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Justice For Mahesh Kumar Verma

Justice For Mahesh Kumar Verma--------------------------------------------Alamgang PS Case No....

Posted by Justice For Mahesh Kumar Verma on Thursday, 27 August 2015

Tuesday, March 4, 2014

नेता

नेता
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थे कभी गरीब इंसान।
नेता बने हुये धनवान॥
छोटा सा घर महल में बदला।
घुमने के लिए कार आया॥
भूल गए जन हित की बातें।
पर अवैध वसूली कभी न भूलते॥
क्षेत्र विकास के पैसे अपने घर में हैं लगाते।
गरीब जनता को और भी अधिक हैं सताते॥
बने हैं नेता जबसे।
पैसे ही पहचानते तबसे॥
नहीं पहचानते और किसी को।
छोड़ राजनीति कुछ न आता उनको॥
थे कभी गरीब इंसान।
आज है उनकी अलग पहचान॥
नेता बने हुये धनवान।
नेता बने हुये धनवान॥
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Saturday, November 2, 2013

दीपावली की शुभकामना

दीपावली की शुभकामना 

सबों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ


Friday, August 23, 2013

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर मेरा निजी विचार

31.12.2012  को मैं justice.verma@nic.in को मैं बलात्कार या अन्य अपराध पर सजा पर अपना निजी विचार e-mail से लिखा था उसे मैं यहाँ हुबहू दे रहा हूँ. पाठक अपना विचार दें. 
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MAHESH KUMAR Verma 31 December 2012 11:13
To: justice.verma@nic.in
महेश कुमार वर्मा
Webpage : http://popularindia.blogspot.in
E-mail ID : vermamahesh7@gmail.com
Contact No. : +919955239846
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महाशय,
सरकार बलात्कारियों की सजा के संदर्भ में आम लोगों की से राय माँगी  है। इसी संदर्भ में यह ई-मेल किया जा रहा है जिसमें मेरा निजी विचार दिया जा रहा है।  --

बलात्कारियों की सजा क्या होनी चाहिए इस बात पर चर्चा करने से पहले मैं इस बात पर चर्चा करना चाहूँगा कि बलात्कार या कोई भी अपराध के लिए अपराधी को सजा देने का क्या उद्देश्य होना चाहिए? निश्चित रूप से सजा का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह अपराधी या अन्य भी पुनः भविष्य में वैसी अपराध करने का दुस्साहस न करे। और इस प्रकार अपराधी को सजा देकर अपराध मुक्त समाज की स्थापना करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही सजा तय की जानी  चाहिए। इस बात पर विचार करने पर हम पाते हैं कि किसी भी अपराध के लिए सजा ऐसा नहीं होना चाहिए की अपराधी को सजा के दौरान कुछ समय के लिए कष्ट तो हो पर फिर सजा के बाद उसमें सुधार नहीं पाया जाए तथा सजा ऐसी भी नहीं होनी चाहिए की सजा का असर सिर्फ उस अपराधी पर ही पड़े तथा अन्य उस सजा से सबक न ले व अपने में सुधार न करे। अर्थात सजा वैसी होनी चाहिए कि उस सजा के बाद अपराधी में सुधार हो और वह पुनः वैसा अपराध न करे तथा सजा से अन्य भी सबक ले व फिर कोई वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। यानि सजा का उद्देश्य सिर्फ अपराधी को कष्ट देना ही नहीं बल्कि अपराधी व समाज में सुधार लाना होना चाहिए।

इन सब बातों पर विचार करने पर हम पाते हैं कि पैसे वाले अपराधी के लिए आर्थिक दंड की सजा का कोई मतलब नहीं रह जाता है उसी तरह अपराध के लिए जान दाव पर लगाने वाले या मानव बम बनने वाले अपराधी के लिए वर्तमान तरीके से दी जाने वाली मौत की सजा (समाज से दूर अकेले में फाँसी देना) का कोई मतलब नहीं रह जाता है। हाँ, किसी अपराध में अपराधी को यदि मौत की सजा ही देनी है तो समाज के बीच  में उसे पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे तड़पा कर मौत की सजा दी जानी चाहिए और उसकी स्थिति को विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर प्रसारित किया जाना चाहिए ताकि उसे अन्य लोग भी देख सके और उसका असर ऐसा पड़े कि फिर कोई भी वैसा अपराध करने का दुस्साहस न करे। वैसे एक दृष्टी से मौत की सजा उचित नहीं है क्योंकि हम मानव हैं और मानव को सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी माना गया है। तो अपराधी को मौत की सजा देना हमारी / हम मानव की बुद्धिमत्ता नहीं है बल्कि हमारी बुद्धिमत्ता तो अपराधी में सुधार लाकर उसे स्वच्छ विचार वाला बना देने में है। और इस प्रकार मौत की सजा देने के स्थान पर उसे सार्वजानिक स्थान पर पिंजड़ा में बंदकर भूखे-प्यासे रखे दिया जाए व साथ-साथ उसे उचित सिक्षा देकर उसमें सुधार का प्रयास भी किया जाए व उसमें सुधार लाया जाए। और फिर स्वच्छ विचारधारा के साथ उसे भी जीने का मौका दिया जाए। हाँ, उसे लगातार एकदम ही भूखे भी न रखा जाना चाहिए बल्कि अपना उसे अपना अपराध महसूस करने व अपने में सुधार के लिए सोचने व ऐसा करने के लिए जिंदा रहने के लिए कुछ दिनों के अंतराल पर भोजन या जो उचित हो देकर उसे जिंदा रखा जाना चाहिए। और सजा के दौरान यदि यह प्रतित नहीं होता है कि उसमें सुधार हो गया है तो जीवन भर उसे उसी तरह से उसी सजा में रखा जाना चाहिए। सार्वजानिक रूप से सजा दिया जाए ताकि अन्य लोग उसे उस स्थिति में देखकर सबक ले और फिर कोई भी वैसा अपराध न करे। सजा के दौरान उस अपराधी की स्थिति का प्रसारण विभिन्न टी. वी. व रेडियो चैनलों पर भी होनी चाहिए ताकि उस सजा को अधिकाधिक लोग देखे और उसका असर व्यापक रूप से पड़े व सजा का यह उद्देश्य सफल हो कि फिर कोई ऐसी अपराध करने का दुस्साहस न करे।

हाँ, मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यहाँ भूखे रखने की सजा मौत / फाँसी की सजा के स्थान पर रखना उचित समझता हूँ पर किस अपराध में ऐसी सजा की व्यवस्था हो इसकी चर्चा मैं यहाँ नहीं कर रहा हूँ। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वर्तमान में जिस तरह से समाज से दूर फाँसी की सजा दी जाती है उससे अन्य अपराध प्रवृति के व्यक्ति पर विशेष असर नहीं पड़ता है क्योंकि उनकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की ही रहती है और उसके सामने सजा न होने पर उसकी मानसिकता में बदलाव नहीं आता है।

अब में आता हूँ बलात्कार पर सजा की बात पर। बलात्कारी की सजा क्या होनी चाहिए -- वास्तव में यह एक महत्तवपूर्ण प्रश्न है। वास्तव में बलात्कार या सामूहिक बलात्कार या यौन शोषण एक जघन्य अपराध है और इस अपराध के साथ अपराधी पशुता से भी नीचे गिर जाता है। इस अपराध के बाद अपराधी मानव कहलाने लायक नहीं रह जाता है। अतः निश्चित रूप से ऐसे अपराधी को कड़ी-से-कड़ी सजा मिलनी चाहिए तथा सजा ऐसी होनी चाहिए जिसका समाज पर व्यापक असर हो और फिर कोई भी ऐसी अपराध करने का विचार भी मन में न लाए। मेरे विचार से ऊपर मेरे द्वारा बताये गए भूखे रखने की सजा से भी कठोर सजा इस अपराध के लिए होना चाहिए। पर वह कठोर सजा क्या हो इसपर गंभीरता से सोचकर तय किया जाए। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि वह कठोरतम सजा जो भी हो पर इस अपराध में पीड़िता के ईलाज में खर्च व पीड़िता को दी जाने वाली मुवावजा की रकम अपराधी से वसूल किया जाना चाहिए।

अंत में मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि सजा तो अपराध हो जाने के बाद दी जाती है। हमें वैसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अपराध हो ही नहीं। और ऐसी व्यवस्था के लिए हरेक मामला पर उचित व्यवस्था, उचित प्रशासन तथा उचित व त्वरित कार्रवाई के साथ-साथ प्रारंभ से ही बच्चों को उचित शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि आगे बढ़कर उसकी मानसिकता अपराधिक प्रवृति की न बने।

धन्यवाद।

आपका -
महेश

Monday, March 25, 2013

होली : शुभकामना, निवेदन व अपील


होली : शुभकामना, निवेदन व अपील



सबों को पवित्र होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

पवित्र होली प्रेम व आपसी भाईचारा का पर्व है अतः इसे प्रेम व भाईचारा का ही पर्व रहने दें। इसे किसी विवाद व शत्रुता का बदला लेने का पर्व न बनाएँ। तथा सभी तरह का वैर व कटुता का भाव भुलाकर आपसी प्रेम-भाव बनाए रखें। किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करें। जबरन किसी को रंग या गुलाल न लगायें।

धन्यवाद।

आपका - 
महेश 

होली : शुभकामना व निवेदन

होली : शुभकामना व निवेदन 



सबों को पवित्र होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

पवित्र होली प्रेम व आपसी भाईचारा का पर्व है अतः इसे प्रेम व भाईचारा का ही पर्व रहने दें। इसे किसी विवाद व शत्रुता का बदला लेने का पर्व न बनाएँ। किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करें। जबरन किसी को रंग या गुलाल न लगायें।

धन्यवाद।

आपका - 
महेश 

Thursday, March 21, 2013

जिंदा हूँ सब जानते हैं

जिंदा हूँ सब जानते हैं 



जिंदा हूँ सब जानते हैं 
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं
या मेरे लिएअपने को मृत समझते हैं
इसीलिए तो मुझसे दूरी बनाये रहते हैं
जिंदा हूँ सब जानते हैं 
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं

मैं तो कई बार मरके भी जिंदा हूँ
पर तुम तो जिंदा रहके भी मृत हो
मैँ जिंदा हूँ तुम्हारे प्यार पाने को
पर तुम मृत हो मुझे तडपाने को

छुप-छुप कर मिलना
रात-रात भर बातें करना
अपने दिल की बात बताना
यह सब मुझे याद है
पर तुम्हारे बिना जीवन ये बर्बाद है

क्यों आने दिया दुनियाँ को
हमारे संबंध व प्यार के बीच
दुनियाँ वाले तो मजा उड़ाएँगे
पर वे प्यार को कभी न समझ पाएँगे
जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं

जिंदा हूँ सब जानते हैं
पर मर गया ऐसा वो मानते हैं




-- महेश कुमार वर्मा 
21.03.2013

छत्तीस साल पहले

छत्तीस साल पहले 

छत्तीस साल पहले 
आज ही के दिन 
मेरी माँ ने मुझे दिया था जन्म 
पर आज जिंदा रहके भी 
दोनों को मिला है मरण 
क्योंकि दुनियाँ वालों ने 
दोनों को एक-दुसरे से छिना 
फिर मारने की धमकी के कारण 
माँ ने मुझसे मिलना  छोड़ा 
था मैं उनतीस का 
और आज हूँ मैं छत्तीस का 
सात साल बीत गए 
पर माँ है उसी कातिल पुत्र के साथ 
जिसने आठ साल पहले 
पिता को मारा 
भूखे रखकर उन्हें मार डाला 
और घर पर अधिकार जमाया 
बीवी की बात मानी 
पर उसे भी धोखा दिया 
जिस कारण बीवी ने उन्हें छोड़ दिया 
व एक नहीं चार-चार को 
जेल का हवा खाना पड़ा 
पिताजी का संजोया परिवार 
बिखर-बिखर कर रह गया 
छत्तीस साल पहले
आज ही के दिन 
मेरी माँ ने मुझे दिया था जन्म 
पर आज जिंदा रहके भी 
दोनों को मिला है मरण 
छत्तीस साल पहले
आज ही के दिन 
मेरी माँ ने मुझे दिया था जन्म 

-- महेश कुमार वर्मा
21.03.2013

Friday, March 8, 2013

देश के बहना जागो

जागो बहना


मैं अपने देश के तमाम बहनों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे महिला प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाएं।




देश के बहना जागो
तुम मानव हो
तुममे बुद्धि-विवेक है
अतः अपने बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल करो
अन्याय के विरुद्ध लड़ो
समाज से महिला प्रताड़ना को उखाड़ फेंको 
व महिलाओं को शीर्ष स्थान पर स्थापित करो
जागो बहना जागो 
जागो बहना जागो



Tuesday, February 26, 2013

मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी?

मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी?


मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी 

न कोई पत्र न कोई मेसेज
न कोई संवाद न कोई फोन
छोड़ के क्यों तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी

कब तक लेगी तुम मेरे प्यार की परीक्षा
आखिर क्या है तुम्हारी इच्छा
जाना ही था तो प्रेम पूर्वक कह देती
पर इतना कष्ट तुम मुझे न देती

अब कैसे रह पाऊंगा मैं
कैसे जी पाऊंगा मैं
तेरे इंतजार में हूँ मैं उस दिन से भूखा
जिस दिन से मुझे छोड़ के तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी

तेरे कारण ही था मैं जिंदा
अब कैसे मैं रह पाऊंगा
अब कैसे मैं जी पाऊंगा
फिर भी है मुझे यह आस
कि आयेगी तुम जरुर मेरे पास
है मुझे यह विश्वास
कि आयेगी तुम जरुर मेरे पास

भूखे कष्ट में तुमसे यही सवाल करता हूँ
कि मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी
मुझे छोड़ के कहाँ तुम चली गयी


रचयिता -- महेश कुमार वर्मा
दिनांक - 26.02.2013

Thursday, January 10, 2013

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष

भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष


मित्रों,



कुछ दिन बाद राष्ट्र 64वाँ गणतंत्र दिवस मनाएगा। भारतीय गणतंत्र के 63 वर्ष हो गए पर यह कहना गलत नहीं होगा कि आज भी आम लोग नारकीय जीवन जी रहे हैं। ये पग-पग पर जुल्म व अन्याय के शोषण हो रहे हैं  आज ये न तो सुरक्षित हैं न तो इन्हें उचित न्याय ही मिल पाता है। हर ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। गलत व अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने पर ये और भी असुरक्षित हो जाते हैं, साथ ही ऐसी स्थिति में इनके साथ गलत व अन्याय और भी बढ जाता है। आज न्याय पाना भी मुश्किल हो गया है। अदालत में भी न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को उसके जिन्दा रहते न्याय मिल ही जाएगा यह कहना भी मुश्किल है, तथा जबतक न्याय नहीं मिला तबतक वे मानसिक पीड़ा झेलते रहते हैं।  कितने लोग इस प्रकार के जुल्म, शोषण व अव्यवस्था के शिकार से मानसिक रुप से इतने प्रताड़ित होते हैं कि ऊब कर वे या तो मौत को गले लगा लेते हैं या अपराध जगत में कदम रख देते हैं।



सोचें कि इस प्रकार के परिस्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है? आखिर कब हमें स्वच्छ व अपराध मुक्त समाज मिलेगी?



-- महेश कुमार वर्मा

Sunday, December 30, 2012

महिला हूँ तो क्या हुआ

 महिला हूँ तो क्या हुआ



महिला हूँ तो क्या हुआ
मैं भी मानव हूँ
 मुझमें भी दिल व दिमाग है
मुझमें भी साहस व शक्ति है
 अब तक सहती रही
बहुत सही अत्याचार
 पर अब न सहूंगी
 अब न सहूंगी



-- महेश कुमार वर्मा 

मुझे जन्म ही लेने क्यों दिया


 मुझे जन्म ही लेने क्यों दिया



आज उस समय मेरे आँखों में आंसू आ गए जब मैंने देखा की लडकियां असुरक्षा के कारण खुद को गर्भ में ही मार देने की बात उठाई। जी हाँ, 16.12.2012 के दिल्ली के सामूहिक दुष्कर्म और फिर पीड़िता की मौत को लेकर पटना के कारगिल चौक पर लोग शोक में मौन रखे। साथ ही न्याय के लिए नारा लगा रहे थे जिसमें लड़के-लड़कियों के हाथ में विभिन्न नारा लिखे पोस्टर थे जिसमें एक पर लिखा था - "KILL ME IN THE WOMB IF YOU CAN'T PROTECT".

बिडंबना है कि एक और लोग कन्या भ्रूण हत्या रोकने की बात करते हैं वहीं दूसरी और असुरक्षा के कारण लडकियां यह कहने को मजबूर है कि यदि उनकी सुरक्षा नहीं हो सकती है तो उसे गर्भ में ही मार दिया जाए। सोचें, उनका कहना भी सही है। हमें बदलाव लाना होगा। लड़की व महिला को सुरक्षा देना होगा। मानते हैं कि बलात्कार जैसी घटना बलात्कारी के गलत मानसिकता का प्रभाव है पर ऐसी घटना रुकने का नाम नहीं ले रही है तो ऐसे में लड़कियां यह सवाल उठाएगी ही कि क्या उसकी यही गलती है कि वह लड़की है? यदि उसकी यही गलती है और इस कारण उसे सुरक्षा नहीं मिलेगा तो उसे जन्म ही क्यों लेने दिया गया?

हमें हरेक परिस्थिति पर विचारना होगा। यह बात भी सही है कि हमारे समाज में जो बाल-विवाह हो रहे हैं उसके कारण में अन्य कारणों के अलावा एक कारण यह भी है कि सयानी कुवांरी लड़की सुरक्षित नहीं है और इसी कारण माँ-बाप जल्द ही शादी कर उसे ससुराल भेज देना चाहते हैं।

-- महेश कुमार वर्मा

Saturday, November 24, 2012

महिलाओं को उसके गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग जानने का अधिकार मिलना चाहिए

 महिलाओं को उसके गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग जानने का अधिकार मिलना चाहिए

आज लोग सूचना का अधिकार व जानकारी प्राप्त करने का अधिकार को बढावा दे रहे हैं। बात भी सही है लोगों को यह अधिकार मिलना चाहिए। सभी लोग इस बात से सहमत होंगे कि हमें अपने देश के बारे में, अपने समाज के बारे में, अपने परिवार के बारे में तथा अपने व अपने शरीर के बारे में भी जानने का अधिकार मिलना चाहिए। जब हमें यह सब अधिकार मिलना चाहिए तोगर्भवती स्त्री को उसके गर्भ मेँ पल रहे भ्रूण का लिंग जानने का अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? भ्रूण हत्या के डर से महिला को इस अधिकार से वंचित किया गया है जो किसी भी अर्थ में उचित नहीं है। आप भ्रूण हत्या को रोकें, भ्रूण हत्या में लिप्त लोगों को कठोर सजा दें यह सही है। पर आज के विकसित वैज्ञानिक युग में महिलाओं को उसके कोख मेँ पल रहे भ्रूण का लिंग जानने के अधिकार से वंचित करना विज्ञान के प्रगति के लिएकलंक ही है। मैं नर व मादा दोनों प्रकार के भ्रूण हत्या का विरोध करता हूँ पर महिलाओं को उसके गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग जानने के अधिकार के पक्ष में जोरदार बहस करता हूँ।

--महेश कुमार वर्मा 

Tuesday, November 13, 2012

मैं खुश रहूँ या न रहूँ, आप सब खुश रहें

मैं खुश रहूँ या न रहूँ, आप सब खुश रहें

आज दिवाली का दिन है। लोग खुशियाँ मना रहे हैं। पर मुझमें कोई ख़ुशी नहीं है। वैसे मेरी ख़ुशी तो कब ही मुझसे दूर हो गयी है ............................. पर ..................... आज जैसा लग रहा है कि मैं सारा चीज खो गया हूँ   .................. पर किसे कहूँ मैं अपनी बात ........................ कोई तो नहीं रहा अपना .....................

खैर, छोड़िये इन बातों को मैं खुश रहूँ या न रहूँ, आप सब खुश रहें।
सबों को दीपावली की ढेर सारी शुभकामनायें।

-- महेश

Wednesday, October 31, 2012

इंदिरा गांधी को गोली क्यों मारी गयी

इंदिरा गांधी को गोली क्यों मारी गयी

आज ३१ अक्टूबर है. २८ वर्ष पहले आज ही के दिन तात्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को आतंकी ने गोली मारकर मार डाला था. मेरे जीवन में भी वह दिन बहुत ही महवपूर्ण था क्योंकि उस दिन मैं दिन-रात रोते रहा था पर मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला था कि इंदिरा गांधी को गोली क्यों मारी गयी...... उस समय मैं ७ वर्ष का था.  विस्तृत यहाँ देखें..............

मैं व इंदिरा गाँधी

http://mahesh-kee-aatmkatha.blogspot.in/2011/02/blog-post.html




Monday, October 22, 2012

दुर्गा पूजा : जरा इधर भी ध्यान दें


दुर्गा पूजा : जरा इधर भी ध्यान दें


सबों को दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं। दशहरा के पर्व को अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतिक माना गया है। इस पर्व में लोग शक्ति की देवी दुर्गा की आराधना करते हैं तथा खुशियाँ मनाते हैं व कई प्रकार से खर्च करते हैं। पर जरा सोचें हमारे समाज व परिवेश में ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें भोजन तक की उचित व्यवस्था नहीं है और इनमें से कई ऐसे हैं जो अपने पेट भरने के लिए अपराध या कुकर्म को अपना रहे हैं। सोचें कि इस स्थिति के लिए जिम्मेवार कौन है? निःसंदेह इस स्थिति के लिए जिम्मेवार हमारी समाज, परिवेश व सरकार के भ्रष्ट नीति है। हमें इस पर सोचना चाहिए व इस स्थिति को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए।

-- महेश कुमार वर्मा 

Sunday, September 9, 2012

मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंद

 मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंद


मेरा कष्ट बढ़ाकर तुमको आता है आनंद 
मुझे छटपटाता देखकर तेरा पुलकित होता मन 
दिल तड़पाकर क्या चाहते हो 
दिल दुखाकर क्या चाहते हो  
मुझको रुलाकर क्या चाहते हो 
क्या चाहते हो 
क्या चाहते हो 
खुलके बोलो स्पष्ट बोलो 
चुप क्यों हो मुँह तो खोलो 
क्या चाहिए कह भी दो ना 
जो भी चाहिए स्पष्ट बोलो 
मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंद 
मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंद 


-- महेश कुमार वर्मा 

Friday, August 31, 2012

प्यार की परीक्षा

प्यार की परीक्षा


मेरे प्यार को तुने पैरों तले रौंद दिया
पर तेरे पग धुरी को भी मैं प्रसाद के तरह स्वीकार किया
किस तरह लोगे मेरे प्यार की परिक्षा
भूखे रखकर, अग्नि में जलाकर या जहर पीलाकर
चाहे जिस तरह ले लो मेरे प्यार की परीक्षा
पर तुम्हें चाहा है तुम्हें ही चाहेंगे
तड़पाओगे तो तड़ते रहेंगे 
रुलाओगे तो रोते रहेंगे 
भूखे रखोगे तो भूखे ही रहेंगे 
पर तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे 
क्योंकि किया हूँ मैं तुमसे प्यार 
किया हूँ मैं तुमसे प्यार 


-- महेश कुमार वर्मा 

Wednesday, August 15, 2012

स्वैच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं?

स्वैच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं?

मित्रों, आज हम स्वतंत्रता के 65वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं।  देश की स्थिति को देखते हुए इस मौके पर मुझे तो बहुत कुछ कहने की ईच्छा होती है पर क्या करूँ हमारे देश में व्यवस्था ऐसी हो गयी है कि बोलने का भी अधिकार नहीं रह गया है।   आप खुद देखें कि हरेक जगह यह आलम है कि लोग निर्बल को दबा रहे हैं और पीड़ीत असहाय होने के कारण चुप रहता है और यदि वह अपने साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है तो उसके साथ और भी कष्ट व शोषण होने लगता है तथा उसे न्याय भी नहीं मिलाता है।  पीड़ीत न्याय के लिए कोर्ट व सरकारी दफ्तर का चक्कर लगा कर थक जाता है और उसे न्याय नहीं मिलती है।  ऐसी स्थिति में कभी-कभी तो पीड़ीत मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित होता है कि वह आत्महत्या तक कर बैठता है।  वैसे आत्महत्या सही नहीं है।  पर कोई भी यों ही शौक से आत्महत्या नहीं करता है बल्कि यदि कोई आत्महत्या करता है तो उसके आत्महत्या का कारण कोई और ही होता है।  आत्महत्या करने वाले के पास जब कोई चारा नहीं बचता है तब ही वह ऐसा कदम उठाता है।  आखिर वह करे भी क्या?  उसे तो कुछ बोलने का भी अधिकार नहीं रह जाता है उसे न्याय पाने का भी अधिकार नहीं रह जाता है तो वह पीड़ीत करेगा भी क्या?  जब उसके ऊपर हो रहे अन्याय से उसका जीना ही मुश्किल हो जाए व अन्याय उसे जीने में ही बाधा पहुंचाए तो वह आत्महत्या नहीं तो और क्या करेगा?
कभी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस बात के लिए फटकार लगाई थी की जब सरकार वेश्याप्रथा व देहव्यापार को बंद नहीं कर सकती है तो इसे अनुमति ही क्यों नहीं दे देती है?  सुप्रीम कोर्ट का यह फटकार सही था।  उसी तरह मैं सरकार व कानून व्यवस्था से पूछना चाहता हूँ कि जब सरकार पीड़ीत को न्याय नहीं दिला  सकती है तो फिर उसे खुद लड़-झगड़ कर अपना फैसला करने का अधिकार क्यों नहीं दे देती है या फिर अन्याय से जब उसे जीना मुश्किल हो रहा हो तो उसे स्वेच्छिक मृत्यु का अधिकार क्यों नहीं दे देती है?  मेरी यह बात लोगों को ख़राब लग सकता है पर यह बात सही है कि कई लोगों की आज स्थिति ऐसी ही है। 

-- महेश कुमार वर्मा 

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Saturday, August 11, 2012

गलत व झूठ का सर्वाधिक प्रयोग न्यायालय में

गलत व झूठ का सर्वाधिक प्रयोग न्यायालय में


जी हाँ, न्यायालय, जिसकी व्यवस्था की गयी है न्याय पाने के लिए, पर दुःख की बात है कि इसी न्यायालय में गलत व झूठ का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है.  और बिना जाँच किए फैसला भी किया जाता है.  और इस कारण कई बार बेकसुर को भी सजा मिल जाती है तो कई बार दोषी को उचित सजा नहीं मिलती है.  ................  केस की अधिकांश कहानी तो मनगढ़ंत ही रहती है.  ............... जैसे किसी व्यक्ति को किसी से किसी बात का बदला लेना है तो उसे फँसाने के लिए वह व्यक्ति उसके खिलाफ झूठा क्रिमिनल केस कर देता है जिसमें वह मारपीट का या कोई अन्य आरोप लगा देता है.  .................  ऐसा झूठा केस तैयार करते समय वे लोग अपने वकील से इस बात पर भी विचार करते हैं कि घटना का स्थान क्या दें जैसे कि क्या दें कि मारपीट घर पर हुआ या खेत में या दुकान पर .....................  अब जब वास्तव में मारपीट हुआ ही नहीं और झूठा ही केस करके फँसाना है तो सोचना पड़ता है कि घटना का स्थान क्या दें ................  निश्चित है कि ऐसी स्थिति में मुदालय यदि अपने को निर्दोष साबित नहीं कर पाता है तो उसे सजा भुगतना ही पड़ेगा.

कई बार तो लोग अपने बचाव के लिए या गलत कार्य करने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं और हमारी अंधी कानून व्यवस्था बिना जाँच किये कार्रवाई पूरी कर देती है और फिर लोग उसी कार्रवाई के आड़ में गलत कार्य कर लेते हैं.  .............  ऐसा ही एक उदाहरण है – एक नबालिग लड़की अपने प्रेमी के साथ भागकर शादी कर ली.  वह दोनों तो घर से भागे हुए थे.  इधर लड़की के घरवालों ने उस लड़का पर लड़की भगाने का या अपहरण का केस कर दिया.  कोर्ट की कार्रवाही प्रारंभ हुयी.  ....................  लड़का गिरफ्तार नहीं हो सका तब कुर्की जब्ती का आदेश हुआ.  .................. अब लड़का-लड़की दोनों चाहते हैं कि कुर्की जब्ती भी नहीं हो और हमदोनों का शादी बना हुआ ही रहे.  ............  इस संबंध सहायता के लिए लड़का-लड़की दोनों एक वकील के पास पहुँचते हैं.  वकील मामला जानने के बाद उसे कहते हैं कि ऐसे नहीं होगा पहले माँग का सिंदूर धोओ और साड़ी उतारकर सलवार-समीज पहनो ...........  इसपर लड़का-लड़की दोनों आपत्ति करते हुए कहते हैं कि हमलोग तो शादी कर चुके हैं ..............  तब वकीत साहब उन्हें बताते हैं कि शादी निश्चिंत से करना पहले सिंदूर धोओ और सलवार-समीज पहनो. ..................  इस प्रकार वह वकील उस लड़की का सिंदूर धुलवा दिए और साड़ी हटवाकर सलवार-समीज पहनवा दिए.  ................ अब वकील उस लड़की को DSP के पास ले जाकर ब्यान दिलवा दिए कि मुझे मेरे पिताजी बेचना चाहते थे तो मैं भागकर ननिहाल चली गयी थी और वहीं थी.  मुझे मालुम हुआ कि लोग उस पर (उस लड़का पर) केस कर दिए हैं इसलिए हम आए हैं जबकि मैं उसके साथ नहीं थी, मुझे उससे भेंट भी नहीं हुयी है.  ............... रहेगी कहाँ? इसपर लड़की कही कि रहेंगे तो पिताजी के पास ही.  ..................................  DSP के पास इस प्रकार का ब्यान लड़की से दिलवा दिया गया फिर वकील साहब उस लड़की को Court लाकर Court में भी वही ब्यान दिलवा दिए.  ............. Court लड़की के पिताजी पर लड़की बेचने के सोच का आरोप का जाँच किए बिना लड़की को उसके पिताजी को सौंप दी तथा उनसे यह बात लिखवाकर receiving ले ली कि लड़की को ले जा रहे हैं, इसे सही ढंग से रखेंगे तथा जब भी अदालत माँग करेगी इसे अदालत में पेश करेंगे..........................

इस प्रकार अपने पिताजी पर बेचने की सोच का आरोप लगाकर भी अपनी ईच्छा से लड़की अपने पिताजी के पास चली गयी.  और उसके पिताजी उसे सही ढंग से रखने व जरूरत पड़ने पर अदालत में पेश करने की बात पर ले गए.  .................  और इसके बाद उस लड़का पर का केस भी समाप्त हो गया.  ........... पर लड़की नबालिग ठीक तो क्या उसका तो उद्देश्य अपने प्रेमी के साथ शादी करके रहने का था और इसी उद्देश्य के लिए हे तो वकील उसके पिता पर लड़की के मुख से ही बेचने की सोच का आरोप लगवा दिए थे .....................  लड़की कुछ दिन पिताजी के पास रही और फिर घर से और भी पैसे वगैरह लेकर फिर अपने उसी प्रेमी के साथ भाग गयी.  ........................  बस, लड़की का काम हो गया.  .........................  अब लड़की के पिताजी पुनः न तो थाना जा सकते थे न तो कोर्ट ही जा सकते थे क्योंकि लड़की पहले से उनपर बेचने की सोच का आरोप लगा चुकी है और उसके पिताजी कोर्ट में यह लिखकर दे चुके हैं कि हम इसे ले जा रहे हैं और सही ढंग से रखेंगे तथा अदालत जब माँग करेगी तब इसे अदालत में पेश करेंगे ..............................  बेचारा लड़की के पिताजी फँस गये.  अब यदि वे Court या थाना जाते हैं तो उनपर ही गाज जिरेगी कि वे सही से लड़की को नहीं रखे.  .........................

तो इस प्रकार झूठ का सहारा लेकर लड़का के कुर्की जब्ती को रोक भी दिया गया और नबालिग लड़की अपने उसी प्रेमी लड़का के साथ भी हो गयी और फँक गए बेचारे लड़की के पिताजी और उसे लड़की मिली भी तो फिर भाग ही गयी.  .......................  यहाँ, हमारी अँधी कानून व्यवस्था के कारण ही झूठ का सहारा लेकर नबालिग लड़की अपने प्रेमी के साथ दुबारा भागने में सफल रही. ..................  यदि हमारा कानून व्यवस्था लड़की द्वारा पिताजी पर बेचने की सोच की आरोप का जाँच करता तथा जाँच करता कि लड़की वास्तव में कहाँ थी तो शायद उसे दुबारा भागने से बचाया जा सकता था.  ..................

वास्तव में हमारी कानून व्यवस्था अंधी ही है.

न्यायालय में आँख पर पट्टी बाँधे हाथ में तराजू लिए महिला का मूर्ति / चित्र इस बात का प्रतीक माना जाता है कि यहाँ पक्षपात नहीं होता है बल्कि उचित न्याय होता है.  पर आज के स्थिति में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह मूर्ति इस बात का प्रतीक है कि मैं (न्यायालय) अंधा हूँ, यहाँ हम कुछ नहीं देखते हैं बल्कि जैसा कहा जाता है उसे ही सही मान लेते हैं और उसी अनुसार सही-गलत देखे बिना ही फैसला करते हैं क्योंकि मेरे आँख पर पट्टी है, मैं नहीं देख सकता हूँ तथा मैं अंधा हूँ.

-- महेश कुमार वर्मा

Thursday, August 2, 2012

वाहन का 99% Insurance Claim फर्जी


वाहन का 99% Insurance Claim फर्जी

कुछ दिन मुझे New India Automobiles, Khajpura, Baily Road, Patna में कार्य करने का अवसर मिला है.  यह 4-wheeler का service centre (workshop) है.  यहाँ मैं जो देखा उसमें पाया कि वाहन का अधिकांश Insurance Claim फर्जी ही रहता है.  मैं जैसा देखा उस अनुसार मैं समझता हूँ कि हरेक जगह ऐसी ही स्थिति होगी और मेरे अंदाज से इस तरह का फर्जी Insurance Claim 99% या इससे भी अधिक रहती होगी.  कैसे?  इसे समझने के लिए इस बात पर ध्यान दें कि कोई भी 4-wheeler servicing के लिए workshop में आता है तो उसमें जैसी खराबी रहती है या जो भी parts टूटा या damage रहता है तो उसमें देखा जाता है कि इसमें से Insurance Claim से किस parts का पैसा मिल जाएगा.  तब फिर उसी अनुसार घटना की एक काल्पनिक कहानी बनाकर Insurance Claim किया जाता है.  जैसे - यदि गाड़ी का पिछला बम्फर थोड़ा damage है और party उसे change करवाना चाहता है तो Insurance Company के पास claim किया जाता है और घटना का विवरण दिया जाता है कि गाड़ी चल रही थी अचानक आगे कुत्ता आ गया तो break लगाया तब पीछे से दूसरा गाड़ी मार दिया जिससे बम्फर टूट गया.  .............  इस प्रकार के claim में यदि वास्तव में बम्फर टूटा हुआ नहीं है तो जानबुझकर workshop में उसे तोड़ा जाता है तब claim दिया जाता है ताकि Insurance Company वाला आकर फोटो खींचे तो फोटो में टूटा हुआ दिखाई पड़े.  ................  तो अधिकांश claim इसी तरह का फर्जी ही रहता है और लोग Insurance Company को ठगकर उससे पैसा ले लेते हैं.  इस तरह के claim में घटना की तिथि भी गलत ही दी जाती है.  सामान्यतः जिस दिन claim किया जाता है उसी दिन या एक दिन पहले का घटना दिखाया जाता है.  ...................  जैसा कि मैं बताया आप यह समझ ही गये होंगे कि वास्तव में घटना घटती नहीं है बल्कि झूठी काल्पनिक कहानी के आधार पर ही claim किया जाता है.  और यदि आप बताए गए स्थान पर या Police / Traffic Police के पास जाँच करेंगे तो इस प्रकार का कोई घटना की जानकारी नहीं मिलेगी.  ..............  इस प्रकार झूठा claim करके लोग Insurance Company को हजारों रुपये का नुकसान पहूँचाते हैं व Insurance Company spot (घटना स्थल) पर जाँच किए बगैर ही claim का पैसा भी दे देती है.  हद तो तब हो जाती है जब Insurance Company वैसी claim को भी पास कर देती है जिसपर संबंधित व्यक्ति के हस्ताक्षर में अंतर रहता है या कोई अन्य व्यक्ति ही उनके स्थान पर हस्ताक्षर कर देता है.  ........ ऐसा ही एक उदाहरण है – October 2011 में New India Automobiles, Khazpura, Baily Road, Patna के मार्फत Sanjay Kumar, Kankarbagh, Patna द्वारा Future Generaly नामक Insurance Company से लिया गया claim का पैसा .............. इसमें claim में Sanjay Kumar हस्ताक्षर नहीं किये हैं बल्कि उनके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति से हस्ताक्षर करवाकर process पूरा करवाया गया.  ...........  सोचिए गलत व्यक्ति के हस्ताक्षर से claim कैसे पास हो गया? ..............
इस प्रकार गलत कहानी के आधार पर फर्जी claim देकर लोग Insurance Company से पैसा ले लेते हैं.  और कभी-कभी वास्तविक claim को भी Insurance Company पास नहीं करती है.  इसी प्रकार का एक उदाहरण है – एक व्यक्ति का गाड़ी खड्ड में गिर गया जिससे उसके गाड़ी का बायाँ भाग damage हुआ ....... वह संबंधित Insurance Company में Insurance Claim किया.  ..............  Insurance Company के व्यक्ति सर्वे करने आए पर यह कहकर claim पास नहीं किया गया कि बायाँ भाग damage का claim पास नहीं होगा.  ........  अब आप खुद सोचें कि यह कैसी बिडम्बना है कि वास्तव में उसके साथ accident हुआ है और गाड़ी damage हुआ है तो उसका claim पास नहीं हुआ और जब लोग झूठी कहानी बनाकर या जानबुझकर गाड़ी damage करके झूठी कहानी बनाकर claim करते हैं तो उसका claim पास हो जाता है व उसे claim का पैसा भी मिल जाता है.  .................
सोचिए कि क्या इस प्रकार की स्थिति में हमारा देश तरक्की कर पाएगा?  ....................

-- महेश कुमार वर्मा

Sunday, July 15, 2012

परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास करें


परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास करें

यह सभी जानते हैं कि परीक्षा में कदाचार से विद्यार्थी के शिक्षा का सही आकलन नहीं हो पाता है.  और कदाचार के द्वारा परीक्षा पास कर उच्चतर वर्ग में नामांकन लेने के बाद फिर विद्यार्थी किस प्रकार क्या सीख पाएगा यह आप समझ ही रहे हैं.  वे कभी भी अपने विषय का सही ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकेंगे. पर इतना समझने के बावजूद भी विद्यार्थी व उनके अभिभावक किसी भी तरह से कदाचार से परीक्षा पास करना ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं.  और इस कार्य में अभिभावक की अलावा स्कूल, कॉलेज, इंस्टीच्यूट के परीक्षा संचालन के स्टॉफ सहित केन्द्राधीक्षक की भी अहम भूमिका रहती है.  और वे तो अब कदाचार के सीमा को इतना तक पार कर गये हैं कि इसके बाद तो परीक्षा शब्द का मतलब ही नहीं रह जाता है.  ...........  परीक्षा केन्द्र पर गये बिना परीक्षा पास होना, प्रश्न का उत्तर लिखे बिना परीक्षा पास होना .............. ये सब इन्हीं कदाचार के उदाहरण हैं.  ..................  जी हाँ, इस तरह के कदाचार भी जोर-शोर से चल रहा है व संबंधित पदाधिकारी का पॉकेट भी अच्ची तरह से गरम हो रहा है.  और इस तरह की घटनाएँ छोटे परीक्षाओं से लेकर अच्छे-अच्छे विश्वविद्यालय के परीक्षाओं में भी हो रही है.  ................  ऐसा ही एक घटना मैं आपको सुनाना चाहता हूँ जो परीक्षा के इस कदाचार को भी प्रमाणित करती है व कदाचार में सेंटर के डायरेक्टर का साथ नहीं देने पर किस प्रकार वे एक ईमानदार स्टॉफ को कार्य पर नहीं रखते हैं, यह भी स्पष्ट होता है.  तो सुनें वह घटना जो मेरे ही साथ घटी है -
27 जनवरी 2012 की बात है – मेरी मुलाकात मौलाना मजहरूल हक अरबी एवं फारसी विश्वविद्यालय (Maulana Mazharul Haque Arbic and Persian University) के अंतर्गत चलने वाले Patliputra Institute of Technology and Management, Patliputra Colony, Patna डायरेक्टर Prof. V. K. Singh (Mob. No.: 9386803802) से हुयी.  मुझसे मिलने के बाद वे मुझसे प्रभावित हुये.  वे मुझे अपने यहाँ कार्य पर रखना चाहे.  मैं भी अच्छा कार्य ढूँढ ही रहा था.  ............  वे मुझसे बातचीत कर मेरा Resume विचारार्थ रख लिए.  कुछ दिनों के बाद वे मुझे बुलाये व Computer पर कार्य करवाकर मेरा Interview लिए व फिर मेरा सारा Certificates का Xerox Copy व एक फोटो जमा करवा लिए.  ......................
इसके बाद वे मुझे रोज बुलाने लगे तथा मेरा कागजात University भेज दिए हैं ............... आज order होगा ............. कल order होगा .......... Registrar अभी बाहर गये हुए हैं, वे आएँगे तब order हो जाएगा ............... आपका selection बेगुसराय सेंटर के लिए confirm है ................. 1 मार्च को joining करना है .............. Registrar बीमार पड़ गए हैं ............. – इस प्रकार की बात वे करने लगे पर वे मुझे रोज आकर मिल लेने के लिए कहते थे.
इसी तरह की बातें कई दिनों तक होती रही.  इसी बीच 17.02.2012 से उस centre पर यानी Patliputra Institute of Technology and Management पर B. Com. की परीक्षा प्रारंभ होने वाली थी.  इस परीक्षा के लिए Director V. K. Singh मुझे एक परीक्षार्थी का परीक्षा का copy लिखने के लिए कहे.  मुझे copy मिलता और मैं उसे अपने घर पर ले जाकर लिखता ............ इस कार्य के लिये वे मुझे पैसे का प्रलोभन भी दिए.  उसी तरह मैं यहाँ भी इस कार्य से इंकार नहीं किया जिस प्रकार मैं RSBY के कार्य में इंकार नहीं किया था. .................  17 तारीख आने पर University के Programme के अनुसार परीक्षा प्रारंभ हो गयी पर उस परीक्षार्थी का copy नहीं लिखा गया.  एक दिन Director V. K. Singh पुनः कह रहे थे कि copy रखा हुआ है, कहो तो दे देते हैं लिख दो ........... पर वे सिर्फ अपना फायदा ही देख रहे थे, वे मुझे पहले पैसा देने के लिए तैयार नहीं हुए और मैं स्पष्ट कह दिया कि पहले payment होगा तब लिखेंगे और इस प्रकार मैं copy लिखने के लिए तैयार नहीं हुआ.  .................  इसपर वे मुझपर गुस्सा गये व बोले कि जब तुमको मुझपर विश्वास ही नहीं है तो फिर मैं क्यों तुमको रखूँगा, जाओ यहाँ से ................ पर फिर बाद में मेरा appointment का order के बारे में पता करने के लिए बोले.  ................  पर अंततः 25 या 26 फरवरी तक यह कार्य नहीं हुआ.  फिर आगे मैं पुछना भी छोड़ दिया.  इसके बाद मैं न तो उनसे मिला न तो फोन ही किया.  .......................
इस घटना से क्या निष्कर्ष निकलता है, आप खुद समझ सकते हैं.  ..................... यह तो स्पष्ट ही है कि मौलाना मजहरूल हक अरबी एवं फारसी विश्वविद्यालय के Patliputra Institute of Technology and Management, Patliputra, Patna में परीक्षार्थी को centre पर गए बिना भी परीक्षार्थी का copy लिखा जाता है व परीक्षा के दिन बित जाने की बाद भी copy लिखा जाता है. ............................
अब आप सोच सकते हैं कि जहाँ नितिश सरकार के कार्यकाल में विकास की चर्चा है वहाँ वास्तव में यह राज्य विकास की ओर है या शिक्षा-जगत में इस प्रकार के कदाचार से पतन की ओर है?  ........................  और आप सोचें कि शिक्षा-जगत में इस प्रकार के कदाचार से क्या बिहार या हमारा देश कभी विकास कर पाएगा?

-- महेश कुमार वर्मा


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