शिकवा होगा
सभी जगह प्रेम व करुणा होगा
आपस में भाईचारा होगा
स्वच्छ व सुंदर समाज होगा
तब अपना समाज महान होगा
तब अपना समाज महान होगा

रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

Sunday, September 14, 2008

है किसी में हिम्मत तो

अब तक तो चुप था पर

अब चुप रह सकता नहीं

मरना होगा मर जाएंगे पर

मैं सर झुका सकता नहीं

है किसी में हिम्मत तो मेरे बातों का जवाब दे दे

है किसी में ईमानदारी तो सच्चाई सामने ला दे

सत्य धर्म से प्यार

किसे सुनाऊँ मैं अपनी हाल
हाल मेरा है बेहाल
मर जाऊँगा मिट जाऊँगा
नहीं मानूंगा मैं हार
झूठ को नहीं स्वीकारुँगा
सत्य को नहीं छोडूँगा
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार
मुझको तो है सत्य धर्म से प्यार

Friday, September 12, 2008

कोई अपना मुझे नजर नहीं आता

चाहता था कुछ कहना पर कह न पा रहा हूँ
चाहता था कुछ लिखना पर लिख न पा रहा हूँ
करूँ मैं क्या मुझे पता नहीं चलता
जीने का कोई सहारा अब नजर नहीं आता
चाहा था नई जिन्दगी जीने को
पर बचा है अब सिर्फ मरने को
चाहता था कुछ कहना पर कह नहीं सकता
चाहता था कुछ लिखना पर लिख नहीं सकता
कैसे कहूँ कैसे सुनाऊँ पता नहीं चलता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता
कोई अपना मुझे नजर नहीं आता

Tuesday, September 9, 2008

दिल

दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है
भर जाएंगे शरीर के जख्म दिन नहीं तो महीनों में जरुर
पर नहीं भरेंगे दिल का जख्म यह बात है जरुर
तड़पते रह जाओगे दिल का जख्म लेकर
पर नहीं आएँगे कोई तुम्हें अपना समझकर
जमाना हो गया है बेदर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
कोई नहीं समझेगा दिल का दर्द
क्योंकि जमाना हो गया है बेदर्द
दिल वो चीज है जो टूट गया तो जुड़ना मुश्किल है
दिल वो चीज है जिसका जख्म भर पाना मुश्किल है

Monday, September 8, 2008

बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते

बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
निभा सको तो साथ देगी जीवन भर ये रिश्ते
नहीं तो सिर्फ कहलाने को रह जाएँगे ये रिश्ते
बनते हैं पल भर में, बिगड़ते हैं पल भर में ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते
बहुत ही नाजुक होती है ये रिश्ते

Thursday, September 4, 2008

ये रिश्ता चीज होती है क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या
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पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

था कभी भाई-भाई का रिश्ता
कभी बिछुड़ने वाला रिश्ता
जो हमेशा साथ-साथ खेलता
हमेशा साथ-साथ पढ़ता
हमेशा साथ-साथ खाता
हमेशा साथ-साथ रहता
पर आज जब वे बड़ा समझदार हुए
तो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हुए
हथियार लेकर दोनों आमने-सामने हुए
भाई-भाई का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


किया था शादी पति-पत्नी के रिश्ता के साथ
जीवन भर साथ निभाने को
पर रह गयी दहेज़ में कमी
तो दिया उसे साथ रहने को
और जिन्दा ही पत्नी को जला डाला
क्योंकि था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
जीवन भर साथ निभाने का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या


था पिता-पुत्र का रिश्ता
पिता ने उसे अपने बुढ़ापे का सहारा समझा
पर उसने तो दुश्मन से भी भयंकर निकला
निकाल दिया पिता को घर से
भूखे-प्यासे छोड़ दिया
नहीं मरा पिता तो उसने
जहर देकर मार दिया
बुढ़ापे का सहारा आज उसी का कातिल बना
था इन्सान पर आज वह हैवान बना
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या

ये रिश्ता चीज होती है क्या

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http://merekavimitra.blogspot.com/2008/08/rishte-par-kavitayen-kavya-pallavan.html#mahesh

Tuesday, September 2, 2008

बाल शिक्षा बनाम बाल मजदूरी

आज सरकार शिक्षा पर जोर दे रही है तथा तरह-तरह के योजनाएं चला रही हैं। पर उस सरकार को क्या यह वास्तविकता मालूम है कि उनके योजनाओं का कितना लाभ बच्चों को मिल रहा है। सरकार को यह नहीं मालूम है कि उनके द्वारा लागु किए गए दोपहर के भोजन का कार्यक्रम की सारी रकम व अनाज स्कूल के शिक्षकों द्वारा चट कर दिए जाते हैं और बच्चों को भोजन नहीं मिलता है और यदि कहीं कभी-कभी थोड़ा-बहुत मिल भी जाता है तो वह घटिया किस्म का ही रहता है। ............ और इस कारण आज सरकारी स्कूल जाने वाले बच्चे-बच्चे "घोटाला" शब्द से वाकिफ हो गए हैं और वे जानते हैं कि उनके लिए आए अनाज उनको न मिलकर शिक्षकों के घर पहुँच रहे हैं। ..............
आज सरकार १४ वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने की बात कह रही है। पर क्या सरकार कभी इस सच्चाई को जानने की कोशिश की कि कितने बच्चे स्कूल जाते हैं व पढ़ते हैं? शायद सरकार कभी यह जानने की कोशिश नहीं की, और यदि की तो वह सही तथ्य तक नहीं पहुँच पायी। ........ आज भी ऐसे कितने बच्चे हैं जो अपनी पढ़ाई के उम्र में पढ़ाई से वंचित होकर अपने पेट पालने के लिए कहीं किसी के अन्दर काम या नौकरी कर रहे हैं। इस प्रकार के बच्चों को न तो पढ़ने का मौका मिलता है और न तो खेलने का ही मौका मिलता है। ................ बच्चो के साथ ऐसी स्थिति सिर्फ गाँव-देहात में ही नहीं शहर में भी है। जबकि बाल मजदूरी पर कानून ने रोक लगा रखी है। ............ शहर के होटलों में या अन्य स्थानों में भी ऐसे कितने बच्चे मिलेंगे जो दिन भर काम करके अपना पेट पालते हैं और न तो वे लिखना-पढ़ना जानते हैं और न तो जान पाते हैं। उन्हें तो बस दिन भर वहाँ काम करना है। उनके जीवन में न तो पढ़ाई है, न तो खेल है और न तो उनके विकास का कोई साधन है। ................... आप सोच सकते हैं कि ऐसे बच्चों का भविष्य क्या होगा? ..............
सरकार को सिर्फ घोषणाएं करने व कार्यक्रम तैयार करने से नहीं होगा .................. बल्कि हर बच्चे को उचित समय पर उचित शिक्षा व उचित वातावरण सुनिश्चित कराना होगा। हमें बच्चे के प्रतिभा को कुंठित नहीं होने देना चाहिए बल्कि प्रतिभा को जगाना चाहिए।
--- महेश कुमार वर्मा
०२.०९.२००८
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Sunday, August 24, 2008

स्त्री शिक्षा में बाधा क्यों


आज हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री जाति को उपेक्षित भाव से देखा जाता है। लड़का-लड़की में अंतर व लड़की को उपेक्षित भाव से देखना उसी समय से प्रारंभ हो जाता है जब लड़की अपने माँ के कोख से जन्म लेती है। जब लड़का जन्म लेता है तो लोग खुशियाँ मनाते हैं और वहीँ जब लड़की जन्म लेती है तो तो एक मायूसी छा जाती है; जैसे कि लड़की को जन्म लेने के बाद कोई विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा हो।

इतना ही नहीं, जन्म के बाद भी लड़का व लड़की के पालन-पोषण में काफी अंतर देखने को मिलता है। जहाँ लड़का के भोजन व रहन-सहन का खास ख्याल रखा जाता है वहीँ लड़की के संबंध में ऐसा नहीं होता है। जहाँ लड़का के पढाई-लिखाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है वहीँ लड़की को इस मायने में नजर अंदाज कर दिया जाता है। कितने लड़की को तो स्कूल जाने का भी सौभाग्य नहीं मिल पाता है। कोई लड़की यदि पराया भी तो मिडिल स्कूल या हाई स्कूल के पढ़ाई के बाद उसका पढ़ाई बंद हो जाता है और यदि उस लड़की के मन में और भी पढने की ईच्छा हो तो उसकी यह ईच्छा चूर-चूर हो जाता है और उसकी प्रतिभा भी कुंठित हो जाती है।



पर सोचें कि हम लड़का व लड़की में इतना भेद-भाव क्यों करते हैं? क्या लड़की को इस समाज में रहने व पढ़ने तथा आगे बढ़ने व कुछ करने का अधिकार नहीं है? .......... सोचने पर इसका एक यही कारण स्पष्ट होता है कि हम यह मानते हैं कि लड़की तो पराया घर जाएगी इस पर इतना ध्यान व खर्च क्यों किया जाए? धन धन हाँ, माँ-बाप अपने इसी सोच के कारण अपने बेटी का सही ढंग से न तो पालन-पोषण करते हैं न तो सही दंग से शिक्षा ही देते हैं। क्योंकि वे मानते हैं की बेटी पराया धन है इसे ससुराल में रहना है तो फिर इसके पीछे इतनी खर्च क्यों करूँ? ............ फिर एक यह भी सोच रहती है की लड़की को ज्यादा या उच्च शिक्षा देंगे तो फिर हमें उस अनुसार उसके लिए उच्च स्तर का वर ढूंढना होगा जिसमें मुझे दहेज के रूप में काफी धन देना होगा। .................... इस प्रकार दहेज समस्या के कारण भी कितने माँ-बाप अपनी बेटी को विशेष नहीं पढाते हैं। ......... पर हमें यह समझना चाहिए की हमारी यह सोच किसी भी अर्थ में उचित नहीं है। दहेज के डर से बेटी को न पढाना हमारी मुर्खता है और यह हमारी संकीर्ण व नीच विचारधारा को ही दर्शाता है। ............... इस प्रकार के सोच रखने वाले को यह समझना चाहिए कि यदि हम बेटी को उचित शिक्षा दें और पढ़ा-लिखा कर आगे बढाएँ तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। यदि लड़की पढ़-लिखकर नौकरी या कोई रोजगार करती है तो इसमें हर्ज क्या? ऐसी स्थिति में ऐसे लड़के भी आसानी से मिल सकते हैं जो बिना दहेज के या कम दहेज के उससे शादी करे। और यदि ऐसा नहीं होता है तो यदि लड़की पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी है, आत्मनिर्भर है तो इसमें हर्ज क्या?............... इस प्रकार हमें यह समझना चाहिए कि बेटी को पढ़ा-लिखा कर आगे बढ़ाने से दहेज समस्या बढती नहीं है बल्कि बहुत हद तक दहेज समस्या का समाधान होता है। ................

अतः हमारी समाज को अपनी इस नीच सोच को बदलना चाहिए व बेटा-बेटी में फर्क न कर लड़का-लड़की दोनों को सही ढंग से पालन-पोषण व उचित शिक्षा देना चाहिए।

हाँ, यह बात भी सही है कि धीरे-धीरे हम जागरूक हो रहे हैं तथा अब कितने परिवारों में बेटी को भी उच्च शिक्षा दी जा रही है। पर इस कार्य में अभी हम बहुत ही पीछे हैं, हमें और आगे बढ़ना होगा।

अपने नीच सोच को हटाना होगा।
बेटा-बेटी में अन्तर पाटना होगा॥
बेटी को आगे बढ़ाना होगा।
जिम्मेदार माँ-बाप का फर्ज निभाना होगा॥

Saturday, August 23, 2008

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबों को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ

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गीता में भगवान श्री कृष्ण ने हमें हमेशा अपने कर्म करते रहने की ही शिक्षा दिए हैं। अतः श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व को हमें यों ही नहीं बिताना चाहिए बल्कि इस अवसर पर हमें अपने कर्म को करते हुए अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित होना चाहिए।

Sunday, August 17, 2008

दिल का जख्म


कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

है जख्म ये जो भरती नहीं
है इसकी दवा जो मिलती नहीं
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे


क्या सुनाऊं दिल का हाल
पापियों ने किया इसे बेहाल
थी अरमां आसमां छूने को
पर ऊँचाई से उसने ऐसा धकेला
कि दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
दिल टुकड़े-टुकड़े हुए
किसी तरह टुकड़े को जोड़कर
नया जीवन जीना चाहा
पर आगे के राह में
उसने ऐसा रोड़ा लगाया
कि दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का दर्द बढ़ता ही गया
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे


बहुत कोशिश की दिल के जख्म को भरने की
पर नहीं किया था रत्ती भर भी सद्व्यवहार उसने
किया था मेरे दिल पर आघात ही आघात उसने
मेरे दिल का जख्म बढ़ता ही गया
दिल का जख्म बढ़ता ही गया
मुझसे उसने दुनियाँ का सब कुछ छीन लिया
नहीं छोड़ा उसने कुछ भी मेरे लिए
सिवाय दिल के जख्म के
सिवाय दिल के जख्म के
कोई आए मेरे दिल का दर्द सुन ले
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे
कोई तो दिल के जख्म पर मलहम लगा दे

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http://kathavyatha.blogspot.com/#septkavita1


Friday, August 15, 2008

आया है स्वतंत्रता दिवस

सबों को स्वतंत्रता दिवस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
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आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म याद कराने को।
भूल न जाना तुम हिंदुस्तान के मज़हब को॥

हो जाओ तैयार सब कुछ न्योछावर करने को।

सहना होगा थोड़ा कष्ट भारतमाता के लाज बचाने को॥

आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म याद कराने को।

आया है स्वतंत्रता दिवस अपना धर्म निभाने को॥

Thursday, August 14, 2008

सबसे न्यारा सबसे प्यारा

सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा
हर बच्चे यहाँ के हैं सच्चे
इनको किसी का डर नहीं
इनके मन में कोई पाप नहीं
बस अपना कार्य करना है
जीवन में आगे बढ़ना हैं
अपना नाम कमाना है
भारत को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाना है
बस मत रोको इन्हें आगे बढ़ने में
मदद करो इन्हें आगे बढ़ने में
सहायता करो इन्हें बढ़ने में
मत लगने दो इनपर किसी भी प्रकार का धब्बा
इसी पर है देश की आशा
गर चुक गए तुम तो मिलेगी निराशा ही निराशा
बस यही है तुमसे आशा
मदद करो इन्हें बढ़ने में
और हाथ बढाओ देश को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने में
सबसे न्यारा सबसे प्यारा
भारत देश है हमारा

Wednesday, August 13, 2008

भारतमाता के हम वीर सपूत



भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे
दुश्मन चाहे लाख आए
अपने कर्तव्य को नहीं भूलेंगे
अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे
अन्याय को नहीं स्वीकारेंगे
भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे

आगे बढ़ते रहे हैं
आगे ही बढ़ते रहेंगे
अन्याय व भ्रष्टाचार को
इस देश से निकाल फेकेंगे
सच्चाई व ईमानदारिता के समाज हम बनाएँगे
भारतमाता के हम वीर सपूत
नहीं झुकेंगे, नहीं हारेंगे

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भारतमाता के हम वीर

Wednesday, August 6, 2008

स्वतंत्रता दिवस नहीं शोक दिवस

मना रहे हैं स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
पढ़ा रहे हैं सदाचारिता की पाठ
कर रहे हैं आपस में गरीबों के राशि के बंदरबाँट
यही है भारतीय स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ
क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता की वर्षगाँठ
आज मेरा देश स्वतंत्र है
पर इस देश के निवासी गुलाम हैं
भ्रष्टाचार व अन्याय के गुलाम
जुल्म व शोषण के गुलाम
घूसखोरी व अत्याचार के गुलाम
एक नहीं दो नहीं सभी हैं इनके गुलाम
यही है मेरे देश की पहचान
यहाँ किसी को बोलने का भी अधिकार नहीं है
यहाँ किसी को न्याय पाने का भी अधिकार नहीं है
नहीं होती है यहाँ आम जन के साथ न्याय
आम जन के लिए तो न्याय माँगना भी गुनाह हो जाता है
यदि माँगा वह न्याय और नहीं दिया पैसा
तो रक्षक भी उसका दुश्मन हो जाता है
क्योंकि यहाँ पैसे की ही बात सुनी जाती है
व पैसे की ही जीत होती है
एक नहीं दो नहीं नीचे से ऊपर तक सभी जगह है घूसखोरी व अत्याचार
इसे बंद करने के लिए नहीं है कोई सरकार
होती रही है होती रहेगी अन्याय व अत्याचार
हमें न्याय पाने का भी नहीं है अधिकार
हमें सच बोलने का भी नहीं है अधिकार
तो फिर क्यों मनाऊं मैं स्वतंत्रता दिवस
आज सच्चाई व इमानदारी का नहीं है नामों निशान
भारत में धर्म की कोई नहीं है पहचान
चूँकि भारत में सच्चाई, ईमानदारी व धर्म सभी का हो गया है नाश
तो क्यों न स्वतंत्रता दिवस के स्थान पर शोक दिवस ही मनाया जाए

रचनाकार : महेश कुमार वर्मा

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स्वतंत्रता की ६१ वीं वर्षगाँठ

Saturday, July 26, 2008

महापाप

इसमें कोई दो राय नहीं कि कन्या भ्रूण हत्या बढ़ने का सर्वाधिक मुख्य कारण संतान के रूप में लड़की की चाह न होकर लड़का की चाह होना रहता है।



अतः जबतक समाज की मानसिकता को बदलकर नर व नारी एक सामान की भावना नहीं लाई जाएगी तबतक इस समस्या से निजात पाना मुश्किल है। और इसके लिए समाज को ही सोचना पड़ेगा व आगे आना पड़ेगा।



फिर आख़िर संतान के रूप में लोग लड़की क्यों नहीं चाहते हैं? हमें इस पर भी सोचना चाहिए और इसमें जो कारण उचित हों उसे दूर करने का उपाय समाज को ही करना होगा। ऐसे ही कारणों में से एक कारण है : दहेज-समस्या।



हमारी समाज दहेज रूपी दानव को नष्ट करने का कोई पहल नहीं करती है, पर जन्म से पूर्व अपने ही संतान को नष्ट करने का पहल जरुर करती है। सोचिए आख़िर कितनी संकीर्ण व नीच विचारधारा की है हमारी समाज। ......... और यदि हमारी समाज इतनी नीच विचारधारा की है तो हमें समाज के इस विचारधारा का विरोध करने में संकोच नहीं करना चाहिए।


........................

........................

.......................


फिर कन्या भ्रूण हत्या ही क्यों , नर या मादा किसी भी प्रकार की भ्रूण हत्या महापाप है। उस माँ-बाप के लिए अपने संतान के प्रति इससे बड़ा कुकर्म और क्या होगा, जिसने ख़ुद संतान के जन्म के लिए प्रयोजन किया व फिर जन्म से पहले ही अपने ही संतान को नष्ट कर दिया।


कन्या भ्रूण हत्या ही नहीं किसी भी लिंग की भ्रूण हत्या महापाप है।


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कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

मुझे भी जन्म लेने दो

Friday, July 25, 2008

संतमत आश्रम या अपराध का अड्डा

नीचे के समाचार को पढ़ें व विचारे:

जब संतमत-सत्संग के आश्रम में इस प्रकार की घटना हो सकती है तो अन्य जगह ऐसी घटना नहीं होगी यह कैसी सुनिश्चित की जाएगी? जो संतमत-सत्संग ख़ुद अपने प्रमुख आश्रम को व अपने प्रमुख संतों को सुरक्षित नहीं रख सकी तथा आरोपी भी प्रमुख संत-महात्मा ही है, वह संतमत-सत्संग कैसे शान्ति फैलाएगी? कैसे अब लोग इन साधु-महात्माओं पर विश्वास करे???

ताजा समाचार है कि जिन्हें गोली लगी उनहोंने कल यानि २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया।

अब आप सोचें कि अध्यात्म के आड़ में संतमत-सत्संग का आश्रम क्या अपराध का अड्डा नहीं बन रहा है?

शान्ति के संदेश देने वाले साधु-महात्मा क्या अपराध नहीं कर रहे हैं?

तो नीचे २३.०७.२००८ के समाचार-पत्र का समाचार पढें व विचारें। उल्लेखनिए है कि साधु दयानंद ने २४.०७.२००८ को दम तोड़ दिया है।

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=1#

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=3&edition=2008-07-23&pageno=17#

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भागलपुर, अपराध संवाददाता : जिले के बरारी थाना अंतर्गत कुप्पा घाट स्थित महर्षि मेही आश्रम पर कब्जे को लेकर सोमवार की देर रात आश्रम के एक साधु दयानंद दास को गोली मार दी गई। जिन्हें गंभीर हालत में जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया, जहां उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इस संबंध में स्वामी दयानंद के बयान पर मंगलवार को आश्रम के चार पदाधिकारियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। जिनमें महर्षि मेंही आश्रम में कब्जे को लेकर साधु को मारी गोली महर्षि मेंही आश्रम .. अखिल भारतीय संतमत सतसंग महासभा के आशुतोष बाबा, महामंत्री करुनेश्वर सिंह, सह मंत्री राजेन्द्र सिंह व प्रबंधक महापात्रा बाबा के नाम शामिल हैं। इधर, देर शाम डीआईजी रघुनाथ प्रसाद सिंह आश्रम पहुंच मौके का जायजा लिया तथा घटना को आश्रम विवाद का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि जांच के बाद ही आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उधर, एसपी कुंदन कृष्णन को आशंका है कि महंत को उसकी ही रिवाल्वर से गोली लगी है। यदि हत्या की नीयत से गोली चलाई गई होती तो गोली कमर की नीचले हिस्से में क्यों लगती। फिर भी मामले की जांच की जा रही है। सुपौल जिले के करजाइन बाजार निवासी वैद्यनाथ प्रसाद यादव के पुत्र स्वामी दयानंद दास ने प्राथमिकी में कहा है कि वह गुरुमहाराज के समाधि स्थल के पीछे स्थित कमरा नंबर तीन में सो रहे थे तथा कमरे का दरवाजा खुला हुआ था। इसी बीच रात के पौने तीन बजे के करीब उसके कमर में गोली मार दी गई। गोली लगते ही वे विस्तर से नीचे गिर चिल्लाने लगे परन्तु वहां कोई नहीं आया। बाद में उन्हें मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने कहा कि नामजद चारों लोग मिलकर आश्रम से उसे निकालवाना चाहते थे। क्योंकि आश्रम में हो रहे गोरख धंधे की उसे जानकारी थी। इसके अलावा वे आशुतोष बाबा का आचार्य के उत्तराधिकारी बनने का भी विरोध करते थे। उन्होंने बताया कि उनके मित्र पंकज दास को जबसे आश्रम से बाहर निकाला गया है तब से उसने आशुतोष बाबा को प्रणाम करना तक बंद कर दिया था। इस बात को लेकर भी आशुतोष बाबा नाखुश थे। इन्हीं सब कारणों से एक साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया। इस संबंध में कमरा नंबर एक में रहनेवाले मोनू बाबा, कमरा नंबर पांच के तेजनारायण जो आश्रम की खेती करते हैं तथा सामने वाले कमरे में रहने वाले सफाईकर्मी योगेन्द्र सिंह ने बताया कि वे लोग सो रहे थे। जिस समय घटना घटी उस समय बिजली नहीं थी। इन लोगों का कहना है कि घटना को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया तथा घटना के वक्त मोनू बाबा व तेजनारायण के कमरे को भी बाहर से बंद कर दिया गया था। इधर, मंत्री राजेन्द्र सिंह, व्यवस्थापक महापात्रा व आशुतोष बाबा ने लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इनलोगों ने दयानंद दास को आश्रम से निकालने की बात को गलत करार देते हुए कहा कि आश्रम के लोग ऐसी घिनौनी हरकत नहीं करेंगे। उनलोगों ने बताया कि महामंत्री करूणेश्र्वर सिंह 19 जुलाई से ही बाहर हैं। घटना के कारणों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए इन लोगों ने इसकी निंदा की है। जांच पूर्व निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी : हरिनंदन बाबा भागलपुर : महर्षि मेंही आश्रम के आचार्य स्वामी हरिनंदन बाबा ने कहा कि घटना की जानकारी उन्हें वार्निग घंटी के बाद रात्रि करीब पौने तीन बजे हुई। हालांकि घटना की वास्तविकता का अब तक उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना को अंजाम बाहरी तत्वों या फिर आश्रम के लोगों द्वारा दिया गया है यह विचारनीय बिंदु है। इसकी गहन जांच कराई जाएगी तथा जांच पूर्व किसी निर्णय तक पहुंचना जल्दबाजी होगी। इस घटना से आश्रम की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। उन्होंने वर्तमान में आश्रम में किसी तरह के विवाद से भी इनकार किया है। व्यवस्था में कमी की बात मानते हुए उन्होंने कहा कि देर शाम आश्रम में आए बाहरी लोगों एवं कमरों की अच्छी तरह जांच होनी चाहिए। जांच में कोताही बरतने का नतीजा सामने है।

Tuesday, July 22, 2008

मुझे भी जन्म लेने दो

तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
मैं बेटी बनकर जन्म ले रही हूँ इसीलिए
मेरे बेटी होना से तुम क्यों घबराते हो
दहेज़ के कारण
या बेटी को पराया धन समझते हो
पर तुम्हारा सोचना व्यर्थ है
बेटी पराया धन नहीं है
तुम मुझे उचित शिक्षा देना
मेरे साथ पराये का व्यव्हार न करना
तब तुम देखोगे कि
बेटी बेटा से कहीं अधिक आगे व शुखदायक है
और तब दहेज़ की समस्या भी ख़त्म हो जाएगी
क्या सोचते हो
मेरे जन्म से तुम्हें मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति में संदेह है
पर तुम्हें यह समझाना चाहिए कि
मोक्ष या परमात्मा-प्राप्ति
संतान के बेटा या बेटी होने पर निर्भर नहीं करता है
यह निर्भर करता है तुम्हारे ध्यान-साधना व तुम्हारे किए कर्म पर
फिर क्या मुझे जन्म से पहले ही मार देने पर
तुम्हें मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी
कभी नहीं, कभी नही, कभी नहीं
तब फिर तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो
तुम्हारी सारी सोच निराधार है
तुमने ही मुझे जन्म लेने के लिए प्रयोजन किया
फिर तुम ही मुझे जन्म से पहले ही मारने का प्रयोजन कर रहे हो
सिर्फ इसीलिए कि मैं नारी जाति का हूँ
पर तुम यह मत भूलो कि
मैं जिसके कोख से जन्म लेने वाली हूँ
वह भी नारी ही है
मुझे जन्म देने वाली माँ भी नारी के कोख से ही जन्म ली है
तुम भी नारी के ही कोख से जन्म लिए हो
इतना ही नहीं
सभी नर व नारी नारी के ही कोख से जन्म लिए हैं
तब फिर तुम मुझे जन्म लेने से क्यों रोकते हो
शायद अब तुम समझ गए होगे कि
नारी बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती है
व बेटी पराया नहीं अपना है
मेरे जन्म के प्रयोजन करने वाले मेरे माता-पिता
तुमसे मेरी यही आग्रह है कि
मुझे मारने का प्रयोजन मत करो
व मुझे मत मारो
मुझे भी जन्म लेने दो
मुझे भी जन्म लेने दो


रचनाकार : महेश कुमार वर्मा
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Sunday, July 20, 2008

कन्या भ्रूण हत्या : एक घिनौना कार्य

भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है व यह मानव जाति के लिए कलंक है। हरेक सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है और जब हम उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देते हैं तो इस मनुष्य के लिए इससे बड़ी कलंक की बात और क्या हो सकती है? धिक्कार है उसको जो किसी भी प्रकार से भ्रूण हत्या में लिप्त हैं........


यह कहना किसी भी अर्थ में सही नहीं है कि बेटा या पुत्र से ही उद्धार होता है। ........आज तो ऐसा कई बार देखा गया है कि पिता जिस पुत्र से आशा रखता है वही पुत्र उसके मृत्यु का कारण भी बनता है। ........... यदि हम आध्यात्म में गहरे तक जाएँ तो हम इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते कि मोक्ष या उद्धार ईश्वर प्राप्ति संतान के नर या मादा होने पर कभी भी निर्भर नहीं करता है।जिस नारी जाति से सारी मनुष्य जाति चाहे वह नर हो या मादा का जन्म होता है, उस नारी जाति के भ्रूण को जन्म से पहले ही नष्ट कर देना या उससे घृणा करना मनुष्य के लिए एक घिनौना कार्य ही है। ................

--महेश कुमार वर्मा

दिनांक : २०।०७।२००८

स्थान : पटना

लेखक : MAHESH KUMAR VERMA

पता : DTDC Courier Office,

Satyanarayan Market,

Opposite Maruti (KARLO) Show Room,

Boring Road, Patna (Bihar)

PIN-800001 (INDIA)

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भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध

जघन्य अपराध

Tuesday, April 22, 2008

चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है?

जी हाँ, यह प्रश्न विचारनिए है कि चमड़ा से निर्मित वस्तु का उपयोग कहाँ तक उचित है? इस बात में कोई दो राय नहीं कि चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग जीव हत्या को बढावा देना है। (क्यों?)

हम चमड़ा निर्मित वस्तु का उपयोग करते हैं आख़िर तब ही तो बाज़ार में इसकी मांग होती है और इसी कारण ही चर्म उद्योग फल-फूल रहा है। तो इस प्रकार हम यदि चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन करते हैं तो उस जीव हत्या के लिए हम भी जिम्मेवार बनते हैं जिसके चर्म से वह वस्तु बनती है। (क्यों?)

और इसमें कोई दो राय नहीं कि जीव हत्या एक महापाप है। अतः हमें चर्म-निर्मित वस्तु का सेवन बंद करना चाहिए।

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वह बकरा ने आपको क्या किया था?
मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित
शाकाहारी भोजन : शंका समाधान
मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन
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Friday, March 21, 2008

होली के अवसर पर एक अपील

पवित्र होली का पर्व आपस में वैर व दुश्मनी या शत्रुता की भावना भुलाकर आपस में प्रेम स्थापित करने का पर्व है। पर आज कितने लोग अपने पुराने दुश्मनी का बदला होली के दिन ही लेते हैं तथा कितने लोग होली के दिन शरारत करने से नहीं चुकते हैं। पर हमें ख्याल रखना चाहिए की पवित्र होली का पर्व शरारत करने का पर्व नहीं है बल्कि यह प्रेम का पर्व है। इस होली के अवसर पर मैं सबों से अपील करना चाहता हूँ कि वे होली का पर्व प्रेम पूर्वक मनाएं न कि शरारती के साथ तथा आपसी वैर भावना भुलाकर आपस में प्रेम स्थापित करें। साथ ही मांस-मदिरा का सेवन भी त्यागना चाहिए।

होली के शुभकामनाओं के साथ।

आपका
महेश कुमार वर्मा
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Sunday, March 9, 2008

मेरा जीवन खुला किताब

मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया
न कोई जान सका न कोई पहचान सका
यह यों पड़ा ही रह गया
मेरा जीवन खुला किताब खुला ही रह गया

Friday, January 25, 2008

मेरे देश की कहानी

सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों आओ सुनो मेरे देश की कहानी
जहाँ रोज होती है घोटाला और होती है बेईमानी
और कुछ हो या ना हो भ्रष्टाचार ही है देश की निशानी
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों आओ सुनो मेरे देश की कहानी

बेईमानी, भ्रष्टाचार, घुसखोरी और अत्याचार
इसी पर तो टिकी है इस देश की सरकार
नहीं हो भ्रष्टाचार तो ये जी नहीं पाएंगे
इसीलिए तो भ्रष्टाचार को ये कभी नहीं छोड़ेंगे

बढ़ रहे हैं बढ़ रहे हैं ये बढ़ते ही रहेंगे
भ्रष्टाचार को ये नंबर वन का बिजनेस बनाएँगे

तड़पते को रुलाएंगे
मरते को मारेंगे
धर्मं को भुलाएँगे
पैसे को पहचानेंगे
सबों पर अपना रॉब जमाएँगे
दुनियाँ में ताकतवर कहलाएँगे

और कुछ नहीं है इनका विचार
बढ़ते ही रहेगी देश में अत्याचार

पुरुष हो या हो महिला
गरीब हो या हो लाचार
सबों के साथ होगी दुर्व्यवहार व अत्याचार
यही तो है इनको शक्तिशाली कहलाने का आधार

छोड़ देंगे यदि इसे
तो नहीं चल पाएगी इनकी सरकार

यह नई बात नहीं
यह तो है वर्षों पुरानी
यहाँ हमेशा होती रही
बेईमानी ही बेईमानी

बस यही है यहाँ की कहानी
यही है मेरे देश की कहानी
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Saturday, January 19, 2008

कहाँ जाऊंगा मैं तुम्हें छोड़कर

कहाँ जाऊंगा मैं तुम्हें छोड़कर
नहीं रह सकता में तुमसे नाता तोड़कर
चले न जाना तुम मेरा दिल तोड़कर
आ जाना तुम मेरा अपना बनकर
जी नहीं सकता मैं तुम्हें छोड़कर
जी नहीं सकता मैं तुम्हें छोड़कर

Wednesday, January 16, 2008

मुझे शांतिपूर्वक जाने दो

यदि कोई नहीं है इस दुनिया में सच्चाई पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में सच्चाई का साथ देने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में ईमानदारिता पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में निष्पक्षता पर चलने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में मुझको न्याय दिलाने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में मुझको सुनने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में मुझसे बातें करने वाला
यदि कोई नहीं है इस दुनिया में गलत व झूठ का बहिष्कार करने वाला
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे विरुद्ध कुछ कहने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे विरुद्ध कुछ करने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे विरुद्ध कुछ करवाने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे किसी कार्य में आपत्ति करने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मुझे कुछ करने से रोकने का
तो किसी को भी नहीं है अधिकार मेरे राह में विध्न डालने का
और ऐसी स्थिति में मुझे जिंदा रहना भी बेकार है
और ऐसी स्थिति में मुझे मर जाना ही बेहतर है
और ऐसी स्थिति में नहीं है किसी को मुझे मरने से रोकने का अधिकार
क्योंकि मैं तो हूँ सारी दुनिया के लिए बेकार
तब तो फिर मर ही जाऊंगा
तब फिर तुझे मैं कुछ न कहूँगा
तब तुमको नहीं होगी कोई दिक्कत मुझसे
तब तुम रहना चैन व आराम से
क्योंकि तब तुम्हारी सारी समस्या का अंत हो जाएगा
तुम्हारे नजर में यह पापी तुमसे हमेशा-हमेशा के लिए दूर चला जाएगा
मैं चला जाऊंगा
फिर कभी न आऊंगा तुम्हारे नजरों के सामने
मैं चला जाऊंगा
फिर कोई पापी न होगा तुम्हारे नजरों के सामने
तब जाता हूँ
मुझे जाने दो
पर एक विनती है
मुझे शांतिपूर्वक जाने दो
बस एक चोटी सी अन्तिम इच्छा पूरी कर दो
और मुझे शांतिपूर्वक जाने दो

...............

०६०६३०

Sunday, January 13, 2008

विचार : दूध का सेवन कहाँ तक उचित है

आज मिठाई का चलन खूब हो गया है, कोई विशेष समारोह हो तो वहाँ नास्ता में मिठाई , मेहमान को नास्ता कराना हो तो वहाँ मिठाई ........... इत्यादि कई प्रकार से मिठाई का उपभोग हो रहा है। ............ अधिकांश मिठाई के निर्माण में दूध का ही उपयोग किया जाता है। दूध का उपयोग मिठाई बनाने के अलावा भी कई कार्यों में होता है। चाय का उपयोग तो हरेक जगह धड़ल्ले से हो रहा है जिसमें दूध का ही प्रयोग किया जाता है। ........... कुल मिलाकर कहें तो आज दूध का उपयोग लोगों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है। ........... पर सोचें कि यह दूध हम कहाँ से लाते हैं? ............ यह दूध हम किसी न किसी स्तनधारी जीव (भारत में मुख्यतः गाय व भैंस) से लेते है, जिसे वह अपने बच्चे के लिए पैदा करती है। हम एक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मानव होकर एक पशु के बच्चा को अपने माँ का दूध पीने से वंचित कर देते हैं और खुद उसका दूध हम पीते हैं। ........... जब हमें इन पशु से दूध प्राप्त करना होता है तो हम क्या करते हैं? ............... बच्चा को अलग बांध देते हैं फिर वह पशु जिसे दुहना रहता है उसका भी पैर बांध देते हैं और तब फिर हम दुहकर दूध प्राप्त करते हैं। और इस बीच बेचारा वह पशु का बच्चा दूध पीने के लिए छटपटाते रहता है। ..............हम बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी होकर कितना जुल्म करते हैं इन बच्चों पर जिसकी माँ ने उसे जन्म देने के बाद उसके आहार के लिए अपने थन / स्तन में दूध उत्पादित करती है उसे हम उस बच्चे को न देकर खुद पीते हैं। ............... क्या यह उचित है? ..............कभी नहीं, नैतिकता के दृष्टि से यह कभी भी उचित नहीं है कि हम सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मानव होकर एक पशु के बच्चे पर इस प्रकार का जुल्म करके उसका आहार को हम ग्रहण करें। ............. ख्याल रखें कि कोई भी स्तनधारी जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु वह अपने दूध का उत्पादन सिर्फ अपने शिशु / बच्चा के लिए ही करता है न कि अन्य के लिए और यह प्रकृति का नियम है। .............. इस प्रकार हमें सिर्फ अपने ही माँ का दूध पीने का अधिकार है जो हम अपने शैश्यावस्था में पी चुके होते हैं और इसके अलावा हमें अन्य किसी भी जीव का दूध पीने का कोई अधिकार नहीं है। और इस प्रकार हमें दूध या दूध से बने किसी भी पदार्थ का उपभोग नहीं करना चाहिए क्योंकि दूध हमारे लिए नहीं बल्कि उस बच्चे के लिए होता है जिसे हम भूखे रखकर जबरन उसके माँ के थन से दूध निकालते हैं।
हमें नवजात पशु पर व उसके जननी (माँ) पर जुल्म ढाना बंद करके किसी भी प्रकार से दूध का उपयोग बंद करना चाहिए।

इंसान नहीं हैवान हैं हम

इंसान नहीं हैवान हैं हम
मारते बेकसूर जीव को और
भरते अपना पेट हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम

मत कहो हमें सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी
यहाँ हम रोज करते हैं बेईमानी

करते हैं अत्याचार
होती है बलात्कार
देते हैं रिश्वत
कोई नहीं करता है बहिष्कार

एक दिन नहीं रोज का है धंधा
पहुंचाते हैं पैसा
डालते हैं डाका
देते हैं उसे भी आधा
पैसे दो मौज मनाओ
कुछ न कहेंगे कुछ न करेंगे
अपना काम करते रहो
वे यों ही सोते रहेंगे
न्याय के लिए आने वाले को हंटर लगाएंगे
वे पुलिस हैं पुलिस ही कहलाएंगे
यह थी हमारी एक झलक
यहाँ होती है अत्याचार झपकते ही पलक
अन्याय करने में सब है मतवाला
जो जितना बड़ा है उसका मुँह उतना ही काला

इंसान नहीं हैवान हैं हम
कलियुग के शैतान हैं हम
मत कहो हमें सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी
हैं हम दुनिया के सर्वाधिक खतरनाक प्राणी
इंसान नहीं हैवान हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम

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http://kavimanch.blogspot.com/#poem18

कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर

आते हैं आंखों में आंसू यह जानकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर
अंधे हैं वो आँख रखकर
बहरे हैं वो कान रखकर
गूंगे हैं वो मुँह रखकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर

हैवानियत की हद कर दी उसने
इंसानियत की नाम नहीं है
कितने भी बड़े क्यों न हो
मानवता की पहचान नहीं है
कहने को तो हैं वो सज्जन
पर दुर्जन से कम नहीं हैं
कुछ बोलो तो होगी पिटाई
जल्लाद से वो कम नहीं हैं
हैं वो हैवान इन्सान बनकर
तड़पाते हैं वो हमेशा शैतान बनकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर
कोई नहीं है मेरा मुझे पहचानकर

Saturday, January 12, 2008

भारतीय गणतंत्र के ५८ वर्ष

कुछ ही दिनों बाद हम भारतीय गणतंत्र के ५८ वीं वर्षगांठ मनाने वाले हैं। ५८ वर्ष पूर्व २६ जनवरी १९५० को हमारा देश भारत गणतंत्र हुआ था जिसकी वर्षगांठ हरेक वर्ष २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप दिनों मनाया जाता है इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूरे भारत वर्ष में हजारों-लाखों रुपये खर्च किये जाते हैं। पर हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि गणतंत्र दिवस मनाने की सार्थकता कितनी सफल होती है। ............



वास्तविकता के जमीं पर आएं तो हम देखते हैं कि भले ही हमारा देश आज स्वतंत्र है पर आज इस देश के नागरिकों को वास्तविक रूप से न तो न्याय पाने का अधिकार है और न तो इन्हें अभिव्यक्ति की ही स्वतंत्रता है। यह कोरी बातें नहीं बल्कि वास्तविकता है। कानून में भले हमें इस प्रकार की स्वतंत्रता व अधिकार मिली है पर वास्तविकता आज यही है कि आम लोगों के लिए आज न्याय पाना उस सपने कि तरह है जो अंततः कोरी कल्पना ही साबित होती है। आज आम लोगों के साथ जुल्म ढाए जाते हैं और यदि वह न्याय की मांग करता है तो न्याय पाना तो दूर की बात उसके साथ और भी अन्याय व अत्याचार किया जाता। जो रक्षक के रूप में खड़ा रहते हैं वे भक्षक बन जाते हैं और जो पंच परमेश्वर के नाम पर रहते हैं वे पापी बन जाते हैं। .......

जरा सोचें कि जब हमारे देश में पीड़ित के साथ न्याय नहीं हो तो ऐसी स्थिति में गणतंत्र दिवस व स्वाधिनता दिवस मनाने का क्या औचित्य रह जाता है? आज भले ही भारत स्वतंत्र है पर भारतवासी अन्याय का गुलाम है और जब तक आमलोगों को न्याय दिलाना सुनिश्चित नहीं हो जाती है तब तक स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस मनाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। .......


.............

न्यायालय में भी नहीं है न्याय


पंच : परमेश्वर या पापी


आज का संसार


यह दिल की आवाज़ है


कैसे करूं मैं नववर्ष का स्वागत

न्यायालय में भी नहीं है न्याय

......... नव वर्ष के स्वागत में हम अनेकों प्रकार से जश्न मानते हैं तथा एक-दूसरे को नव वर्ष का बधाई देते हैं। पर क्या सिर्फ बधाई भर दे देने मात्र से हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है? नव वर्ष के आगमन पर हम एक-दूसरे को बधाई व शुभ-कामना दें और फिर सालों भर अपने धर्म व कर्तव्य को भूल जाएँ, क्या यही मेरा कार्य होना चाहिए? ............

नव वर्ष के आगमन के साथ ही हम लग जाते हैं गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी में। अगले माह हम फिर गणतंत्र दिवस मनाएंगे। हम गणतंत्र की ५७ वीं वर्षगांठ में फिर तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित करेंगे व हजारों रुपये खर्च करेंगे। पर क्या हमने कभी सोचा है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रात्मक राज्य भारत में हम गणतंत्र दिवस पर हजारों-लाखों रुपये खर्च कर देते हैं पर भारत को गणतंत्र हुए आज ५७ वर्ष हो जाने पर भी आज भारत के जनता को न्याय नहीं मिल पाती है। न्याय मिलना तो दूर की बात, कभी-कभी तो लोगों को न्याय की मांग तक करने का अधिकार का हनन होता है। कभी-कभी तो अदालत द्वारा भी सही फैसला नहीं सुनाया जाता है और दोषी सजा-मुक्त हो जाता है तथा निर्दोष को सजा भुगतना पड़ता है। कुछ ही दिनों पहले की घटना में एक ऐसा ही उदाहरण मिलता है 'जेसिका लाल हत्याकांड' के मामला में; जिसमें हाईकोर्ट द्वारा जो फैसला सुनाया गया वह निचली अदालत के फैसले से पूर्णतः विपरीत था। जहाँ निचली अदालत ने 'मनु' को निर्दोष बताकर बरी कर दिया था वहीं उच्च न्यायालय ने 'मनु' को दोषी व हत्यारा बताकर उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। ............. सोचें कि यदि निचली अदालत के फैसले व जांच पर रहा जाता तो क्या दोषी को सजा मिल पाती? सोचें कि आख़िर निचली अदालत द्वारा सच्चाई तक क्यों नहीं पहुँचा गया? ................ ऐसा एक नहीं कई मामला रहता है जिसमें अदालत द्वारा गलत फैसला सुनाया जाता है और दोषी आजाद रहता है व निर्दोष सजा भुगतता है। ............ सोचें कि आखिर किस मुँह से हम यह कहकर अपने को गौरवांवित महसूस करते हैं कि हम भारतीय गणतंत्र की ५७ वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। -- सिर्फ दिखावा के लिए गणतंत्र दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है। हमें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि हरेक व्यक्ति को न्याय मिले। ............. सिर्फ यह कहने मात्र से नहीं होगा कि सभी को न्याय पाने का अधिकार है बल्कि सबों के साथ न्याय करना भी होगा। - वास्तव में कितने लोगों को आज न्याय पाना तो दूर की बात उन्हें न्याय मांगने का भी अधिकार नहीं है और यदि वह न्याय की मांग किया तो उसके साथ और भी ज्यादा अन्याय होने लगता है। ......... और उसके साथ अन्याय जब चरम सीमा पर पहुंच जाती है, उसके साथ मानसिक प्रताड़ना इतनी आधिक हो जाती है कि ऐसी स्थिति में कभी-कभी पीड़ित विवश होकर हथियार को लेता को या फिर ऐसी ही स्थिति में कभी-कभी पीड़ित या तो आत्महत्या कर लेता है या या फिर अपराधी बन जाता या फिर मानसिक प्रताड़ना से जूझकर पागल हो जाता है। ..........

..................


(यह महेश कुमार वर्मा द्वारा २४.१२.२००६ को लिखे एक पत्र से लिया गया है।)

Wednesday, December 26, 2007

कैसे करूं मैं नववर्ष का स्वागत

दिन बीते माह बीते वर्ष बीत गए
कितने आए कितने गए उम्र बीत गए
कहना न होगा हम चाँद सितारों पर पहुँच गए
पर धर्म के राह पर हम अभी तक न आए
नहीं मिलती है अदालत में न्याय
व्याप्त है चारों ओर अन्याय ही अन्याय
जब करो न्याय की बात
तो होगी अन्याय से मुलाकात
लाए हो सौगात तो होगी तुम्हारी बात
नहीं तो खाने पड़ सकते हैं दो-चार लात
बहुत बड़ी है उनकी औकात
भेज सकते हैं निर्दोष को भी हवालात
लौट जाना पड़ता है मुँह लटकाकर
क्योंकि रक्षक बना है भक्षक हथियार उठाकर
पता नहीं कब होगी धर्म की स्थापना
न जाने कैसा होगा आने वाला जमाना
नहीं है कहीं न्याय की सुगबुगाहट
चारों ओर है अन्याय का ही आहट
कैसे करूँ मैं नववर्ष का स्वागत
कैसे करूँ मैं नववर्ष का स्वागत

Friday, December 21, 2007

आज का संसार

न्याय मांगने पर जहाँ होता है प्रहार
छीन लेता है मुख का आहार
पीड़ित के साथ होता है दुराचार
यही तो है आज का संसार

Thursday, December 20, 2007

यह दिल की आवाज़ है

बात बहुत खास है
यहाँ सुशासन नहीं कुशासन है
यहाँ रक्षक ही भक्षक है
न्याय मिलने की नहीं आश है
क्योंकि पंच परमेश्वर नहीं पंच पापी है
कोई नहीं अपना है
यह दिल की आवाज़ है

Sunday, December 9, 2007

जमाना हो गया है बेदर्द

दिले दर्द को बयां कर नहीं सकता
दर्द को सह पाना आसान नहीं है
आसानी से मर नहीं सकता
ऐसी स्थिति में जिंदा रहना भी आसान नहीं है
सुनाऊं किसे मैं अपना दर्द
जमाना हो गया है बेदर्द
जो सुनना चाहा मेरा दर्द
जमाना उसे मुझसे दूर किया
जमाना उसे मुझसे दूर किया
क्योंकि जमाना हो गया है बेदर्द

Monday, December 3, 2007

मेरा जीवन नहीं है खुशहाल

कोई मुझसे प्रभावित है
तो कोई मुझसे खफा है
कोई विशेष विषय पर मेरा विचार जानना चाहता है
तो कोई मेरे शब्दों से कोसों भागता है
कोई मेरे बारे में विस्तृत जानना चाहता है
तो कोई मेरे नाम से घबराता है
कोई दरवाजा पर करोड़ों लिए खड़ा है
तो कोई दरवाजा पर से (मुझे) भूखों भगाया है
पता नहीं क्या होगा
मत पुछो मेरा हाल
चाहे जो भी होगा
पर अब मेरा जीवन नहीं है खुशहाल

Friday, November 30, 2007

तुमसे जुदाई का दर्द सहा नहीं जाता

तुमसे जुदाई का दर्द सहा नहीं जाता
तेरे बिना अब रहा नहीं जाता
खाई थी जीवन भर साथ देने की क़समें
खाई थी साथ-साथ जीने-मरने की क़समें
पर बेदर्द जमाना ने ऐसी जुदाई दी
कि फिर पास आना मुश्किल है
तुमसे मिलना मुश्किल है
आपस में बातें करना मुश्किल है
पर तोड़ दो इन सारे बंधनों को
और पास आ जाओ पास आ जाओ
तुमसे जुदाई का दर्द सहा नहीं जाता
तेरे बिना अब रहा नहीं जाता

Wednesday, November 28, 2007

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

पिछले दिनों दिल की आवाज़ पर मांसाहार से संबंधित मेरा दो विचार (i) मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन व (ii) मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित प्रकाशित किए गए। इन ब्लाग्स पर पाठकों द्वारा प्राप्त प्रतिक्रिया में मेरे विचार के पक्ष में व विपक्ष में दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं थी। जिसमें पाठकों द्वारा कुछ प्रश्न भी उठाए गए। प्रस्तुत आलेख पाठकों द्वारा उठाए गए प्रश्नों के जवाब के रूप में प्रस्तुत है।
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कितने लोग मांसाहार के पक्ष में यह तर्क देते हैं की शाकाहार भोजन में हम जब पेड़-पौधे रूपी जीव की हत्या कर सकते हैं तो फिर मांसाहार भोजन से परहेज क्यों? इस तर्क के जवाब में मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि शाकाहार भोजन में वनस्पति को कष्ट होता है यह बात सही है पर मांसाहार भोजन में जंतु की हत्या होती है। और आपको यह समझना चाहिए कि जो भी पेड़-पौधे होते हैं वह फल अपने लिए नहीं उपजाते हैं बल्कि वह फल मनुष्य व अन्य पशु के भोजन के लिए ही होता है। पर कोई भी जंतु अपनी संतान का उत्पादन मनुष्य के भोजन के लिए नहीं करता है। जिस प्रकार आपको अपने संतान या अपने प्राणों से प्रेम रहता है उसी प्रकार उस जंतु को भी अपने प्राणों व अपनी संतान से प्रेम रहता है जिसे मारकर हम खाते हैं। जहाँ तक रही फल की बात तो पेड़ तो फल का उत्पादन मनुष्य व अन्य पशु के लिए ही करता है। आप फल को आसानी से तोड़कर खा सकते हैं, पेड़ कोई आपत्ति नहीं करेगा। यदि आप उस फल को न तोडें तो कुछ दिनों के बाद पेड़ खुद उस फल को छोड़ देता है क्योंकि पेड़ ने फल अपने लिए उत्पादित नहीं किए थे।
मांसाहार के पक्ष में कितने लोगों का तर्क रहता है कि यह प्रकृति का नियम है कि एक जीव दूसरे जीव का भोजन करते हैं, यदि मांसाहार भोजन बंद कर दिया जाए तो उस शाकाहारी जीव , जिनका मांस खाया जाया जाता है, की संख्या काफी बढ़ जाएगी और वे हमारी फसल नष्ट कर देंगे। इस तर्क के संदर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि विवेकशील मनुष्य के द्वारा यह तर्क देना शोभा नहीं देता है। उन्हें यह जानना चाहिए कि प्रकृति के द्वारा नियम में जो आहार-श्रृंखला है उसमें यह कहीं नहीं है कि मनुष्य वनस्पति के अलावे दूसरे जीव को खाएगा। हाँ, अन्य जंगली जीवों के साथ ऐसा है कि मांसाहारी जीव शाकाहारी जीव को खाते हैं, पर मनुष्य के साथ प्रकृति का यह नियम नहीं है। रही यह बात कि यदि हम मांसाहार भोजन न करें तो शाकाहारी जीवों कि संख्या बढ़ जाएगी और वी हमारी फसल नष्ट कर देंगे तो इस संदर्भ में बुद्धिमान मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह शाकाहारी जीव जिनका हम भोजन करते हैं वे पहले वास्तव में जंगल में ही रहते थे पर हम मनुष्य ही उसे जंगल से हटाकर अपने साथ बस्ती में ले आए। ........... फिर हम उन्हें पालकर उनकी संख्या वृद्धि में तो खुद हम ही सहायक बन रहे हैं तब फिर यह कहना किसी भी अर्थ में उचित नहीं है कि यदि नहीं खाएंगे तो उनकी संख्या बढ़ जाएगी। ...........
मनुष्य सर्वाधिक श्रेष्ठ व सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी है और इस कारण मनुष्य को अन्य जीवो का भक्षक बनना मनुष्य जाति के लिए शर्म व कलंक की बात है।

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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

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Sunday, November 18, 2007

पंच : परमेश्वर या पापी

सुना था पंचायत में पंच आते हैं
जो ईमानदार व निष्पक्ष होते हैं
वह धर्मानुकुल उचित निर्णय सुनाते हैं
इसी लिए पंच को परमेश्वर कहते हैं
पर जब मैं देखा कि
आए हुए पंच ईमानदार नहीं पक्षपाती है
वह दूसरे पक्ष को सुनने वाला नहीं
बल्कि एकतरफा दोषी का साथ देने वाला है
वह निष्पक्ष फैसला करने वाला नहीं
बल्कि निर्दोष पर ही जानलेवा हमला करने वाला है
तो मुझे सोचना पड़ा कि
यह पंच परमेश्वर नहीं बल्कि पंच पापी है

Saturday, November 17, 2007

तेरी याद में

सोता हूँ तेरी याद में
जागता हूँ तेरी याद में
खाता हूँ तेरी याद में
पीता हूँ तेरी याद में
लिखता हूँ तेरी याद में
सब कुछ करता हूँ तेरी याद में
हर पल बीतता है तेरी याद में
सब कुछ समर्पित है तेरी याद में
मेरा दिल धड़कता है तेरी याद में
बस तेरी याद में तेरी याद में

मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

मनुष्य जाति के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और कुछ नहीं होगी कि यह बेकसूर जीवों को मारकर फिर उसे खाकर अपना पेट भरता है। धिक्कार है ऐसी मनुष्य जाति को जो अपने को सर्वश्रेष्ठ व सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील कहता है। उस समय कहाँ जाती है उसकी बुद्धिमत्ता व विवेकशीलता जब वह बेकसूर जीवों को मारकर उसे खाता है? क्या यही उसकी बुद्धिमत्ता है कि निरपराध जीवों को मारकर अपनी पेट भरे? क्या यही उसकी बुद्धिमत्ता है कि अपने से कमजोर जीव को मारकर अपना पेट भरे?..................
किसी भी सूरत में मांसाहार भोजन उचित नहीं है। जिस प्रकार हमें अपने प्राणों से प्रेम रहता है उसी प्रकार हमें उन जीवों के लिए भी सोचना चाहिए जिन्हें मारकर हम खाते है। ..........

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मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

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Sunday, November 11, 2007

इतना कष्ट दिया तुने

इतना कष्ट दिया तुने कि अब तड़पा भी नहीं जाता है
इतना रुलाया तुने कि अब रोया भी नहीं जाता है
इतना प्यार था तुमसे कि अब साथ छोड़ा भी नहीं जाता है
इतना अन्याय किया तुने कि अब साथ रहा भी नहीं जाता है

तुझे लोगों ने श्रेष्ठ व बुद्धिजीवी समझा
पर तुम सबसे बड़ा पापी व अधर्मी निकला
तुझे लोगों ने दिल का साफ समझा
पर तुम मीठा जहर निकला
तुमसे लोगों न चाहा था उचित व्यवहार
पर तुमने किया सबों के साथ दुर्व्यवहार

तुमपर मैं किया था बहुत ही विश्वास
पर कभी न सोचा था कि तुम करोगे ऐसा आघात
पर अब मुझे नहीं होगी यह बर्दाश्त
क्योंकि तुने किया बहुत ही घिनौना वारदात

एक शंकर था आदि काल में जिसने विष का पान किया
एक शंकर तुम हो जिसने सबका सर्वनाश किया
इतना अन्याय किया तुने कि अब साथ रहा भी नही जाता है
इतना प्यार था तुमसे कि अब साथ छोड़ा भी नहीं जाता है

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यह रचना महेश कुमार वर्मा द्वारा १९.०८.२००६ को लिखा गया था।

Thursday, November 8, 2007

दिवाली दिन है खुशियाँ मनाने का

दिवाली दिन है खुशियाँ मनाने का
न कि बाद में पछताने का
दिवाली दिन है बुराई पर अच्छाई के विजय का
न कि जुआ में पैसे बर्बाद करने का
दिवाली दिन है अन्धकार से प्रकाश में जाने का
न कि बम-पटाखा से प्रदुषण फैलाने का
दिवाली दिन है आपस में खुशियाँ बटाने का
न कि बम-पटाखा से घायल होने का
दिवाली दिन है खुशियाँ मनाने का
न कि बाद में पछताने का

आख़िर क्या गलती थी मेरी

आख़िर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मुझे बदनाम व अपमानित किया
आख़िर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मेरे साथ दुर्व्यवहार किया
आखिर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मेरे साथ मार-पिट किया
आखिर क्या गलती थी मेरी
जो तुमने मुझे घर से निकला

चुप क्यों हो
बोलते क्यों नहीं हो
मुझे जवाब चाहिए
आखिर क्या गलती थी मेरी
आख़िर किस गलती की
सजा दे रहे हो मुझे
बोलो, बोलते क्यों नहीं हो
जवाब दो, मुझे जवाब चाहिए
आखिर क्या गलती थी मेरी

यही न कि
मैं तुम्हारे द्वारा बोले गए झूठ का विरोध किया
व तुम्हें सच्चाई बताना चाहा
बस यही न
इसी गलती की सजा दे रहे हो तुम
यानी सच बोलने की सजा

यदि सच बोलना है गुनाह तो जिंदा रहना भी है गुनाह
ठीक है, मर जाउंगा मिट जाउंगा
पर नहीं रहूंगा झूठ को स्वीकारकर
और मेरे मरने के लिए जिम्मेवार होगे तुम
तुम यानी झूठ बोलने के मामला में सबसे खतरनाक
व इस पृथ्वी पर का सबसे बड़ा अन्यायी व पापी व्यक्ति शिव शंकर

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यह रचना महेश कमर वर्मा द्वारा २६.०६.२००६ को लिखा गया था।
LS280

Saturday, November 3, 2007

हमें अपनी मंजिल को पाना है

हमें अपनी मंजिल को पाना है
हर चुनौती को स्वीकारना है
राह में चाहे जो भी बाधा आए
दुश्मन चाहे लाखों कांटा बिछाए
हरेक बाधा को तोड़ना है
हमें अपनी मंजिल को पाना है

अपना कर्म करते जा

अपना कर्म करते जा
जीवन में आगे बढ़ते जा
देखो कभी न तुम मुड़कर
सोचो कभी न तुम रूककर
हर परिस्थिति में बढ़ते जा
हरेक बढ़ा को तोड़ते जा
अपना कर्म करते जा
जीवन में आगे बढ़ते जा

Friday, October 26, 2007

अपराधी बनने का एक कारण यह भी

कोई भी व्यक्ति यों ही अपराधी नहीं बन जाता है या यों ही अपराध नहीं कर बैठता है या कोई भी व्यक्ति यों ही आत्महत्या नहीं करता है बल्कि कोई मानसिक प्रताड़ना से या कोई अन्य कारण से वह इतना टूट जाता है कि उसे अपने मामला में आगे बढ़ने के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता है, कोई उसका साथ देने वाला या सुनने वाला नहीं रह जाता है तो अपने ऊपर किये जा रहे अन्याय से उबकर परिस्थितिवश वह या तो अपराध कर बैठता या अपराधी बन जाता है या तो फिर आत्महत्या कर लेता है ।................
वास्तव में कितने लोगों को आज न्याय पाना तो दूर कि बात उन्हें न्याय मांगने का भी अधिकार नहीं है और यदि वह न्याय कि मांग किया तो उसके साथ और भी ज्यादा अन्याय होने लगता है । .............और उसके साथ अन्याय जब चरम-सीमा पर पहुंच जाती है, उसके साथ मानसिक प्रताड़ना इतनी अधिक हो जाती है कि ऐसी स्थिति में कभी-कभी पीड़ित विवश होकर हथियार उठा लेता है या फिर ऐसी ही स्थिति में कभी-कभी पीड़ित या तो आत्महत्या कर लेता है या फिर अपराधी बन जाता है या फिर मानसिक प्रताड़ना से जूझकर पागल हो जाता है । ................
.............................
पाठक कृपया इस विषय पर अपना निष्पक्ष विचार दें ।

Thursday, October 25, 2007

आखिर कब तक

क्यों तड़पाते हो मुझे
क्यों कष्ट देते हो मुझे
क्यों लोगों को गुमराह करते हो तुम
इसीलिए क्योंकि मैं
हमेशा सत्य पर रहा
इसीलिए क्योंकि मैं
कभी झूठ नहीं बोला
इसीलिए क्योंकि मैं
हमेशा तुम्हें अपना समझा
कब तक तपाओगे मुझे
कब तक कष्ट दोगे मुझे
कब तक करोगे तुम अन्याय
कब करोगे तुम मेरे साथ न्याय
क्या तुम कभी नहीं आओगे सच्चाई पर
क्या तुम कभी नहीं करोगे न्याय
मैंने तुम्हें झूठ बोलने के मामला में
सबसे खतरनाक व्यक्ति घोषित किया
मैंने तुम्हें इस पृथ्वी पर का
सबसे बड़ा अन्यायी व पापी व्यक्ति घोषित किया
क्या तुम्हारे अन्याय का अंत नहीं होगा
क्या तुम सच्चाई व इमानदारी पर नहीं आओगे
आखिर क्या चाहते हो तुम
आखिर तुमको मुझसे बात करने का सहस क्यों नहीं है
इसीलिए क्योंकि तुम हमेशा गलत व झूठ पर रहे
आखिर कब तक चलेगी तुम्हारी अन्याय
और कब तक मैं जीवन और मौत के बीच जूझता रहूंगा
तुम हो शिव शंकर मैं हूँ महेश
पर हम दोनों में कब तक चलेगी यह लड़ाई विशेष
चुप क्यों हो
मुझे जवाब चाहिए
आखिर कब तक चलेगी तुम्हारी अन्याय
आखिर कब तक

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यह रचना महेश कुमार वर्मा द्वारा ०४.०६.२००६ को लिखा गया था ।

Monday, October 22, 2007

महिलाओं को चुपचाप सबकुछ सहते रहना प्रताड़ना को बढावा देना है

हमें यह नहीं भूलना चाहिए की हर सफलता के पीछे किसी-न-किसी रूप में एक महिला का हाथ रहता है । आज पुरुष वर्ग घर में जहाँ अपने हरेक कार्य के लिए एक महिला पर निर्भर रहते हैं वहीं अनावश्यक कभी वह आपे से बाहर होकर उसी महिला को तरह-तरह के यातना व प्रताड़ना देने लगते हैं । उस समय वह यह भूल जाता है कि उसके भोजन से लेकर उसके घर के सारी व्यवस्था के लिए वह इसी महिला पर निर्भर है । जिस समय पुरुष को अपना कार्य निकालना हो उस समय उसे वही महिला बहुत ही प्यारी लगती है तथा अन्य समय वह बेवजह उसी महिला पर क्रोधित होते रहते हैं तथा उस महिला को तरह-तरह के यातनाएँ भी देते हैं । ऐसी स्थिति में महिला यदि चुपचाप सब-कुछ सहते रहे तो यह पुरुष द्वारा की जा रही प्रताड़ना को बढावा देना ही होगा और ऐसी स्थिति में वह पुरुष कभी भी अपनी आदत से बाज नहीं आएगा । अतः महिलाओं को चुपचाप सब-कुछ नहीं सहकर पुरुष द्वारा की जा रही बेवजह प्रताड़ना का विरोध करना चाहिए । और ऐसा करने पर ही आँख रहते अंधे पुरुष को यह समझ में आएगी कि महिला उसके लिए कितनी महत्तवपूर्ण है ।
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यह महेश कुमार वर्मा द्वारा २०.०६.२००७ को लिखा गया था जिसे जून २००७ के कादम्बिनी के मतान्तर में भेजा गया था ।

Friday, October 19, 2007

मंथन : विजया दशमी और मांसाहार भोजन

कई स्थानों पर लोग विजया दशमी के दिन मांसाहार भोजन करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? एक ओर हम पूरे धूम-धाम से दुर्गा-पूजा का पर्व मनाते हैं, जिसमें हम अनेक देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं और फिर दूसरी और इस पर्व के समाप्ति के दिन हम मांसाहार भोजन करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? क्या दुर्गा पूजा व दशहरा पर्व का उद्देश्य मांसाहार भोजन है जो हम अपने इस पर्व की समाप्ति मांसाहार भोजन से करते हैं? कभी नहीं, इस पर्व का ऐसा उद्देश्य कभी नहीं है। यह पर्व हमें अन्याय से लड़ने की सिख देती है,...........तो फिर हम बेकसूर जीवों को मारकर फिर उसका भोजन करके खुद अन्याय क्यों करते हैं? ख्याल रखें की यह पर्व अन्याय से लड़ने के लिए है न कि अन्याय करने के लिए। .........


आज हम बहुत ही गर्व के साथ कहते हैं कि मनुष्य इस पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी है। पर जरा सोचें कि एक बेकसूर जीवों को मरना व कष्ट देना क्या यही हमारी बुद्धिमत्ता है? ........ जरा सोचें कि हम अपने प्राणों से या अपने बच्चों से कितना प्यार करते हैं, क्या इसी प्रकार हमें दूसरे जीवों के लिए नहीं सोचना चाहिए? जिन जीवों को हम मारकर भोजन करते हैं उनमें भी उसी प्रकार आत्मा है जैसे मुझमेंआपमें है तथा उसे भी उसी प्रकार कष्ट होता है जैसे मुझे व आपको होता है। सोचें को आपको जब थोडा कष्ट होता है तो आपको कैसा लगता है ...........? उसी प्रकार सब जीवों को कष्ट होता है? ........ सोचें कि यदि आप बेकसूर हों और आपको कोई कष्ट देगा तो आपको कैसा लगेगा? ........ उसी प्रकार उस जीव के लिए भी सोचें जिसे मारकर हम खाते हैं? ............ इस पृथ्वी पर के सबसे अधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी मनुष्य के लिए यह शर्म की बात है कि वह सिर्फ अपने पेट व जिह्वा स्वाद के लिए बेकसूर जीवों को मारकर उसका मांस का भोजन करे। .......... ऐसी स्थिति में मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी कहना 'बुद्धिमत्ता' व 'विवेकशीलता' शब्द का अपमान करना है। और ऐसी स्थिति में मनुष्य को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी न कहकर मनुष्य को पशु से भी बदतर कहना अनुचित नहीं होगा। (क्यों?)

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मांसाहार भोजन : उचित या अनुचित

शाकाहारी भोजन : शंका समाधान

वह बकरा ने आपको क्या किया था?

http://groups.google.co.in/group/hindibhasha/browse_thread/thread/dde9e2ce361496a0

Thursday, October 18, 2007

सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ

सबों को दुर्गा पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ । वर्तमान में हमलोग दुर्गा पूजा मना रहे हैं । जिधर देखें उधर दुर्गा पूजा की तैयारी है । दुर्गा पूजा में सजावट में हम कितने खर्च करते हैं व हर्सोल्लास के साथ दुर्गा पूजा का पर्व मनाते हैं । दुर्गा पूजा का पर्व पूरे १० दिनों का पर्व हैं । प्रत्येक वर्ष आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को कलश स्थापना के साथ नवरात्रारम्भ होता है तथा नौ दिनों तक विधिवत मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद दशमी के दिन प्रतिमा विसर्जन के रश्म के साथ दुर्गा पूजा का पर्व समाप्त होता है । इस दशमी के दिन को विजया दशमी भी कहते हैं । कहते हैं इसी दिन भगवान रामचंद्र ने लंकापति रावण को मारा था और इसी दिन दस सिर वाला रावण हारा था इसीलिए इस पर्व को दशहरा भी कहते हैं।
सिर्फ दुर्गा पूजा ही नहीं अन्य पर्व भी हमलोग प्रतिवर्ष नियमित रूप से मनाते हैं । सिर्फ धार्मिक पर्व ही नहीं कई घटनाओं का वर्षगांठ या साल-गिरह हम मनातें हैं तथा कई महापुरुष के जन्म-दिन के वर्षगांठ पर उन्हें याद करते हैं । स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस व गांधी-जयंती को तो भारत में राष्ट्रीय पर्व मान लिया गया है । इतना ही नहीं अन्य कई घटनाओं का हम वर्षगांठ या साल-गिरह मनाते हैं जिसमें हम उन घटनाओं को याद करते हैं । हम अपने घर-परिवार में भी अपने या बच्चे के या घर के अन्य सदस्य के जन्म के वर्षगांठ मनाते हैं।
कुल मिलाकर कई वर्षगांठ व साल गिरह पर हम काफी रकम खर्च करते हैं पर सोचनीय है कि किसी भी घटना का वर्षगांठ या साल गिरह मनाने के पीछे हमारा क्या उद्देश्य रहना चाहिए ? जिस घटना के वर्षगांठ या साल-गिरह हम मनाते हैं क्या उस घटना से मुझे वास्तविक सिख नहीं लेनी चाहिए ? इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी घटना के वर्षगांठ या साल गिरह मनाने के पीछे हमारा उद्देश्य उस घटना को याद कर उससे अच्छाई को ग्रहण करना व बुराई को त्यागना होना चाहिए । साथ ही घटनाओं को याद कर मुझे यह भी महसूस करना चाहिए कि उस घटना में कहाँ भूल हुयी और उससे हमें भविष्य के लिए सिख लेनी चाहिए । किसी भी घटना के वर्षगांठ या साल गिरह मनाने में जबतक हम उससे कुछ सिख ग्रहण नहीं करते हैं और उसे अमल में नहीं लाते हैं तबतक उस घटना का साल-गिरह मानना निरर्थक ही होगा भले ही उसके पीछे हजारों रुपये क्यों न खर्च किये गए हों । ................दुर्गा पूजा में हम पूरे नवरात्र दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं जिसमें अंततः हम यही देखते हैं कि दानवों कि हार होती है और इसके लिए देवी को उनसे लड़ना पडा था । ................
तो आयें इस दुर्गा पूजा में हम सिर्फ बाहरी सजावट में ही पैसे खर्च न करें बल्कि इस पूजा में अन्याय व बुराई के विरुद्ध लड़ने के लिए दृढ संकल्पित हों तथा अपने में जो भी बुराई हैं उसे निकाल फेकें।
आपका
महेश

Tuesday, October 16, 2007

कादम्बिनी युवा वर्ग की एक अद्वितीय पत्रिका है

कादम्बिनी पत्रिका से मैं वर्षों से परिचित हूँ पर पहले मैं इसे खरीदकर नहीं पढ़ता था । मौका निकलकर पुस्तकालय में जाकर पढ़ता था या तो वह भी नहीं हो पाता था । पर अब पिछले कई माह से मैं इसे नियमित रूप से खरीदकर पढ रह हूँ । यह पत्रिका युवा वर्ग के लिए एक अद्वितीय पत्रिका है । इसके सभी स्तम्भ अच्छे हैं । वैसे खासकर इसके साहित्यिक स्तम्भ कविता व कहानी से मैं इसके ओर आकर्षित हूँ तथा मुझमें लेखन का शौक ही इस पत्रिका का नियमित ग्राहक बनाया । वैसे इस पत्रिका का स्थाई स्तम्भ ज्ञान कोष, योग, आई टी नुक्कढ़, मतांतर, स्त्री : बाहर-भीतर भी काभी अच्छे हैं । मतांतर व स्त्री : बाहर-भीतर जैसे स्तम्भ पत्रिका में हमेशा ही प्रकाशित होते रहना चाहिए तथा हरेक युवा पाठक को इसे पढकर उसपर चिन्तन-मनन करना चाहिए व हरेक को मतान्तर में हिस्सा लेना चाहिए । यह पत्रिका युवा वर्ग के लिए एक अद्वितीय पत्रिका है । पत्रिका में जिस तरह अन्य लेखकों के पता प्रकाशित किया जता है उसी तरह स्त्री : बाहर-भीतर स्तम्भ के लेखिका तसलीमा नसरीन के भी पता प्रकाशित किया जाना चाहिए । ..........
कादम्बिनी के अक्टूबर २००७ का अंक काफी अच्छा लगा । इस अंक के कवर स्टोरी "ब्लाग हो तो बात बने" बहुत ही प्रभावित किया तथा इससे प्रभावित होकर मैं अपना ब्लाग http://popularindia.blogspot.com बना लिया । इस ब्लाग में मैं हिंदी में लिखने में असमर्थ था तो मैने लेखक बालेन्दु जी से E-mail द्वारा सम्पर्क स्थापित किया फिर उनके मार्गदर्शन से मैं ब्लाग में हिंदी में लिखने की विधि जान गया । अब मैं इसमें हिंदी में लिख लेता हूँ । मैं अपना ब्लाग बना लिया इसमें मैं अपना स्वतंत्र विचार रख सकता हूँ । लेखन में मेरी रूचि के कारण यह मेरे लिए बहुत ही अच्छी है । par यह सब कादम्बिनी व बालेन्दु जी के प्रयास से ही हुआ है जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता । इसके लिए कादम्बिनी व बालेन्दु जी को बहुत-बहुत धन्यवाद् ।
अपने ब्लाग में मेरे द्वारा समाज के विभिन्न विषयों पर स्वतंत्र विचार व तर्क देने की योजना है । बस थोडा इंतजार करें । पर इसके लिए मैं कादम्बिनी व बालेन्दु जी से और सहयोग कि आशा करुंगा ।
अंत में कादम्बिनी परिवार व 'ब्लाग हो तो बात बने' के लेखक बालेन्दु जी को दुर्गा पूजा व दीपावली के अवसर पर ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ ।
आपका

महेश

Monday, October 15, 2007

आपका दिन मंगलमय हो

नमस्कार,
कृपया इन्तजार करें, मैं जल्द ही इस ब्लोग पर तार्किक विषय से सम्बंधित विषय ला रह हूँ। बस थोडा इन्तजार करें।

Sunday, October 7, 2007

Thanks Kadambini

Thanks Kadambini for informatin of blogging. I am a new blogger.

Good morning

I am a new bloger. In this blog I send many topics for discussion. Please wait

Thanks
चिट्ठाजगत
चिट्ठाजगत www.blogvani.com Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

यहाँ आप हिन्दी में लिख सकते हैं :