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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

Saturday, February 27, 2010

होली प्रेम पूर्वक मनाएं

सबों को होली की शुभकामनाएं
होली आपसी प्रेम भाईचारा का प्रेम हैअतः यह ख्याल रखें कि इस पर्व में आपसी प्रेम बनाएं रखें तथा किसी के भी साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करेंजो चाहे उसे जबरन रंग-गुलाल लगायेंकिसी के साथ अभद्र व्यवहार करें तथा होली को प्रेम के साथ ही मनाएं

-- महेश कुमार वर्मा

Friday, February 26, 2010

महिला आरक्षण क्यों?

सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पास कर दिया है और अब इसपर बहस होगी। इस विधेयक में लोक सभा व राज्य विधान सभा में महिलाओं को 33% आरक्षण की व्यवस्था है। स्थानीय निकाय के चुनाव में पहले से ही महिलाओं को आरक्षण मिला हुआ है। पर वहाँ महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर चुने गए महिला प्रतिनिधि किस प्रकार कार्य कर रही है इस बात को मैं अपने पोस्ट आरक्षण नीति : उचित या अनुचित में बताया हूँ। मेरे इस पोस्ट से आप जान गए होंगे कि आरक्षण के कारण किस प्रकार अयोग्य को भी मजबूरन अपना प्रतिनिधि के रूप में चुनना पड़ता है। व फिर उस चुने हुए प्रतिनिधि अपने अयोग्यता के कारण खुद कार्य नहीं करते हैं और उनके बदले में कार्य कोई और करता है। और जब ऐसा होता है तो फिर उस आरक्षण का क्या मतलब रहा? यह एक विचारनीय प्रश्न है कि क्या आरक्षण उचित है? कोई किसी कार्य के लिए कमजोर है तो उसे ऊँचा उठाना चाहिए ताकि वह उस खास कार्य के लिए योग्य बन सके और इस प्रकार उसे बिना दिक्कत उस खास कार्य को करने का अधिकार प्राप्त हो सकता है और तब वह अपने कार्य को सही ढंग से कर भी सकेगा? जिस प्रकार पेड़ की डाली को चूमने के लिए हमें ऊँचा उठना होगा, पेड़ की डाली नीचे नहीं आ सकती है। उसी प्रकार कमजोर को ऊँचा उठाएं न कि आरक्षण के माध्यम से अयोग्य को जिम्मेवारी सौंपे।
जहां तक महिला आरक्षण विधेयक का सवाल है मैं महिलाओं का सम्मान करता हूँ पर लोक सभा, विधान सभा या स्थानीय निकाय के चुनाव में किसी भी प्रकार से धर्म, जाति या लिंग के आधार पर आरक्षण का मैं जोरदार विरोध करता हूँ।
मैं किसी भी प्रकार से कमजोर वर्ग को चाहे वह पुरुष हो या महिला स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि वे अपने में प्रगति करें व योग्य बनें तब फिर उनके दावेदारी पर लोग खुद उन्हें किसी भी विशेष कार्य की जिम्मेवारी सौंपेंगे। सरकार से मैं कहना चाहता हूँ कि कमजोर को ऊँचा उठाने के लिए सार्थक कदम उठाएं।
-- महेश कुमार वर्मा
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Saturday, February 13, 2010

RSBY के स्मार्ट कार्ड बनाने में अनियमितता

अपने पिछले पोस्ट में मैं बताया कि बिहार में पारिवारिक सर्वेक्षण के आंकड़ा में किस-किस तरह के गलती भरे पड़े हैं। और सच्चाई का खुलासा करते हुए आज मैं बता रहा हूँ कि BPL परिवार के लिए RSBY के स्मार्ट कार्ड बनाने में तथा उसे वितरित करने में किस तरह के अनियमितता बरती गयी है।
इसे बताने से पहले मैं बता दूँ कि स्मार्ट कार्ड बनने के बाद उसे activate करने का अधिकार FKO (हिंदी में शायद ग्राम-सचिव या पंचायत सचिव कहते हैं) को है। कार्ड activation करने की प्रक्रिया है कि FKO का अंगूठा का निशान एक खास स्कैनर से ले लिया जायेगा। फिर हरेक कार्ड को activate करने के लिए कार्ड को card reader में डालकर FKO स्कैनर पर अपना अंगूठा रखेगा। कंप्यूटर पूर्व में दिए गए अंगूठा के निशान से इस अंगूठा को मिलाएगा। यदि अंगूठा सही पाया गया तब तो आगे वह कार्ड activate होगा अन्यथा वह card activate नहीं होगा। हरेक कार्ड को activate करने के लिए बारी-बारी से कार्ड को card reader में डालकर अंगूठा का निशान स्कैनर पर देना पड़ता है जिसे कंप्यूटर पूर्व में दिए गए निशान से मिलाता है।
पर इस प्रक्रिया में अनियमितता यह बरती जा रही है कि FKO के अंगूठा के निशान के बदले कंप्यूटर ओपेरटर के ही अंगूठा के निशान save कर लिया जाता है और फिर ओपेरटर के अंगूठा के निशान से ही कार्ड activate होता है। देखने सुनने में तो यह सामान्य अनियमितता है पर वास्तव में यह बहुत ही गंभीर है। इस प्रकार से की गयी काम की जांच करने पर आप पायेंगे कि कई पंचायत के FKO के अंगूठा के निशान एक ही है और एक ही पंचायत में एक से अधिक भी अंगूठा का निशान है। जो कि सैधांतिक रूप से सही नहीं है क्योंकि विज्ञान के अनुसार किसी भी दो व्यक्ति के एक से अधिक अंगूठा का निशान नहीं हो सकता है और एक स्थान पर दो FKO भी नहीं है। सरकार को या किसी को भी इस अनियमितता की जांच करना हो तो वह activated card का backup file का data को लेकर उसके अंगूठा के निशान (जिससे वह card activate हुआ है) से वहाँ के FKO के अंगूठा के निशान से मिलाकर देखें कि क्या दोनों एक ही है? आप पायेंगे कि दोनों अलग-अलग है। इससे इस प्रकार की अनियमितता प्रमाणित होती है क्योंकि विज्ञान के अनुसार किसी भी दो व्यक्ति के अंगूठा के निशान एक ही नहीं हो सकता है।
मैं आपको यह भी बता दूँ कि मैं जो कार्य किया वहाँ मेरे अंगूठा के निशान से भी कई हजार card activate हुए। वैसे पहली बार जब मेरा अंगूठा का निशान लिया गया उससे पहले तक मैं यह नहीं जान पाया था कि FKO के बदले में यह मेरा या अन्य ओपेरटर के अंगूठा का निशान लिया जाता है। मैं समझता था कि उस ओपेरटर को ही card activate करने का अधिकार मिलता है। खैर अचानक उस दिन मेरे पास इस प्रकार का कार्य आने पर उस दिन तो मैं कार्य कर अपने अंगूठा के निशान से card activation का कार्य कर लिया। उससे पहले मैं card activation का नहीं बल्कि card printing का कार्य करता था। इस प्रकार पहला दिन तो अचानक आए इस कार्य को मैं कर दिया। पर चूँकि यह सही कार्य नहीं था तथा मैं कभी भी गलत कार्य करने के पक्ष में नहीं रहा अतः आगे मैं यह कार्य करूँ या इसे करने से इंकार कर दूँ, इसपर मैं खूब विचारा अपने किसी नजदीकी से भी सलाह लिया। अंत में मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि यदि अभी मैं यह कार्य करने से इंकार कर दूंगा तो ये मुझे कार्य पर से निकाल देंगे और फिर मेरे पास इस अनियमितता का कोई सबूत या प्रमाण भी नहीं रहेगा। और यदि मैं अभी यह कार्य कर लूँ तो फिर मुझे इस अनियमितता को साबित करने का प्रमाण मिल जाएगा। काफी सोच-विचार कर मैं वह card activation का कार्य जारी रखने का विचार किया और साथ ही साथ मैंने यह भी फैसला किया कि भविष्य में मैं इस अनियमितता को उजागर करूँगा। और आज अपने इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से मैं इस अनियमितता को सबों के सामने उजागर कर रहा हूँ। सरकार को या किसी भी जांच एजेंसी को इसकी जांच करनी हो तो वे करें। मैं इस अनियमितता का प्रमाण दूंगा, पर मेरी सुरक्षा वे सुनिश्चित करें। मेरे अंगूठा के निशान से कई हजार card activate किये गए हैं जो यह साबित करता है कि card activation FKO नहीं किया है क्योंकि विज्ञान के अनुसार दो भिन्न व्यक्ति के अंगूठा के निशान एक ही नहीं हो सकता है। card किस निशान से activate हुआ यह देखने के लिए आप activated card का backup file देख सकते हैं। मेरे अंगूठा के निशान से किस-किस पंचायत का कार्य activate हुआ मैं आपको बता सकता हूँ। मेरे इस तर्क से यदि आप सहमत नहीं हैं और यदि आपका कहना है कि अनियमितता नहीं हुई है और card FKO द्वारा ही activate किया गया है तो मैं पूछना चाहूँगा कि activated card का backup file से स्पष्ट है कि card मेरे ही अंगूठा के निशान से activate हुआ है तो आप बताएं कि मुझे कब FKO का कार्य सौंपा गया?
अंत में मैं यह भी बता दूँ कि card बनने के बाद card बांटा तो गया पर जब पूरा card नहीं बंट सका और कितने card बचे रह गए तो वहाँ भी register में card प्राप्त करने वाले के अंगूठा के निशान वाले column में भी किसी ओपेरटर से ही अंगूठा का निशान लगा कर card को वितरित दिखा दिया गया। (यह कार्य मैं नहीं किया। मुझे भी card receiving वाले column में अंगूठा का निशान लगाने के लिए कहा गया था पर मैं यह कार्य करने से सीधा इंकार कर दिया था। फिर मुझपर दबाव नहीं डाला गया था।) इसकी जांच भी आप उस register को देखकर कर सकते हैं जहां आप देखेंगे कि एक ही गाँव या पंचायत के कई card एक ही अंगूठा के निशान द्वारा प्राप्त किया गया है।
मेरे द्वारा इस अनियमितता का खुलासा करने से किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
-- महेश कुमार वर्मा 
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Date : 13.06.2012
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जानकारी को बढ़ाते हुए मैं यहाँ स्पष्ट करना  चाहूँगा कि Bikram  block के Habispur  Gona पंचायत के 660, Patut  पंचायत के 792, Dattiyana पंचायत के 651, Arap पंचायत के 515 व Bikram Koraitha पंचायत के 474 (कुल 3092) card मेरे अंगूठे के निशान से activate हुए हैं। 

-- महेश कुमार वर्मा 
 

Friday, February 12, 2010

BPL परिवार के रिकॉर्ड में गलत आंकड़ा

अपने पिछले पोस्ट में मैं इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश की है कि किस प्रकार चुनाव आयोग का मतदाता सूचि व फोटो पहचान पत्र के कार्य में गड़बड़ी होती है और सरकार द्वारा पानी के तरह पैसे खर्च किये जाने के बावजूद भी सही ढंग से कार्य नहीं होता है और गलती में सुधार नहीं होती है। आज मैं सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के लिए कराये गए सर्वेक्षण व इसके लिए बनाये जा रहे BPL परिवार के स्मार्ट कार्ड के कार्य को बताने जा रहा हूँ।
बिहार में BPL परिवार के लिए जो सर्वेक्षण किया गया है यदि उस सर्वेक्षण के नतीजे को सही मानें तो आप पायेंगे कि :
  • दो-तीन माह के बच्चा या एक-दो वर्ष के बच्चा भी मजदूरी करता है।
  • किसी के पत्नी के लिंग पुरुष भी है तो किसी के पति के लिंग स्त्री भी है। उसी तरह किसी के पुत्र का लिंग स्त्री व पुत्री का लिंग पुरुष भी है।
  • यह भी मिलेगा कि किसी के एक से अधिक पिता हैं।
  • पिता का उम्र कम व पुत्र का उम्र अधिक भी मिलेगा।
  • किसी व्यक्ति के नाम कई परिवार के सूचि में दर्ज है।
यह सब बात मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि यह बिहार में हुए सर्वेक्षण का नतीजा है और इसी के आधार पर BPL परिवार का रिकॉर्ड तैयार किया गया है व BPL कार्ड (स्मार्ट कार्ड) जारी किया गया है। ऐसे एक-दो उदहारण नहीं हैं बल्कि कई व कई परिवार के साथ मिलेंगे। इतना ही नहीं BPL परिवार को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) का जो समार्ट कार्ड वितरित किया गया है उसमें आपको कई कार्ड ऐसे मिलेंगे कि उसमें हिंदी में नाम कुछ और है तथा इंग्लिश में नाम कुछ और है।
मेरा नाम तो BPL परिवार में नहीं है और न ही मुझे RSBY का स्मार्ट कार्ड ही मिला है पर फिर भी मुझे यह बात इसीलिए मालूम है क्योंकि पारिवारिक सर्वेक्षण के रिपोर्ट को कंप्यूटर में एंट्री करने व RSBY का स्मार्ट कार्ड बनाने का कार्य मैं भी किया हूँ। सरकार को अपने कार्य में इन सब खामियों पर ध्यान देना चाहिए तथा सर्वेक्षण के कार्य में वैसे ही व्यक्ति को भेजना चाहिए जो जानकार हो। अन्यथा यही होगा कि पुत्र का लिंग स्त्री व पुत्री का लिंग पुरुष ही दर्ज होगा। अब आप सोचें कि इस रिकॉर्ड के आधार पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के कार्यक्रम में डॉक्टर उसका क्या ईलाज करेगा? क्या डॉक्टर लिंग परिवर्तित देखकर उसे गलत व्यक्ति घोषित कर ईलाज करने से इंकार कर देगा? .............
आपको ऐसे कितने परिवार मिलेंगे जिनको वास्तव में BPL के लिस्ट में नहीं आना चाहिए पर उनका नाम BPL के लिस्ट में है और वे उसका लाभ ले रहे हैं। ..............
जो भी हो पर इस तरह से कार्य होगी तो ये सब गलती में सुधार कभी नहीं होगी क्योंकि सरकार का सभी कार्य ठेका पर ही रहता है। सर्वेक्षण का कार्य भी किसी अन्य कंपनी को दिया जाता है और फिर वह जैसे-तैसे कार्य को सम्पन्न कर सिर्फ अपना ही पैसा बनाते हैं।

--महेश कुमार वर्मा

Thursday, February 11, 2010

सच्चाई का खुलासा : मतदाता सूचि में सुधार नहीं होगा

चुनाव आयोग मतदाता सूचि मतदाता पहचान पत्र बनाने में काफी पैसे खर्च कर रही हैपर मतदाता सूचि मतदाता पहचान पत्र में गलत आंकड़ा में कमी नहीं हो रही हैऔर जगह की बात तो मैं नहीं कह सकता पर बिहार में तो स्थिति यही हैयहाँ के मतदाता सूचि मतदाता पहचान पत्र मतदाता में अंकित मतदाता या संबंधी के नाम में गलती रहना आम बात हो गयी हैमतदाता पहचान पत्र में तो आप यह भी देखेंगे कि मतदाता कोई और है और फोटो किसी और का है, मतदाता पुरुष है तो फोटो किसी महिला का है, इत्यादिबिहार में मतदाता पहचानपत्र बनने की शुरुआत कई वर्ष पहले ही हुईपर प्रारंभ से अब तक मतदाता सूचि में मतदाता के नाम वगैरह में सुधार सही ढंग से नहीं हो पाया हैऔर जिस ढंग से कार्य होती है उसी ढंग से कार्य हो तो शायद कभी सुधार होगी भी नहींक्यों? क्या आपने कभी इस विषय पर सोचा कि आखिर यह सुधार क्यों नहीं हो पाती है जबकि चुनाव आयोग इसपर काफी रकम खर्च कर रही है? बिहार में रहने वाले तो इस बात को जरुर जान रहे होंगे कि मतदाता सूचि मतदाता पहचान पत्र में कितनी गलतियाँ रहती हैइस गलती के कारण एक बार चुनाव में चुनाव आयोग को समाचार पत्र में विज्ञप्ति निकालना पड़ा था कि मतदाता पहचान पत्र में हुई गलती को नजरअंदाज करके मतदाता को वोट डालने दिया जाएभले ही मतदाता उस पहचान पत्र से वोट तो डाल देते हैं पर उस पहचान पत्र में हुई गलती के कारण उसे वे अन्य जगह उपयोग नहीं कर पाते हैंकरते भी हैं तो कहीं-कहीं तो काम हो जाता है परकहीं-कहीं नाम में गलती रहने के कारण उसे अस्वीकार कर दिया जाता हैअब आप ही बताएं कि चुनाव आयोगद्वारा जारी किया गया मतदाता पहचान पत्र में गलती हो और उस गलती के कारण उसका उपयोग अन्य जगह नहीं हो, उसे अस्वीकार कर दिया जाये तो फिर उस पहचान पत्र का क्या मतलब रह गया? ऐसा भी देखने में मिला है किकिसी मतदाता सूचि में एक ही परिवार के सभी सदस्यों के नाम दो बार दर्ज है पर हरेक बार सुधार के कार्य होने के बाद भी वह उसी तरह रहता हैप्रश्न उठता है कि सुधार कार्य में इतने रकम खर्च करने के बाद भी आखिर सुधार क्यों नहीं हो पाता है?
चूँकि मतदाता सूचि मतदाता पहचान पत्र का कार्य मैं भी किया हूँ अतः मुझे उपरोक्त प्रश्न का सही जवाब मालुम हैऔर आज मैं यह खुलासा कर रहा हूँ कि किस प्रकार मतदाता सूचि मतदाता पहचान पत्र का कार्य होता है जिस कारण सुधार नहीं हो पाता है और सरकार का सभी पैसा पानी के तरह बह जाता है
चुनाव आयोग मतदाता सूचि मतदाता पहचान पत्र बनाने का कार्य ठेका पर (Contract basis पर) किसी प्राइवेटकंपनी को दे देती हैबिहार का कार्य सामान्यतः कोलकाता के किसी कंपनी को दिया जाता हैऔर फिर वह कंपनी पटना में विभिन्न स्थानों पर पटना से बाहर भी खुद या किसी अन्य को contract basis पर कार्य देकर कार्य कराती हैकार्य करने के लिए वे local (स्थानीय) ओपेरटर रखते हैंपर ओपेरटर को वे कार्य का पूरा बोझ दिए रहते हैवे ओपेरटर को टार्गेट दे देते हैं कि इतना कार्य करना हैऔर फिर इस स्थिति में ओपेरटर क्या करेगा? वे सुधार कार्य में समय बिताना छोड़कर आगे बढ़ जाते हैंऔर इस प्रकार गलती, जहाँ सुधार करनी थी वह ज्यों का त्यों बना ही रहता हैआप कहेंगे कि ओपेरटर को तो इस प्रकार नहीं करना चाहिएक्यों? आपका कहना तो ठीक हो सकता है पर मैं यहाँ यह भी बता दूँ कि ओपेरटर पर कार्य का काफी दबाव बना रहता है कि इतना कार्य करके इस टार्गेट को पूरा करना ही हैकितने जगह तो ओपेरटर को यह भी निर्देश दे दिया जाता है कि सुधार करने में समय मत बिताओ बल्कि कंप्यूटर पर सिर्फ वह डाटा खोलकर आगे बढ़ जाओ वह डाटा सुधार किया हुआ डाटा में गिनती कर लिया जायेगाऔर ओपेरटर यही करते है तथा गलती में वास्तविक सुधार नहीं होता है जबकि सिस्टम में उसे सुधार किया गया डाटा में गिन लिया जाता हैआपको मैं यह भी बता दूँ कि कोलकाता के एक कंपनी Netware Computer Services ने मुझे इसीलिए काम पर से हटा दिया था क्योंकि गलती को बिना सुधारे आगे बढ़ने के उसके बात को मेरे द्वारा नहीं मानने के कारण मैं उसका टार्गेट पूरा नहीं कर पाता था। .............
किसी भी व्यक्ति को मेरे इस सच्चाई का खुलासा करने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिएपर सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए और यों ही पानी के तरह पैसा नहीं बहाना चाहिएबल्कि कार्य में कहाँ त्रुटी है उसे खोजकर उसमें सुधार करना चाहिए।

-- महेश कुमार वर्मा

Saturday, January 30, 2010

परीक्षा में कदाचार के लिए जिम्मेवार कौन

मैं अपने पिछले पोस्ट में परीक्षा में कदाचार का जिक्र किया है विचारनीय है कि परीक्षा मूल्यांकन में कदाचार के लिए जिम्मेवार कौन है? मैं जोर देकर कहता हूँ कि परीक्षा में कदाचार के लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि परीक्षार्थी के अभिभावक रहते है जी हां अभिभावक, जो अपने बच्चे के विकास के लिए उसे स्कूल में पढ़ाते हैं पर मैट्रिक की परीक्षा में चोरी कराने में सबसे आगे उनका ही हाथ रहता है और ऐसा करके वे अपने बच्चे का जीवन उज्जवल नहीं बल्कि अंधकारमय ही बनाते हैं यह मेरी कोरी बहस नहीं बल्कि वास्तविकता है जो बच्चा स्कूल के परीक्षा में चोरी नहीं करता था और मैट्रिक की परीक्षा में भी चोरी नहीं करना चाहता है उसे भी अभिभावक मैट्रिक के परीक्षा में चोरी करने के लिए चीट / पुर्जा देते हैं यह बात सही है कि मैट्रिक के परीक्षा में चोरी / नक़ल करने के पक्ष में विद्यार्थी से ज्यादा उसके अभिभावक रहते हैं और अभिभावक खुद परीक्षा में अपने विद्यार्थी को नक़ल करने के लिए चीट (पुर्जी) पहुँचाते हैं / पहुँचवाते हैं और ऐसा करके वे अपने बच्चे का भविष्य बनाने में सहयोग नहीं करते हैं बल्कि बच्चे के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर भविष्य बिगाड़ते हैं

क्या ऐसी स्थिति से हमारी समाज सुधर सकती है?

Friday, January 29, 2010

ऐसे शिक्षक क्या पढ़ायेंगे?

जैसा कि पिछले पोस्ट में मैंने लिखा कि किस प्रकार आरक्षण नीति के कारण अयोग्य को महत्त्वपूर्ण कार्य दे दिया जाता है और इस कारण देश विकास के राह पर न चलकर पतन की ओर जाता है। योग्य व्यक्ति को दरकिनार कर अयोग्य व्यक्ति को कार्य सौंपना व्यक्ति के प्रतिभा के साथ खिलवाड़ ही है। आरक्षण के अलावा अन्य सरकारी नीति में भी इस प्रकार होती है। इसी का एक अच्छा उदहारण बिहार में कुछ वर्षों से हो रहे शिक्षकों की बहाली है। बिहार में रहने वाले तो जान ही रहे होंगे कि किस प्रकार बहाली की गयी है पर बिहार के बाहर के लोगों की जानकारी के लिए मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि इस बहाली में मेधा को कोई स्थान ही नहीं दिया गया है। प्रतियोगिता / प्रतियोगी परीक्षा समाप्त कर दी गयी। बल्कि उम्मीदवार द्वारा मैट्रिक / इंटर में प्राप्त किये गए अंक के आधार पर बरीयता सूचि के आधार पर बहाली की गयी / की जा रही है। पिछले बार भी इसी तरह हुयी थी और इस बार भी इसी तरह हो रही है। बहाली के इस नीति के ओर से तर्क दिया जा सकता है कि जिसे मैट्रिक / इंटर में ज्यादा अंक मिला है, स्वाभाविक रूप से वह तेज है अतः बिना प्रतियोगी परीक्षा के ही बहाली की जा रही है तो यह गलत नहीं है। कुछ पल के लिए यदि इस तर्क को मान लें तो इस तर्क के समर्थक को यह यह भी समझना चाहिए कि यदि वह तेज था तो वह तो उस समय तेज था जब वह मैट्रिक / इंटर पास किया था। पर आज की उसकी स्थिति क्या है इसकी जांच आपने कहाँ किया? आज आप उसके ज्ञान को परखे बिना, बिना कोई ट्रेनिंग दिए सीधे स्कूल में पढ़ाने के लिए भेज रहे है। -- क्या जो व्यक्ति 30-40 वर्ष पहले मैट्रिक किया और उस समय यदि वह तेज था और फिर इधर वर्षों से पढाई-लिखाई से उसका कोई संबंध नहीं रहा है तो क्या आप यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वह अब भी पढ़ाने के योग्य है? फिर आपको यह भी समझना चाहिए कि कोई यदि पढने में तेज है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह सही ढंग से पढ़ाने के भी योग्य है। अपने तेज होने और दुसरे को पढ़ाना दोनों में बहुत ही अंतर है। फिर मैं पूछना चाहूँगा कि क्या परीक्षा में ज्यादा अंक लाने का मतलब तेज होना है? निःसंदेह इसका उत्तर लोग हाँ में देंगे। पर मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि किस प्रकार पहले परीक्षा में खुलकर कदाचार होता था और तेज विद्यार्थी अंक पाने में पीछे राह जाते थे व कमजोर व मुर्ख विद्यार्थी अच्छे अंक लाते थे। मेरे इस कथन से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह सर्वविदित है कि बिहार में परीक्षा में व मूल्यांकन में कदाचार पहले भी होता था और अब भी हो रहा है। पटना उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से 1996 में सुधार हुआ व परीक्षा में कड़ाई हुयी। पर फिर ........ फिर उसी तरह परीक्षा में चोरी / नक़ल व कदाचार जारी है। अंतर सिर्फ यही है कि पहले विद्यार्थी परीक्षा में बैग में किताब भरकर ले जाते थे और डेस्क पर किताब रखकर किताब खोलकर व देखकर उत्तरपुस्तिका में लिखते थे। पर अब डेस्क पर किताब रखकर चोरी / नक़ल नहीं की जाती है पर परीक्षा हॉल में किताब व चीट / पुर्जा जाता ही है और चोरी होती ही है, जो किसी से छिपी हुयी नहीं है। ...... मैं यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि क्या आप यह भूल गए कि बिहार के शिक्षा में कुव्यवस्था के कारण ही बिहार के बाहर के एक राज्य (नाम मुझे याद नहीं है) ने बिहार इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद के प्रमाण पत्र की मान्यता समाप्त कर दी थी। फिर बहुत ही मुश्किल से बिहार इंटरमीडिएट शिक्षा परिषद ने उस राज्य में अपने प्रमाण पत्र की मान्यता को पुनः प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी। ................. तो इस प्रकार परीक्षा में कदाचार होती थी व होती है। तो क्या यह कहना उचित होगा कि उच्च अंक प्राप्त करने वाला तेज है ही। और फिर इस प्रकार उच्च अंक प्राप्त करने वाले के बिना कोई ज्ञान के जांच किए ही शिक्षक के रूप में नियुक्त कर बिना ट्रेनिंग के ही सीधे स्कूल में पढ़ाने के लिए भेजना उचित है? क्या इस प्रकार के शिक्षक बच्चे को सही ढंग से पढ़ा सकेंगे? बिहार में यही हो रहा है। पिछले बार के बहाली में तो उम्मीदवार के ऊपरी आयु सीमा वही थी जो आयु सीमा सेवानिवृति के लिए है। अतः 50-55 वर्ष के व्यक्ति को भी शिक्षक का नौकरी लग गया और वे अपना business छोड़कर नौकरी पर आ गए। ऐसे कितने लोगों को शिक्षक का नौकरी लग गया जिसे खुद कुछ नहीं आता है। ताज्जुब तो तब होती है जब एक पचास-पचपन वर्ष के एक पैर वाले व्यक्ति को Drill Teacher (व्यायाम शिक्षक) के रूप में नियुक्त किया गया। नियुक्त ही नहीं किया गया बल्कि वर्षों से वे नौकरी कर भी रहे है। आप सोच सकते हैं के जिनका एक ही पर है (उनका दूसरा पैर घुटना के ऊपर से ही कटा हुआ है) वह व्यायाम शिक्षक के रूप में बच्चे को क्या सिखाएंगे? ........................
तो इस प्रकार हुयी है व हो रही है शिक्षकों की बहाली और ऐसी है हमारी शिक्षा नीति। आप खुद सोच सकते हैं कि ऐसे शिक्षकों के भरोसे बच्चों का कितना विकास होगा? मेरे इस बात से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि बिहार में शिक्षकों की इस प्रकार के बहाली से लोगों को शिक्षक शब्द से ही शिक्षक के प्रति जो आदर व सम्मान की भावना थी वह अब नहीं रही। सच पूछिये तो शिक्षकों का कार्य अब अपने ज्ञान से सेवा भाव से बच्चों को सही राह पर लाकर विकास करना नहीं रहा बल्कि उनका कार्य अब सिर्फ बैठे-बैठे पैसा कमाना हो गया है।
शिक्षक = मास्टर = मास + टर
(यानी पढावें या न पढावें बस किसी तरह मास यानी महीना टरेगा यानी बीतेगा और पैसा मिलेगा)
..............
आप खुद सोचें कि इस प्रकार की व्यवस्था से देश का विकास होगा या देश का पतन होगा?

Thursday, January 28, 2010

आरक्षण नीति : उचित या अनुचित

मैंने अपने पिछले पोस्ट में बताया कि किस प्रकार सरकार जाति के आधार पर समाज को बाँट रही है। सरकार जाति के आधार पर आरक्षण करके देश को विकाश के ओर ले जा रही है या पतन की ओर? विचारने पर यह बात सामने आता है कि जाति के आधार पर या किसी भी आधार पर आरक्षण होने के कारण योग्य उम्मीदवार का चयन न होकर अयोग्य उम्मीदवार का चयन करना पड़ता है। जी हाँ, जिस वर्ग के लिए जो आरक्षण है उसे उस आरक्षण का लाभ देने के लिए यदि उस वर्ग विशेष में योग्य उम्मीदवार नहीं है तो अयोग्य को चुन लिया जाता है भले ही उसका परिणाम जो भी हो। ऐसा प्रतियोगी परीक्षा से लेकर राजनीति तक में हो रही है। आप खुद देखें -- चुनाव में जो सीट किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षित रहता है तो उस क्षेत्र में उस वर्ग विशेष के बाहर के कोई व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि यदि उस आरक्षित वर्ग विशेष में यदि योग्य व्यक्ति न भी हैं तो किसी भी अयोग्य ही सही, व्यक्ति चुनाव लड़ते हैं और जितने के बाद ......................... अयोग्य व्यक्ति जितने के बाद क्या करेंगे यह आप समझ ही सकते हैं। इस प्रकार आरक्षण की इस व्यवस्था से हमारा देश उन्नति की ओर नहीं बल्कि पतन की ओर ही जाता है। कितने सीट महिला के लिए आरक्षित रहती है। वहाँ यदि कोई योग्य महिला नहीं रहती है तो फिर उसी तरह आरक्षण के कारण किसी न किसी महिला को ही जन प्रतिनिधि बनना पड़ता है। पर जितने के बाद क्या वह अपने विवेक से कुछ कर पाती है। उसका सारा कार्य उसका पति या कोई अन्य करता है। वह तो सिर्फ नाम का ही जन प्रतिनिधि रहती है। अब आप बताएं कि जब जितने के बाद भी वहाँ उसका पति या अन्य ही कार्य करता है तो महिला के नाम पर उस आरक्षण का क्या हुआ? ऐसी स्थिति सिर्फ चुनाव में ही नहीं, सरकारी नौकरियों व प्रतियोगी परीक्षाओं में भी है। और वहाँ आरक्षण के कारण अयोग्य को भी बड़े से बड़े जिम्मेदारी वाला कार्य सौंप दी जाती है और इसका सीधा असर आम जन पर पड़ता है।
इस प्रकार आरक्षण की निति से देश उन्नति की ओर नहीं बल्कि पतन की ओर ही जाती है। सरकार को यह समझना चाहिए कि कमजोर वर्ग को ऊँचा उठाने के लिए आरक्षण नहीं बल्कि उसे वैसी व्यवस्था व साधन चाहिए जिससे वह अपने को मेधा सूचि में ला सके। और फिर बिना किसी जाति के आधार पर वह आरक्षित श्रेणी से आए नहीं कहलाकर योग्य कहलाये।
ऊँची डाली को छूने के लिए हमें ऊपर उठना चाहिए न कि डाली को ही झुकाना चाहिए। उसी तरह कमजोर को योग्य बनाकर उसे कार्य सौंपे न कि आरक्षण से कार्य को ही झुका दें।
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पाठक अपना निष्पक्ष विचार देने की कृपा करें।
आपका
महेश

Wednesday, January 27, 2010

जाति के आधार पर समाज को बांटने में सरकार कितनी दोषी

सोचनीय है कि एक ओर धर्म व जाति के आधार पर भेद-भाव समाप्त करने की बात कही जाती है और दूसरी ओर धर्म व जाति के आधार पर आरक्षण दिया जाता है। विचारने पर तो यही बात सामने आती है कि धर्म व जाति के आधार पर समाज को बांटने का कार्य करने में सबसे ज्यादा हाथ हमारी यह धर्म व जाति के आधार पर के आरक्षण व्यवस्था है। यह कोई कोरी बहस नहीं है बल्कि सौ फीसदी सही है। आप खुद देख सकते हैं कि हमारे समाज में किसी भी जाति के लोगों को एक जगह रहने में या अपना व्यापार करने में कोई दिक्कत नहीं है। पर हमारी कानून की क्या व्यवस्था है? कानून कि व्यवस्था है कि जाति प्रमाण पत्र ले आओ तो यह सुविधा मिलेगा....... तो फलां जाति के लिए इतना आरक्षण तो फलां जाति के लिए इतना आरक्षण..........आप खुद देखें कि सरकार व कानून ने समाज को जाति के आधार पर कितने वर्गों में बांटा है...... फॉरवर्ड, बैकवर्ड, पिछड़ा वर्ग, अन्यन्त पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति , दलित, महादलित............. आप कहेंगे कि जाति की व्यवस्था हमारे समाज में पहले से ही है और वहाँ इससे भी अधिक बहुतों जातियां हैं। पर आप खुद सोचें कि हमारे समाज में एक शादी को छोड़कर अन्य कहीं भी जाति को लेकर किसी को रहने या कार्य करने में कोई दिक्कत नहीं है। हाँ, पहले हमारे समाज में जातिवाद था पर अब समाज इसे छोड़ रही है पर अफसोस कि अब हमारे सरकार की जाति पर आधारित आरक्षण व्यवस्था इसे बढा रही है।
किसी ने सही कहा है :
सरकार कहती है जाति-पाती हटाओ।
कानून कहता है जाति प्रमाण पत्र ले आओ॥
क्या यह षडयंत्र है।
नहीं यह लोकतंत्र है॥
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मेरे इस आलेख पर पाठक अपनी निष्पक्ष विचार देने की कृपा करें।
आपका
महेश

Tuesday, January 26, 2010

देश से अपराध भगाना है, खुशहाल जीवन लाना है।

आज राष्ट्र 61 वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। भारत को स्वतंत्र हुए 62 वर्ष व गणतंत्र हुए 60 वर्ष हो गए। पर इतने अवधि में हमने क्या पाया? क्या देश के आम नागरिकों को देश के विकाश का वास्तविक फायदा मिल पाया है? इस बात पर विचारने पर हम पाते हैं कि कहने के लिए देश कितनी भी प्रगति क्यों न कर लिया हो पर आम लोगों के जीवन में इस प्रगति का कोई फायदा नहीं है। आज देखें हरेक जगह बेईमानी व भ्रष्टाचार फैला है और इसका सीधा असर आम जन पर पड़ रहा है। पर इस प्रकार के स्थिति के लिए जिम्मेवार कौन है? इसके लिए जिम्मेवार देश के बाहर के कोई दुश्मन नहीं बल्कि देश में ही रहने वाले हम व आप सहित पूरा देश है। और यदि हम अपने देश के अंदरूनी भ्रष्टाचार पर काबू नहीं पाएंगे तो वह दिन दूर नहीं जब हम पुनः अपने देश के अंदर के ही दुश्मन के गुलाम बन जाएंगे। हमें जागना होगा व देश के दुश्मन को भगाना होगा और इसके लिए हम सबों को साथ मिलकर चलना होगा। तो आएं अपने देश के अंदर फैले अपराध, बेईमानी व भ्रष्टाचार को समाप्त कर व देश में मानवता व सच्चाई-ईमानदारिता के धर्म की स्थापना कर देश को अपराध मुक्त व खुशहाल बनाने में अपना सहयोग करें।

देश से अपराध भगाना है।

खुशहाल जीवन लाना है॥

जय हिंद।

जय भारत॥

Sunday, January 24, 2010

क्यों न करूँ मैं गणतंत्र दिवस का बहिष्कार

गणतंत्र दिवस है आया
सोचने पर हमने है विचारा
है नहीं यहाँ बच्चों को पढने का अधिकार
है नहीं बच्चों को खेलने का अधिकार
बच्चे करते हैं होटल में काम
बेचते हैं रेल पर नशा तमाम
देखने वाला नहीं है कोई उसे
फिर हमने देश को गणतंत्र माना कैसे
गणतंत्र दिवस है आया
सोचने पर हमने विचारा
नहीं है यहाँ पीड़ित को न्याय का अधिकार
गुनाहगार घूमता है खुला बाजार
न है न्याय पाने का अधिकार
न है न्याय करने का अधिकार
न है सच बोलने का अधिकार
न है सच पर चलने का अधिकार
देश में फैली है भ्रष्टाचार
हो रही है सबों के साथ बलात्कार
तो फिर क्यों कहते हैं मेरा देश है महान
क्यों मनाऊं मैं गणतंत्र दिवस का त्यौहार
क्यों न करूँ मैं गणतंत्र दिवस का बहिष्कार
क्यों न करूँ मैं गणतंत्र दिवस का बहिष्कार
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Wednesday, December 30, 2009

नववर्ष का विचार : हमें सुधरना होगा

नव वर्ष पर सबों को हार्दिक शुभकामनाएं।

हरेक वर्ष हम नववर्ष पर एक-दुसरे को शुभकामनाएं देते है। पर कभी हमने सोचा है कि सिर्फ शुभकामनाएं भर दे देने से क्या हमारा समाज व देश उन्नति कर सकेगा। कभी नहीं, हमें अपने समाज से बुराई को हटाना होगा। जब तक हम समाज में व्याप्त बुराई को हटाने में कोई सहयोग नहीं करते हैं तो सिर्फ शुभकामनाएं देने से कुछ नहीं होगा। कितने लोग सोचते व कहते हैं कि एक हमारे चाहने से क्या होगा .......... पूरा दुनियाँ ऐसी हैं तो क्या एक सिर्फ हमारे सुधरने से दुनियाँ सुधर जायेगी ............ इस तरह से लोग कई बात कहते हैं। पर हमें सोचना व समझना चाहिए कि हम और आप जैसे व्यक्तियों से ही यह समाज बना है। तब फिर हमारे व आपके सुधरने से यह समाज क्यों न सुधरेगा? याद रखें हमारे-आपके सहयोग से ही इस देश की उन्नति संभव है। और हमारे-आपके सहयोग से ही देश से अपराध व भ्रष्टाचार समाप्त हो सकती है। अन्यथा देश की अपराध व भ्रष्टाचार हमें ही कुचल देगी।

अतः हम सबों से यह आह्वान करना चाहता हूँ कि अपने में सुधार लाते हुए समाज को सुधारने में अपना योगदान दें। यही हमारी नववर्ष की खुशी होगी।

हम बदलेंगे युग बदलेगा।
हम सुधरेंगे युग सुधरेगा॥

धन्यवाद।


आपका
महेश कुमार वर्मा

Tuesday, December 15, 2009

बारात का मतलब

मैंने अपने पिछले पोस्ट में बताया कि किस प्रकार हमारे समाज में जबरन लड़कियों की शादी करायी जाती है? फिर यदि शादी के रश्म को किसी भी तरह पूरा करने को ही शादी मानें तो होने वाले शादियों के गवाह या साक्ष्य कितने बन पाते हैं? हिन्दू परिवार से जुड़े रहने के कारण हिन्दू परिवार के कुछ शादियों को देखने का अवसर मुझे मिला है, अतः आएं इन शादियों पर कुछ विचार करें।

लोग कहते हैं कि बारात जाने का मतलब होता है कि वे बारात उस शादी के गवाह व साक्ष्य बनते हैं। पर मैं देखता हूँ कि गए बारात की उपस्थिति में तो शादी होती ही नहीं हैं तो उस बाराती को प्रत्यक्षदर्शी साक्षी या गवाह कैसे माना जाए? सामान्यतः देखा जाता हैं कि बारात लड़के वाले के यहाँ से लड़की वाले के यहाँ जाती है। और लड़की वाले के घर में ही शादी का कार्यक्रम होता है। पर उस शादी के कार्यक्रम में बाराती नहीं जाते हैं बल्कि शादी कुछ लड़के वाले व कुछ लड़की वाले के ही उपस्थिति में सम्पन्न होता है। कहीं-कहीं तो शादी के अंतिम मुख्य रश्म सिन्दुरदान के समय सामने पर्दा दे दिया जाता है और उपस्थित लोगों को भी शादी के इस मुख्य रश्म के दर्शक व साक्षी बनने से रोका जाता है। तो जब बाराती उस शादी के समय उपस्थित रहता ही नहीं है तो फिर उस बाराती को प्रत्यक्षदर्शी / साक्षी / गवाह कैसे कहा जा सकता है। तो इस प्रकार सामान्य तौर पर बाराती को प्रत्यक्षदर्शी नहीं कहा जा सकता है। और इस प्रकार 'बारात के जाने का मतलब गवाह बनना' यह कहना सही नहीं है।
पाठकों पर ही मैं इस प्रश्न को छोड़ रहा हूँ कि बारात का मतलब सिर्फ मनोरंजन ही है या और कुछ?

Monday, December 14, 2009

जहाँ जबरन शादी होती है

मित्रों, आज हम आपको उस स्थान के बारे में बताने जा रहा हूँ जहाँ जबरन शादी होती है। चौकिये नहीं, यह कोई कोरी-काल्पनिक बात नहीं बल्कि वास्तविकता है। आगे पढ़ें (Click Here)

Sunday, December 13, 2009

जागो बहना जागो

हर परिवार, हर जाति, हर समाज में शादी बड़ी धूमधाम से होती है। शादी को लोग मांगलिक व शुभ मानते हैं। दुल्हन अपने बाबुल के घर को छोड़कर पिया संग ससुराल जाती है और फिर वही ससुराल ही उसका घर-परिवार हो जाता है। दुल्हन का एक नया जीवन शुरू होता है। ससुराल में दुल्हन को अपने बाबुल के घर से भिन्न परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। अपने नए जीवन के विषम परिस्थिति में दुल्हन को अपने को ढालना पड़ता है। उसी प्रकार दूल्हा को भी अपने जीवनसाथी के साथ सामंजस्य स्थापित कर रहना पड़ता है ताकि दोनों की जीवन रूपी नैया सही ढंग से चल सके।
हर माँ-बाप अपने संतान के लिए चाहते है कि उसका जीवन सही ढंग से बीते। कन्या के व्यस्क होते ही माँ-बाप उसके लिए योग्य वर के तलाश में लग जाते हैं। पर दहेज समस्या व गरीबी के कारण कितने माँ-बाप कम उम्र में ही अपनी बेटी की व्याह रचा देते हैं तो कितने योग्य वर न ढूंढ़ पाते हैं और किसी तरह बेटी का व्याह रचाकर छुट्टी कर लेते हैं। हरेक लड़का-लड़की को अपने जीवन-साथी के संदर्भ में मन में एक सपना / एक ईच्छा / एक ख्वाहिश रहती है या उसके होने वाले दूल्हा या दुल्हन कैसी है यह जानने की इच्छा होती है। पर हमारे समाज में बेटी के व्याह में बेटी से उसके शादी के बारे में कोई राय नहीं ली जाती हैं। यहाँ तक कि उसके भावी वर के बारे में भी उसे जानकारी नहीं दी जाती है। बेटी संकीर्ण मानसिकता के समाज में इस प्रकार से दबी व फँसी रहती है कि वह अपने शादी के बारे में अपना विचार किसी से कह भी नहीं सकती है। जिस लड़का से उसकी शादी ठीक की जा रही है उसके बारे में वह किसी से पूछ भी नहीं सकती है और यदि उसे उस लड़का के बारे में कोई ऐसी बात मालूम भी होती है जिस कारण वह उसके साथ शादी न करना चाहे तो यह बात भी वह किसी को बता नहीं सकती है और यदि वह अपने ही शादी में अपनी ओर से कुछ कही तो उसपर तमाम इल्जाम लगने में भी देर न होती है। तो इस प्रकार अपने ही शादी में लड़की अपने इच्छानुसार कुछ भी नहीं कर सकती है। शादी में न तो लड़की के इच्छा को स्थान दिया जाता है, न तो उससे कुछ पूछा ही जाता है, न तो उसका कुछ सुना ही जाता है। और इस प्रकार बुद्धि-विवेक रहते हुए भी वह लड़की कठपुतली के समान रहती है और जबरन उसकी शादी किसी लड़के से करा दी जाती है चाहे वह उस लड़की को पसंद हो या न हो। लड़की को वह लड़का पसंद नहीं है या लड़की से कोई विचार नहीं लिया जाए और उसकी शादी करायी जाती है तो यह शादी जबरन नहीं तो और क्या है?
इस प्रकार लड़कियों के जबरन शादी हमारे समाज में लगभग सभी घरों में हो रहे हैं। पर सोचें कि क्या यह जबरन शादी उचित है? एक समय हमारे देश में स्वयंवर की प्रथा थी, जहाँ कन्या को भी ख़ुद अपना वर चुनने का अधिकार था। पर आज वहीं उस
की कुछ नहीं सुनी जाती है और जबरन उसकी शादी करा दी जाती है।

हमारे समाज में इस तरह के कार्य हमारी पतितता को ही दर्शाता है। हमें अपने समाज के इस कृत्य पर शर्मिंदगी होनी चाहिए। मैं अपने देश के तमाम बहनों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे महिला प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाएं।
देश के बहना तुम जागो
तुम मानव हो
तुममे बुद्धि-विवेक है
तुम्हारी चुप्पी ही तुम्हें दबाती है
अतः अपने बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करो
अन्याय के विरुद्ध लड़ो
समाज से महिला प्रताड़ना को उखाड़ फेंको
व महिलाओं को शीर्ष स्थान पर स्थापित करो
जागो बहना जागो
जागो बहना जागो

Sunday, November 22, 2009

भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान

जिस देश में भ्रष्टाचार होती है, उस देश के हम वासी हैं
दिस देश में न्याय का होता हलाल, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ बोलने का नहीं है अधिकार, उस देश के हम वासी हैं
जहाँ स्वतंत्र रहते हुए भी हैं गुलाम, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ धर्म से बड़ा पैसा है, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ पैसे से बिकती है सरकार, उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ पैसे के सामने न्यायालय भी होता अंधा, उस देश के हम वासी हैं।
भ्रष्टाचार है जिस देश की पहचान
नहीं है कहीं धर्म का नामों-निशान
उस देश के हम वासी हैं।
जहाँ हर रोज अपराध होती है, उस देश के हम वासी हैं।
मेरा देश भले हो बेईमान, पर फिर भी है यह महान
होकर बेईमान है जो महान, उस देश के हम वासी हैं।

Sunday, October 18, 2009

हमें मनुष्य बनना होगा

दिवाली का पर्व बीत गया और अब महापर्व छठ निकट गया है। आपको याद होगा पिछले वर्ष छठ पर्व के उपरांत पशुओं ने कवि के रचना के माध्यम से मनुष्य को मुर्ख की संज्ञा देता हुए शाप दिया था कि इनका व्रत निष्फल जाएगा। क्या हम मनुष्य पशुओं के शाप से मुक्त होंगे?

हम मनुष्य को सबसे बुद्धिमान विवेकशील प्राणी कहते हैं पर वास्तव में इनका जीवन आज पशु से भी बदतर है, तभी तो ये पशुओं का दुःख-दर्द नहीं समझते हैं उन्हें मारकर अपना पेट भरते हैंकिसी भी दृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति ने मनुष्य को मांसाहारी जीव के रूप में नहीं बनाया है पर मनुष्य प्रकृति के नियम को तोड़कर मांसाहार करता हैउस समय मनुष्य अपनी सारी बुद्धि खो देता है और पशु से भी बदतर बन जाता
है।

अतः कवि हमें जोर डालते हुए मनुष्य बनने के लिए कहता है :

हमें मनुष्य बनना होगा
पशुओं का दर्द समझना होगा
प्रकृति के साथ चलना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा

बन सके नारायण तो
नर का कर्तव्य निभाना होगा
अंदर के बुराई को हटाना होगा
अच्छाई को लाना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा
हमें मनुष्य बनना होगा


-- महेश कुमार वर्मा

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Saturday, October 17, 2009

दीपावली की शुभकामनाएं

दीपावली की शुभकामनाएं

अंतर में ज्ञान का दीप जलाकर सत्य के प्रकाश में ईमानदारिता के राह पर चलें।

Friday, October 9, 2009

दीपावली का संकल्प

दुर्गा पूजा व दशहरा बीत गया। ईद भी बीत गया और अब आ गया बुराई पर अच्छाई के विजय व अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक पर्व दीपावली। दीपावली का पर्व हमें अंधकार से प्रकाश में जाने की प्रेरणा देता है। इस पर्व के अवसर पर कई दिन पहले से ही लोग अपने घरों की साफ-सफाई में लग जाते है।
कार्त्तिक मास के
अमावस को मनाया जाने वाला इस पर्व को अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक माना जाता है। इस दिन शाम में लोग लक्ष्मी-गणेश का पूजन कर अपने घरों में दीप जलाते हैं। लोग घरों को दीपक से सजाते हैं और दीपक के रोशनी से ही अमावस की वह काली रात उजियाला में बदल जाता है। वैसे अब दीपक का स्थान मोमबत्ती व विद्युत-बल्ब भी ले लिया है। पर इस दिन लोग अपने घरों को दीप, मोमबत्ती, इत्यादि से प्रकाशवान बनाते हैं व खुशियाँ मनाते हैं। इस दिन धन की देवी लक्ष्मी की पूजा होती है अतः व्यापारी वर्ग में व दुकानों में इस पर्व का विशेष महत्त्व है व उस दिन लोग माँ लक्ष्मीं की पूजा कर धन-धान्य की कामना करते हैं।
पर्व में खुशियाँ मनाना व पर्व के आधार पर अच्छे राह पर चलना तो ठीक है पर लोग कुछ लापरवाही व कुछ अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से भी नहीं चुकते हैं। आप खुद देखिए, अंधकार से प्रकाश में जाने का प्रतिक पर्व दीपावली के लिए लोग महीनों पहले से अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं पर दीपावली के दिन क्या करते हैं। उस दिन लोग बम-पटाखे व आतिशबाजी से ध्वनि व वायु प्रदूषित कर हमारे पर्यावरण व वातावरण को ही नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि खुद के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाते हैं। ......... अंधकार से प्रकाश में जाना तो ठीक है, साफ-सफाई भी ठीक है पर वातावरण प्रदूषित कर खुद की स्वास्थ्य खराब करना कहाँ तक उचित है? जरा सोचें, दीपावली अंधकार से प्रकाश में जाने का पर्व है न की स्वच्छ वातावरण को प्रदूषित करने का। .....................
दूसरी ओर कितने लोगों की यह संकीर्ण मानसिकता रहती है की इस दिन रात में जुआ / सट्टा / पचीसी खेला जाता है / खेलना चाहिए और अपने इसी संकीर्ण मानसिकता के कारण कितने लोग उस रात जुआ खेलते हैं / पैसे सट्टा में लगाते हैं व हजारों रुपये बर्बाद करते हैं। पर सोचें, क्या हुआ जुआ खेलकर ...... एक ओर धन की देवी लक्ष्मी की पूजा व दूसरी ओर जुआ / सट्टा में हार कर धन बर्बाद करना ................ क्यों, ऐसा क्यों? ................... वास्तव में जुआ खेलना धन कमाने का उचित तरीका है ही नहीं। ..................

दीपावली अंधकार से प्रकाश में जाने का पर्व है और इस दिन अपने में बुराई रूपी अंधकार को हटाकर अच्छाई रूपी प्रकाश को लाना चाहिएतो क्यों इस दिवाली में हम बुरे मार्ग से हटकर अच्छे मार्ग पर चलने का संकल्प लें


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